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पांडिचेरी घूमकर लौटे वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने साझा किया यात्रा वृत्तांत

Om Thanvi : पुदुचेरी (तमिल में पुदु=नया, चेरी=नगर) भले ही पांडिचेरी का बदला हुआ नाम हो, पर यहाँ आपको दोनों नाम चलन में मिलेंगे। बस अड्डे पर कंडक्टर अब भी “पौंडी-पौंडी” की पुकार लगाते हैं। जबकि देश में और जगहों पर पुराने नाम अब उपेक्षा – बल्कि घृणा – के घेरे में चले गए हैं। प्रसंगवश, ध्वनिप्रेम में मुझे पांडिचेरी नाम ज्यादा भाता है। मैंने वहां इसे ही अपनाया। शायद ही किसी ने इस पर उंगली उठाई होगी।

Om Thanvi : पुदुचेरी (तमिल में पुदु=नया, चेरी=नगर) भले ही पांडिचेरी का बदला हुआ नाम हो, पर यहाँ आपको दोनों नाम चलन में मिलेंगे। बस अड्डे पर कंडक्टर अब भी “पौंडी-पौंडी” की पुकार लगाते हैं। जबकि देश में और जगहों पर पुराने नाम अब उपेक्षा – बल्कि घृणा – के घेरे में चले गए हैं। प्रसंगवश, ध्वनिप्रेम में मुझे पांडिचेरी नाम ज्यादा भाता है। मैंने वहां इसे ही अपनाया। शायद ही किसी ने इस पर उंगली उठाई होगी।

यही इस केंद्रशासित जगह की खूबी है। लोगों में नकचढ़गी नहीं है। बरताव में गरमाई है, जो तुरंत लक्ष्य चाहे न हो – पर अनुभव होती जाती है। शहर खूबसूरत है। बंगाल की खाड़ी की गोद में बसा है। समंदर भला किस बस्ती को सौंदर्य से अछूता रखता है? मैंने दुनिया के अनेक सागर-महासागर देखे हैं। यहाँ तक कि बेजान सागर (डैड सी) भी। केपटाउन की वह संधि-रेखा भी, जहाँ अतलांत महासागर और हिन्द महासागर गले मिलते हैं। बस, उत्तरध्रुव महासागर छूटा रहता है – जीवन में कुछ तो छूटा रहना भी चाहिए!

पांडिचेरी के सागर-तट पर लगातार तीन रोज तफरीह हुई। सागर की लहरों की थाप-पछाड़ वहां इतनी मुखर है कि लहरें जब लौट रही होती हैं, सागर अपनी चुप्पी में भी गुनगुनाता जान पड़ता है। कमबख्त कौन पत्थरदिल होगा जो वहां जाकर चंचल न हो जाय – भले घड़ी भर के लिए! प्रोमेनाड तट के पार गोरों की बस्ती है। फ़्रांसी वास्तुकला और रंग यहाँ सुरक्षित हैं। थोड़ी-बहुत उनकी आबादी भी। पहले डच, पुर्तगाली और अंगरेज लोगों का राज भी रहा। पर आखिरी निशान फ़्रांस के रहे। जनसत्ता के हमारे पुराने साथी विनय ठाकुर ने इस हलके की बारीक जानकारियां हमें दी। गिरजे के सामने बनी जोन ऑफ़ आर्क की प्रतिमा हमसे छूट ही जाती, अगर वे उस ओर ध्यान न दिलाते। विनय आजकल वहीं रहते हैं।

पांडिचेरी की पहचान महर्षि अरविंद से वाबस्ता है। उनकी फ़्रांसी साथी मीरा अल्फ़ासा उर्फ़ ‘मदर’ ने जो आश्रम बसाया, वह पनपते हुए कुछ दूरी पर ऑरोविल (अरविंद-नगर) नाम का मशहूर अधात्म-केंद्र बन चुका है। साधक वहां आते हैं, रहते हैं; एकांत और शांति की उपलब्धि इससे अलग क्या होती होगी। ऑरोविल आश्रम के बीचोबीच एक विशाल सुनहरा गोलक बना है। संभवतः ‘मदर’ की स्मृति में इसे ‘मातृमंदिर’ नाम दिया गया है। यह मूलतः साधना-स्थल है, पर वास्तुकला में दिलचस्पी रखने वालों के लिए किसी तीर्थ से कम न होगा।

मातृमंदिर में प्रवेश के लिए अनुमति चाहिए, जो हमारे पास नहीं थी। तड़के सूर्योदय देखने के विफल उद्यम के बाद शोधार्थी रजनीश कुमार के साथ उनकी बाइक पर मैं ऑरोविल चला आया था। हम जंगल की राह हो लिए। जंगल की पगडंडियों और बेतरतीब वनस्पतियों का अध्यात्म भी कौन मामूली अध्यात्म होता है? पर उसमें रमने की फुरसत, और कुव्वत, हम शहरातियों में कहाँ!

पांडिचेरी और ऑरोविल के अलावा इस प्रवास में दूरस्थ पिच्छावरम नाम की ठहरी हुई (पच्छजलीय/बैकवाटर्स) झील भी जाना हुआ और चिदंबरम के प्रसिद्ध नटराज मंदिर भी। पिच्छावरम ने केरल प्रवास की याद ताजा की। साफ-सुथरे और पुजारियों की दादागीरी से रहित चिदंबरम मंदिर ने काशी से लेकर पुरी तक के कुछ-कटु-कुछ-वीआइपी अनुभव याद दिलाए। दोनों जगह की यात्रा पांडिचेरी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के छात्रों और शिक्षकों के साथ हुई, जो परस्पर आत्मीय हो सारे रास्ते नाचते-गाते-झूमते चले। मजा यह रहा कि गाना न आया तो किसी ने हनुमान चालीसा सुनाई, किसी ने कुरान की आयतें। मुझे बहुत आनंद आया, चाहे छात्रों को इसमें संशय रहा हो!

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.

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