अक्षम, पक्षपाती और लापरवाह मोदी सरकार से सुप्रीम कोर्ट ने काम छीना!

शीतल पी सिंह-

मोदी सरकार का इक़बाल ख़त्म… आक्सीजन पर सुप्रीम कोर्ट ने आज एक फ़ैसला लिया, दिया नहीं! फ़ैसला यह है कि मोदीजी की केंद्रीय सरकार जिसने आक्सीजन के देशव्यापी वितरण के सारे हक़ अपने आप अपने आपके लिए कर लिये थे , वह अपने काम को संतोषजनक ढंग से नहीं कर सकी, इसलिए इस काम को सुप्रीम कोर्ट ने मोदीजी की सरकार की जगह अपने हाथ में ले लिया है। इसके लिये कोर्ट ने एक टास्क फ़ोर्स बना दी है जो आने वाले दिनों में इस काम को अपने हाथ में ले लेगी ।

सुप्रीम कोर्ट इसके पहले पर्यावरण के मामले में केंद्रीय सरकार के कार्यकलापों को असंतोषजनक पाकर “भूरेलाल कमेटी” गठित कर इससे मिलता जुलता फ़ैसला कर चुका है। यह पिछली सदी के आख़िर की बात है।

इस फ़ैसले ने मोदीजी की सरकार की कार्यप्रणाली पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा किया है । यह सरकार के अक्षम होने , पक्षपाती होने और लापरवाह होने के आरोपों की एक हद तक पुष्टि करता है।

सुप्रीम कोर्ट से मोदीजी की सरकार के एक दूसरे फ़ैसले पर भी जल्द ही कड़ा निर्णय आ सकता है । वह वैक्सीन के अलग अलग दामों के बारे में होगा । मोदीजी की सरकार ने वैक्सीन ख़रीदने का दाम खुद के लिये 150 रुपये , राज्यों के लिए 400रुपये (जिसे वैक्सीन निर्माता ने घटाकर 300 किया है) और प्रायवेट अस्पतालों के लिये 600 रुपये तय किया है । सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सरकार से पूछा है कि वैक्सीन के यह तीन तरह के दाम क्यों तय किये गये? इससे पहले कब किसी वैक्सीन के लिये किसी सरकार ने ऐसा किया? केंद्र सरकार एक साथ पूरे देश के लिए एक दाम पर वैक्सीन क्यों नहीं ख़रीद रही है? सरकार को प्रायवेट वैक्सीन निर्माता के लाभ की चिंता क्यों है?

अभी तक सुप्रीम कोर्ट और केंद्रीय सरकार के बीच असाधारण सौहार्दपूर्ण वातावरण बना हुआ था । रिटायर्ड चीफ़ जस्टिस सीधे राज्यसभा पहुँच रहे थे , दूसरे जस्टिसेज भी गवर्नर इत्यादि के रूप में सुशोभित हो रहे थे । केंद्र सरकार से कड़े सवालों का होना लुप्तप्राय था , बल्कि हाईकोर्ट्स से आये फ़ैसलों तक पर सुप्रीम कोर्ट में केंद्रीय सरकार लगातार राहत पा रही थी । बोबडे़ साहब के चीफ़ जस्टिस पद से रिटायर होते ही सुप्रीम कोर्ट “नार्मल” हुआ लगता है।

ख़ैर बहुत खामखयाली पालना ठीक न होगा । दरअसल महामारी के प्रबंधन में मोदीजी की सरकार की लापरवाहियों के नतीजे में देशभर के अस्पतालों श्मसानों में लाशों के अंबार लग गये हैं । महामारी ने सबसे ज़्यादा वातानुकूलित क्लास का नंबर लगाया है । अख़बारों के शोकसंदेश के विज्ञापन छापने वाले पन्नों की संख्या बढ़ गई है और मोदीजी की सरकार का प्रचंड समर्थन करने वाला मध्यवर्ग आक्सीजन बेड, आक्सीजन सिलिंडर, आक्सीजन कंसेंट्रेटर,रेमसेडिविर, फ़्लू की दवाओं और एंबुलेंस आदि के लिये सड़कों पर मारा मारा फिर रहा है । सबको किसी न किसी नज़दीकी या खुद की क़ुर्बानी देनी पड़ रही है, सबको हैसियत समझ आ गई है । जज वकील पत्रकार इंजीनियर डाक्टर व्यापारी दलाल विधायक सांसद आदि अनादि सब आसन्न मौत से बचते/भागते/छिपते/भोगते फिर रहे हैं । जान की क़ीमत देकर लोगों को समझ आ रहा है कि मंदिर या किसी नेता की मूरत से पहले अस्पताल और अस्पताल में दवा और डाक्टर होना कितना ज़रूरी है?

सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में बैठे जज भी इंसान ही हैं । उनके भी नाते रिश्तेदार दोस्त यार हैं । वे भी अपनों की मौत से वैसे ही दुख पाते हैं जैसे दूसरे।

इसलिये लगभग आधा दर्जन हाईकोर्ट्स एकाएक क्रांतिकारी नज़र आने लगे हैं । कोई इसे नरसंहार बता रहा है तो कोई कुछ और सुप्रीम कोर्ट भी इस सब पर हाईकोर्ट्स को स्नब करता नहीं दिख रहा।

सबकी जान पर बन आई है! सब समझ रहे हैं कि उनकी गलती से उस्तरा बंदर के हाथ लग गया है और गर्दन किसी की भी कलम हो सकती है!


अमिताभ श्रीवास्तव-

यह बहुत बड़ी ख़बर थी शनिवार की । सबसे महत्वपूर्ण। जो काम केंद्र सरकार को बहुत पहले ख़ुद करना चाहिए था, वह देश की सर्वोच्च अदालत ने किया। सुप्रीमकोर्ट का एक राष्ट्रीय टास्क फ़ोर्स गठित करना यह साफ़ दिखाता है कि सरकार ने महामारी से निपटने के मोर्चे पर किस क़दर ढिलाई बरती है। अपने नागरिकों को समय पर सही स्वास्थ्य सुविधाएँ दिलाने के लिए तमाम व्यवस्थाएँ बनाना सरकार की ज़िम्मेदारी होती है जिसमें मोदी सरकार बुरी तरह नाकाम हुई है। सुप्रीमकोर्ट की यह पहल न्यूज़ चैनलों के लिए चर्चा का बड़ा मुद्दा होना चाहिए था।

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