Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सियासत

समाजवाद बबुआ अब सैफई बुझाई

सैफई में मुलायम सिंह के पोते तेजप्रताप का तिलक हुआ जिसमेँ प्रधानमंत्री मोदी सरकारी विमान से शिरकत करने सैंफई पहुंचे। उत्तरप्रदेश के राज्यपाल राम नाईक सरकारी हेलीकाप्टर से सैंफई पहुंचे। लालू और उनका परिवार भी चार्टर्ड प्लेन से वहां पहुंचा। और अमिताभ बच्चन भी चार्टर्ड प्लेन से वहां पहुँच गए। सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतज़ाम उत्तरप्रदेश की सरकार द्वारा किए गए। करोंडो रूपये इस जश्न पर फूंके गए। यह समाजवाद का नायाब नमूना है। गरीब सर्दी, गर्मी और बारिश हर मौसम में भूख बीमारियों से मर रहा है और सैंफई में करोड़ों रुपये का जश्न हो रहा है बावजूद इसके कि देश में स्वाइन फ्लू से हजारों लोग मर चुके हैं और उसकी चपेट में हैं। यह भारतीय लोकतंत्र का वह रूप है जिससे राजतंत्र भी शरमा जाए और ऐसा समाजवाद जिसके आगे पूंजीवाद भी उन्नीस ही रह जाए।

सैफई में मुलायम सिंह के पोते तेजप्रताप का तिलक हुआ जिसमेँ प्रधानमंत्री मोदी सरकारी विमान से शिरकत करने सैंफई पहुंचे। उत्तरप्रदेश के राज्यपाल राम नाईक सरकारी हेलीकाप्टर से सैंफई पहुंचे। लालू और उनका परिवार भी चार्टर्ड प्लेन से वहां पहुंचा। और अमिताभ बच्चन भी चार्टर्ड प्लेन से वहां पहुँच गए। सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतज़ाम उत्तरप्रदेश की सरकार द्वारा किए गए। करोंडो रूपये इस जश्न पर फूंके गए। यह समाजवाद का नायाब नमूना है। गरीब सर्दी, गर्मी और बारिश हर मौसम में भूख बीमारियों से मर रहा है और सैंफई में करोड़ों रुपये का जश्न हो रहा है बावजूद इसके कि देश में स्वाइन फ्लू से हजारों लोग मर चुके हैं और उसकी चपेट में हैं। यह भारतीय लोकतंत्र का वह रूप है जिससे राजतंत्र भी शरमा जाए और ऐसा समाजवाद जिसके आगे पूंजीवाद भी उन्नीस ही रह जाए।

समाजवाद (Socialism) एक आर्थिक-सामाजिक दर्शन है। समाजवादी व्यवस्था में धन-सम्पत्ति का स्वामित्व और वितरण समाज के नियन्त्रण के अधीन रहते हैं। समाजवाद अंग्रेजी और फ्रांसीसी शब्द “सोशलिज्म” का हिंदी रूपांतर है। 19वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में इस शब्द का प्रयोग व्यक्तिवाद के विरोध में और उन विचारों के समर्थन में किया जाता था जिनका लक्ष्य समाज के आर्थिक और नैतिक आधार को बदलना था और जो जीवन में व्यक्तिगत नियंत्रण की जगह सामाजिक नियंत्रण स्थापित करना चाहते थे। आचार्य नरेन्‍द्र देव ने अपने समाजवादी सिद्धांतों की सूक्ष्‍म व्‍याख्‍या ‘गया थीसिस’ में की है। समाजवादी आंदोलन में नरेन्‍द्र देव की ‘गया थीसिस’ उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी कि लोहिया की ‘पचमढ़ी थीसिस’। ध्यान देने की बात है कि आचार्य नरेन्‍द्र देव किसान और मजदूरों की क्रांतिकारी शक्‍ति के बीच विरोध नहीं बल्‍कि पूरकता के पक्षधर थे, उन्‍होंने कृषि क्रांति को समाजवादी क्रांति से एकाकार करने के पक्ष में रहे, यही वजह थी कि उन्‍होंने अपना ज्‍यादा समय किसान राजनीति को दिया।

राजनीतिक अधिकारों के पक्षधर रहे डॉ. लोहिया ऐसी समाजवादी व्यवस्था चाहते थे जिसमें सभी की बराबर की हिस्सेदारी रहे। वह कहते थे कि सार्वजनिक धन समेत किसी भी प्रकार की संपत्ति प्रत्येक नागरिक के लिए होनी चाहिए। उन्होंने एक ऐसी टीम खड़ी की जिससे समाजवादी आंदोलन का असर लंबे समय तक महसूस किया जाए। डॉ. लोहिया रिक्शे की सवारी नहीं करते थे। वह कहते थे एक आदमी दूसरे आदमी को खींचे यह अमानवीय है।  राजनीतिक अधिकारों के पक्षधर रहे डॉ. लोहिया ऐसी समाजवादी व्यवस्था चाहते थे जिसमें सभी की बराबर की हिस्सेदारी रहे. वह कहते थे कि सार्वजनिक धन समेत किसी भी प्रकार की संपत्ति प्रत्येक नागरिक के लिए होनी चाहिए. उन्होंने एक ऐसी टीम खड़ी की जिससे समाजवादी आंदोलन का असर लंबे समय तक महसूस किया जाए. डॉ. लोहिया रिक्शे की सवारी नहीं करते थे. कहते थे एक आदमी एक आदमी को खींचे यह अमानवीय है।

यद्यपि समाजवादी आंदोलन और समाजवादी शब्द का प्रयोग उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध से आरंभ हुआ तथापि ईसा से 600 वर्ष पूर्व भी समाजवादी विचारों का वर्णन मिलता है, परंतु प्लेटो सर्व प्रथम दार्शनिक है जिसने इन विचारों को स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया। वह न केवल संपत्ति के समान और सामूहिक प्रयोग के पक्ष में था वरन् व्यक्तिगत कौटुंबिक प्रथा का अंत कर स्त्रियों और बच्चों का भी समाजीकरण करना चाहता था। उसके साम्यवाद का आधार गुलाम प्रथा थी और वह केवल संकुचित शासक वर्ग तक सीमित था, अत: उसको अभिजाततंत्रीय समाजवाद कहा जाता है। मध्यकालीन विचारों में भी साम्य संबंधी धारणाएँ मिलती हैं, परंतु उस समय के विद्रोहों का आधार नैतिक और धार्मिक था। आधुनिक काल के प्रथम चरण से विचारस्वातंत्र्य के कारण धर्मनिरपेक्ष चिंतन आरंभ हुआ और इस काल में टामस मोर (Thomas More, “यूटोपिया”, 1516) और कंपानैला (Campanella, “सूर्यनगर” 1623) जैसे विचारकों ने साम्य के आधार पर समाज की कल्पना की, परंतु औद्योगिक क्रांति के पूर्व आधुनिक समाजवादी विचारों के लिए भौतिक आधार – पूँजीवादी शोषण और सर्वहारा वर्ग – संभव नहीं था। औद्योगिक क्रांति के साथ विज्ञानों का विकास हुआ और प्राचीन मान्यताओं तथा धार्मिक अंधविश्वासों का ह्रास होने लगा। इन परिस्थितियों में आधुनिक समाजवादी चिंतन का उदय हुआ। इस काल का प्रथम समाजवादी विचारक फ्रांस-निवासी बाबूफ़ (Babeuf, 1764-97) था। वह भूमि के राष्ट्रीयकरण के पक्ष में था तथा अपने व्यय की प्राप्ति क्रांति द्वारा करना चाहता था।

अठारहवीं शताब्दी के अंत और उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ के अन्य प्रमुख फ्रांसीसी समाजवादी विचारक साँ सीमों (Saint Simon 1760-1825) और फ़ोरिए (Fourier 1772-1837) हैं। साँ सीमों संपत्ति पर सामाजिक अधिकार स्थापित करना चाहता था परंतु वह सबको समान वरन् श्रम के अनुसार वेतन के पक्ष में था। फ़ोरिए के विचार साँ सीमों से मिलते जुलते हैं, परंतु वह सहकारी संगठनों की कल्पना भी करता है। उपर्युक्त फ्रांसीसी समाजवादियों के विचारों से ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमरीका भी प्रभावित हुए। ब्रिटेन का तत्कालीन प्रमुख समाजवादी विचारक रॉबर्ट ऑवेन (Robert Owen, 1771-1858) था। वह स्वयं एक मजदूर और बाद में सफल पूँजीपति, समाजसुधारक और मजदूर तथा सहकारी आंदोलनों का प्रवर्तक हुआ। उसका कथन था कि मनुष्य का स्वभाव परिस्थितियों से प्रभावित होता है। वह शिक्षा, प्रचार और समाज-सुधार द्वारा पूँजीवादी शोषण का अंत करना चाहता था। अपने विचारों के अनुसार उसने उपनिवेश स्थापित करने का प्रयत्न किया, परंतु असफल रहा; तथापि उसके विचारों का ब्रिटिश और संयुक्त राज्य अमरीका के मजदूर आंदोलनों पर गहरा प्रभाव पड़ा।

ऑवेन की भाँति काबे (Cabet, 1781-1856) ने भी संयुक्त राज्य अमरीका में समाजवादी उपनिवेश स्थापित किए परंतु उसके प्रयत्न भी सफल न हो सके। ऑवेन के बाद ब्रिटेन में मजदूरों के अंदर चार्टिस्ट, (Chartist) विचारधारा का प्रादुर्भाव हुआ। यह आंदोलन मताधिकार प्राप्त कर संसद् पर अधिकार स्थापित करना और इस प्रकार राज्यशक्ति प्राप्त करने के बाद आर्थिक तथा सामाजिक सुधार करना चाहता था। आगे चलकर फेबियन तथा अन्य समाजवादियों ने इस संवैधानिक मार्ग का आश्रय लिया। परंतु फ्रांसीसी समाजवादी लुईज्लाँ (Louis Blonc, 1811-1882) क्रांतिकारी था। वह उद्योगों के समाजीकरण ही नहीं, मजदूरों के काम करने के अधिकार का भी समर्थक था। “”प्रत्येक अपनी सामथ्र्य के अनुसार कार्य करे और प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुसार प्राप्ति हो”” उसने इस साम्यवादी विचार का प्रचार किया।  कार्ल मार्क्स (1818-83) के साथी एंगिल्स ने उपर्युक्त आधुनिक समाजवादी विचारों को काल्पनिक समाजवाद का नाम दिया। इन विचारों का आधार भौतिक और वैज्ञानिक नहीं, नैतिक था; इनके विचारक ध्येय की प्राप्ति के सुधारवादी साधनों में विश्वास करते थे; और भावी समाज की विस्तृत परंतु अवास्तविक कल्पना करते थे।

हमारे देश में समाजवाद के भविष्य पर आज प्रश्न चिन्ह लगा हुआ है। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद देश का संविधान आम आदमी के हितों को धयान में रख कर ही बनाया गया था। देश के आर्थिक विकास के लिए मिश्रित अर्थव्यवस्था को स्वीकार किया गया। यद्यपि सार्वजनिक उद्योगों को अधिक महत्व दिया गया। उद्देश्य यह था कि देश का धन कुछ खास लोगों की मुट्ठी में कैद हो कर न रह जाए। पंचवर्षीय योजनाओं का उद्देश्य भी यही था कि गरीबी दूर हो, आम आदमी ऊपर उठे, बेरोजगारी दूर हो, शिक्षा और चिकित्सा की सुविधाएं प्रत्येक को सुलभ हों। संविधान की मूल प्रस्तावना में आम आदमी के हितों का पूरी तरह से धयान रखा गया था फिर भी तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के आपातकाल का लाभ उठा कर एक संशोधन के द्वारा संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवाद’ शब्द जोड़ कर भारतीय गणतंत्र के आर्थिक स्वरूप पर एक मोहर लगा दी।

सामाजिक दृष्टि से भी देश की पंथ निरपेक्षता को असंदिग्ध बनाने के लिये प्रस्तावना में ‘पंथ निरपेक्ष’ (सेक्यूलर) शब्द जोड़ दिया गया। अभी कुछ दिनों पहले सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालकृष्णन, न्यायमूर्ति आर.वी. रवीन्द्रन एवं न्यायमूर्ति जे. एम. पांचाल की पीठ ने एक गैर सरकारी संगठन की उस मांग को खारिज कर दिया जिसमें चाहा गया था कि जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 29 ए (5) से समाजवाद के प्रति निष्ठा की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया जाए। न्यायालय ने कहा कि समाजवाद को वामपंथ की सीमित परिभाषा में रखकर नहीं देखना चाहिए, यह (समाजवाद) लोकतंत्र का एक पहलू है जो आम लोगों की भलाई से जुड़ा है। यहां प्रश्न किसी शब्द से प्यार या घृणा करने से नहीं है। प्रश्न है किसी व्यवस्था से वांछित परिणाम निकल रहे हैं या नहीं।

किसी को यह स्वीकार करने में क्यों संकोच होना चाहिए कि समाजवाद का उद्देश्य बड़ा पवित्र रहा है। सत्ता और वह भी लोकतांत्रिक सत्ता यदि कमजोरों का उत्थान नहीं करती तो उस सत्ता का कोई अर्थ ही नहीं है। गोस्वामी तुलसीदास ने राम के मुंह से यह कहलवाकर कि ‘जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृप अवसि नरक अधिकारी’ शासकों के लिये एक बड़ी कड़ी कसौटी उपस्थित कर दी है। लोकतंत्र में तो सारी जनता को ही, जिसमें गरीब, अमीर, शिक्षित-अशिक्षित सभी सम्मिलित हैं, यह अधिकार दिया गया है कि एक निश्चित समयावधि के बाद सत्ता में बैठे अपने जन-प्रतिनिधियों को वह चुनाव के माधयम से परखे कि वे जन-अपेक्षाओं के अनुरूप कार्य कर रहे हैं या नहीं और यदि नहीं, तो उसको ऐसे जन प्रतिनिधियों को सत्ता से हटाने का अधिकार है। इसमें आमतौर पर कोई विवाद नहीं है कि साम्यवाद/समाजवाद के द्वारा मजदूर वर्ग के हितों का पोषण हुआ है। इसके कारण पूंजीवादियों को भी मजदूरों के बारे में सोचना पड़ा है।

लेखक शैलेंद्र चौहान जयपुर निवासी हैं और उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन