एनडीटीवी माफी मांग ले तो एक दिन का प्रतिबंध हम भी माफ कर देंगे : मोदी सरकार

एक दिन का प्रतिबंध लगाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है. केंद्र की मोदी सरकार ने कहा है कि पठानकोट एयरबेस पर आतंकी मामले की गलत रिपोर्टिंग के लिए चैनल अगर माफी मांग ले तो वह एक दिन के प्रतिबंध को माफ कर सकती है. एनडीटीवी के वकील ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि उन्हें हफ्ते भर का समय दिया जाए ताकि वह एनडीटीवी प्रबंधन से बात कर उसके रुख की जानकारी दे सकें. ऐसे में माना जा रहा है कि चैनल प्रबंधन विवाद को आगे न बढ़ाते हुए माफी मांगने को तैयार हो जाएगा और पूरे मामले का पटाक्षेप हो जाएगा.

न्यूज चैनल एनडीटीवी के प्रसारण पर एक दिन का प्रतिबंध लगाने के मामले में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी पक्ष पेश किया है जिसके मुताबिक एनडीटीवी 2 जनवरी 2016 को पठानकोट एयरबेस पर आतंकी हमले की रिपोर्टिंग के लिए माफी मांग ले तो वह एक दिन का बैन नहीं लगाएगी. एनडीटीवी के अधिवक्ता हरीश साल्वे ने कहा कि चैनल को माफी मांगने की जानकारी देने के लिए उन्हें एक हफ्ते का समय चाहिए. कोर्ट ने हफ्ते भर का समय दे दिया है. मामले की अगली सुनवाई 31 मार्च को होगी.

केंद्र सरकार के सूचना प्रसारण मंत्रालय का आरोप है कि एनडीटीवी इंडिया ने पठानकोट एयरबेस पर आतंकी हमले की कवरेज में संवेदनशील जानकारी लीक की. इसके दंड में मंत्रालय ने  9 नवंबर की रात से 10 नवंबर 2016 की रात तक 24 घंटे तक प्रसारण बंद रखने का आदेश दिया था. इस पर खूब हंगामा हुआ. बाद में मंत्रालय ने चैनल पर एक दिन के प्रतिबंध को ठंडे बस्ते में डाल दिया. उधर, चैनल इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट चला गया.

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सुप्रीम कोर्ट हुआ सख्त- पैसे न दिए तो एंबी वैली नीलाम कर देंगे

सुप्रीम कोर्ट ने सहारा मामले में अपने फरवरी के आदेश को संशोधित कर दिया है… सहारा को अब सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री के मुकाबले सेबी-सहारा खाते में रकम जमा करानी होगी.. सुप्रीम कोर्ट ने सहारा को चेताते हुए कहा अगर उसने पैसे नहीं जमा कराए तो एंबी वैली को नीलाम कर देंगे… सहारा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फरवरी के आदेश को संशोधित करते हुए समूह के न्यूयॉर्क स्थित होटल की नीलामी से मिलने वाली रकम को सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री में जमा कराए जाने के बदले सेबी-सहारा के संयुक्त खाते में जमा कराने का आदेश दिया है…

इस होटल की बिक्री से कंपनी को करीब 750 करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद है… साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने सहारा को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर वह तय समय पर पैसा जमा कराने में विफल होती है तो वह एंबी वैली को नीलाम कर देगी… सुप्रीम कोर्ट ने सहारा ग्रुप को 17 अप्रैल तक 5,000 करोड़ रुपये जमा कराए जाने का आदेश दिया था… इससे पहले सहारा समूह को बड़ा झटका देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने लोनावाला में सहारा की प्रॉप्रटी एंबी वैली को जब्त किए जाने का आदेश दिया था… सहारा ग्रुप के इस प्रॉपर्टी की कीमत 39,000 करोड़ रुपये है…

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक सहारा से रकम की वसूली नहीं होती है तब तक यह टाउनशिप सुप्रीम कोर्ट के पास ही रहेगी… सहारा ग्रुप का यह टाउनशिप मुंबई के पुणे में है… सहारा ने सुप्रीम कोर्ट में माना कि उसे मूलधन के तौर पर सेबी को 14,000 करोड़ रुपये का भुगतान करना है और कंपनी सेबी को अभी तक 11,000 करोड़ रुपये का भुगतान कर चुकी है।

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मजीठिया मामले में काश सुप्रीमकोर्ट ऐसा कर देता!

देश के अधिकांश अखबार मालिकों के खिलाफ माननीय सुप्रीमकोर्ट में अवमानना का केस चल रहा है। इस मामले में सुप्रीमकोर्ट में अभी डेट नहीं पड़ पा रही है। अगर माननीय सुप्रीमकोर्ट कुछ चीजें कर दे तो सभी अखबार मालिकों की नसें ना सिर्फ ढीली हो जायेंगी बल्कि देश भर के मीडिया कर्मियों को इंसाफ भी मिल जायेगा। इसके लिये सबसे पहले जिन समाचार पत्रों की रिपोर्ट कामगार आयुक्त ने सुप्रीमकोर्ट में भेजी है उसमें जिन अखबार मालिकों ने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश नहीं लागू किया है या आंशिक रुप से लागू किया है ऐसे अखबारों के मैनेजिंग डायरेक्टर, डायरेक्टर, पार्टनर और सभी पार्टनरों को अदालत की अवमानना का दोषी मानते हुये उनके खिलाफ कामगार आयुक्त को निर्देश दें कि उनके खिलाफ पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज करा दें और सभी जिलाधिकारियों, तहसीलदारों को निर्देश दें कि उनके खिलाफ रिकवरी कार्रवाई शुरू की जाये। उनको जमानत भी माननीय सुप्रीमकोर्ट से तभी प्राप्त हो जब वे मीडियाकर्मियों को उनका पूरा बकाया एरियर वेतन तथा प्रमोशन दें।

जिन मीडियाकर्मियों ने मजीठिया का क्लेम लगाया या याचिका दायर की ऐसे जितने मीडियाकर्मियों का प्रबंधन ने ट्रांसफर या टर्मिनेशन किया है ऐसे मीडियाकर्मियों के ट्रांसफर और ट्रमिनेशन पर रोक लगा दे। अब बाकी बचे ऐसे अखबार मालिक जिन्होंने कामगार आयुक्त को पटा कर यह रिपोर्ट लिखवा लिया कि उनके यहां मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश लागू है ऐसे अखबारों की स्कूटनी करायी जाये। इसके लिये प्रदेश स्तर पर एक जांच कमेटी बनायी जाये। इस कमेटी में आयकर विभाग के अधिकारी, हाईकोर्ट के सेवानिवृत जज, पत्रकारों द्वारा प्रत्येक राज्य में चुने गये उनके प्रतिनिधि और सुप्रीमकोर्ट के एडवोकेट हो।

यह कमेटी सभी अखबारों में यह विज्ञापन जारी करे कि इन अखबारों ने दावा किया है कि ये अपने कर्मचारियों को जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश दे रहे हैं। अखबार मालिकों के एक दावे की जांच के लिये तीन दिवसीय एक कैंप लगाया जा रहा है। अगर किसी भी कर्मचारी को जो इन अखबारों में काम करते हैं उनको वेज बोर्ड के अनुसार वेतन नहीं मिल रहा है तो वे इस कैंप में संपर्क करें। इस कैंप में आयकर अधिकारी अखबारों और उनके प्रबंधन की सहयोगी कंपनियों के २००७ से १० तक की बैलेंससीट और दूसरे कागजात लेकर आयें।

इस कैंप में कामगार आयुक्त इस दावे की पुष्टि के सभी कागजात प्रमोशन लिस्ट लेकर आयें जिसकी एक सीए भी जांच करे और मीडियाकर्मियों की सेलरी स्लीप तथा दूसरे संबंधित कागजातों की उसी समय जांच कर अखबार के मैनेजिंग डायरेक्टर, डायरेक्टर, पार्टनर और सभी पार्टनरों को अदालत की अवमानना का दोषी मानते हुये उनके खिलाफ कामगार आयुक्त को निर्देश दे कि उनके खिलाफ पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज करा दें और  सभी जिलाधिकारियों, तहसीलदारों को निर्देश दे कि उनके खिलाफ रिकवरी कार्रवाई शुरू की जाये। उस अखबार के सभी मीडियाकर्मियों को उनका अधिकार दिलाया जाये। साथ ही इसकी पूरी रिपोर्ट माननीय सुप्रीमकोर्ट में भेजी जाये। इसके बाद जितने मामले १७. २ के लेबर कोर्ट में चल रहा हैं वे खुद ब खुद मीडियाकर्मी वापस ले लेंगे। इस पूरी प्रक्रिया में ६ माह से ज्यादा का समय ना लगे। साथ ही जो मीडियाकर्मी २००७ से २०११ तक जिस पद पर था उसी पद को आधार माना जाये और उनका पद या विभाग या कंपनी ना बदला जाये।  काश सुप्रीमकोर्ट ऐसा कर देता।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

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मजीठिया वेतनमान : आगे से कौन डरेगा सुप्रीम कोर्ट से…

मजीठिया वेतनमान को लेकर भले ही देश की कानून व्यवस्था और उसका पालन आलोचनाओं के घेरे में हो लेकिन प्रिंट मीडिया में भूचाल देखा जा रहा है, एबीपी अपने 700 से अधिक कर्मचारियों को निकाल रही है, भास्कर, पत्रिका आधे स्टाफों की छंटनी करने जा रहा है, हिंदुस्तान टाइम्स बिक गया आदि बातें स्पष्ट संकेत दे रही हैं सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेतनमान को लेकर कुछ बड़ा फैसला आने वाला है। अब ये उठा पटक नोटबंदी के कारण हो रही है या किसी और कारण? यह तो समय बताएगा लेकिन मार्च-अप्रैल तक प्रिंट मीडिया में बड़े उलट फेर देखने को मिल सकते हैं. क्योंकि डीएवीपी की नई नीति से उसी अखबार को विज्ञापन मिलेगा जो वास्तव में चल रहा है और जहां के कर्मचारियों का पीएफ कट रहा हो या फिर पीटीआई, यूएनआई या हिन्दुस्थान न्यूज एजेंसी से समाचार ले रहा हो। साथ ही लगने वाला समाचार कापी पेस्ट ना हो, कि बेवसाइट से उठाकर सीधे-सीधे पेपर में पटक दी गई हो। इसका असर प्रिंट मीडिया में पड़ेगा.

ऐसी अवमानना सब पर चले
मजीठिया वेतनमान दिलाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में लगी अवमानना याचिका में जिस तरह सुनवाई चल रही है उससे पत्रकारों की परेशानी बढ़ रही है। यदि भारत का यही कानून है तो ठीक है, ऐसी ही सुनवाई हर केस में हो…  यदि ऐसा होगा तो कानून का भय किसे सताएगा? कोई भी बंदा कोर्ट के आदेश का पालन नहीं करेगा। पीड़ित बंदा अवमानना में जाएगा तो आरोपी कुछ जवाब नहीं देगा। पीड़ित के साक्ष्य मान्य नहीं होंगे. पुलिस या प्रशासनिक अधिकारी जो जांच करेंगे उस पर भी पीड़ित और अधिकारी के अलग-अलग बयान मानकर कार्रवाई नहीं की जाएगी. आरोपी लिखित कह देगा कि हम कोर्ट के आदेश का पालन कर रहे हैं  तो उससे कुछ साक्ष्य नहीं मांगे जाएंगे क्योंकि 3 करोड़ केस पेंडिंग हैं, एक-एक व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट न्याय थोड़े ही दिला पाएगा। मजीठिया वेतनमान में जब सुप्रीम कोर्ट 18 हजार केसों में नियमानुसार वेतन दिलाने में असमर्थतता जता रहा हो तो उसे सवा अरब आबादी को न्याय दिलाना है, वह कैसे दिलाएगा?

सुनवाई भी अजीब है
चूंकि न्यायालय अवमानना अधिनियम 1971 की धारा 5 के अनुसार न्यायालय के फैसले के बाद यदि कोई व्यक्ति न्यायालय की निष्पक्ष आलोचना करता है तो उसे न्यायालय अवमानना का दोषी नहीं माना जाएगा। इस अधिकार के तहत कुछ तथ्य पर चर्चा करना चाहूंगा। कोर्ट ने यह पूछा कि अपने मजीठिया वेतनमान क्यों नहीं दिया तो इस पर कुछ ने बाद में कहा कि हम 20 जे के अधिकार का उपयोग कर वेतन नहीं दे रहे हैं।

अब बात यह उठती है कि परिवादी ने प्रकरण लगाया है उसने 20 जे के तहत कुछ लिखकर नहीं दिया. यदि दिया होता तो वेतन मांगने क्यों आता। पूर्व में चले मजीठिया वेतनमान की वैधानिकता में यह सवाल नहीं उठा तो अवमानना में यह बात कहां से आ गई? यह बात पत्रकार पक्ष के वकीलों ने भी रखी। कुल मिलकर प्रकरण को जानबूझकर लटकाने के लिए जबरन 20 जे का प्रकरण सुना जा रहा है। जबकि उसकी सुनवाई का कोई वैधानिक औचित्य ही नहीं है क्योंकि अवमानना में वही बात उठाई जा सकती है जो मूल प्रकरण में उठाई गई हो। जैसे आप हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में वही बात उठा सकते हैं जो निचले अदालत में रखी हो और उसे इगनोर कर फैसला सुनाया गया हो। अब हर अदालत में उसी प्रकरण के लिए नया तथ्य और नया साक्ष्य नहीं ला सकते।

सैलरी स्लिप और उपस्थिति पंजीयन मांगे
सुप्रीम कोर्ट तो इस मामले में सिर्फ कर्मचारियों की ओरिजनल सैलरी स्लीप और ओरिजनल उपस्थिति पंजीयन मांगना चहिए और मजीठिया वेतन मान के अनुसार वेतन भुगतान का आदेश देना चहिए। वो भी जमानती वारंट के साथ, जो ना भुगतान करें उसे गैर जमानती वारंट में बदल दो। बस इत्ता सा न्याय करने के लिए बरसों बरस लग गए और अभी भी एक बड़ा कन्फ्यूजन है कि देश के आका जनता द्वारा चुनी सरकार है या मीडिया के मालिक हैं?

रमेश मिश्र
पत्रकार
swargeshmishra@rediffmail.com

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ये है सुप्रीम कोर्ट का स्टे आर्डर…. हर मीडियाकर्मी को इसे पढ़ना चाहिए

ऐसा पहली बार हुआ है जब मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ रहे किसी पत्रकार का तबादला किये जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लिया हो और उसके तबादले पर रोक लगा दी हो. सुप्रीम कोर्ट का यह कदम उन बहुत से मीडियाकर्मियों के हित में है जो मजीठिया वेज बोर्ड का हक पाने के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं और इसके बदले में प्रबंधन द्वारा तरह तरह से उत्पीड़ित किए जा रहे हैं. इस स्टे आर्डर का हवाला देकर अदालत में मीडियाकर्मी अपने उत्पीड़न के खिलाफ वाद दायर कर सकते हैं. देखें स्टे आर्डर की कापी…

पूरे मामले को जानने-समझने के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें :

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सुप्रीम कोर्ट ने प्रभात खबर के आरा ब्यूरो चीफ के तबादले पर लगायी रोक

देश भर के मीडियाकर्मियों में खुशी की लहर : एडवोकेट उमेश शर्मा ने भी सुप्रीमकोर्ट के इस कदम का किया स्वागत : जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले की लड़ाई लड़ रहे देश भर के मीडियाकर्मियों के पक्ष में माननीय सुप्रीमकोर्ट ने एक और बड़ा कदम उठाया है। प्रबंधन के खिलाफ जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सुप्रीमकोर्ट में लड़ाई लड़ रहे प्रभात खबर के रांची (झारखंड) के के ब्यूरो चीफ मिथिलेश कुमार का प्रबंधन ने तबादला कर दिया तो मिथिलेश कुमार ने सीधे सुप्रीमकोर्ट में अपने एडवोकेट दिनेश तिवारी के जरिये गुहार लगा दी। इस मामले में मजीठिया वेज बोर्ड की सुनवाई कर रहे सुप्रीम कोर्ट के विद्वान न्यायाधीश रंजन गोगोई और नागेश्वर राव की खंड पीठ ने मिथिलेश कुमार के पक्ष में कदम उठाते हुये उनके ट्रांसफर पर रोक लगा दिया।

आप को बता दें कि रंजन गोगोई जी ही जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के अवमानना मामने की सुनवाई कर रहे हैं। अवमानना मामले की भी स्टे आर्डर में चर्चा है। इस स्टे के बाद से ना सिर्फ प्रभात खबर बल्की सभी अखबारों के पत्रकारों के चेहरे खिल गये हैं। प्रभात खबर के आरा ब्यूरो चीफ मिथिलेश कुमार का तबादला प्रभात खबर के चीफ ह्यूमन रिसोर्स आफिसर्स श्री अंजय शर्मा द्वारा चाईबासा कर दिया गया था। मिथिलेश कुमार ने तबादले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट ने उनके तबादले पर स्थगन आदेश जारी करते हुए नयी जिम्मेदारी सौंपने पर रोक लगा दी। साथ ही मिथिलेश कुमार के द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर रिट पीटिशन को अन्य कर्मचारियों के मामले के साथ शामिल करते हुए कहा कि निर्धारित 10 जनवरी 2017 को इस मामले की भी सुनवाई की जाएगी।

उधर इस मामले में देश भर के पत्रकारों के पक्ष में जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सुप्रीमकोर्ट में लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा ने अपनी पहली प्रतिक्रिया देते हुये कहा है कि इस फैसले से देश भर के उन सभी मीडियाकर्मियो को फायदा होगा जिनको मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ मांगने और क्लेम करने के कारण प्रबंधन अपना निशाना बनाकर ट्रांसफर कर रहा है। उमेश शर्मा ने कहा है कि वे इस मामले के फैक्ट अभी देख रहे हैं, लेकिन वाकई ये सुप्रीमकोर्ट का बहुत बढिया कदम है और इससे अखबार मालिक अपनी मनमानी बंद करेंगे।

सुप्रीम कोर्ट के स्टे आर्डर की कापी के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें :

पत्रकार और आरटीआई एक्टीविस्ट शशिकांत सिंह की रिपोर्ट. संपर्क : ९३२२४११३३५

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ये क्या, सुप्रीम कोर्ट के लिखित आदेश में जागरण के मालिकों को तलब करने का जिक्र ही नहीं!

सुप्रीमकोर्ट के लिखित आदेश से समाचारपत्र कर्मियों में निराशा : माननीय सुप्रीमकोर्ट में 4 अक्टूबर को हुयी मजीठिया वेज बोर्ड मामले की सुनवाई के बाद लिखित आदेश कल 6 अक्टूबर को आया। लेकिन इस आदेश में दैनिक जागरण के मालिकों संजय गुप्ता और महेंद्र मोहन गुप्ता को तलब किए जाने का जिक्र ही नहीं है। न ही इन दोनों का नाम किसी भी संदर्भ में लिया गया है। यानि संजय गुप्ता और महेंद्र मोहन गुप्ता को अगली सुनवाई के दौरान सुप्रीमकोर्ट में उपस्थित नहीं रहना पड़ेगा।

4 अक्टूबर को हुयी सुनवाई में दैनिक जागरण के मालिकों का नाम सामने आया था। इन्हें तलब किए जाने की पुष्टि सुप्रीम कोर्ट के वकीलों ने कोर्ट से बाहर की थी। इसी तरह माननीय सुप्रीमकोर्ट में मजीठिया मामले के पत्रकारों के पक्ष में लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा ने 17 (1) के मुद्दे को उठाया लेकिन आर्डर में 17(2) के बारे में लिखा है। सुप्रीमकोर्ट के एडवोकेट ने सुनवाई के बाद बाहर निकलकर पत्रकारों को बताया कि अगली डेट 25 अक्टूबर को रखी गयी है लेकिन आर्डर में अगली डेट के बारे में बताया गया है कि यह 8 नवंबर 2016 को दोपहर 2 बजे से सुनवाई है।

इसी तरह सुप्रीमकोर्ट में अगले पांच राज्यों के श्रमायुक्त को तलब करने में राजस्थान का भी नाम था लेकिन आर्डर में राजस्थान का नाम नहीं है। इस बार की सुनवाई में 20जे का भी मुद्दा था लेकिन उस पर भी बहस नहीं हो सकी जिसको लेकर देश भर के मीडिया कर्मी निराश हैं। फिर भी, मीडियाकर्मियों को माननीय सुप्रीमकोर्ट पर पूरा भरोसा है। इनका मानना है कि देश के इस सबसे बड़े न्याय के मंदिर में देर तो है लेकिन अंधेर नहीं है, उन्हें न्याय जरूर मिलेगा। आप भी पढ़िए माननीय सुप्रीमकोर्ट का ताज़ा आदेश….

सुप्रीमकोर्ट में मजीठिया मामले की सुनवाई के बाद जारी लिखित आदेश…

UPON hearing the counsel the Court made the following

O R D E R

We have heard the learned counsels for the
parties. We have considered the status reports
filed by the Labour Commissioners of the concerned
States.

The monitoring in respect of State of
Nagaland is closed. So far as the State of
Maharashtra is concerned, the State is granted
further two weeks’ time to file its response.
Insofar as the States of Uttar Pradesh,
Himachal Pradesh, Uttarakhand, Manipur, Madhya
Pradesh, Chhattisgarh, Delhi and Jharkhand are
concerned, we direct that all revenue recovery
proceedings which are pending shall be
completed at the earliest.

In respect of such of the defaulting units
against whom recovery proceedings have not been
initiated, the same shall be initiated and
completed at the earliest.

In all cases where there is a dispute with
regard to the amount payable, we direct the State
Governments to act under the provisions of Section
17(2) of the Working Journalists and Other ewspaper Employees (Conditions of Service) and
Miscellaneous Provisions Act, 1955. The concerned
Labour Court will finalize its award expeditiously
and send the same to the State Government for due
execution.

Insofar as the legal issues that have to be
heard and decided are concerned, Shri Colin
Gonsalves, learned senior counsel, who had agreed
to identify and carve out the principles that would
be required to be decided in these cases, is
granted two weeks further time to formulate the
said questions and file appropriate written notes.
We make it clear on the next date fixed, the
Court will hear the aforesaid legal questions and
pass necessary orders thereon.

List these matters on 8th November, 2016 at
2.00 p.m.

On the said date i.e. 8th November, 2016,
status report with regard to the implementation of
the Majithia Wage Board recommendations in respect
of the following five States shall be placed before the Court for consideration:

(1) Tamil Nadu
(2) Kerala
(3) Andhra Pradesh
(4) Karnataka
(5) Telangana

We also direct that copies of the status
reports filed by all the States till date be
circulated to the learned counsels appearing for
the contesting establishments.

Contempt Petition(C)No.570/2014 In W.P.(C) No. 246/2011
Leave sought for withdrawal of the
contempt petition is allowed. This contempt
petition is accordingly closed.

All pending applications shall also stand
disposed of.

(Neetu Khajuria)
Court Master
(Asha Soni)
Court Master

(Signed order in Contempt Petition(C) No.570/2014
in W.P.(C) No.246/2011 is placed on the file.)
IN THE SUPREME COURT OF INDIA
CIVIL ORIGINAL JURISDICTION
CONTEMPT PETITION(C) NO. 570 OF 2014
IN
WRIT PETITION (C) NO.246 OF 2011
BENNET COLEMAN & CO. EMPLOYEES UNION PETITIONER(S)
VERSUS
INDU JAIN & ORS. RESPONDENT(S)
O R D E R
Leave sought for withdrawal of the
contempt petition is allowed. This contempt
petition is accordingly closed.
All pending applications shall also stand
disposed of.
……………..J.
(RANJAN GOGOI)
……………..J.
PRAFULLA C. PANT)
NEW DELHI
OCTOBER 04, 2016

पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकान्त सिंह की रिपोर्ट. संपर्क : 9322411335

पढ़िए मूल खबर जिसकी अब कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई है…

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सुप्रीम कोर्ट ने लेबर कमिश्नरों को दिया सख्त निर्देश- आरसी काटिये और वेज बोर्ड की सिफारिश लागू कराइए

सुप्रीम कोर्ट से शशिकांत सिंह की रिपोर्ट…

सभी लेबर कमिश्नरों को अखबार मालिकों की रिकवरी काटने का सख्त आदेश… लेबर कमिश्नरों को आज माननीय सुप्रीमकोर्ट ने मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश लागू ना करने पर जमकर लताड़ा और दैनिक जागरण के मालिकों संजय गुप्ता और महेन्द्र मोहन गुप्ता को अगली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट में तलब कर लिया है। साथ ही सभी लेबर कमिश्नरों को सख्त आदेश दिया कि आप इस मामले की रिकवरी सर्टिफिकेट जारी करा कर इस सिफारिश को अमल में लाइए।

माननीय सुप्रीमकोर्ट में आज पत्रकारों की तरफ से लड़ाई लड़ रहे वरिष्ठ उमेश शर्मा ने 17(1) के कलेम को 17(२) में डालने के मुद्दे को जमकर उठाया और देश भर के पत्रकारों के चेहरे पर एक बार फिर ख़ुशी ला दी। एडवोकेट कॉलिन गोंसाल्विस ने 20 (जे) और वेरीयेबल पेय का मुद्दा उठाया। एडवोकेट परमानंद पांडे ने भी  जमकर अपना पक्ष रखा। माननीय सुप्रीमकोर्ट ने आज सभी लेबर कमिश्नरों को साफ़ कह दिया आप आरसी काटिये और मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश को लागू कराकर पूरी रिपोर्ट लेकर तीन महीने में आइये।

इस मामले में आज महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और दिल्ली, उत्तरांचल के लेबर कमिश्नरों को तलब किया गया था। इन लेबर कमिश्नरों ने दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर और दूसरे बड़े अखबारों की मजीठिया वेज बोर्ड लागू ना करने की मंशा संबंधी रिपोर्ट दी है। इस मामले की अगली सुनवाई 25 अक्टूबर को रखी गयी है जिसमें आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, राजस्थान और कर्नाटक सहित पांच राज्यों के लेबर कमिश्नरों को तलब किया गया है। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया वेज बोर्ड से जुड़े कानूनी प्वाइंट पर एक रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश दिया।

सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान मौजूद रहे मुंबई के पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकान्त सिंह की रिपोर्ट. संपर्क : 9322411335

मूल खबर…

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सुप्रीम कोर्ट ने जागरण के मालिकों महेंद्र मोहन और संजय गुप्ता को तलब किया

मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू न करने और सुप्रीम कोर्ट से लेकर कानून, न्याय, संविधान तक की भावनाओं की अनदेखी करने से नाराज सुप्रीम कोर्ट ने आज दैनिक जागरण के मालिकों महेंद्र मोहन गुप्ता और संजय गुप्ता को अगली सुनवाई पर, जो कि 25 अक्टूबर को होगी, कोर्ट में तलब किया है. आज सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू न किए जाने को लेकर सैकड़ों मीडियाकर्मियों द्वारा दायर मानहानि याचिका पर सुनवाई हुई.

कोर्ट ने आज के दिन कई प्रदेशों के लेबर कमिश्नरों को बुला रखा था. कोर्ट ने सभी लेबर कमिश्नरों से कहा कि जिन जिन मीडियाकर्मी ने क्लेम लगाया है, उसमें वे लोग रिकवरी लगाएं और संबंधित व्यक्ति को न्याय दिलाएं. कोर्ट के इस आदेश के बाद अब श्रम विभाग का रुख बेहद सख्त होने वाला है क्योंकि पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने लापरवाही बरतने पर उत्तराखंड के श्रमायुक्त के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया था.

सैकड़ों मीडियाकर्मियों की याचिका का प्रतिनिधित्व करते हुए एडवोकेट उमेश शर्मा ने आज सुप्रीम कोर्ट को बताया कि दैनिक जागरण की किसी भी यूनिट में किसी भी व्यक्ति को मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से न तो एरियर दिया गया है और न ही सेलरी दी जा रही है.

साथ ही दैनिक भास्कर समूह के बारे में भी विस्तार से बताया गया. आज सुप्रीम कोर्ट ने जागरण के मालिकों को कोर्ट में आने के लिए आदेश कर दिया है ताकि उनसे पूछा जा सके कि आखिर वो लोग क्यों नहीं कानून को मानते हैं. चर्चा है कि अगली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट भास्कर के मालिकों को तलब कर सकता है. फिलहाल इस सख्त आदेश से मीडियाकर्मियों में खुशी की लहर है.

कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुंबई के पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकांत सिंह भी मौजूद थे. उन्होंने फोन करके बताया कि आज सुप्रीम कोर्ट ने जो सख्ती दिखाई है उससे वे लोग बहुत प्रसन्न है और उम्मीद करते हैं कि मालिकों की मोटी चर्बी अब पिघलेगी. सैकड़ों मीडियाकर्मियों को मजीठिया वेज बोर्ड से संबंधित अपने हक के लिए गाइड करने वाले पत्रकार शशिकांत सुप्रीम कोर्ट में हुई आज की सुनवाई की विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं जिसे जल्द भड़ास पर प्रकाशित किया जाएगा.

अपडेटेड न्यूज (7-10-2016 को दिन में डेढ़ बजे प्रकाशित) ये है….

संबंधित पोस्ट्स….

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मजीठिया : सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड के लेबर कमिश्नर के खिलाफ जारी किया वारंट

उत्तर प्रदेश के लेबर कमिश्नर को 6 हफ्ते में दिलाना होगा मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ, 4 अक्टूबर को महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान, झारखंड और दिल्ली के लेबर कमिश्नर को हाजिर होने का आदेश

पत्रकारों के वेतन से संबंधित फिलवक्त देश के सर्वाधिक चर्चित आयोग मजीठिया वेज बोर्ड के मामले में आज माननीय सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर सख्त कदम उठाया और उत्तराखंड के श्रम आयुक्त को आज के दिन हाजिर रहने की पूर्व सूचना के बावजूद सुप्रीम कोर्ट में अनुपस्थित रहने पर कोर्ट ने वारंट जारी कर दिया है। साथ ही उत्तर प्रदेश के श्रम आयुक्त को साफ कह दिया कि 6 हफ्ते के अंदर मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश को पूरी तरह लागू कराईये। सुप्रीम कोर्ट ने लिखित रूप से तो नहीं बल्कि मौखिक रुप से यह भी कह दिया कि अगर आपने 6 सप्ताह में ऐसा नहीं किया तो जेल भेज दूंगा।

सुप्रीम कोर्ट ने आज 20जे के मुद्दे पर मौखिक रूप से कहा कि जो भी वेतन ज्यादा होगा, उसे माना जायेगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि कौन कर्मचारी होगा जिसे वेतन ज्यादा मिले तो वह लेने से मना कर देगा। देश भर के पत्रकारों की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा ने इस खबर की पुष्टि करते हुये कहा है कि आज सुप्रीम कोर्ट का फैसला काफी एतिहासिक माना जायेगा। श्रम आयुक्तों ने अपनी सफाई में कहा कि कर्मचारी हमारे पर 17(1) के तहत क्लेम नहीं कर रहे हैं। जो क्लेम कर रहे हैं हम उनके पक्ष में खुलकर हैं। श्री उमेश शर्मा ने एक बार फिर कहा है कि लोग 17 (1) के तहत श्रम आयुक्त कार्यालय में क्लेम लगायें।

सुप्रीम कोर्ट से बाहर निकलने के बाद देश भर से आये पत्रकारों को सुप्रीम कोर्ट के लॉन में उन्होंने पत्रकारों से कहा कि मैं बार-बार सबसे कह रहा हूं कि 17(1) के तहत लेबर कमिश्नर के यहां क्लेम लगाईये और फिर सबसे यही बात कहूंगा कि पहले उन्हीं को श्रम विभाग वरियता देगा जिसने 17(1) के तहत क्लेम किया है। अब 4 अक्टूबर को महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान, झारखंड और दिल्ली के लेबर कमिश्नर को माननीय सुप्रीम कोर्ट में हाजिर होने का आदेश दिया गया है। इन प्रदेशों के पत्रकार जल्द से जल्द 17(1) के तहत श्रम आयुक्त कार्यालय में क्लेम लगायें।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई कार्यकर्ता
९३२२४११३३५

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मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई : न मीडिया मालिक जेल जाएंगे, न अफसर, हारे हुए हम होंगे!

Yashwant Singh : यूपी के जंगलराज में तब तक कुछ नहीं होता जब तक कि कपार पर कस के डंडा न मारा जाए… जागरण के मालिकों को तलब कर लिया है श्रमायुक्त ने, सुप्रीम कोर्ट के डर से.. ( पढ़ें ये लिंक : http://goo.gl/cEjFk8 ) लेकिन मुझे नहीं लगता इन चोट्टों का कुछ होने वाला है… अफसर माल लेकर मस्त और मालिक शोषण करके मालामाल… सत्ताधारी महाचोरकट नेता इन सभी से थोक में माल लेकर और निहित स्वार्थी मित्रता की डील करके गदगद. न्यायपालिका कितना और कब तक इनको ठोंकती जगाती सिखाती समझाती रहेगी…मजीठिया वेज बोर्ड का मामला एक ऐसा मामला है जिसे आप गौर से देख पढ़ जान लें तो आपका लोकतंत्र पर से पूरा भरोसा उठ जाएगा.

कांग्रेस, भाजपा, सपा… सब इस केस में नंगे हैं. किसी की औकात नहीं बेइमान मीडिया मालिकों को नियम कानून का पाठ पढ़ाने की. सब अपनी अपनी पूंछ दबाए बचाए मालिकों को अभयदान दिए घूम रहे हैं. मीडिया मालिक खुद को लोकतंत्र का राजा माने बैठे इतरा रहे हैं जिनके अधीन सब कुछ है- नेता, अफसर, कानून, पत्रकार, जज… सब… ये नए किस्म का फासीवाद है. मीडिया के माफिया में तब्दील होकर दीमक की तरह लोकतंत्र, आजादी, समानता, मानवता, न्याय को चट कर जाने का फासीवाद.

इस बाजारवादी दौर में न्याय, संघर्ष, सच्चाई, ईमानदारी आदि शब्द बेहद अल्पसंख्यक हो गए हैं.. इनके साथ वो खड़े हैं जो पीड़ित हैं या जो मजबूर हैं. बाई डिफाल्ट हर कोई बाजारवादी हो जाना चाहता है, यानि किसी तरह से ढेर सारा धन हासिल कर लेना चाहता है ताकि हर उपलब्ध सुख को खरीद कर घर में समेट सके. यह सच भी है कि ढेर सारे सुख पैसे से मिलते हैं. हेल्थ से लेकर पर्यटन तक और खाने से लेकर मकान तक, सोचने से लेकर सुरक्षित सुखकर नींद लेने तक के लिए पर्याप्त पैसा जेब में होना चाहिए… आप इस दौर तक हासिल हर वैज्ञानिक तकनीकी हेल्थ टूरिज्म रिलेटेड उपलब्धियों से उपजी चीजों को जीना, जीवन का हिस्सा बनाना चाहते हैं तो आपके पास ठीकठाक पैसे होने चाहिए. तब सच में आप आधुनिक जीवन के हिसाब से जीवन जी सकेंगे और ठीकठाक तरीके से सोच सकेंगे. हम हाशिए के लिए अभी अभाव के चलते स्वत:स्फूर्त उत्तेजना को समेटे आदिम किस्म का जीवन जी रहे हैं और उसी हिसाब से सोच रहे हैं.

बाजारवाद ने ईमानदारी से पैसा पाने कमाने के रास्ते बेहद सीमित कर दिए हैं. या तो कट्टा उठा लीजिए या फिर बेइमान बन जाइए. बहुत तेज दिमाग वाले और करोड़ों में पगार लेने वाले सीईओ-एडिटर-हेड टाइप नौकर लोग संख्या में कितने फीसदी होंगे, बहुत कम. फिर भी उनके दिल से पूछिए कि वो खुद के लिए कितना वक्त निकाल पाते हैं. उनका जीवन एक रोबोट की तरह किसी दूसरे के मकसद के लिए होम खर्च होते बीतता रहता है और वे खुश इस बात में होते रहते हैं कि वो ठीकठाक पैसा कमा रहे हैं. आजकल हो ऐसा गया है कि जिन्हें जीवन जीना नहीं आता, वे पैसे वाले होते जा रहे और जो सचमुच प्रकृति के करीब हैं, जीवन जीना आता है, वे तंगहाल परेशान हैं. क्या यही कंट्रास्ट, यही अंतरविरोध ही जीवन है या प्रकृति है, या गति है?

फिलहाल यह प्रवचन लंबा हो रहा है. आजकल खुद बोलने लिखने से बचता हूं या फिर होइहें वही राम रचि राखा टाइप फील कर सब कुछ को प्रकृति का हिस्सा मान इगनोर मार देता हूं. लेकिन जब सीधे सपाट तरीके से सोचने लगता हूं तो कपार में खून चढ़ने लगता है और धड़कन तेज होने लगती है…

मुझे देश भर के उन हजारों मीडियाकर्मियों से प्यार है जिन्होंने अपनी अपनी नौकरियों को दांव पर लगाकर अपने हक के लिए अपने मीडिया मालिकों से मोर्चा पंगा लिया और सुप्रीम कोर्ट में मालिकों के खिलाफ केस लगाकर लड़ रहे हैं. बहुत लंबी खिंच गई लड़ाई. मालिकों, सरकारों और सिस्टम ने पीड़ित पत्रकारों को बहुत छला, बहुत खींचा केस, बहुत समय लगाया, इतना कि न्याय मांगने वाले टूट जाएं. हो भी यही रहा है. जाने किस आशा दिलासा पर सब उम्मीद से भरे हैं, लड़े जा रहे हैं. ये हार जाएंगे तो मुझे बहुत अफसोस होगा.

एक बड़ी हार पिछले दिनों हो चुकी है, सुप्रीम कोर्ट में ही हो चुकी है, हिंदुस्तान टाइम्स केे उन सैकड़ों कर्मियों की जिन्होंने छंटनी के खिलाफ एचटी प्रबंधन से सौ करोड़ मुआवजे व नौकरी पर रखे जाने की जीत हाईकोर्ट से हासिल कर ली. उनके जीतने की खबर हमने भड़ास पर बल्ले बल्ले स्टाइल में चलाई थी (पढ़ें जीतने वाली खबर : http://goo.gl/rDte7V ) . अब वो हार गए. प्रबंधन सुप्रीम कोर्ट गया. जाने क्या खेल तमाशा हुआ. एचटी के मालिक जीत गए. सौ करोड़ हड़प गए. सैकड़ों की नौकरियां खा तो चुके ही थे, जीने की उम्मीद भी छीन ले गए. इसलिए यह मत मानकर चलिए कि सुप्रीम कोर्ट कोई हनुमान जी की गदा टाइप चीज है.

जब सब कुछ मेनुपुलेट हो / किया जा रहा है, जब सब कुछ बाजार / मालिकों / पैसेवालों के अनुकूल बनाया जा रहा हो ताकि अर्थव्यवस्था की व्यवस्था उछाल मारती रहे तो सुप्रीम कोर्ट के माननीय जज लोग कोई एलियन नहीं जो दिल्ली के प्रदूषण से निकले खतरनाक आक्सीजन को अपने अंदर धकेलने से इनकार कर अपने किसी दूसरे ग्रह वाले देस से ओरीजनल बूटी बिटामिन हवा मंगा कर खींच रहे हैं. वे भी सत्ता और सिस्टम के नीति नियमों दशा दिशा के संकेतों को अच्छे से पढ़ते समझते हैं और अपने हाथों इस मालिक फ्रेंडली व मजदूर विरोधी अर्थव्यवस्था की स्पीड धड़ाम करने के आरोप मढ़े जाने से बचना चाहते हैं. जैसे हर जगह एक मेनस्ट्रीम होता है वैसे ही जजों में भी एक मेनस्ट्रीम है जो सत्ता सिस्टम के अनुकूल होती है. कम ही जज ऐसे हैं जो वाकई ईमानदार हैं, क्योंकि ईमानदारी भी अब दो किस्म की है. एक है मेनस्ट्रीम वाली ईमानदारी. एक है जनता के प्रति पक्षधरता वाली ईमानदारी. जैसे मेनस्ट्रीम मीडिया में जनपक्षधर लोगों के लिए स्पेस नहीं है, या है तो उन्हें पगलेट या एलियन माना जाता है, उसी तरह जुडीसिरी में भी अब जनपक्षधर ईमानदारों के लिए जगह बहुत कम है. ऐसे जजों को पगलेट, खतरनाक मानते हैं बाकी साथी जज.

जाने क्यों हम हाशिए के लोग उम्मीद से भरे होते हैं, कोई न कोई तर्क जीने हंसने खुश होने के लिए खोज लेते हैं और नीके दिन आने पर बनत न लागे देर टाइप श्लोगन कविता बांचते हुए अच्छे दिनों की उम्मीद में एक के बाद एक बुरे वक्त को अपने आसपास आमंत्रित करते रहते हैं. शायद ज़िंदगी यही है. शायद ज़िंदगी यह नहीं है.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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मजीठिया पर आज के फैसले का निहितार्थ : सुप्रीम कोर्ट आरपार वाले एक्शन के मूड में, जो मीडियाकर्मी सोए हैं वो अब भी जग सकते हैं

देश भर के पत्रकारों और गैर पत्रकारों के वेतन प्रमोशन से जुड़े मजीठिया वेज बोर्ड मामले में आज माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए उन श्रम सचिवों / श्रम आयुक्तों को तलब करना शुरू किया है जिन्होंने मजीठिया वेज बोर्ड मामले में या तो सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करते हुए अपनी स्टेटस रिपोर्ट नहीं भेजी या जिन्होंने मजीठिया वेज बोर्ड लागू कराने के आदेश को गंभीरता से नहीं लिया।

शुरुआत पांच राज्यों से होगी। नार्थ इस्ट के चार राज्यों के अलावा एक राज्य उत्तर प्रदेश भी है। इन राज्यों के श्रम सचिव / श्रमायुक्त 23 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में तलब किए गए हैं। इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने अब मीडिया मालिकों, राज्य सरकारों और अफसरों की मनमानी को संज्ञान लेकर उन्हें दंडित करने का सीधा रुख अख्तियार कर लिया है। साथ ही इससे मीडियाकर्मियों को उनका हक भी मिल सकेगा।

खचाखच भरे सुप्रीमकोर्ट के कोर्ट नंबर 7 में इस फैसले को सुनने के लिए देश भर के पत्रकारों का जमावड़ा लगा। हालत ये थी कि कई पत्रकारों को कोर्ट रूम के अंदर जाने का पास भी नहीं मिला। इस दौरान सुप्रीमकोर्ट में पत्रकारों की तरफ से केस लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा ने जमकर पत्रकारों का पक्ष रखा और कहा कि आज समाचार पत्र कर्मियों का अखबार मालिक अत्यधिक शोषण कर रहे हैं। इस दौरान माननीय सुप्रीमकोर्ट के न्यायमूर्ति रंजन गोगोई जी ने सभी राज्यों के श्रम आयुक्तों को सुप्रीम कोर्ट में तलब किया। फिलहाल पांच-पांच राज्यों के श्रम आयुक्तों को सुप्रीमकोर्ट ने तलब करने का निर्णय लिया।

इस दौरान अधिवक्ता कोलिन गोंजाल्विस और परमानन्द पांडे ने 20जे का मुद्दा उठाया। इस मुद्दे पर भी बहस होगी। उधर आज के फैसले को उमेश शर्मा ने निर्णायक बताते हुए कहा कि जो भी समाचार कर्मी अब तक क्लेम नहीं कर सके हैं, अब वे भी क्लेम कर सकते हैं। सरकार और अफसर सुप्रीम कोर्ट के डंडे के बाद अब थक हार कर अपनी नौकरी बचाने के लिए शिकायतकर्ताओं की शिकायतों को गंभीरता से लेंगे और मीडियाकर्मियों को उनका हक मिल जाएगा।

मुंबई से दिल्ली आए पत्रकार और आरटीआई कार्यकर्त शशिकांत सिंह ने यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट से बाहर निकलते हुए तैयार करके भड़ास के पास भेजी है. शशिकांत से संपर्क 9322411335 के जरिए किया जा सकता है.

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मजीठिया : बेहद सख्त सुप्रीम कोर्ट ने यूपी समेत पांच राज्यों के सचिवों को नए एक्शन रिपोर्ट के साथ 23 अगस्त को तलब किया

मीडिया मालिकों के कदाचार और सरकारी अफसरों की नपुंसकता से नाराज सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया वेज बोर्ड मामले में अब एक एक को देख लेने का इरादा बना लिया है. अपना रुख बहुत सख्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राज्यों से आई रिपोर्ट को एक साथ एक बार में नहीं देखा जा सकता और इसमें बहुत सारी बातें स्पष्ट भी नहीं है इसलिए अब यूपी समेत पांच राज्यों की समीक्षा होगी और समीक्षा के दौरान संबंधित राज्यों के सचिव सुप्रीम कोर्ट में मौजूद रहेंगे. शुरुआत में नार्थ इस्ट के पांच राज्य हैं जिनके सचिवों को अपनी नवीनतम एक्शन रिपोर्ट तैयार करके 23 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष हाजिर रहने को कहा है.

बताया जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद अब उन राज्यों के श्रम विभागों में हलचल शुरू हो जाएगी जहां क्लेम फाइल करने वालों को उनका वाजिब हक दिलाने की बजाय श्रम विभाग के अधिकारी मीडिया मालिकों की चमचागिरी करते हुए पूरे प्रकरण को लीपपोत कर अनिर्णय की स्थिति में डाले हुए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि संबंधित पांच राज्यों के सचिव अपने यहां के सारे क्लेम और सारे दावों के निपटान की स्थिति लेकर 23 अगस्त को कोर्ट आएं. 23 अगस्त की सुनवाई के बाद ऐसे ही फिर अन्य पांच राज्यों के सचिवों को नवीनतम एक्शन रिपोर्ट के साथ सुप्रीम कोर्ट बुलाया जाएगा. तो, इस पूरे घटनाक्रम और सुप्रीम कोर्ट के रुख से जाहिर है कि मामला मीडियाकर्मियों के पक्ष में है और मीडिया मालिकों व उनके चाटुकार अफसरों की चालबाजी सफल नहीं होने वाली है.

भड़ास4मीडिया की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में दायर किए गए सैकड़ों अवमानना मामलों के वकील उमेश शर्मा ने भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह को फोन पर बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने बिलकुल सही रास्ता अख्तियार किया है. अब यूपी समेत जिन पांच राज्यों के सचिवों को 23 अगस्त को बुलाया गया है वो न सिर्फ वहां सारे मामले निपटा कर और सही रिपोर्ट लेकर पहुंचेंगे बल्कि इसका असर उन दूसरे राज्यों में होगा जहां मीडिया मालिकों और सरकारी अफसरों का गठजोड़ आम मीडियाकर्मियों के क्लेम को लटकाने में जुटे हुए हैं और गोलमोल रिपोर्ट बनाकर सुप्रीम कोर्ट को बरगलाने की कुत्सित मंशा रखते हैं. आने वाले दिनों में हर राज्य के श्रम अफसरों को पूरी सख्ती दिखाते हुए मीडियाकर्मियों को उनका हक दिलाना पड़ेगा वरना संभव है सुप्रीम कोर्ट में पेशी के दौरान खड़े खड़े उन्हें जेल भेजे जाने का आदेश उच्चतम न्यायालय दे दे. एडवोकेट उमेश शर्मा ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के आज के आदेश की लिखित कॉपी का इंतजार किया जा रहा है. उसके बाद आगे की रणनीति तय की जाएगी.

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह का कहना है कि संविधान, सुप्रीम कोर्ट और कानून को ठेंगे पर रखने वाले देश द्रोही मीडिया मालिकों और चोरकट धूर्त अफसरों से निपट पाना कोई मामूली बात नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने पूरा मौका देने के बाद अब इन्हें सही से घेरना शुरू कर दिया है. मजीठिया वेज बोर्ड मामले की आज हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने पांच-पांच राज्यों के सचिवों को नवीनतम एक्शन रिपोर्ट के साथ जो तलब करना शुरू किया है और कहा है कि अपने साथ नवीनतम एक्शन रिपोर्ट लाकर बताओ कि कितनों को न्याय मिला और कितनों को नहीं मिला तो जाहिर है कि संबंधित राज्यों के सचिव खुद सुप्रीम कोर्ट में खड़े रहेंगे और इसका मतलब हुआ कि अगर अफसरों ने तनिक भी चालाकी दिखाई और मीडियाकर्मियों को उनका हक नहीं दिला पाए तो सुप्रीम कोर्ट में खड़े खड़े ही अफसरों को कोर्ट की अवमानना में गिरफ्तार कर के जेल भेजने की आदेश सुप्रीम कोर्ट दे सकती है. इसके ठीक बाद उस मीडिया मालिक को भी अरेस्ट करने का आदेश दे सकती है जिसने अपने कर्मी को उसका हक नहीं दिया. यानि अब मीडिया मालिकों और अफसरों के जेल जाने के दिन आने वाले हैं. तो हम लोग कह सकते हैं- ”अब भी तो सुधर जाओ हरामखोरों!”

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जानो कानून : : सुप्रीम कोर्ट का फैसला- फेसबुक पर किसी की आलोचना करना अपराध नहीं, एफआईआर रद्द करो

Facebook postings against police… criticising police on police’s official facebook page…. F.I.R lodged by police….

HELD – Facebook is a public forum – it facilitates expression of public opinion- posting of one’s grievance against government machinery even on government Facebook page does not by itself amount to criminal offence – F. I.R. Quashed.

(Supreme Court)
Manik Taneja & another – Vs- State of Karnataka & another
2015 (7) SCC 423

पूरी खबर…..

Comments on Facebook : Supreme Court quashes FIRs against couple

In a fillip for free speech on social media, the Supreme Court quashed FIRs registered by the Bengaluru Traffic Police for criminal intimidation against a couple for posting adverse comments on its Facebook page. A bench of Justices V. Gopala Gowda and R. Banumathi quashed the criminal prosecution against the couple in their judgment, observing that they were well within their rights to air their grievances in a public forum like Facebook.

“The page created by the traffic police on the Facebook was a forum for the public to put forth their grievances. In our considered view, the appellants might have posted the comment online under the bona fide belief that it was within the permissible limits,” the 10-page judgment observed.

‘End to harassment’

“The police sought to suppress free speech by intimidating us with serious charges…this judgment will have a larger impact. We had the resources to get our charges squashed, but many will find it hard to counter police harassment. I hope this will be an example to stop intimidation by the police,” said Manik Taneja, the petitioner.

On June 14, 2013, Manik Taneja and his wife Sakshi Jawa, were booked by the police under charges of using ‘assault or criminal force to deter a public servant from discharging his duty’ (Section 353 of the Indian Penal Code) and criminal intimidation (IPC 506).

The previous day, the couple were driving in their car, when they collided with an autorickshaw, resulting in a passenger being injured.

Though they had paid due compensation to the injured, Ms. Jawa – who had driven the car – was summoned to Pulakeshi Nagar Traffic police station where the police had allegedly misbehaved with her.

The couple then vent their anger on the police’s Facebook page, and even sent an email complaining about the alleged harassment to the police.

The police reacted by lodging a criminal complaint against the couple.

The Karnataka High Court had refused to intervene when the couple approached it for relief, following which they had moved the Supreme Court.

This judgment comes even as another bench of the Supreme Court is hearing the legality of Section 66A of the Information Technology Act, 2000, which prescribes arrest and three years imprisonment for social media comments considered to be of a “menacing character” by the authorities.

‘We had the resources to get our charges squashed, but many will find it hard to counter police harassment’

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जजों की नियुक्ति के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट से जो लिस्ट सुप्रीम कोर्ट भेजी गई है, वह धांधलियों का पुलिंदा है!

इलाहाबाद हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति पर ‘चौथी दुनिया’ में छपी प्रभात रंजन दीन की ये बेबाक रिपोर्ट पढ़ें

जजों की नियुक्ति के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट से जो लिस्ट सुप्रीम कोर्ट भेजी गई है, वह धांधलियों का पुलिंदा है. जज अपने बेटों और नाते रिश्तेदारों को जज बना रहे हैं। और सरकार को उपकृत करने के लिए सत्ता के चहेते सरकारी वकीलों को भी जज बनाने की संस्तुति कर रहे हैं. न्यायाधीश का पद सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के प्रभावशाली जजों का खानदानी आसन बनता जा रहा है. जजों की नियुक्ति के लिए भेजी गई अद्यतन सूची में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के बेटे से लेकर कई प्रमुख न्यायाधीशों के बेटे और रिश्तेदार शामिल हैं.

नेताओं को भी खूब उपकृत किया जा रहा है. वरिष्ठ कानूनविद्, उत्तर प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेता और पश्चिम बंगाल के मौजूदा राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी के बेटे नीरज त्रिपाठी, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे वीएन खरे के बेटे सोमेश खरे, जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट और आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश व इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज रहे सगीर अहमद के बेटे मोहम्मद अल्ताफ मंसूर समेत ऐसे दर्जनों नाम हैं, जिन्हें जज बनाने के लिए सिफारिश की गई है.

जजों की नियुक्ति के लिए की गई संस्तुति की जो सूची सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, उसमें 73 नाम जजों के रिश्तेदारों के हैं और 24 नाम नेताओं के रिश्तेदारों के हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश का कार्यभार संभालने के पूर्व जो तकरीबन 50 नाम जजों की नियुक्ति के लिए भेजे उनमें भी अधिकांश लोग जजों के बेटे और रिश्तेदार हैं या सरकार के पैरवी-पुत्र सरकारी वकील हैं. अब जज बनने के लिए योग्यता ही हो गई है कि अभ्यर्थी जज या नेता का रिश्तेदार हो या सत्ता की नाक में घुसा हुआ सरकारी वकील. अन्य योग्य वकीलों ने तो जज बनने का सपना देखना भी बंद कर दिया है.

जब न्यायाधीश ही अपने नाते-रिश्तेदारों और सरकार के प्रतिनिधि-पुत्रों को जज नियुक्त करे तो संविधान का संरक्षण कैसे हो? यह कठोर तथ्य है जो सवाल बन कर संविधान पर चिपका हुआ है. यह पूरे देश में हो रहा है. जजों की नियुक्ति के लिए विभिन्न हाईकोर्टों से जो लिस्ट सुप्रीम कोर्ट भेजी जा रही हैं, उनमें अधिकांश लोग प्रभावशाली जजों के रिश्तेदार या सरकार के चहेते सरकारी अधिवक्ता हैं. वरिष्ठ वकीलों को जज बनाने के नाम पर न्यायपीठों में यह गैर-संवैधानिक और गैर-कानूनी कृत्य निर्बाध गति से चल रहा है, इसके खिलाफ सार्वजनिक मंच पर बोलने वाला कोई नहीं.

सार्वजनिक मंच पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर जजों की नियुक्ति को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष रो सकते हैं, लेकिन जजों की नियुक्तियों में जो धांधली मचा कर रखी गई है, उसके खिलाफ कोई नागरिक सार्वजनिक मंच पर रो भी नहीं सकता. इस रुदन और उस रुदन के मर्म अलग-अलग हैं. रिश्तेदारों और सरकारी वकीलों को जज बना कर आम आदमी के संवैधानिक अधिकार को कैसे संरक्षित-सुरक्षित रखा जा सकता है और ऐसे जज किसी आम आदमी को कैसा न्याय देते होंगे, लोग इसे समझ भी रहे हैं और भोग भी रहे हैं. देश की न्यायिक व्यवस्था की यही सड़ी हुई असलियत है.

इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने जजों की नियुक्ति के लिए जिन नामों की सिफारिश कर फाइनल लिस्ट सुप्रीम कोर्ट भेजी, उनमें से अधिकांश नाम मौजूदा जजों या प्रभावशाली रिटायर्ड जजों के बेटे, भांजे, साले, भतीजे या नाते रिश्तेदारों के हैं. बाकी लोग सत्ता सामर्थ्यवान सरकारी वकील हैं. चंद्रचूड़ यह लिस्ट भेज कर खुद भी सुप्रीम कोर्ट के जज होकर चले गए, लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट और लखनऊ पीठ के समक्ष यह सवाल छोड़ गए कि क्या जजों की कुर्सियां न्याधीशों के नाते-रिश्तेदारों और सत्ता-संरक्षित सरकारी वकीलों के लिए आरक्षित हैं? क्या उन अधिवक्ताओं को जज बनने का पारंपरिक अधिकार नहीं रहा जो कर्मठता से वकालत करते हुए पूरा जीवन गुजार देते हैं?

इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा इलाहाबाद और लखनऊ पीठ के जिन वकीलों के नाम जज की नियुक्ति के लिए भेजे गए हैं उनमें मोहम्मद अल्ताफ मंसूर, संगीता चंद्रा, रजनीश कुमार, अब्दुल मोईन, उपेंद्र मिश्र, शिशिर जैन, मनीष मेहरोत्रा, आरएन तिलहरी, सीडी सिंह, सोमेश खरे, राजीव मिश्र, अजय भनोट, अशोक गुप्ता, राजीव गुप्ता, बीके सिंह जैसे लोगों के नाम उल्लेखनीय हैं. ये कुछ नाम उदाहरण के तौर पर हैं. फेहरिस्त लंबी है. इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की तरफ से तकरीबन 50 वकीलों के नाम सुप्रीम कोर्ट भेजे गए हैं, जिन्हें जज बनाए जाने की सिफारिश की गई है. इसमें 35 नाम इलाहाबाद हाईकोर्ट के और करीब 15 नाम हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के हैं.

जो नाम भेजे गए हैं उनमें से अधिकांश लोग विभिन्न जजों के रिश्तेदार और सरकारी पदों पर विराजमान वकील हैं. इनमें ओबीसी, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का एक भी वकील शामिल नहीं है. ऐसे में, खबर के साथ-साथ यह भी जानते चलें कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के निर्माण से अब तक के 65 साल में एक भी अनुसूचित जाति का वकील जज नहीं बना. इसी तरह वैश्य, यादव या मौर्य जाति का भी कोई वकील कम से कम लखनऊ पीठ में आज तक जज नियुक्त नहीं हुआ. बहरहाल, ताजा लिस्ट के मुताबिक जो लोग जज बनने जा रहे हैं, उनके विभिन्न जजों से रिश्ते और सरकारी पदों के सत्ताई-छत्र का तफसील भी देखते चलिए.

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज, जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट, आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के जज रहे सगीर अहमद के बेटे मोहम्मद अल्ताफ मंसूर को जज बनाए जाने की सिफारिश की गई है. अल्ताफ मंसूर उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य स्थायी अधिवक्ता (चीफ स्टैंडिंग काउंसिल) भी हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज रहे अब्दुल मतीन के सगे भाई अब्दुल मोईन को भी जज बनने योग्य पाया गया है. अब्दुल मोईन उत्तर प्रदेश सरकार के एडिशनल चीफ स्टैंडिंग काउंसिल हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज रहे ओपी श्रीवास्तव के बेटे रजनीश कुमार का नाम भी जज बनने वालों की सूची में शामिल है. रजनीश कुमार उत्तर प्रदेश सरकार के एडिशनल चीफ स्टैंडिंग काउंसिल भी हैं.

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज रहे टीएस मिश्रा और केएन मिश्रा के भतीजे उपेंद्र मिश्रा को भी जज बनाने की सिफारिश की गई है. उपेंद्र मिश्रा इलाहाबाद हाईकोर्ट के सरकारी वकील हैं. पहले भी वे चीफ स्टैंडिंग काउंसिल रह चुके हैं. उपेंद्र मिश्र की एक योग्यता यह भी है कि वे बसपा नेता सतीश चंद्र मिश्रा के भाई हैं. इसी तरह हाईकोर्ट के जज रहे एचएन तिलहरी के बेटे आरएन तिलहरी और जस्टिस एसपी मेहरोत्रा के बेटे मनीष मेहरोत्रा को भी जज बनने लायक पाया गया है. इनके भी नाम लिस्ट में शामिल हैं. लखनऊ बेंच से जिन लोगों के नाम जज के लिए चुने गए, उनमें चीफ स्टैंडिंग काउंसिल (2) श्रीमती संगीता चंद्रा और राजकीय निर्माण निगम व सेतु निगम के सरकारी वकील शिशिर जैन के नाम भी शामिल हैं.

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे वीएन खरे के बेटे सोमेश खरे का नाम भी जज के लिए भेजा गया है. इसी तरह इलाहाबाद हाईकोर्ट के स्वनामधन्य जज रहे जगदीश भल्ला के भांजे अजय भनोट और न्यायाधीश रामप्रकाश मिश्र के बेटे राजीव मिश्र का नाम भी जजों के लिए अग्रसारित सूची में शामिल है. अंधेरगर्दी की स्थिति यह है कि हाईकोर्ट के जज रहे पीएस गुप्ता के बेटे अशोक गुप्ता और भांजे राजीव गुप्ता दोनों में ही जज बनने लायक योग्यता देखी गई और दोनों के नाम सुप्रीम कोर्ट भेज दिए गए. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के सिटिंग जज एपी शाही के साले बीके सिंह का नाम भी अनुशंसित सूची में शामिल है. सुप्रीम कोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार के चीफ स्टैंडिग काउंसिल सीडी सिंह का नाम भी जजों के लिए चयनित सूची में शामिल है.

यह मामला अत्यंत गंभीर इसलिए भी है कि जजों की नियुक्ति की यह लिस्ट खुद इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने तैयार की और अपनी संस्तुति के साथ सुप्रीम कोर्ट भेजी. चंद्रचूड़ अब खुद सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश हैं. उन्हें न्याय के साथ न्याय करने के लिए ही तरक्की देकर सुप्रीम कोर्ट ले जाया गया होगा. जजों की नियुक्ति के लिए भेजी गई संस्तुति ने उनकी न्यायिकता और उन्हें तरक्की देने के मापदंड की न्यायिकता दोनों को संदेह में डाला है. डीवाई चंद्रचूड़ सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे वाईवी चंद्रचूड़ के बेटे हैं.

वकीलों का यह सवाल वाजिब है कि क्या जजों की नियुक्ति के लिए किसी ताकतवर जज का रिश्तेदार होना या एडिशनल एडवोकेट जनरल, चीफ स्टैंडिंग काउंसिल या गवर्नमेंट एडवोकेट होना अनिवार्य योग्यता है? क्या सरकारी वकीलों (स्टेट लॉ अफसर) को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124 और 217 के तहत वकील माना जा सकता है? संविधान के ये दोनों अनुच्छेद कहते हैं कि जजों की नियुक्ति के लिए किसी वकील का हाईकोर्ट या कम से कम दो अदालतों में सक्रिय प्रैक्टिस का 10 साल का अनुभव होना अनिवार्य है. क्या इसकी प्रासंगिकता रह गई है? भेजी गई लिस्ट में ऐसे कई नाम हैं जिन्होंने कभी भी किसी आम नागरिक का मुकदमा नहीं लड़ा. काला कोट पहना और पहुंच के बूते सरकारी वकील हो गए, सरकार की नुमाइंदगी करते रहे और जज के लिए अपना नाम रिकमेंड करा लिया.

वर्ष 2000 में भी 13 जजों की नियुक्ति में धांधली का मामला उठा था, जिसमें आठ नाम विभिन्न जजों के रिश्तेदारों के थे. अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में कानून मंत्री रहे राम जेठमलानी ने जजों की नियुक्ति के लिए देशभर के हाईकोर्ट से भेजी गई लिस्ट की जांच का आदेश दिया. जांच में पाया गया कि 159 सिफारिशों में से करीब 90 सिफारिशें विभिन्न जजों के बेटों या रिश्तेदारों के लिए की गई थीं. जांच के बाद अनियमितताओं की पुष्टि होने के बाद कानून मंत्रालय ने वह सूची खारिज कर दी थी.

जजों की नियुक्ति में जजों द्वारा ही धांधली किए जाने का मामला बाद में जनेश्वर मिश्र ने राज्यसभा में भी उठाया. इसके जवाब में तब कानून मंत्री का पद संभाल चुके अरुण जेटली ने सदन को आधिकारिक तौर पर बताया था कि औपचारिक जांच पड़ताल के बाद लिस्ट खारिज कर दी गई. उस खारिज लिस्ट में शुमार कई लोग बाद में जज बन गए और अब वे अपने रिश्तेदारों को जज बनाने में लगे हैं. इनमें जस्टिस अब्दुल मतीन और जस्टिस इम्तियाज मुर्तजा जैसे नाम उल्लेखनीय हैं. इम्तियाज मुर्तजा के पिता मुर्तजा हुसैन भी इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज थे. अब्दुल मतीन के सगे भाई अब्दुल मोईन को जज बनाने के लिए संस्तुति सूची में शामिल कर लिया गया है.

इस प्रकरण की सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि जजों की नियुक्ति में धांधली और भाई-भतीजावाद के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक पांडेय द्वारा दाखिल की गई याचिका खारिज कर दी गई थी और अशोक पांडेय पर 25 हजार का जुर्माना लगाया गया था. जबकि अशोक पांडेय द्वारा अदालत को दी गई लिस्ट के आधार पर ही केंद्रीय कानून मंत्रालय ने देशभर से आई ऐसी सिफारिशों की जांच कराई थी और जांच में धांधली की आधिकारिक पुष्टि होने पर जजों की नियुक्तियां खारिज कर दी थीं.

अशोक पांडेय ने कहा कि जजों की नियुक्ति के लिए भेजी गई मौजूदा लिस्ट में बरती गई अनियमितताओं के खिलाफ उन्होंने फिर से याचिका दाखिल की और फिर हाईकोर्ट ने उस पर कोई गंभीरता नहीं दिखाई. अदालत ने एडवांस कॉस्ट के नाम पर 25 हजार रुपये जमा करने का निर्देश देते हुए कहा कि इसके बाद ही मामले पर सुनवाई की जाएगी. पांडेय चिंता जताते हैं कि संविधान और कानून से जुड़े इतने संवेदनशील मामले को 25 हजार रुपये के लिए अदालत ने लंबित रख दिया है. धांधली की यह सूची प्रधानमंत्री और कानून मंत्री को भेजने के बारे में अशोक पांडेय विचार कर रहे हैं, क्योंकि उनके द्वारा भेजी गई सूची पर ही तत्कालीन कानून मंत्रालय ने वर्ष 2000 में कार्रवाई की थी.

न्याय व्यवस्था को सत्ता-प्रभाव में लाने का चल रहा षडयंत्र

सरकारी वकीलों को जज बना कर पूरी न्यायिक व्यवस्था को शासनोन्मुखी करने का षडयंत्र चल रहा है. सीधे तौर पर नागरिकों से जुड़े वकीलों को जज बनाने की परंपरा बड़े ही शातिराना तरीके से नष्ट की जा रही है. कुछ ही अर्सा पहले अधिवक्ता कोटे से जो 10 वकील जज बनाए गए थे, उनमें से भी सात लोग राजीव शर्मा, एसएस चौहान, एसएन शुक्ला, शबीहुल हसनैन, अश्वनी कुमार सिंह, देवेंद्र कुमार अरोड़ा और देवेंद्र कुमार उपाध्याय उत्तर प्रदेश सरकार के वकील (स्टेट लॉ अफसर) थे. इनके अलावा रितुराज अवस्थी और अनिल कुमार केंद्र सरकार के लॉ अफसर थे.

वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में मान्यता देने में भी भीषण अनियमितता हो रही है. नागरिकों के मुकदमे लड़ने वाले वकीलों को लंबा अनुभव हो जाने के बावजूद उन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता की मान्यता नहीं दी जाती, जबकि सरकारी वकीलों को बड़ी आसानी से वरिष्ठ वकील की मान्यता मिल जाती है. कुछ ही अर्सा पहले लखनऊ बेंच के चार वकीलों को वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में मान्यता दी गई, जिनमें चीफ स्टैंडिंग काउंसिल आईपी सिंह, एडिशनल एडवोकेट जनरल बुलबुल घोल्डियाल, केंद्र सरकार के स्टैंडिंग काउंसिल असित कुमार चतुर्वेदी और सार्वजनिक क्षेत्र के विभिन्न उपक्रमों और विश्वविद्यालयों के वकील शशि प्रताप सिंह शामिल हैं. लखनऊ में अनुभवी और विद्वान वकीलों की अच्छी खासी तादाद के बावजूद हाईकोर्ट को उनमें कोई वरिष्ठ अधिवक्ता बनने लायक नहीं दिखता. ऐसे रवैये के कारण वकीलों में आम लोगों के मुकदमे छोड़ कर सरकारी वकील बनने की होड़ लगी हुई है. सब इसके जुगाड़ में लगे हैं और इससे न्याय की मूलभूत अवधारणा बुरी तरह खंडित हो रही है.

जजी भी अपनी, धंधा भी अपना…

जजों के रिश्तेदार जज बन रहे हैं और जजों के रिश्तेदार उन्हीं के बूते अपनी वकालत का धंधा भी चमका रहे हैं. न्याय परिसर में दोनों तरफ से जजों के रिश्तेदारों का ही आधिपत्य कायम होता जा रहा है. जजों के बेटे और रिश्तेदारों की आलीशान वकालत का धंधा जजों की नियुक्ति वाली लिस्ट की तरह कोई चोरी-छिपी बात नहीं रही. यह बिल्कुल सार्वजनिक मामला है. आम लोग भी जजों के रिश्तेदार वकीलों के पास ही जाते हैं, जिन्हें फीस देने से न्याय मिलने की गारंटी हो जाती है.

जजों के रिश्तेदारों की उन्हीं के कोर्ट में वकालत करने की खबरें कई बार सुर्खियां बन चुकी हैं. हाईकोर्ट की दोनों पीठों के दर्जनों नामी-गिरामी जजों के बेटे और रिश्तेदार वहीं पर अपनी वकालत का धंधा चमकाते रहे हैं. इनमें जस्टिस अब्दुल मतीन के भाई अब्दुल मोईन, जस्टिस अभिनव उपाध्याय के बेटे रीतेश उपाध्याय, जस्टिस अनिल कुमार के पिता आरपी श्रीवास्तव, भाई अखिल श्रीवास्तव और बेटे अंकित श्रीवास्तव, जस्टिस बालकृष्ण नारायण के पिता ध्रुव नारायण और बेटा ए. नारायण, जस्टिस देवेंद्र प्रताप सिंह के बेटे विशेष सिंह, जस्टिस देवी प्रसाद सिंह के बेटे रवि सिंह, जस्टिस दिलीप गुप्ता की साली सुनीता अग्रवाल, जस्टिस इम्तियाज मुर्तजा के भाई रिशाद मुर्तजा और नदीम, जस्टिस कृष्ण मुरारी के साले उदय करण सक्सेना और चाचा जीएन वर्मा, जस्टिस प्रकाश कृष्ण के बेटे आशीष अग्रवाल, जस्टिस प्रकाशचंद्र वर्मा के बेटे ज्योतिर्जय वर्मा, जस्टिस राजमणि चौहान के बेटे सौरभ चौहान, जस्टिस राकेश शर्मा के बेटे शिवम शर्मा, जस्टिस रवींद्र सिंह के भाई अखिलेश सिंह, जस्टिस संजय मिश्र के भाई अखिलेश मिश्र, जस्टिस सत्यपूत मेहरोत्रा के बेटे निषांत मेहरोत्रा और भाई अनिल मेहरोत्रा, जस्टिस शशिकांत गुप्ता के बेटे रोहन गुप्ता, जस्टिस शिवकुमार सिंह के बेटे महेश नारायण और भाई बीके सिंह, जस्टिस श्रीकांत त्रिपाठी के बेटे प्रवीण त्रिपाठी, जस्टिस सत्येंद्र सिंह चौहान के बेटे राजीव चौहान, जस्टिस सुनील अम्बवानी की बिटिया मनीषा, जस्टिस सुरेंद्र सिंह के बेटे उमंग सिंह, जस्टिस वेद पाल के बेटे विवेक और अजय, जस्टिस विमलेश कुमार शुक्ला के भाई कमलेश शुक्ला, जस्टिस विनीत शरण के पिता एबी शरण और बेटे कार्तिक शरण, जस्टिस राकेश तिवारी के साले विनीत मिश्रा, जस्टिस वीरेंद्र कुमार दीक्षित के बेटे मनु दीक्षित, जस्टिस यतींद्र सिंह के पिता विकास चौधरी, भतीजा कुणाल और बहू मंजरी सिंह, जस्टिस सभाजीत यादव के बेटे पीपी यादव, जस्टिस अशोक कुमार रूपनवाल की बिटिया तनु, जस्टिस अमर शरण के भतीजे सिकंदर कोचर, जस्टिस अमरेश्वर प्रताप शाही के ससुर आरएन सिंह और साले गोविंद शरण, जस्टिस अशोक भूषण के भाई अनिल और बेटे आदर्श व जस्टिस राजेश कुमार अग्रवाल के भाई भरत अग्रवाल अपनी वकालत का धंधा अपने रिश्तेदार जजों के बूते ही चमकते रहे हैं.

लेखक प्रभात रंजन दीन वरिष्ठ पत्रकार और संपादक हैं. उनका यह लिखा चौथी दुनिया से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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SUPREME COURT DISMISSES SLP OF LOKMAT GROUP OF NEWSPAPERS

Inspiring story of non journalist employee who succeeds finally after a long battle of 17 years… Gets benefit of regularization and permanency as Teleprinter Operator, Planner with retrospective effect… Held entitled to all the benefits of Palekar, Bachawat Awards…

Mahesh Sakure, with M.Com. degree, has been working with Lokmat Group of Newspapers at Bhandara, near Nagpur, since 1.10.1996. Initially he joined as Teleprinter Operator but was later  doing the work of Planner. He was being paid monthly salary of Rs 1500/- which was raised to Rs 2000/-p.m. Mahesh filed Complaint before Industrial Court, Bhandara on claiming the benefit of regularization and permanencey as Teleprinter Operator and later as Planner and payment of wages and grant of all other allied benefits as per Palekar and Bachawat Awards from the date he had completed 240 days continuous service.   The management, inter alia, took the stand that he was not employee of the newspaper establishment but that of a charitable organization known as “Manav Sewa Trust”.

After recording evidence of both sides and hearing them, the Industrial Court, Bhandara, granted to Mahesh Sakure the benefit of regularization and permanency as Teleprinter Operator w.e.f. 315.1997 and regularization and permanency as Planner w.e.f. 1.4.1998 and also granted overtime wages at double the rate for the excess 12 hours a week he had put in as Planner, which post falls in the catregory of “Journalist” and as per Section 6 of the Working Journalists Act, requires him to work only for 36 hours a week as against which he was being asked to work for 48 hours a week.  The Court also rejected the contention of the management that he was the employees of “Manav Sewa Trust”and not of “Lokmat”.

The management challenged the said order of the Industrial in Bombay High Court, Bench at Nagpur, and sought stay of the said order.  The Learned Single Judge granted stay of the order on the condition that the management shall pay to the workman a sum of Rs 10 Lakhs and a monthly salary of Rs Ten Thousand as interim relief, pending final decision of the case.

This order of the Learned Single Judge was challenged by the management before the Division Bench of the High Court by filing a Letters Patent Appeal which was dismissed by the Division Bench.  The management preferred a Special Leave Petition in the Supreme Court which was disposed of by the Supreme Court with a slight modification of the order to the effect that out of the amount of Rs 10 Lakhs granted to the workman as interim relief only Rs Five Lakhs shall be paid to him and the remaining amount of Rs Five Lakhs shall be kept in deposit by the High Court  till the disposal of the Writ Petition by the Learned Single and the same will be disposed as per the orders of the Learned Single Judge to be passed on the merits of the case.   The other interim order that during the pendency of the Writ Petition the employer shall pay salary of Rs 10,000/- was however confirmed by the Supreme Court.

The Supreme Court also directed the Learned Single Judge to dispose of the Writ Petition filed by the management within a period of three months. Upon this direction of the Supreme Court, the Learned Single Judge heard the matter of merits and finally dismissed the Writ Petition of the management with a direction that the workman should be paid the remaining balance of Rs Five Lakhs with interest and also imposed the cost of Rs 10,000/- on the management.

This judgment and order of the Learned Single Judge was again challenged by the management in the Supreme Court which was dismissed by the Supreme Court in limini on 12.10.2015. Meanwhile, the employee Shri Sakure has been fixed on a monthly salary of about Rs 35,000/- p.m., which he has been receiving under protest as details thereof have not been provided by the management.

The aforesaid claim of the workman is now calculated to be in the region of about Rs Forty Nine Lakhs for payment of which he has already represented to the management failing which another round of litigation for the same is round the corner. That since the management has not acceded to his request a claim for the sum of Rs 49,37,720.13 has already been filed before the Labour Court at Bhandara.

UNION FREED FROM THE CLUCTCHES OF LOKMAT MANAGEMENT – BATTLES ROYAL GO ON !

The background :

As stated elsewhere in this newsletter, the Lokmat Shramik Sanghatana, Nagpur, which is functioning since 1996, which is an affiliate of AINEF and a composite union of journalists and non journalist employees, has been fighting for reclassification of Lokmat Newspapers on the basis of their gross revenue in respect of Palekar Award, Bachawat Award, Manisana Award and now Majithia Award.

That the Lokmat Shramik Sanghatana, Nagpur, has also been fighting a Reference before the Industrial Tribunal, Nagpur, in regard to regularization and permanency of 78 journalist and non journalist employees who are being engaged on contract basis for several years now. That besides these two major demands, the union has also succeeded in many other individual disputes details of which are being given separately.

The Victimisation :

Feeling aggrieved and angered with the aforesaid efforts of the union to cover a major ground remaining untouched by any union in the country and also the efforts of the union at its expansion throughout Maharashtra/India by opening a Branch of the Union at Akola and Goa, the management  dismissed on 12.11.2013   President of Goa Branch Shri Rajesh Inmulwar, who was working on contract basis,  for his refusal to resign from the union.

That from 13th November 2013 employees started “Non cooperation movement” as a result of which, it is alleged by the management, that newspapers’ printing was badly affected putting it to huge financial loss.

On 20.11.2013, 61 employees, including eight journalists,  from various centres in the State, bulk of them 25 in number from Nagpur, all principal office bearers, were dismissed without enquiry and as the References are pending management sought approval of its action in respect of the dismissal of these 61 employees before the Industrial Tribunal.  The management examined 120 witnesses and union examined 24 witnesses.  Management’s arguments are over and on 20.4.2016 Union has also concluded its arguments.  The decision of the Tribunal is expected in June 2016.     

Capturing of the union by Lokmat management :    

Immediately on 20.11.2013 itself, before actual dismissal of office bearers of the Union, the management and its lackeys, Lokmat in its office premises and during office hours itself “elected” new office bearers of the union and the first thing done by them was to send a registered ack due letter to Shri S.D. Thakur, Advocate, informing that he was no longer Legal Advisor of the Union and, therefore, he should not appear on behalf of the union in any case.

Letters of intimation were also sent to the Additional Commissioner of Labour, Registrar of Trade Unions and the management of Lokmat.

The Great betrayal :

Thereafter, the most important work these lackeys of the management (Editor of City Edition and one Executive in Printing Depatment posing as President and General Secretary) did was to sign an unconditional  “settlement” with the management (i) withdrawing References seeking claissification of newspaper establishment on the basis of its gross revenue in respect of Palekar, Bachawat, Manisana and now Majithia and (ii) withdrawing Reference seeking regularization and permanency of 78 journalists and non journalist employees who are working on contract basis without any condition or benefit to the employees concerned.

When the real office bearers of the Union initiated legal proceedings against these bogus office bearers, several objections were raised to prolong the matter and on initial points the matter was taken to the High Court also.  The High Court rejected the Writ Petition of these lackeys of the management.  That after hearing the parties, the Industrial Court by its order dated 29.3.2016 held that the earlier office bearers (the real office bearers) are the true office bearers of the Union and the management’s lackeys  posing as President and General and Working Committee members are not the office bearers and working committee members of the Union as alleged by them.

The employees are agog with joy and sense of pride for the glorious victory and celebrated the same on 1st May boisterously.

13 Pasters get the designation and Grade of Scanners in Lokmat

The 13 Pasters who have been performing the duties of Scanners for a long time were not being given the designation and grade of Scanner and hence they had filed complaints before the Industrial Court under the provisions of Maharashtra Recognition of trade Unions & Prevention of Unfair Labour Practices Act, 1971.  The Industrial Court, Nagpur allowed these complaints and granted them designation and grade of Scanners with retrospective effect viz., 13.12.2004.

The Industrial Court also held that the category of Scanner being a journalist category the employees were required to work for only 36 hours a week as per Section 6 of WJ Act whereas in fact they were being asked to work for 48 hours a week.  Therefore, all these employees should be given overtime wages at double the rate for all the years they have been working as Scanners for extra 12 hours a week they have worked.

The employees have filed recovery proceedings against the management of Lokmat for recovery of amounts ranging between Rupees 17 Lakhs and Rupees 38 Lakhs per employee.

With May Day Greetings,

SD Thakur, Adv
President, AINEF

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प्रबंधन द्वारा सताए जागरण के सैकड़ों मीडियाकर्मियों को सुप्रीम कोर्ट से हासिल हुई निराशा

Stupidity of Two Advocates has let down Newspaper Employees

Newspaper employees, in general, and Dainik Jagran employees, in particular, got a jolt in the Supreme Court today because of the foolishness of their two advocates namely; Vinod Pandey and Ashwin Vaish when the Hon’ble Court refused to grant any relief to the employees, who are either victimised or about to be victimised.

On the last date of hearing i.e. on 12th of January, 2016 the bench of the Hon’ble Justices Shri Ranjan Gogoi and Shri Prafulla C. Pant had directed the employees to file their affidavits of the victimisation and harassment for demanding the Majithia Award. In response to that hundreds of employees of different newspapers have already filed their affidavits narrating their exploitation and harassment by their managements.

However, for the reasons, not known to anybody, some of the employees of Dainik Jagran obviously on being misled by the above named two advocates filed two Interim Applications to hear the case of handful employees of Dainik Jagran praying for the stay of any action against them by the management.

The Hon’ble Justice Gogoi reiterated in the court that as per the judgment of the Supreme Court of 7th February 2014, the employees would be entitled to get wages and allowances and arrears but if any disciplinary action was taken against them, the same could not be interfered. This has come as big setback to hundreds of employees of newspapers because of the basic legal ignorance and audacious behaviour of the advocates, who misguided the leaders of the Jagran Employees Union.

M.P. Singh
Advocate
(Present at the time of hearing in the Court Room)
mataprasadsingh@gmail.com

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मेरे गरीब चौकीदार पिता को इस जज ने नौकरी से निकाल दिया, अब घर कैसे चलेगा

Dear Sir,

I m pallvi from ambala city. I just want to say that My father Ramesh kumar was working in Haryana Court Ambala city as a chownkidar from 20 years under session judge (Mr.Jaiveer singh Hudda). Before 5 years, My father suspended by Mr. Jaivir Singh hUdda with wrong ellications. At that time my father was working in hudda’s Kothi. But in which document Mr. Hudda Said that everything wrong in court then he suspended my father. At that time 15 Employees suspended by Mr.Hudda. One person can make mistake. But 15 Peoples can’t do at same time.

My father is a very poor man. Then we caused in Chnadigarh high Court then My father won the cause from High court. But after Some time Mr. Hudda Said that u are Fail in your enquiry. Then we Caused again delhi Supreme court. Then Advocate Mr. Anand Mishra got 25,000/- from us for this cause. But Problem is not solved. After a long time Mr. Mishra said that your cause has been dismissed.

But in which Hudda’s Kothi My father was very harrsed by Mr. Hudda, and Mrs. Hudda. Even my father slapped by Mrs. Hudda. Mr. Hudda said that in his documents that broken the fans and glasses But its common sense when this was happening in the court, then Mr. HUdda also will complained in other department. But there are no any complaint regarding that. Everything prove that every elications are false against my father.

In which my family, There are 5 Members. My mother is a house wife. Now we want to again join this job. If its not possible then we want to retirement from this job. We will thankfull to you. Becoz I also want to higher study. If in which anything wrong, I m so sorry for that.

We have a great hope from you.

Thanking you

Pallvi Kashyap
pallvik3@gmail.com

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पर्ल ग्रुप की संपत्तियों की नीलामी के लिए सुप्रीम कार्ट ने कमेटी बनाई

हाल ही में करीब 50,000 करोड़ रूपये की हेराफरी के मामले में केंद्रीय जांच एजेंसी ने पर्ल ग्रुप के मालिक निर्मल सिंह भंगू को गिरफ्तार किया था. उन पर निवेशकों के साथ धोखाधड़ी का आरोप लगा था. अब खबर आ रही है कि पर्ल ग्रुप की संपत्तियों की नीलामी के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी बना दी है. कोर्ट ने पूर्व जज आर एम लोढा की अध्यक्षता में कमेटी बनाई. सेबी के जरिये लोगों को पैसे लौटाया जाएगा और यह कमेटी इस बात की निगरानी रखेगी कि किस तरह अगले 6 महीनों में लोगों के कर्ज को चुकाया जा सके. सेबी को इस केस से जुड़े सारे दस्तावेज़ इस कमेटी को सौंपना होगा.

कंपनी पर पोन्जी योजना के जरिए निवेशकों के 55 हजार करोड़ रुपये की ठगी का आरोप है. P7 न्यूज़ चैनल और पर्ल्स ग्रुप के चेयरमैन निर्मल सिंह भंगू के साथ सीबीआई ने 4 दूसरे लोगों को भी गिरफ्तार किया है. कंपनी पर आरोप है कि इसने करीब 6,00,00,000 निवेशकों से 49,100 करोड़ रुपए जुटाये हैं. सेबी के आदेश के मुताबिक अगर पीएसीएल ब्याज समेत ये रकम रिफंड करती है तो उसे करीब 55,000 हजार करोड़ रुपये की व्यवस्था करनी होगी.

इस मामले की जांच सेबी के अलावा सीबीआई और ईडी भी कर रहे हैं. सीबीआई के वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि कंपनी के चारों कार्यकारियों को सीबीआई के मुख्यालय पर गहन पूछताछ के बाद गिरफ्तार किया गया। पूछताछ के दौरान उन्होंने बिना तालमेल वाले जवाब देने शुरू किए और साथ ही सहयोग करना भी बंद कर दिया, जिसके बाद उन्हें अरेस्ट कर लिया गया। इनके खिलाफ IPC की धारा 120B (आपराधिक साजिश) तथा 420 (धोखाधड़ी) की धाराओं में मामला दायर किया गया है। निवेशकों को भारी रिटर्न का लालच देकर उनसे धन जुटाया गया था.

सीबीआई ने 19 फरवरी, 2014 को पर्ल्स के 60 साल के संस्थापक निर्मल सिंह भंगू पर देश के इतिहास में सबसे बड़े चिटफंड घोटाले को चलाने की आपराधिक साजिश और धोखाधड़ी करने के आरोप में मामला दर्ज किया था। करीब 2 साल बाद अब उसे सीबीआई गिरफ्तार करने में सफल हुई है। घोटाले की रकम 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 5 करोड़ से ज्यादा छोटे निवेशकों से पर्ल्स एग्रोटेक कॉर्पोरेशन लिमिटेड और पर्ल्स गोल्डन फॉरेस्ट लिमिटेड के नाम पर धोखे से ली गई थी। पर्ल्स की ये दोनों कंपनियां जमीन-जायदाद का कारोबार करती दिखाई गईं थीं।

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मजीठिया वेज बोर्ड : शपथ पत्र के इस प्रारूप को डाउनलोड कर सही विवरण भरें और दस्तखत करके भेजें

सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया वेज बोर्ड की हालिया सुनवाई के दौरान इस बात का संज्ञान लिया कि मीडिया मालिक मजीठिया वेज बोर्ड की मांग करने वाले कर्मियों को विविध तरीके से प्रताड़ित कर रहे हैं. कोर्ट ने इस संबंध में पीड़ितों को अपनी बात और पीड़ा रखने का अनुरोध माना. कोर्ट ने वकीलों से कहा कि वे पीड़ित प्रताड़ित कर्मियों की बात कोर्ट के सामने ले आएं.

इसी संबंध में एडवोकेट उमेश शर्मा ने एक फार्मेट तैयार किया है जिसे भरकर वे सभी लोग उन्हें भेज दें जो उनके जरिए सुप्रीम कोर्ट में केस लड़ रहे हैं. नीचे एफीडेविट का प्रारूप दिया गया है जिसे क्लिक कर डाउनलोड करें और फिर अपना सही विवरण भरने के बाद दस्तखत करें. इसके बाद भेज दें.

एफीडेविट का प्रारूप डाउनलोड करने के लिए इस पर क्लिक करें>

supreme court affidevit

उपरोक्त प्रारूप को सही तरीके से भर कर और हस्ताक्षर कर के इस पते पर डाक या कूरियर के जरिए भेज दें>

Advocate Umesh Sharma
(wage board case affidevit)
112, New Delhi House
27, Barakhambha Road
Connaught Place
New Delhi-110001


मूल पोस्ट>

मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर जो लोग प्रताड़ित किए जा रहे, वे अपना डिटेल एडवोकेट उमेश शर्मा को भेजें

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मजीठिया वेज बोर्ड मामले की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई में हो रही देरी पर यशवंत ने मुख्य न्यायाधीश को भेजा पत्र

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भारत सरकार ने कोर्ट में कहा- अगर अफसरों को मौलिक अधिकार चाहिए तो पहले इस्तीफा दें

इलाहाबाद हाई कोर्ट के लखनऊ बेंच में आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर द्वारा आईएएस, आईपीएस अफसरों द्वारा सरकारी कार्य और नीतियों की आलोचना पर लगे प्रतिबन्ध को ख़त्म करने हेतु दायर याचिका में भारत सरकार ने कहा है कि यह रोक लोक शांति बनाए रखने के लिए लगाई गयी है. राजीव जैन, उपसचिव, डीओपीटी द्वारा दायर हलफनामे के अनुसार प्रत्येक सेवा संविदा में कुछ मौलिक अधिकारों का हनन होता है.

इसके अनुसार यदि सरकारी सेवकों को सरकार की किसी हालिया नीति अथवा कार्य की आलोचना का अधिकार दे दिया गया तो इससे अनुशासन नहीं बचेगा, जो कार्यक्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगी जिससे प्रशासन में अराजकता आएगी और यह लोक शांति को प्रभावित कर सकता है.

हलफनामे के अनुसार हर व्यक्ति अपनी मर्जी से सेवा में आता है और उसे अधिकार है कि सेवा से अलग हो कर अपने मौलिक अधिकारों का उपयोग करें, फ्री-लांसर सरकारी सेवा में न आयें. याचिका में कहा गया था कि अखिल भारतीय सेवा आचरण नियमावली के नियम 7 में किसी भी प्रकार के मंतव्य पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाया गया है जो संविधान के अनुच्छेद 19(2) में दिए किसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का हनन है.

Govt in HC: Bureaucrats resign to exercise Fundamental Rights

In a petition filed by IPS Officer Amitabh Thakur in Lucknow Bench of Allahabad High Court challenging the prohibition of All India Services officers to criticize government policy, the Central government has said that such restriction is placed in interest of public order.

The counter reply filed through Rajiv Jain, Under Secretary, DOPT says that every contract of service involves invasion of Fundamental Rights. It says if government servants are permitted to make adverse criticism of any recent government policy or action, there will be no discipline, leading to lack of efficiency in work, chaos in administration and ugly situations which in final analysis may lead to public disorder.

The counter reply also says that every person voluntarily joins these services and it is open for them to exercise their fundamental rights by resigning from the service. Free lancers need not enter government service.

The petition had said that rule 7 of the All India Services Conduct Rules 1968 with blanket prohibition on any adverse criticism of any current government act or policy is against the right to freedom of expression under Article 19(2).

भारत सरकार द्वारा दाखिल किए गए जवाब को देखने के लिए नीचे क्लिक करें>

Counter reply by Govt of India

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सुप्रीम कोर्ट में ‘लोकमत’ को साकुरे ने दी मात, एरियर 50 लाख और वेतन 40 हजार मिलेगा

नागपुर। दो साल पहले 61 कर्मचारियों को बिना किसी कारण के अवैध रूप से टर्मिनेट करने और कर्मचारियों के शोषण, अन्याय एवं अत्याचार के लिए कुख्यात महाराष्ट्र के कुख्यात लोकमत समाचार पत्र समूह को सुप्रीम कोर्ट से फिर एक बड़ा झटका लगा है. लोकमत के भंडारा कार्यालय में प्लानर के रूप में कार्यरत महेश मनोहरराव साकुरे को सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया वेतन आयोग के अनुसार वेतन देने और 1998 से लेकर अब तक पालेकर, बछावत, मणिसाना एवं मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुसार ब्याज के साथ एरियर्स देने का फैसला सुनाया है.

इस आदेश के अनुसार साकुरे का वेतन अब करीब रु. 40 हजार हो जाएगा और उन्हें एरियर्स के रूप में करीब 50 लाख रुपए मिलेंगे. कांग्रेस सांसद और कोयला घोटाला के आरोपी विजय दर्डा एवं महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री राजेंद्र दर्डा के लोकमत समूह को पिछले कुछ महीनों में विभिन्न अदालतों से ऐसे कई झटके लगे हैं, मगर कर्मचारियों के साथ उनके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया है.

महेश साकुरे लोकमत अखबार के भंडारा कार्यालय में 1.10.96 से टेलीप्रिंटर आपरेटर के पद पर कार्यरत थे. श्री साकुरे प्रति माह 300 रु., 500 रु., 1000 रु. व 2000 रु. पर काम करते रहे हैं. 1.4.1998 को उन्हें टेलीप्रिंटर आपरेटर से प्लानर बना दिया गया, मगर वेतन वही प्रति माह रु. 2000/- ही रहा. उल्लेखनीय है कि समाचारपत्र में प्लानर के पद पर कार्यरत कर्मचारियों को मणिसाना सिंह और मजीठिया अवार्डस् के मुताबिक पत्रकारों की श्रेणी में रखा गया है और उसी के अनुसार उनका वेतन तय किया गया है.

वर्किंग जर्नालिस्ट एक्ट की धारा 6 के अनुसार पत्रकारों के लिए हर सप्ताह 36 घंटे काम निर्धारित है, मगर श्री साकुरे से साप्ताहिक 48 घंटे काम लिया जाता था, लेकित वेतन प्रति माह केवल रु. 2000/- ही दिया जाता था. बार-बार ज्ञापन देने, अनुरोध करने पर भी जब न्याय नहीं मिला तो श्री साकुरे ने वर्ष 2001 में औद्योगिक न्यायालय, भंडारा में अनफेयर लेबर प्रैक्टिस एक्ट के तहत शिकायत दर्ज कराई. करीब 11 साल के संघर्ष के बाद 18.10.11 को न्यायाधीश श्री वी. पी. कारेकर ने साकुरे के पक्ष में फैसला सुनाया और कई आदेश दिए.

न्यायाधीश वीपी कारेकर ने क्या फैसला सुनाया, क्या-क्या आदेश दिए… उसके आगे क्या हुआ… जानने के लिए नीचे क्लिक करके अगले पेज पर जाएं>

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मजीठिया वेज बोर्ड मामले की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई में हो रही देरी पर यशवंत ने मुख्य न्यायाधीश को भेजा पत्र

देश भर के सैकड़ों लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद अखबार मालिकों द्वारा मजीठिया वेज बोर्ड न दिए जाने के खिलाफ अवमानना याचिका सुप्रीम कोर्ट में लगा रखी है. भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह ने भी सैकड़ों मीडियाकर्मियों का प्रतिनिधित्व करते हुए कई मीडिया हाउसों के मालिकों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका एडवोकेट उमेश शर्मा के माध्यम से दायर कर रखी है. इन सारी याचिकाओं की सुप्रीम कोर्ट सुनवाई इकट्ठे करता है. सुप्रीम कोर्ट ने कई महीनों पहले सुनवाई के दौरान आदेश दिया कि श्रम विभाग के स्पेशल अधिकारी मजीठिया वेज बोर्ड की रिपोर्ट लागू किए जाने को लेकर स्टेटस रिपोर्ट बनाकर कोर्ट में सबमिट करें, उसके बाद अगली सुनवाई होगी.

सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को मीडिया मालिकों और मीडिया मालिकों की भक्त केंद्र व राज्य सरकारों ने एक तगड़ा मौका मान लिया और स्टेटस रिपोर्ट भेजने को लेकर हीलाहवाली शुरू कर दिया. कई राज्यों की स्टेटस रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट जा चुकी है और कई राज्यों की जानी बाकी है. सुप्रीम कोर्ट ने तीन महीने का वक्त दिया था लेकिन अब डबल तीन महीने होने जा रहे हैं. ऐसे में मीडियाकर्मियों की चिंता बढ़ती जा रही है. तरह तरह की अफवाहों चर्चाओं को पंख लगने लगे हैं.

सबसे ताजी चर्चा ये है कि फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में जो जस्टिस गांगुली मजीठिया वेज बोर्ड के मामले को देख रहे हैं, वे काफी सख्त व ईमानदार छवि वाले हैं. उनका रिटायरमेंट साल दो साल में होने वाला है. तब तक मीडिया मालिक और सरकारें मजीठिया मसले को लटका कर रखेंगी ताकि इनके कार्यकाल में कोई फैसला न आ सके. जस्टिस गांगुली के रिटायर होते ही पूरा मामला किसी ऐसे बेंच को सौंप दिया जाएगा जो लीपपोत कर सब कुछ बराबर कर देगा. इन चर्चाओं में कितनी सच्चाई है, इस बारे में तो कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन मजीठिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट की लगातार एक्सटेंडेड चुप्पी की तरफ एक पत्र लिखकर भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह ने ध्यान दिलाया है. इस पत्र में मजीठिया मामले की जल्द सुनवाई की तारीख तय करने की गुहार की गई है. साथ ही कई अन्य तथ्यों की तरफ ध्यान दिलाया गया है.

यशवंत का लिखा पत्र पढ़ने के लिए नीचे क्लिक कर अगले पेज पर जाएं>

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सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकारों से कहा- अपनी जगह पर रहें

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पत्रकारों के डायस के नजदीक आने पर नाराजगी जाहिर की है। कोर्ट ने पत्रकारों को नसीहत दी कि उन्हें वहीं रहना चाहिए जो जगह उनके लिए तय की गई है। ये टिप्पणी केंद्र सरकार के खिलाफ डिसएबल लोगों के कोटा को लेकर दाखिल अवमानना की याचिका की सुनवाई के दौरान दी गई। बेंच की अगुवाई कर रहे जस्टिस राजन गोगोई ने कहा कि पत्रकारों को एकदम जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। जजों की कमेटी ने इस मामले में फैसला भी किया है जो शायद आप तक नहीं पहुंचा है। पत्रकारों को अपने निर्धारित स्थान पर ही रहना चाहिए।

जस्टिस गोगोई और जस्टिस एनवी रमना की बेंच ने मीडिया के सुनवाई के दौरान जजों या वकीलों की टिप्पणियों की कवरेज पर भी ऐतराज जताया। कोर्ट ने कहा कि बहुत सारे जज ऐसे हैं जिन्हें किसी केस के दौरान दी गई टिप्पणी को मीडिया में कवरेज पसंद नहीं है। ये टिप्पणियां बहस के दौरान मामले को समझने के लिए की जाती हैं और इसमें हम बातों को काट-छांट कर नहीं बोलते। कोर्ट ने कहा कि अगर आप सही तरीके खबर देते हैं तो आपका स्वागत है।

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अरुण पुरी के खिलाफ विहिप नेता द्वारा दायर मुकदमे पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई

बिजनेस टुडे मैग्जीन के कवर फोटो पर महेंद्र सिंह धोनी को भगवान विष्णु के रूप में प्रकाशित करने के खिलाफ बेंगलुरु में एक विहिप नेता ने इंडिया टुडे ग्रुप के चेयरमैन अरुण पुरी के खिलाफ एक मुकदमा दर्ज कराया था. इस मुकदमें पर रोक के लिए अरुण पुरी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. सुप्रीम कोर्ट ने अरुण पुरी को राहत दे दी है. पढ़िए इस संबंध में रिलीज हुई खबर….

SC stays proceedings against Aroon Purie

NEW DELHI: The Supreme Court stayed criminal proceedings against India Today group head Aroon Purie, which was initiated against him for publishing a cover photo in Business Today in 2013 showing Indian cricket team captain M S Dhoni as Lord Vishnu. Agreeing to hear Purie’s plea, a bench of Justices J S Khehar and N V Ramana directed additional chief metropolitan magistrate of Bengaluru not to proceed in the case filed by a VHP leader for allegedly hurting religious sentiments.

Senior advocate Amrendra Sharan and Sanchit Guru, appearing for Purie, contended that the entire complaint against him was false and baseless and it was filed merely to harass the petitioner. They also pointed out that a similar complaint was filed in Pune which was dismissed by the lower court. Purie approached SC after Karnataka HC refused to quash the proceedings against him. VHP leader Yerraguntla Shyam Sunder had filed a complaint objecting to the picture in which Dhoni — in the garb of the deity — holds various products including a shoe in his hands. The sub title read “God of Big Deals”.

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पत्रकार जगेंद्र हत्याकांड मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भेजा यूपी सरकार को नोटिस

उत्तर प्रदेश में पत्रकार जगेंद्र सिंह को जलाकर मारे जाने के मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को नोटिस जारी किया है. सुप्रीम कोर्ट ने यह नोटिस उस याचिका पर सुनवाई के बाद जारी कि जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट में दाखिल पीआईएल को सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर की गुहार लगाई गई है. सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकार को जलाए जाने और उनकी हत्या के मामले की स्वतंत्र जांच के लिये जगेंद्र के बेटे द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका वापस लेने की परिस्थितियों की सीबीआई जांच हेतु दायर याचिका पर विचार करने का निश्चय किया. इससे पहले याचिका दायर कर पत्रकारों की सेफ्टी के लिए गाइडलाइंस बनाए जाने की बात कही गई है.

इस बीच लखनऊ से खबर है कि पूर्व कानून मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता कपिल सिब्बल की वकालत से यूपी कांग्रेस खुद को शर्मिंदा महसूस कर रही है. पार्टी के विधानमंडल दल के नेता प्रदीप माथुर ने कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया को चिट्ठी लिखकर कहा है कि जिन मामलों में कांग्रेस सीबीआई जांच की मांग कर रही है, उस मामले में कपिल सिब्बल सुप्रीम कोर्ट में जांच का विरोध कर रहे हैं. इससे प्रदेश में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शर्मसार महसूस कर रहे हैं. माथुर ने सोनिया को लिखी चिट्ठी में कहा है कि शाहजहांपुर में पत्रकार जगेंद्र सिंह की हत्या के मामले में उनके परिवार के लोगों ने सरकार के मंत्री और पुलिस पर आरोप लगाया था.

यह पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री जितेंद्र प्रसाद का संसदीय क्षेत्र रहा है. यूपी कांग्रेस सहित पार्टी के अधिकतर वरिष्ठ नेताओं ने मंत्री को हटाने और सीबीआई जांच की मांग की है. इसके उलट केंद्रीय नेता कपिल सिब्बल सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई जांच का विरोध कर रहे हैं, इसलिए वह मामले में हस्तक्षेप करें. यादव सिंह केस में हाई कोर्ट के सीबीआई जांच के फैसले के खिलाफ प्रदेश सरकार सुप्रीम कोर्ट गई थी. इस मामले में भी कपिल सिब्बल ने सपा सरकार की ओर से पैरवी की थी हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा. कांग्रेस यादव सिंह के मसले को भी प्रमुखता से उठाती रही है.

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Scribe Jagendra Singh burning case : SC seeks response from Centre, UP on PIL

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Scribe Jagendra Singh burning case : SC seeks response from Centre, UP on PIL

New Delhi: The Supreme Court on Friday decided to entertain a plea seeking CBI probe into the circumstances leading to the withdrawal of a petition by a journalist’s son, who had sought an independent probe into the alleged burning and murder case of his father in which a state minister and five others have been booked. An application filed by a Lucknow scribe has claimed that the son of slain journalist, Jagendra Singh, was pressurised and threatened by the alleged killers of his father, following which he had written a letter to his lawyer on July 23 wishing to withdraw the petition.

He said this was substantiated by his interaction with him on social media. An FIR was registered against Samajwadi Party government’s Minister Ram Murti Singh Verma and five cops on the basis of a complaint by Jagendra’s son Raghvendra after the journalist died during treatment at a Lucknow hospital. A bench, headed by Chief Justice H L Dattu, issued notices to the Centre and Uttar Pradesh Government on the application filed by Mudit Mathur and sought replies from all parties within three weeks.

The court will hear the matter along with the main petition on which the notices were issued on June 22. The fresh plea has sought a probe into the case by a CBI team consisting of officers from outside Uttar Pradesh. The applicant has also sought laying down guidelines for protection of journalists, impartial grievance redressal mechanism for scribes apprehending assaults and other acts of victimisation and comprehensive victim and witness protection programme.

In the main petition filed by Delhi-based journalist Satish Jain, the apex court had also sought response from the Union Home Ministry, the state government and the Press Council of India. Jagendra was allegedly set on fire by police officials during a raid at his house in Awas Vikas Colony of Sadar Bazar area in Saharanpur on June one. He succumbed to injuries on June eight.

“On June 1, according to his family members, a group of policemen and goons came in two cars in late afternoon and barged into his house in Shahjahanpur. Initially, they had an argument with him reminding him he had been repeatedly told not to write anything about Verma, then they pinned him down, poured petrol on him and set him on fire,” the petition said.

“Journalist Jagendra invited Ram Murti Verma’s ire by posting reports on Facebook about illegal mining activities and land grabbing against the minister,” it alleged. Seeking CBI probe, the plea said inspite of all evidence, “no arrest has been made by the state police and there is every likelihood of destruction of evidence by them.

“The fact that police officials and a senior politician have been arrayed in the case as accused has shaken the confidence of public in investigation conducted by the State Police,” it said, adding that “it is desirable to entrust the investigation to the CBI”.

“Safety of Indian journalists has long been compromised, particularly in small towns where local authorities can wield enormous power. According to PCI, a statutory press watchdog group, 79 journalists were murdered in the past two and a half years in India, with very few convictions,” it said.

According to family members of the deceased, Jagendra had posted something on Facebook against Verma regarding his alleged involvement in illegal mining and land grabbing, after which the minister sent cops to his house who allegedly doused the scribe with kerosene and set him on fire. The FIR has been lodged under IPC 302 (murder), 120-B (criminal conspiracy), 504 (intentional insult with intent to provoke breach of the peace) and 506 (criminal intimidation). The Allahabad High Court had on June 16 directed the UP government to file a status report in the case within a week and asked it to inform it about the stage of investigating a PIL filed by an NGO, ‘We The People’.

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पत्रकार जगेंद्र हत्याकांड मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भेजा यूपी सरकार को नोटिस

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दलित अधिकारियों, कर्मचारियों की पदावनति के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट जायेगा आइपीएफ – दारापुरी

लखनऊ : पूर्व आईजी एवं आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) के राष्ट्रीय प्रवक्ता एस. आर. दारापुरी ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आरक्षण और परिणामी ज्येष्ठता के आधार पर सभी विभागों में पदोन्नति पाए दलित अधिकारियों और कर्मचारियों को पदावनत करने के फैसले पर गहरा दुःख व्यक्त किया है. उन्होंने कहा है कि इससे प्रदेश में लभगग 5000 दलित अधिकारी और कर्मचारी प्रभावित होंगे. प्रदेश सरकार के फैसले के खिलाफ आईपीएफ सुप्रीम कोर्ट जाएगा.

उन्होंने प्रेस को जारी अपने बयान में कहा है कि दरअसल सुप्रीम कोर्ट में अखिलेश और मायावती दोनों की सरकारों की लचर पैरवी के कारण पदावनत होने की स्थिति बनी है. केंद्र की मोदी सरकार भी पूर्ववर्ती मनमोहन सरकार की तरह ही इस सम्बन्ध में संसद में लंबित विधेयक को पारित नहीं करा रही है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश का बहाना बना कर अखिलेश सरकार पूरे तौर पर दलित विरोधी कार्रवाइयां कर रही है.

उन्होंने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के नागराज केस में आये निर्णय में यह कहा गया था कि सरकार जिन दलित जातियों को पदोन्नति में आरक्षण का लाभ देना चाहती है, उस के लिए सरकार उनके सामाजिक-शैक्षिक पिछड़ेपन, सरकारी नौकरियों में वर्तमान प्रतिनिधित्व तथा इसकी कुशलता पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में आंकड़े प्रस्तुत करे। उसे न तो उत्तर प्रदेश में दलितों की तथाकथित रहनुमा बनने वाली मायावती और न ही अखिलेश सरकार समेत राष्ट्रीय स्तर पर मोदी और मनमोहन सरकार ने किया. इस के फलस्वरूप लगभग प्रदेश में 5000 दलित अधिकारी/कर्मचारी प्रभावित होंगे. उन्होंने कहा कि आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) दलितों के हितों की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट में जायेगा और शीघ्र ही प्रदेश स्तरीय सम्मलेन आयोजित करेगा जिसमें इस सम्बन्ध में संसद में लंबित बिल को पारित कराने के लिए आन्दोलन की रणनीति तय की जाएगी.

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पत्रकार जगेंद्र हत्याकांड पर केंद्र और यूपी सरकार को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस

नई दिल्ली : शाहजहांपुर के जुझारू पत्रकार जगेंद्र सिंह की हत्या के मामले को सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान ले लिया है। इससे हत्याकांड के आरोपी मंत्री और पुलिस वालों के खिलाफ कार्रवाई का रास्ता भी आसान होने की संभावनाएं बढ़ गई हैं। कोर्ट ने हत्याकांड के संबंध में यूपी सरकार, केंद्र सरकार और प्रैस काउंसिल ऑफ इंडिया को नोटिस भेजकर दो सप्ताह के भीतर जवाब तलब कर लिया है। 

जगेंद्र हत्याकांड पर पत्रकार सतीश जैन की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार और केंद्र के अलावा प्रैस काउंसिल ऑफ इंडिया को भी नोटिस भेजा है। याचिका में पत्रकार जगेंद्र सिंह की मौत की जांच सीबीआई से कराने की मांग भी की गई है। याचिका में मामले की सीबीआई जाँच के साथ-साथ पत्रकारों की सुरक्षा के लिए भी दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की गई है। 

याचिका में कहा गया है कि अगर किसी भी पत्रकार की आकस्मिक मौत होती है तो इसकी जाँच कोर्ट की निगरानी अदालत के देखरेख में हो। याचिकाकर्ता के वकील आदिश अग्रवाल ने बताया कि प्रैस काउंसिल ऑफ इंडिया के मुताबिक पिछले ढाई साल में 79 पत्रकारों की हत्या हुई है। ऐसे में जरूरी है कि पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कोई गाइडलाइन जारी की जाए। इसलिए काउंसिल को भी याचिका में पार्टी बनाया गया है। इस मामले में उसकी भूमिका अहम होगी क्योंकि ये एक सरकारी संस्था है जिसमें सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज चेयरमैन हैं।

उन्होंने कहा कि अब मध्यप्रदेश में भी पत्रकार की जलाकर हत्या कर दी गई है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट में एक और याचिका दाखिल की जाएगी। इसमें सभी राज्यों को पार्टी बनाया जाएगा। इस वक्त राज्यों में पत्रकारों की हालत खराब है और ऐसे में उनकी सुरक्षा के लिए पुख्ता इंतजाम जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट इस मामले की सुनवाई दो हफ्ते बाद करेगा।

आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नूतन ठाकुर ने पत्रकार जगेन्द्र सिंह केस में सीबीआई जांच के लिए पीआईएल में सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी कर स्थिति से अवगत कराने के आदेश का स्वागत किया है। उनका कहना है कि मात्र एक स्वतंत्र संस्था द्वारा तफ्तीश ही लोगों के मन में मंत्री और पुलिस की भूमिका के प्रति पर्याप्त विश्वास पैदा कर सकती है। ख़ास कर यदि इस बात पर ध्यान दिया जाए कि जगेन्द्र के आग लगने का एफआईआर उसके मरने के बाद ही दर्ज हो सका था। वह भी तब जब उनके परिवार वालों ने बिना एफआईआर हुए दाह संस्कार करने से साफ़ मना कर दिया था। 

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मजीठिया वेतनमान: सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर यूपी श्रम विभाग के भी सख्त निर्देश जारी

गोरखपुर : राजस्थान, मध्यप्रदेश आदि राज्यों की तरह अब उत्तर प्रदेश शासन ने भी मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुपालन का सख्त निर्देश जारी कर दिया है।  श्रम आयुक्त शालिनी प्रसाद ने प्रदेश के समस्त श्रम अधिकारियों को आदेशित किया है कि वे अपने अपने क्षेत्र के समाचार पत्र प्रतिष्ठानों का निरीक्षण कर तत्काल इस संबंध में रिपोर्ट उपलब्ध कराएं। आदेश में कहा गया है कि समाचार पत्र प्रतिष्ठानों के निरीक्षण के दौरान वहां कार्यरत पत्रकारों और गैर पत्रकारों की संख्या, उनके मौजूदा वेतनमान आदि के सम्बन्ध में पूरी जानकारी रिपोर्ट में दें। निरीक्षण के लिए जिलाधिकारियों से स्वीकृति लेना आवश्यक नहीं है। मजीठिया वेतनमान से संबंधित क्षेत्रीय स्तर पर कोई रिपोर्ट दर्ज कराई गई हो तो श्रम आयुक्त ने उसके भी त्वरित निस्तारण का आदेश दिया है। 

यह आदेश एक जून को श्रम आयुक्त द्वारा प्रदेश के सभी क्षेत्रीय अपर उप श्रम आयुक्तों को दिए गए हैं। इस आदेश में कहा गया है कि उच्चतम न्यायालय द्वारा अवमानना वाद सिविल संख्या 411 2014 अभिषेक राजा व अन्य बनाम संजय गुप्ता व अन्य में पारित आदेश दिनांक 28-4-2015 के द्वारा निरीक्षक नियुक्त किए जाने के निर्देश दिए गए हैं। इस सम्बन्ध में शासन ने 12 नवम्बर 2014 द्वारा पूर्व में ही निरीक्षक नियुक्त किया जा चुका है। मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों को लागू करने के सम्बन्ध में भी शासन द्वारा पत्र संख्या 342 36-1-2014 दिनांक 20-06-2014 द्वारा निर्देश जारी किया गया था परन्तु उक्त प्रकरण पर प्रायः देखा जा रहा है कि अधिकतर क्षेत्रीय कार्यालयों द्वारा बार-बार लिखे जाने के उपरान्त भी उक्त प्रकरण को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। यह स्थिति अत्यन्त खेदजनक है।

श्रम आयुक्त ने अपने निर्देश में यह भी कहा है कि चूंकि उच्चतम न्यायालय ने सम्बन्धित प्रतिष्ठानों हेतु निरीक्षक नियुक्त किए जाने के आदेश दिए हैं, इसलिए निरीक्षण के लिए जिलाधिकारियों से स्वीकृति लेना आवश्यक नहीं है। इस आदेश में यह भी कहा गया है कि यदि क्षेत्रीय स्तर पर इस सम्बन्ध में कोई शिकायत दर्ज करायी गयी हो तो उसका तत्काल निस्तारण भी किया जाए। यहां उल्लेखनीय है कि गोरखपुर जर्नलिस्ट्स प्रेस क्लब की ओर से श्रम उपायुक्त कार्यालय गोरखपुर को गोरखपुर समाचार पत्र प्रतिष्ठानों में मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियां लागू नहीं किए जाने की शिकायत करते हुए ज्ञापन दिया गया था।

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