लेबर कमिश्ररों से जिरह में मैनेजमेंट और श्रम विभाग की नंगई हो जाएगी बेपर्दा

मजीठिया वेज अवॉर्ड पाने की जंग लड़ रहे लोगों को निस्संदेह मिलेगा इंसाफ : न्याय में विलंब यानी न्याय नहीं – यह एक आम कहावत या कहें कि मुहावरा बन गया है, जो सिस्टम की न्यायिक व्यवस्था, न्याय की स्थिति, न्याय की दशा-दिशा से उपजा है। न्याय-इंसाफ की अतीत से लेकर वर्तमान तक की स्थिति, इसके मिलने में बेतहाशा विलंब, अनेक-अगणित उतार-चढ़ाव, अस्थिरता-अनिश्चितता और अन्यान्य बाधाएं-अड़चनें इंसाफ की जंग लड़ रहे लोगों के हौसले को पस्त कर देती हैं। उसे ऐसे मुकाम पर पहुंचा देती हैं कि वह निराश होकर बोल पड़ता है – छोड़ो यार! इस मुकदमेबाजी से कुछ नहीं होने वाला, कुछ नहीं मिलने वाला। इससे अच्छा है कि खामोश होकर-चुप होकर घर बैठें। या इसी तरह के न जाने कितने ख्याल, भाव-विचार मन में दंड-बैठक करते हैं, करते रहते हैं। इसी मनोदशा में कुछ लोग वास्तव में निष्क्रियता के शिकार हो जाते हैं और कुछ लोग, या कहें कि ज्यादातर लोग इस स्थिति में बहुत देर तक नहीं रह पाते। जल्दी ही बाहर निकल आते हैं, इससे उबर जाते हैं और फिर,  शुरू की गई लड़ाई को उसके मुकाम तक पहुंचाने के लिए नए संकल्प के साथ मैदान में कूद पड़ते हैं।

मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों के अनुसार वेतन, सुविधाएं एवं अन्य लाभों को पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अवमानना केस लड़ रहे मीडिया कर्मियों की बीते १९ जुलाई को स्थिति बहुत कुछ ऊपर वर्णित की ही तरह रही जब जज साहब ने अगली सुनवाई की तिथि २३ अगस्त घोषित कर दी और पांच राज्यों के लेबर कमिश्ररों को इसी तिथि पर हाजिर होने का आदेश जारी कर दिया। बता दें कि १९ जुलाई फाइनल हियरिंग की तिथि थी और कर्मचारियों को पूरी उम्मीद थी कि इस तारीख पर ऑर्गूमेंट(जिरह) होंगे, जो कुछ देर तक या चंद दिनों तक चलेंगे और फैसला हो जाएगा। पर ऐसा हुआ नहीं। बाद में काफी मंथन, वाद-विवाद, असंख्य व्याख्याओं-विवेचनों के उपरांत निकले निष्कर्षों से अधिकांश मीडिया कर्मियों को उम्मीद बंधी कि न्याय जरूर मिलेगा, पर थोड़ा वक्त और लगेगा। इस या ऐसी आस भरी  स्थिति की ही देन है यह मुहावरा- देर आयद, दुरुस्त आयद। यानी देर तो लगेगी, पर हकीकतन, वास्तव में संपूर्ण-समग्र न्याय मिलेगा।

निश्चित ही इस -समग्र न्याय- सरीखे शब्दों पर कई सवाल उठेंगे। तो इसका जवाब ये है कि सुप्रीम कोर्ट ने अब लेबर कमिश्ररों के माध्यम से सरकार को भी पक्षकार-पार्टी बना दिया है। क्योंकि वेज बोर्ड की अनुशंसाओं, संस्तुतियों को क्रियान्वित कराने-अमली जामा पहनाने-पहनवाने का दायित्व-जिम्मा सरकारी मशीनरी के अहम हिस्से श्रम विभाग का ही है। और हर प्रदेश में इस महकमे का सारा भार श्रम आयुक्तों (लेबर कमिश्ररों) पर ही होता है। इनसे ऊपर श्रम सचिव (लेबर सेक्रेटरी) होता है। सर्वोच्च अदालत ने अपने तकरीबन हर आदेश में लेबर कमिश्ररों को ही स्टेटस रिपोर्ट भेजने का आदेश दिया है। लेकिन इन अफसरों ने इस महान काम को पूरा करने में घोर, दंडनीय लापरवाही की है। उनके ऊपर जो आरोप लगते हैं कि वे मालिकों-मैनेजमेंट के पे-रोल पर होते हैं, मालिकों के टुकडख़ोर होते हैं, उनसे कर्मचारियों-कामगारों के खिलाफ गैरकानूनी, आपराधिक, अमानवीय या कहें कि पतित कारनामे करने के लिए रिश्वत-घूस लेते हैं तो इसमें कोई दो राय नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश ने इस आरोप पर अपनी मुहर लगा दी है। लेबर कमिश्ररों ने इस बार भी स्टेटस रिपोर्ट नहीं भेजी होती अगर चीफ सेक्रेटरीज का दबाव नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट के चीफ सेक्रेटरीज को तलब करने का मकसद यही था।

बावजूद इसके, स्टेटस रिपोर्ट्स को माननीय अदालत ने संतोषजनक नहीं पाया है। इनमें बेहिसाब खामियां पाई हैं। तथ्यों-हकीकतों-वास्तविकताओं की जांच-पड़ताल किए बगैर ऑफिस में बैठकर मनमाने तरीके से रिपोर्टें तैयार की गई हैं, सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा पाया है। यही नहीं, माननीय अदालत को यह तक लगा है कि लेबर कमिश्ररों ने अपनी रिपोर्टों में कहीं न कहीं मजीठिया वेज बोर्ड अवॉर्ड को ही विवादास्पद बता-बना दिया है। जबकि सुप्रीम कोर्ट के ७ फरवरी २०१४ के आदेश-फैसले के बाद इसकी लेसमात्र भी गुंजाइश नहीं रह गई थी। यही वजह है कि कोर्ट ने लेबर कमिश्ररों को तलब करने का सिलसिला शुरू किया है। जैसा कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश है, ये महामहिम श्रमायुक्त लोग पधारेंगे और उनसे जवाब-तलब माननीय न्यायाधीश महोदय करेंगे ही, याचिकाकर्ताओं के वकील कोलिन गोंसाल्वेज, परमानंद पांडेय, उमेश शर्मा आदि भी उन्हें कठघरे में खड़ा करेंगे और सवालों की भीषण बौछार करेंगे। इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर नजर दौड़ा लेना ज्यादा उपयुक्त रहेगा। आदेश इस प्रकार है:—–

UPON hearing the counsel the Court made the following O R D E R

We have heard the learned counsels for the parties and perused the relevant material. Taking into account the large number of responses of the States and the Labour Commissioners thereof which have been filed in the last few days, perhaps in view of the deadline of 19th July, 2016 fixed by this Court by its previous order dated 14th March, 2016, it is necessary to have a comprehensive picture that emanates from the said responses/reports.

Shri Colin Gonsalves, learned senior counsel who appears on behalf of some of the Employees’ Union, has submitted that he would file a comprehensive report on all the issues involved in the case(s) so that effective orders can be passed by the Court. Learned senior counsel, Shri Gonsalves, is requested to do so. On the next date fixed, we propose to take up the cases pertaining to the States of Uttar Pradesh, Nagaland, Manipur, Himachal Pradesh and Uttarakhand in the first batch.

The Labour Commissioners of the aforesaid States shall be present on the said date. The Court will hear arguments on the issue relating to clause 20(j) of the Majithia Wage Board Recommendations in the context of the relevant provisions of the Working Journalists and Other Newspaper Employees (Conditions of service) and Miscellaneous Provisions Act, 1955 and thereafter proceed to examine the issue of implementation of the Wage Board Award in the concerned State.

The Labour Commissioners of the above-named States, therefore, are directed to ensure that all pending applications/issues before them are decided and appropriate orders as required are passed thereon so that the said authorities are in a position to apprise the Court accordingly. List these petitions on 23rd August, 2016 at 2.00 p.m. In the meantime, State of Goa may file its response. As prayed for, liberty is granted to the parties to file their respective responses to the affidavits filed by the States/Union Territories/Labour Commissioner(s).

चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने लेबर कमिश्ररों को पूरी तैयारी के साथ हाजिर होने का आदेश दिया है ताकि वे सुप्रीम कोर्ट को संतुष्ट कर सकें, तो ऐसे में हमारे पास भी एक नया या कहें कि सुनहरा मौका है अपनी दिक्कतों, समस्याओं, परेशानियों, मैनेजमेंट के उत्पीडऩ-प्रताडऩा-हैरेसमेंट-विक्टिमाइजेशन से लेबर कमिश्ररों को अवगत कराने और उसका निदान, निवारण, समाधान करने के लिए कहने का। वैसे भी लेबर कमिश्रर्स अपनी बदमाशियों, अखबार मालिकान से अपनी सांठ-गांठ, मिलीभगत, गठजोड़ पर पर्दा डालने-छुपाने के लिए कोई न कोई तरकीब तो निकालेंगे ही ताकि सर्वोच्च न्यायालय की गाज से बच सकें। ऐसे में हम लोगों का फौरी कर्तव्य यह है कि इस मौके को हाथ से किसी भी सूरत में जाने न दें। अगर न दिए हों तो तत्काल अपनी समस्याओं, मजीठिया वेज बोर्ड अवॉर्ड के हिसाब से बनती अपनी सेलरी, बकाया, फिटमेंट का प्रारूप आदि बनाकर लेबर कमिश्रर्स के हवाले करके उसे अमली जामा पहनाने के लिए दबाव डालें। अखबार किस क्लास मेें आता है, उसकी सालाना समग्र आमदनी-राजस्व क्या है, यह सारा कुछ उसको बताएं। नहीं बता पाने की स्थिति में हैं तो लेबर कमिश्रर से कहें कि वह मैनेजमेंट या किसी के भी माध्यम से इसकी जानकारी लेकर  आपको आपका बनता लाभ मुहैया करवाए।

आप सोच रहे होंगे कि कितनी सहजता से, कितनी आसानी से सारी चीजें, सारी बातें लेबर कमिश्रर के मत्थे मढऩे को कह दीं। इसका जवाब निश्चित रूप से आप जानते होंगे, फिर भी बता दूं कि लेबर कमिश्रर बेशक खुद को आपके सामने बेबस-लाचार, असहाय दिखाए, प्रदर्शित करे, पर हकीकत यह है कि वह मैनेजमेंट को उसके साथ सहयोग न करने पर प्रॉसीक्यूट कर सकता है। मैनेजमेंट पर बदसलूकी-दुव्र्यहार करने, वेज बोर्ड के क्रियान्वयन में सहयोग न करने, वेजबोर्ड से संबंधित जानकारी-डाक्यूमेंट्स आदि मुहैया कराने में हीला-हवाली करने, सकारात्मक रवैया न अपनाने आदि को लेकर मैनेजमेंट पर केस कर सकता है। उनकी गिरफ्तारी करवा सकता है। मध्यप्रदेश के बेतूल जिले में लेबर इंसपेक्टर की ओर से पत्रिका मैनेजमेंट पर की गई कार्रवाई इसकी मिसाल है।

कई अखबारों मसलन इंडियन एक्सप्रेस, हिंदुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ इंडिया आदि   के कर्मियों के सामने अखबार के क्लास को लेकर चिंता है कि उनका अखबार किस क्लास में आता है। क्योंकि मैनेजमेंट ने अखबार के एडिशनों-संस्करणों को एक-एक, अलग-अलग यूनिटों का दर्जा दे दिया है। उन संस्करणों की उनकी आमदनी के हिसाब से, उनकी कॉस्ट के हिसाब से अलग-अलग क्लासिफिकेशन कर दिया है। जो कि सही नहीं है। सही यह है कि ये अखबार मीडिया हाउसेज हैं, एक मीडिया प्रतिष्ठान हैं। इनके चेयरमैन-मालिक होते हैं जिनके नाम से प्रतिष्ठान की सारी आय जमा होती है। उन्हीं के नाम से प्रतिष्ठान (इस्टेब्लिशमेंट) का सारा काम होता है, संचालित होता है। आपको ध्यान होगा कि सुप्रीम कोर्ट अपने हर आदेश में इस्टेब्लिशमेंट शब्द का इस्तेमाल करता है। यानी एक मीडिया इस्टेब्लिशमेंट मीडिया से जुड़े हुए अनेक कारोबार करता है जिसे वह यूनिटों, ब्रांचों, विभागों आदि में बांट-वितरित कर काम करता है। इस बारे में १९९४ में इंडियन एक्सप्रेस बनाम भारत सरकार आदि एक केस में सुप्रीम कोर्ट स्पष्ट फैसला दे चुका है। इसी तरह का एक फैसला दिल्ली हाई कोर्ट ने हिंदुस्तान टाइम्स और उसके कर्मचारियों से संबंधित एक केस में दिया है।

ऐसे में भला दैनिक भास्कर और दैनिक जागरण कैसे बच सकते हैं। इन अखबारों ने तो अपने मास्टहेड पर ही लिख रखा है देश का नंबर एक अखबार और विश्व में सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला अखबार। इसके अलावा राजस्थान पत्रिका, नवी दुनिया, प्रभात खबर, पंजाब केसरी, अमर उजाला आदि और दक्षिण एवं पश्चिम भारत के अनेक अखबार है जिनकी कमाई हजार करोड़ रुपए सालाना से ज्यादा की है। बावजूद इसके मजीठिया मांगने वाले कर्मचारियों का तबादला कर रहे हैं, इस्तीफा लेकर या जबरिया नवगठित कंपनियों में ज्वाइन करवा रहे हैं, या फिर टर्मिनेट कर दे रहे हैं। यह सब गैर कानूनी है। इसके बारे में लेबर कमिश्ररों को त्वरित गति से लिख कर दें ही, साथ ही अपने वकीलों को भी इससे अवगत कराएं। क्यों कि केसों से जुड़े सभी मुद्दों पर एक व्यापक-विस्तृत एवं गहरी रिपोर्ट बनाकर सुप्रीम कोर्ट को देने की इजाजत वरिष्ठ वकील कोलिन गोंसाल्वेज को सुप्रीम कोर्ट ने दे दी है। या कहें कि सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं ही कोलिन साहब से ऐसी रिपोर्ट पेश करने का अनुरोध किया है।

इससे एक चीज तो पूरी तरह साफ है कि कोर्ट में कर्मचारियों के हर मसले, मैनेजमेंट की हर बदमाशी और सरकारी पक्ष यानी लेबर डिपार्टमेंट की हर कारस्तानी-कारगुजारी-करतूतों पर खुलकर बहस-मुबाहिसा, पूछताछ होगी। और नंगई (बदमाशी-गुंडागर्दी) करने वाले हर पक्ष को नंगा कर दिया जाएगा, या कि नंगा होना पड़ेगा। मजेदार यह है कि इस बहस की शुरुआत, या कहें कि केंद्र बिंदु clause 20(j) of the Majithia Wage Board Recommendations है। जर्नलिस्ट एक्ट १९५५ के प्रावधानों, उससे मिले कानूनी अधिकारों आदि को संदर्भित करते हुए बहस होगी। इस एक्ट में प्रदत्त पारिश्रमिक-वेतन-पगार-वेज से संबंधित अधिकारों का हनन किसी भी सूरत में नहीं किया जा सकता। इस ध्रुव सत्य से मालिकान-मैनेजमेंटिया दानवों-राक्षसों को अवगत कराया जाएगा और बताया जाएगा कि सरकार द्वारा, वेज बोर्ड द्वारा और पे कमीशन द्वारा तय किए वेतनों से कम किसी भी कीमत पर नहीं दिया जा सकता। मैनेजमेंट द्वारा अपने फायदे और कर्मचारियों-कामगारों को लूटने, उनका हर तरह से शोषण करने के लिए गढ़े गए उनके हर कानून बेमानी हैं। वैसे भी कंपनियों को अपनी ओर से बनाए सेलरी, ट्रांसफर, टर्मिनेशन, सस्पेशन आदि के नियमों-कानूनों को सरकारी प्रमाणन की अनिवार्यता होती है। सरकार की सहमति, सर्टिफिकेट लिए बगैर वे यदि अपने नियमों पर अमल करते हैं तो वे दंड के भागी होंगे।

इसलिए, खासकर उन मीडिया साथियों से मेरा अनुरोध है, सुझाव है कि इंसाफ में देरी की अनुभूति से उपजी निराशा से उबर कर सच्चाई के धरातल पर मजबूती से अपने पांवों को टिका लें। इस भ्रम को ध्वस्त कर डालें कि सर्वोच्च न्यायालय ने मालिकों-मैनेजमेंट को अपने दानवी कृत्य करने के लिए और अवसर, और समय दे दिया है। नहीं, ऐसा हरगिज नहीं है। ८५ से ज्यादा कंटेम्प्ट केसों को शीघ्रता में, हड़बड़ी में नहीं निपटाया जा सकता। इसके अलावा माननीय न्यायालय के अभी तक के आदेश, कार्य, गतिविधि, प्रक्रिया समग्रता में कर्मचारियों के पक्ष-हक में रहे हैं। और आगे भी रहेंगे, अभी तक के हालात तो यही संकेत दे रहे हैं।

भूपेंद्र प्रतिबद्ध
वरिष्ठ पत्रकार
चंडीगढ़
मो. ९४१७५५६०६६
bhupendra1001@gmail.com

भड़ास के माध्यम से अपने मीडिया ब्रांड को प्रमोट करें. वेबसाइट / एप्प लिंक सहित आल पेज विज्ञापन अब मात्र दस हजार रुपये में, पूरे महीने भर के लिए. संपर्क करें- Whatsapp 7678515849 >>>जैसे ये विज्ञापन देखें, नए लांच हुए अंग्रेजी अखबार Sprouts का... (Ad Size 456x78)

भड़ास की खबरें व्हाट्सअप पर पाएं, क्लिक करें- Bhadas WhatsApp News Alert Service

 

Comments on “लेबर कमिश्ररों से जिरह में मैनेजमेंट और श्रम विभाग की नंगई हो जाएगी बेपर्दा

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *