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एक साल से सिर्फ सपने बेच रही मोदी सरकार, जनता के हाथ कुछ नहीं लगा

मोदी सरकार के एक साल पूरे हो गए। सब इस पर चिंतन कर रहे कि हमने क्या पाया क्या खोया, लेकिन जमीनी हकीकत यही है आम लोगों के हाथ में सपनों के अलावा कुछ नहीं आया। हां विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ा लेकिन विदेशी निवेश से नहीं अपिंतु मोदी सरकार द्वारा खर्चों में बेतहाशा कटौतियों के कारण। वर्तमान हालात यह है कि मोदी जितना काम नहीं कर रहे है उससे ज्यादा प्रचार और प्रोपेगेंडा फैला रहे है जैसे सरकार ने बहुत बड़ी तीर मार ली हो और कुछ मीडिया के दलाल बड़े ठेके और जमीन पाने की लालच में प्रधानमंत्री का गुणगान कर रहे है। 

मोदी सरकार के एक साल पूरे हो गए। सब इस पर चिंतन कर रहे कि हमने क्या पाया क्या खोया, लेकिन जमीनी हकीकत यही है आम लोगों के हाथ में सपनों के अलावा कुछ नहीं आया। हां विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ा लेकिन विदेशी निवेश से नहीं अपिंतु मोदी सरकार द्वारा खर्चों में बेतहाशा कटौतियों के कारण। वर्तमान हालात यह है कि मोदी जितना काम नहीं कर रहे है उससे ज्यादा प्रचार और प्रोपेगेंडा फैला रहे है जैसे सरकार ने बहुत बड़ी तीर मार ली हो और कुछ मीडिया के दलाल बड़े ठेके और जमीन पाने की लालच में प्रधानमंत्री का गुणगान कर रहे है। 

लोगों की जीवन और दशा की बात करें तो देशवासियों में देश के लिए कुछ करने का जब्बा कम, खुद के लिए करने का ज्यादा है। कारण सरकार आम लोगों के प्रति गैर जिम्मेदार है। जैसे यदि आप हेलमेट लगाकर वाहन नहीं चला रहे है तो जुर्माना लगेगा, कारण आप अपनी सुरक्षा के साथ खिलवाड़ कर रहे है लेकिन वाहन चालकों को खतरा खराब सड़कों से भी। इस सवाल पर यातायात पुलिस कहेंगा, हम नहीं जानते उसके लिए आप सड़क निर्माण करने वाली एजेंसी से बात करें। घर में बिजली नहीं आ रही है लेकिन बिल बराबर आ रहा, कंपनी या सरकार की इस इकाई से पूछे कि जब बिजली ही नहीं तो बिल किस बात का। तो कर्मचारी बोलेगा हम नहीं जानते कनेक्शन लगा है मतलब बिल देना पड़ेगा नहीं तो कनेक्शन कटा दें।

रेल में सफर करते वक्त जनरल टिकटधारियों को टिकट दो दे दिया जाता है लेकिन बैठने की सीट नहीं दी जाती और जनरल डिब्बे में खड़े होने की जगह ना होने पर यदि कोई शयन में चला गया तो जुर्माना लगेगा। फिर टीटी बोलेगा हम कुछ नहीं जानते। टेªन में जगह नहीं तो आप सफर मत करें। खाद्य विभाग के माध्यम से राषन आपूर्ति में जमकर धांधली बरती जाती है और एजेंसी को काम देकर विभाग गैर जिम्मेदार बना रहता है। कुल मिलाकर कहे तो अधिकांष सरकारी विभाग अपना धर्म भूलकर वसूली में लगा है, उसे पैसा चाहिए चाहे जैसे भी मिले। इसी कारण सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार का बोलबाला है। सरकारी अधिकारी-कर्मचारी नए कानून में यह खोजते है कि हमें जुर्माना लगाने का अधिकार कहां मिला है, नहीं मिला है तो राजपत्र प्रकाशित करा लेते है। जब सरकार ही देश के नागरिकों को वसूली का माध्यम समझती है तो लोग देश के प्रति क्यों जिम्मेदार होगे। भारतीय समाज बिखरा पड़ा है लोगों को एक दूसरे के दुख दर्द से कोई लेना-देना नहीं, लेकिन सरकार ने कानून ऐसा बनाया है जैसे विश्व की सबसे जिम्मेदार सरकार यही हो। जब तक सरकार अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेगी, तब तक देश का उत्थान होने से रहा। कोई बेरोजगार है, भूखा है, बीमार है तो सरकार कानून बनाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेती है। ऐसे तो सरकार की जिम्मेदारी है। 

समस्याएं बहुत है, और मोदी देश नीति की जगह विदेष नीति पर ज्यादा ध्यान दे रहे है। उनकी मंशा विदेशी कंपनियों से भारी निवेश कराना है, लेकिन भारत गर्म देश है यहां निजी कंपनियां सफल नहीं है। आईटी, पेट्रोलियम, ज्वेलरी जैसी कुछ कंपनियां छोड़कर शेष कंपनियों की हालत ठीक नहीं। मतलब साफ है कि भारत भी चीन की राह (तानाशाही छोड़कर) पर नहीं चला तो उसका विकास असंभव है। अच्छे दिन तभी आएंगे जब सरकारी कंपनियांें की हिस्सेदारी बढ़े, सरकार मांग और आपूर्ति के हिसाब से काम करें। सरकार को निजी कंपनियों के मुकाबले सरकारी कंपनियां खोलने पर ज्यादा जोर देना चाहिए। हर क्षेत्र में 60 से लेकर 80 प्रतिशत निवेश सरकारी होना चाहिए। देश में अधिकांशतः उसी शहर का विकास हुआ है जहां बड़े सरकारी संस्थान है। वहीं प्रापर्टी डीलर व व्यापारी पनपते है। जैसे भोपाल के विकास के पीछे भेल का योगदान है, भिलाई शहर के विकास में भिलाई स्टील प्लांट का योगदान है, जबलपुर में रक्षा क्षेत्र की तीन बड़ी कंपनियां है। प्राइवेट कंपनियों में मुबई, पूणे और बैगलोर का ही विकास हुआ है वह भी इसलिए क्योंकि वे समुद्र के किनारे है और वहां की जलवायु सम है। जल के द्वारा परिवहन सुविधा सुलभ है। फिर भी इन शहरों के विकास में सरकारी निवेष व परिवहन का बड़ा योगदान है। मोदी सरकार का जोर बेरोजगारी पर है लेकिन ठोस कार्ययोजना नहीं है कंपनियां लगेगी रोजगार मिलेगा बेबुनियादी बाते है। निजी कंपनियां सिर्फ शोषण कर रही है, बड़े उद्योगपतियों के आगे सरकार बेवश है। जो मजीठिया वेतनमान को लेकर साफ देखने को मिला। 

देश में बेरोजगारी की बात करें तो सवा अरब जनसंख्या वाले इस देश में महज 20 करोड़ लोग रोजगार कर रहे है और इस आंकड़े में नौकरी पेशा से ठेला खुपचा और व्यापारी भी शामिल है। देश में हर साल लगभग 8 करोड़ लोगों को रोजगार की जरूरत होती है जिसमें 4 करोड़ लोग विभिन्न कारणों से रोजगार नहीं करते। अब 4 करोड़ लोगों में सिर्फ 2 करोड़ लोगों को रोजगार मिलता है, लेकिन अच्छा रोजगार सिर्फ 2 लाख लोगों को ही मिलता है शेष को रोजगार गुजारा भत्ता के समान मिलता है। निजी कंपनियां देश के बैंक से कर्ज लेकर व्यापार करती है माल कमाती है बाद में खुद को दीवालिया घोषित कर देती है, चूंकि देष में ब्याज दर ज्यादा है इसलिए अधिकांश उद्योगपति विदेशी बैंकों से कर्ज लेना ज्यादा उचित समझते है। निजी कंपनियां हमारा पैसा लेकर हमें ही ललचाती है और सरकार तमाशा देखती है। इसके लिए सरकार, सरकारी कर्मचारी और नागरिक अपनी सामूहिक जिम्मेदारी नहीं समझेगे तो कुछ नहीं होगा। और सरकार जिम्मेदारी के नाम पर जुर्माना जोड़ देती है। देष में 60 प्रतिशत लोगों के पास आधुनिक सुविधा के संसाधन नहीं है इसलिए भारत बहुत बड़ा बाजार जरूर है लेकिन यदि सरकार सब कुछ निजी कंपनियों के हाथ में छोड़ देंगी तो देश की स्थिति बदतर से बदतर हो जाएगी इसलिए भारत को साम्यवाद अर्थव्यवस्था अपने की जरूरत है नहीं तो 100 मोदी आ जाए हर दौरे में 100 लाख करोड़ निवेश की घोषणा करवा ले देश का विकास होने से रहा। 

15 लाख करोड़ के बजट वाले इस देश में ढाई से तीन लाख रूपए भ्रष्टाचार कोर्ट कचहरी में खर्च हो जाते है। ढाई लाख रूपए देश की सुरक्षा में खर्च हो जाते है। ढाई तीन लाख रूपए धर्म-कर्म में खर्च हो जाते है। 50 लाख से 1 लाख करोड़ का अनुदान बांट दिया जाता है। कुल मिलाकर कहे तो 2-3 लाख करोड़ रूपए में देश चल रहा है। ऐसी प्लानिंग में ना तो देश का विकास होगा ना मोदी सरकार का कद बढ़ेगा। सरकार लोगों से 60 प्रतिशत तक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कर लेती है। मतलब सरकार जनता का लूटती है और उद्योगपतियों की तिजोरी भरती है। निर्माण और खरीदी का काम निजी हाथों में सौंपती है। नेहरू लेकर मोदी तक औद्योगिक क्रांति का नारा देते-देते थक गए देश जहां था वहीं है और अंग्रेजों ने 150 सालों में विकास की इबारत लिख दी। कारण सब कुछ सरकारी हाथों में था। जबकि वर्तमान में सरकार निजीकरण में जोर दे रही है अर्थात् पूरा सेटअप सरकार बनाती है और कंपनियों को दे दी है। कुछ लोग ये सोचते है कि सरकारी कंपनियों से निजी कंपनियां बेहतर होती है यह बहुत ही गलत धारणा है। सरकारी कंपनियों से ज्यादा भ्रष्टाचार प्राइवेट कंपनियों में होते है और कोई पकड़ नहीं पाता। इसीलिए ज्यादा तर प्राइवेट कंपनियां फलफूल नहीं पाती। और एक कंपनी की अधिकतम लाइफ 20 से 30 साल होती है और उसके बाद उस उत्पाद की मांग घट जाती है या बंद हो जाती है फिर कंपनी बंद। आज भी कई सरकारी कंपनियां आर्थिक रूप से इतनी मजबूत है कि तीन चार अंबानी खड़ा कर दें। 

लेखक एवं पत्रकार महेश्वरी प्रसाद मिश्र से संपर्क : [email protected] 

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