मोदी का भगवा नवउदारवाद : अगर यह योजना नाकाम रही, तो फिर उग्र हिंदुत्व की राह अपनाई जाएगी!

नरेंद्र दामोदरदास मोदी 26 मई 2014 को तब भारतीय लोकतंत्र की असाधारण क्षमता के प्रतीक बने, जब उन्होंने यह दिखाया कि कैसे एक मामूली पृष्ठभूमि से आने वाला एक साधारण आदमी ऊंचे उठते हुए देश का प्रधानमंत्री बन सकता है. हालांकि उन्हें इस ऊंचाई पर उठाने की पूरी कवायद दुनिया की ऐसी ही सबसे महंगी कवायदों में से एक थी (इस पर अंदाजन 10,000 करोड़ रुपए खर्च हुए), लेकिन इस तथ्य के बावजूद उनके हिमायतियों ने इसे भारतीय लोकतंत्र के चमत्कार के रूप में पेश किया. इस पूरी प्रक्रिया में मोदी ने अंधाधुंध रफ्तार से 300,000 लाख किमी दूरी तय की और 5,800 जगहों पर रैलियों को संबोधित किया. इसमें वो 1350 जगहें भी शामिल हैं, जहां 3डी तकनीक से मोदी की 10 फुट ऊंची होलोग्राफिक छवि का इस्तेमाल करते हुए एक ही वक्त में 100 रैलियों को संबोधित किया गया.

Narendra Modi

सभी संभव माध्यमों के जरिए विज्ञापनों का ऐसा तूफानी हमला किया गया कि बच्चे भी ‘अबकी बार मोदी सरकार’ और ‘अच्छे दिन आनेवाले हैं’ गाते फिर रहे थे. बेशक इसमें आरएसएस के लाखों कार्यकर्ताओं की फौज का भी समर्थन था, जिसने यह दिखाया कि अगर जरूरत पड़ी तो उनकी राह को आसान बनाने के लिए उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर, असम के कोकराझार और ऐसी ही जगहों की धरती खून से लाल की जा सकती है. मतदाताओं को लुभाने की ऐसी गहन प्रक्रिया का जोड़ विकसित लोकतंत्रों तक में मिलना मुश्किल है.

यह सब बहुत बड़े पैमाने पर किया गया, और अगर इसके पैमाने को छोड़ दें तो अपने आप में इसमें कुछ भी नया नहीं था. लेकिन यह पैमाना ही था, जिसने सबसे ज्यादा असर डाला. असल में ये चुनाव अनेक तरह से अलग थे. चुनाव के दौरान की प्रक्रिया को अलग कर दें तब भी इसके जो नतीजे आए, उनका पैमाना ही स्तब्ध कर देने वाला था. सबसे ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवार को विजेता घोषित करनेवाले हमारी अनोखी चुनावी व्यवस्था के कारण, जो अपने बुनियादी सैद्धांतिक स्तर पर भी जनता के प्रतिनिधित्व का मखौल उड़ाती है, भाजपा को 282 वोट मिले. यह 31 फीसदी वोटों के साथ कुल सीटों का 53 फीसदी है, जो कि बहुमत से खासा ऊपर है. इसने गठबंधन के दौर को विदाई दे दी, जिसके बारे में कइयों का मानना था कि यह बना रहेगा. सहयोगी दलों को मिला कर राजग का आंकड़ा 334 तक चला गया, और असल में लोकसभा में वामपंथी दलों को छोड़कर भाजपा का कोई विपक्षी नहीं बचा है. नीतिगत मामलों में कांग्रेस असल में इसकी एक घटिया प्रतिलिपि ही रही है. राज्य सभा में भाजपा का बहुमत नहीं है, लेकिन वहां ऐसे रीढ़विहीन दल हैं, जो भाजपा को बचाने के लिए बड़ी आसानी से तैयार हो जाएंगे, जैसा कि हाल में एक ट्राई अध्यादेश के मामले में हुआ. इस तरह भाजपा एक ऐसी स्थिति में है, जिसमें वह जो चाहे वह कर सकती है. फासीवाद के जिस भूत की आशंका बहुतों द्वारा जताई जा रही थी, वह एक सच्ची संभावना बन कर सामने आ गई है. सवाल है कि क्या भारत एक फासीवादी राज्य में तब्दील हो जाएगा? क्या यह एक हिंदू राज्य बन जाएगा? क्या यह धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए एक कैदखाना बन जाएगा?
पूंजी का तर्क

मोदी ने अपना चुनावी अभियान अध्यक्षीय प्रणाली वाली शैली में चलाया था, जिसमें वे अकेले अपने बारे में शेखी बघारते हुए अहंकार से भरी बातें करते फिर रहे थे. लेकिन चुनावों के बाद उन्होंने खुद को एक बदले हुए व्यक्ति के रूप में पेश किया.  पार्टी के संसदीय दल के नेता के रूप में अपनी पुष्टि के बाद जब वे संसद भवन में दाखिल हो रहे थे, तो इसे लोकतंत्र का मंदिर बताते हुए इसकी सीढ़ियों पर माथा टेक कर प्रणाम किया. फिर पवित्र दस्तावेज के रूप में संविधान की शपथ लेने के बाद उन्होंने ऐलान किया कि उनकी सरकार गरीबों, नौजवानों और महिलाओं के लिए समर्पित होगी. उन्होंने सभी पड़ोसी देशों के प्रमुखों को निमंत्रण देते हुए और भी वाहवाही हासिल की. अपनी पहली विदेश यात्रा पर भूटान जाकर उन्होंने संकेत दिए कि वे पड़ोसियों के साथ दोस्ताना रिश्तों को अहम मानते हैं. ब्राजील के फोर्तालेसा में आयोजित छठे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में 100 अरब डॉलर की जमा पूंजी वाले विकास बैंक की स्थापना में उनका भी योगदान था. यह बैंक ब्रिक्स के भीतर व्यापार और विकास को बढ़ावा देगा. देश के भीतर उन्होंने नौकरशाही को अनुशासन में रखने के लिए अनेक कदम उठाए हैं लेकिन साथ ही उन्होंने नौकरशाहों से कहा है कि वे मंत्रियों और सांसदों की राजनीतिक दखलंदाजी का विरोध करें. कल का फेकू अब अब चुपचाप, पूरी गंभीरता से अपना काम कर रहा है. उन्होंने एक महीना बीतने के बाद अपना मुंह और दावा किया कि उनकी सरकार की उपलब्धियां कांग्रेस के 67 बरसों के शासनकाल से बेहतर थीं. हालांकि उनके पक्ष में ऐसी अनेक बातें कही जा सकती हैं, जिन्होंने लोगों को प्रभावित किया है और वे सोचने लगे हैं कि मोदी आरएसएस या भाजपा से स्वतंत्र होकर काम कर सकते हैं और इस तरह वे जनता के लिए अच्छा काम भी कर सकते हैं.

असल में ये और दूसरे अनेक कदम पूंजीपतियों के लिए व्यापार और निवेश के मौके पैदा करने के मकसद से उठाए गए थे, जिन्होंने मोदी में काफी निवेश किया है और उनसे उम्मीदें लगा रखी हैं. सुधारों को हमेशा ही जनता के नाम पर लागू किया जाता है और उसे जायज ठहराने के लिए ‘रिस कर नीचे आने’ की संदिग्ध दलील पेश की जाती है. लेकिन असल में उनका मकसद पूंजी के हितों को पूरा करना होता है जिसे वे मुक्त बाजार की अर्थव्यवस्था के जरिए आगे बढ़ाते हैं. इसलिए ये सुधार मेहनतकश विरोधी होते हैं. सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों का निजीकरण, सार्वजनिक सेवाओं का व्यावसायीकरण, प्राकृतिक संसाधनों को निजी व्यक्तियों के हवाले करना, कीमतें तय करने के लिए बाजार के तंत्र पर भरोसा करना, करों तथा शुल्कों की बाधाएं हटा कर व्यापार को प्रोत्साहित करना, नियामक नियंत्रण को वापस ले लेना, राज्य को आर्थिक गतिविधियां संचालित करने में अक्षम बनाने के लिए राजकोषीय कदम उठाना और इस तरह निजी हितों को बढ़ावा देना, निजी क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों में तेजी लाने के लिए कर तथा श्रम सुधार अपनाना और विनियमन को लागू करना नवउदारवाद के लक्षण हैं. लोगों की ‘अच्छे दिनों’ की खुमारी तब झटके से टूटी जब कुछ ही दिनों के भीतर रेलवे बजट आया, जिसमें रेलवे के यात्रा किराए तथा माल भाड़े में क्रमश: 14.2 तथा 6.5 फीसदी की भारी बढ़ोतरी की गई, जिससे पहले से ही महंगाई के बोझ से दबे लोगों पर और ज्यादा बोझ बढ़ेगा. नरेंद्र मोदी इस साल सितंबर में अपनी अमेरिका यात्रा पहले भारत-अमेरिका परमाणु करार को लागू करना चाहते हैं, जिसके संकेत देते हुए अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) को भारत के असैनिक परमाणु कार्यक्रम की निगरानी के लिए और अधिक पहुंच मुहैया कराई गई है. यह कदम हो या फिर तीन महीनों में खाद्य सुरक्षा विधेयक को स्थगित करने की बात हो या रेलवे में सौ फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के दरवाजे खोलना हो या फिर विदेशी निवेश को लुभाने के लिए पेट्रोलियम सेक्टर में भारी नीतिगत बदलाव हो, ये सारी बातें ठेठ नवउदारवाद को ही साबित करती हैं. हालांकि इन दक्षिणपंथी नीतियों की शुरुआत कांग्रेस ने की थी और उसी ने इन्हें लागू भी किया था, लेकिन इस मामले में भाजपा के साथ उसकी स्वाभाविक संगत है. यह इन नीतियों को लागू करने में भाजपा द्वारा दिखाई जा रही तेजी से साफ जाहिर है.
फिर हिंदुत्व किधर हैॽ

मोदी ने विकास के अपने इरादे पर जोर देने के लिए सोचसमझ कर ही हिंदुत्व पर चुप्पी साधे रखी है. लेकिन एक पक्के संघी के बतौर, जिसका प्रमाण खुद संघ के मुखिया मोहन भागवत ने दिया है, वे भारत को हिंदू राष्ट्र में बदलने के अपने हिंदुत्ववादी एजेंडे को कभी भूल नहीं सकते. हालांकि यह एजेंडा कई तरीकों से अमल में लाया जा सकता है. जैसे कि रामजन्म भूमि आंदोलन या गोधरा के बाद मुसलमानों का कत्लेआम सीधे चुनावी फायदों के लिए लोगों को बांटने के घिनौने तरीके थे, वहीं इनसे कुछ नरम तरीके भी हो सकते हैं जिनके जरिए भीतर ही भीतर संस्थानों को हिंदुत्व के अड्डों में बदला जा सकता है. हिंदुत्व का पहला या सख्त रास्ता शांति को भंग करता है और पूंजी ऐसा पसंद नहीं करेगी. फिर इतना भारी जनाधार हासिल होने की वजह से वह सचमुच जरूरी भी नहीं है. इसलिए मोदी ऐसे सांप्रदायिक झगड़ों के पक्ष में नहीं होंगे, जिनसे निवेश का माहौल बिगड़ जाए. हालांकि सौ सिरों वाला संघ परिवार अपनी जीत से अंधा हो चुका है और वह जमीनी स्तर पर ऐसी समस्याएं खड़ी कर सकता है, जैसा कि पुणे में मुस्लिम नौजवान मोहसिन शेख की हत्या के मामले में दिखा है. इसके अलावा हिंदुत्ववादी गुटों द्वारा अनेक जगहों पर सांप्रदायिक गुंडागर्दी दिखाई गई है. ऐसी हरकतों को काबू में करना मोदी के लिए मुश्किल हो सकता है. लेकिन वे निश्चित रूप से हिंदुत्व का नरम तरीका अपनाएंगे जिसमें वे व्यवस्थित रूप से संस्थानों का भगवाकरण करेंगे. गुजरात में उन्होंने ऐसा ही किया है. इसकी एक बहुत साफ मिसाल येल्लाप्रगदा सुदर्शन राव की चुपचाप की गई नियुक्ति है, जो काकतिया विश्वविद्यालय में इतिहास तथा पर्यटन प्रबंधन के एक अनजान से प्रोफेसर हैं. उन्हें भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद का नया अध्यक्ष बनाया गया है. मानव संसाधन विकास मंत्री शायद यह नहीं सोचतीं कि इस पद के लिए योग्यता मायने रखती है, खुद उनकी योग्यता तथा झूठे शपथ पत्र पर भी आपत्ति उठाई गई है. नए नए अध्यक्ष बने ये माननीय इतना मूर्खता पूर्ण दुस्साहस रखते हैं कि उन्होंने ‘भारतीय जाति व्यवस्था’ की अच्छाइयों को खोज लिया और और यह घोषणा भी कर डाली कि उनका एजेंडा महाभारत की घटनाओं की तारीख निश्चित करने के लिए  शोध कराने का है.

आम अवधारणा के उलट, असल में नवउदारवाद और विचाराधारात्मक हिंदुत्व में कोई आपसी विरोध नहीं है. व्यक्तिवाद और सामाजिक डार्विनवादी रवैए के बारे में इन दोनों के विचार मेल खाते हैं. इसी तरह हिंदुत्व और फासीवाद के बीच समानता भी इतनी जगजाहिर है कि उसके विस्तार में जाने की जरूरत नहीं. फासीवाद मूलत: राजकीय तानाशाही, कानून से परे रूढ़िवादी समूहों की धौंस, राष्ट्रीय अंधभक्ति, एक बड़े कद के नेता के सामने व्यक्तियों और समूहों के समर्पण और सामाजिक जीवन को डार्विनवादी नजरिए से देखने की हिमायत करता है. हिंदुत्व के झंडाबरदारों का भी यही चरित्र है. इसे समझने के लिए आपको बस गोलवलकर को देखने की जरूरत है, जो हिंदुत्व विचारधारा के पूज्य सिद्धांतकार हैं. इस तरह अपने सारतत्व में हिंदुत्व, नवउदारवाद और फासीवाद एक दूसरे के पूरक हैं. और यह पूरकता अपने भव्य रूप में नरेंद्र मोदी में अभिव्यक्त होती है. उल्लेखनीय समाजशास्त्री आशीष नंदी ने उन्हें तब ‘एक फासिस्ट का श्रेष्ठ और ठेठ नमूना’ कहा था जब मोदी की कोई हैसियत नहीं थी. चाहे वह सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन करते हुए केरल, गुजरात, पश्चिम बंगाल, राजस्था, महाराष्ट्र, त्रिपुरा और उत्तर प्रदेश के राज्यपालों से इस्तीफा देने को कहना हो या फिर जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे के संबंध में अनुच्छे 370 को खत्म करने का संकेत देना हो, या समान नागरिक संहिता अपनाए जाने की बात हो या फिर भारत के दूरसंचार नियमन प्राधिकार अधिनियम 1997 को बदलने के लिए अध्यादेश की घोषणा हो, जिसमें नियामक संस्था के प्रमुख की ‘भविष्य में किसी केंद्र या राज्य सरकार में नियुक्ति’ पर पाबंदी थी, ताकि नृपेंद्र मिश्र को प्रधान मंत्री के प्रधान सचिव के बतौर नियुक्त की जा सके, इन सबमें नरेंद्र मोदी की फासीवादी निशानियों को देखना मुश्किल नहीं है. उन्होंने दल के भीतर किसी संभावित विरोध को खत्म करने के लिए अपने आदमी अमित शाह को दल के अध्यक्ष के रूप में बैठा दिया है और राजनीतिक वर्ग को दरकिनार करने के लिए नौकरशाही के साथ सीधा संपर्क बना रहे हैं.
भगवा नवउदारवाद

भगवा नवउदारवाद नवउदारवादी आर्थिक सुधारों की दिशा में एक आक्रामक अभियान है. इसमें साथ ही साथ सामाजिक-सांस्कृतिक तरीकों से वर्चस्ववादी हिंदुत्व का प्रसार करते हुए अपने राजनीतिक जनाधार को और एकजुट तथा मजबूत बनाए रखा जाता है. इसमें निजीकरण, उदारीकरण, विनियमन तथा पूंजी को सारी सुविधाएं मुहैया करना शामिल है, जिसमें पड़ोसी देशों के साथ बेहतर रिश्ते बनाया जाना भी शामिल है ताकि व्यावसायिक माहौल बनाया सके और अंतरराष्ट्रीय व्यापार का विस्तार हो सके. इन सबको देखते हुए भाजपा का कट्टर राष्ट्रवाद भी बहुत सोच-समझ कर चलाया जा रहा है. विवादास्पद वैदिक प्रकरण को भी इसी रणनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए. वेद प्रताप वैदिक चाहे तकनीकी रूप से आरएसएस से जुड़े हों या नहीं, उन्हें भाजपा ने हाफिज सईद से अनधिकारिक-अनौपचारिक बातचीत के लिए नियुक्त किया था, जिसे छुपाने के लिए वह कश्मीर पर बयानबाजी कर रही थी. भगवा नवउदारवाद का मतलब यह भी होगा कि श्रम कानूनों को फिर से लिखा जाएगा, दूसरे कानूनों का सरलीकरण किया जाएगा (जो शुरू भी हो चुका है) तथा संविधान का इस तरह संशोधन किया जाएगा कि यह भारत को व्यवसाय के और अधिक अनुकूल बना सके. इसका मतलब है कि भूमि अधिग्रहण को और आसान बना दिया जाएगा, देश के प्राकृतिक संसाधनों को पूंजी की लूट के लिए खोल दिया जाएगा. इसका मतलब होगा कि नौकरशाही की सभी महत्वपूर्ण जगहों पर हिंदुत्ववादी लोगों को बैठाया जाएगा और शैक्षिक तथा दूसरे शोध संस्थानों का भगवाकरण किया जाएगा. किसी असहमति को पनपने से पहले ही उसे कुचलने के लिए आंतरिक सुरक्षा तंत्र को मजबूत किया जाएगा और किसी भी प्रतिरोध को रत्ती भर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. यह सब अकेले सर्वोच्च नेता नरेंद्र मोदी की कमान में होना है.

अगर यह योजना नाकाम रही, तो फिर उग्र हिंदुत्व की राह अपनाई जाएगी.

(अनुवाद: रेयाज उल हक. समयांतर के अगस्त, 2014 अंक में प्रकाशित)

रेयाज के हाशिया ब्लाग से साभार.



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