No one killed Arushi!

Prateek Chaudhary : पुलिस ने शुरू से ही आरुषि मर्डर को ऐसे ट्रीट किया जैसे कोई बच्ची नही कोई जानवर मरा हो। कोई भी सबूत किसी के खिलाफ नही मिला पुलिस को जांच में ओर अब कोर्ट से सब बरी! आखिर कैसे मर गयी आरुषि? कोई तो होगा उसका कातिल? इस केस के इन्वेस्टिगेटर ऑफीसर पर कायर्वाही होनी चाहिए जिन्होंने अपना जमीर बेचकर एक मासूम बच्ची की लाश का सौदा कर सबूत मिटा दिये। माफ करना आरुषि, तुम ऐसे देश मे पैदा हुई जिसमें इंसान की कोई कीमत नहीं, जहाँ हर कुर्सी बिकाऊ है।

Haresh Kumar : अब तो ईश्वर ही बता सकते हैं कि आखिर में आरुषि को मारा किसने था? सारे गवाह और सबूत आरुषि के हत्यारों को दुनिया के सामने न ला सके। शुरुआत में इस केस में घरेलू नौकर से लेकर उनके दोस्तों पर शक गया था, लेकिन अगले दिन घरेलू नौकर हेमराज भी मृत पाया गया था, तो बाद में माता-पिता पर आरुषि की हत्या की बात सामने आई। इसके पीछे जो लोग थे उन्होंने इसे- ओनर किलिंग कहा। सवाल ये है कि आरुषि को मारा किसने। क्या आरोपी को सजा मिल सकेगी या आरोपी भी आपस में एक-दूसरे के हाथों मारे गए। कई पेंच हैं। 16 मई 2008 से आज तक यह मामला उलझा हुआ है और अब तो इसका सुलझना भी ईश्वर के हाथों में है। एक्स्ट्रीम कंडीशन में ही कोई मां-बाप अपनी बच्ची की हत्या कर सकता है, लेकिन यहां तो कई मर्डर हुए हैं। और डॉक्टर इतना निर्दयी नहीं होता। उसे भी समाज की परवाह होती है। पूरा करियर खत्म हो गया। सामाजिक प्रतिष्ठा चली गई और बेटी गई अलग से। अब जीने का क्या मकसद हो सकता है भला। उस दंपती के बारे में भी सोचें, जिसने अपनी इकलौती बेटी को खोया है। सच्चाई सिर्फ ईश्वर जानता है या उस घटना से संबंधित लोग, जिनमें से कई अब हैं नहीं।

Samar Anarya : तलवार दंपत्ति आरुषी हत्याकांड में बरी. दोषी कोई नहीं। न असली हत्यारे, न पुलिस जिसने केस बिगाड़ा, न मीडिया जिसने टीआरपी के लिए मामले को सनसनीखेज ही नहीं बनाया- जिसने मीडिया ट्रायल में तलवार परिवार को हत्यारा और यौन रोगी जैसा तक बना के पेश किया, उस 13 साल की बच्ची तक को! न्याय की जय हो. No one killed Arushi. कन्या पूजने वाले, बेटियों का अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाने वाले, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसी योजनाएँ चलाने वाले देश में कोई सोच भी कैसे सकता है- किसी बेटी को मारने का?

Abhishek Srivastava : बधाई हो। इंसाफ़ हुआ है। तलवार दंपत्ति के वकील कह रहे हैं कि इंसाफ़ हुआ है। जब माई-बाउ को सज़ा हुई थी तब रेबेका जॉन ने कहा था कि यह ”मिसकैरेज ऑफ जस्टिस” है। लीजिए, जस्टिस हो गया। बस एक सवाल है। जस्टिस आरुषि को चाहिए था या उसके कथित हत्‍यारों को? अब तो हत्‍यारा कहना भी पाप है। छूट गए हैं। अदालत से। इलाहाबाद वाली। मने, आरुषि ऐसे ही मर गई थी। बेमतलब इतना टाइम वेस्‍ट किया सबका। ठीके है। जाएदा…

Krishan Bhanu : सीबीआई से यक्ष प्रश्न… माँ-बाप बरी! तो फिर आरुषि को किसने मारा? शिमला के वरिष्ठ वकील छब्बील दास के हत्यारे क्यों नहीं पकड़े गए? मामला 1995 का है। शिमला के बड़े कारोबारी हर्ष बालजीज की शाम ढलते ही आर्मी एरिया में किसने गोली मारकर हत्या कर दी? हर्ष को 2003 में गोली मार दी गई थी। क्या ऐसे में कोटखाई गुड़िया रेप और हत्या की गुत्थी सुलझने की सीबीआई से उम्मीद की जा सकती है?

अलीगढ़ के युवा वकील प्रतीक चौधरी, दिल्ली के पत्रकार हरेश कुमार, मानवाधिकारवादी समर अनार्या, मीडिया विश्लेषक अभिषेक श्रीवास्तव और शिमला के वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण भानु की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *