माया की चाल से निर्दलियों की लगी लॉटरी

बसपा सुप्रीमों मायावती की राजनीति को समझना सबके बस की बात नहीं है।वह क्या कहती हैं? क्या करती हैं? इस बात का अंदाजा राजनीति के बड़े-बडे धुरंधर भी नहीं लगा पाते हैं। कुछ दिनों पूर्व माया ने आश्चर्यजनक रूप से यह घोषणा करके सबको चौंका दिया था कि बसपा की तरफ से वह मुख्यमंत्री पद की दावेदार होंगी, जबकि सब जानते हैं कि अगर बसपा सत्ता में आती है तो मायावती ही मुख्यमंत्री की कुर्सी की हकदार होती हैं। उन्होंने सीएम की दावेदारी क्यों ठोकी, इसके कयास लगाये ही जा रहे थे कि माया ने एक और फरमान सुना दिया कि बसपा यूपी में उप-चुनाव नहीं लड़ेगी।

कारण किसी को समझ में आया हो या नहीं, परंतु माया ने इसकी जो वजह बताई, उसके अनुसार प्रदेश में कानून व्यवस्था का बुरा हाल है, इसके चलते अखिलेश सरकार कभी भी गिर सकती है, जिसके बाद हालात मध्यावधि चुनाव जैसे हो जायेगें। इसके अलावा एक और शिगूफा छोड़ते हुए माया कहती हैं कि भाजपा, सपा विधायकों को टिकट का प्रलोभन देकर उनसे इस्तीफा दिलाकर सूबे में समय से पहले विधानसभा का चुनाव करा सकती है।

बसपा सुप्रीमों साफ-साफ कहती हैं कि उप-चुनाव लड़ने की बजाये वह अपनी पूरी ताकत विधान सभा चुनाव में लगायेंगी। बहनजी के इस फरमान से पार्टी के अंदर भले ही कोई खास सुगबुगाहट नहीं सुनाई दी हो, लेकिन समाजवादी नेताओं के चेहरों पर चमक आ गई। सपा ने अपने आप ही यह मान लिया था कि बसपा की गैर-मौजूदगी में उसका वोट बैंक सपा की तरफ खिसक आयेगा, जबकि भारतीय जनता पार्टी के नेता बसपा के दलित वोट बैंक को हथियाने के लिये लम्बे समय से मशक्कत कर रहे हैं।लोकसभा चुनाव में इसका असर भी देखने को मिला था, जो समय के साथ गहरा होता जा रहा है।

इस बात का अहसास मायावती को भी है, इसी लिये वह कांशीराम को भारत रत्न देने की चर्चा को छल करार देते हुए कहती हैं कि भाजपा कांशीराम को भारत रत्न देने वाली नहीं है, वह दलितों को गुमराह करने के लिये ऐसा कर रही है। वहीं वह यह भी कहती हैं कि राखी बांधकर भाजपा नेताओं ने उनको छला था।

माया की बातों में कितना दम है यह तो केन्द्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी आलाकमान को ही पता होगा लेकिन एक हकीकत जरूर सबको कचोट रही है। भाजपा के दलित नेताओं के अच्छे दिन अभी तक क्यों नहीं आये हैं, जबकि उत्तर प्रदेश की सभी 17 आरक्षित लोकसभा सीटों पर भाजपा को जीत मिली थी। इसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि मोदी कैबिनेट में आरक्षित सीटों से विजय होने वाले 17 में से किसी भी सांसद को मंत्री पद नहीं हासिल हो पाया। मोदी कैबिनेट में इस समय दो दलित चेहरे मध्य प्रदेश के सांसद थावरचंद गहलोत और राजस्थान के निहालचंद मेघवाल शामिल हैं, जबकि अटल कैबिनेट में चार-चार दलित नेताओं को जगह दी गई थी।

इसी तरह से मोदी दस राज्यपालों की नियुक्ति भी कर चुकी है, लेकिन यहां भी किसी दलित नेता को मौका नहीं दिया गया। इससे पूर्व जब राजग सरकार थी तो प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने यूपी जैसे बड़े सूबे के राज्यपाल की जिम्मेदारी दलित नेता सूरज भान को सौंपी थी। संगठन में भी दलितों को तवज्जो नहीं मिल रही है। एक भी राज्य का अध्यक्ष दलित नहीं है। जहां उसकी सरकारे हैं वहां उसने किसी दलित को मुख्यमंत्री नहीं बनाया है। जहां सरकारें नहीं हैं, वहां दलित नेता को कम से कम भाजपा विधायक दल का नेता तो बनाया जा सकता था, इस मामले में भी पार्टी आलाकमान पिछड़ गया। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी इस बात को अनदेखा किया जा रहा है, जबकि संघ के मुखिया मोहन भागवत लगातार सामाजिक समरसता और व्यापक हिन्दू एकता की दुहाई देते नही थकते हैं।

बहरहाल, चुनावी रस्साकशी के बीच मायावती ने पैतरा बदलते हुए अपने समर्थकों से यह कहकर माहौल में गर्मी जरूर पैदा  कर दी है कि उप-चुनाव में समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी सहित अन्य दलों के प्रत्याशियों को सबके सिखाने के लिये वह अच्छे निर्दलीय प्रत्याशियों के पक्ष में वोट डालें। माया नहीं चाहती हैं कि बसपा प्रत्याशी न होने की दशा में भी उनका वोट सपा-भाजपा के खाते में जाये, क्योंकि एक बार जाने वाला(वोटर), फिर आसानी से वापस नहीं आता है। (किस निर्दल प्रत्याशी का समर्थन किया जाये, इसका फैसला नसीमुद्दीन सिददीकी और रामअचल राजभर करेंगे) अतीत में इस बात का अहसास माया को हो भी चुका है।

इसके अलावा जो सच्चाई है, उस पर नजर दौड़ाई जाये तो बसपा नहीं चाहती हैं कि लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार का इतिहास एक बार फिर उप-चुनावों में दोहराया जाये। अगर अबकी से भी पिटाई हो गई तो फिर उबरने का कोई मौका नहीं मिलेगा, जबकि 2017 के चुनाव में सीधे उतरा जायेगा तो बसपा इस फजीहज से काफी हद तक बच जायेगी। इन दो वर्षो में बसपा अपनी राजनैतिक जमीन मजबूत कर लेगी तो समाजवादी पार्टी के पाप का घड़ा भी भर चुका होगा वहीं मोदी का चमत्कार भी थोड़ा-बहुत कम हो जायेगा। बसपा की बदली रणनीति का चुनाव पर क्या असर पडे़ेगा यह तो बाद की बात है, लेकिन माया के पैंतरे से निर्दलों की बल्ले-बल्ले हो गई है।

 

लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं और यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं। कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं। अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं।

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