भ्रष्ट डीजीपी सिद्धू के पैरोल पर हैं देहरादून के कई बड़े पत्रकार!

PHOTO Amitabh Thakur

पिछले सप्ताह उत्तराखंड के डीजीपी बीएस सिधू द्वारा ख़रीदे गए एक विवादित वन भूमि के मामले में इस प्रकरण को जानने-समझने और इस पर अपनी निजी हैसियत में अग्रिम कार्यवाही करने के लिए हम (मैं और पत्नी नूतन) देहरादून गये थे. मामले की कहानी लम्बी है और उसे मैं अलग से प्रस्तुत करूँगा. उस मामले में मेरे पास इतने दस्तावेज़ हैं जो मामले की सच्चाई को एकदम से साफ़ कह देते हैं. इन दस्तावेजों को देखते ही कोई भी समझ जाएगा कि यह “चोरी और सीनाजोरी” की एक अद्भुत दास्तान हैं जिसमे एक व्यक्ति ने अपने रसूख और ऊँचे पद का सीधा दुरुपयोग कर अपना व्यक्तिगत हित साधने और कर्तव्यशील लोगों को फंसाने और परेशान करने का कुकृत्य किया है.

यहां एक मरे हुए आदमी की जगह दूसरा आदमी खड़ा कर देने, 100 वर्ग फीट के गिरे हुए मकान को बैनामे में 1800 वर्ग फीट के पुराने बंगले के रूप में दर्शाने, 25-30 हज़ार प्रति वृक्ष कीमत के 250 साल के पेड़ों को उसी बैनामे में 1000 रुपये प्रति वृक्ष का दिखाये जाने, सरकारी कार्यवाही करने वाले जिम्मेदार अफसरों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज कराये जाने, उन मुकदमों में मनमाफिक कार्यवाही नहीं करने पर छोटे अफसर को प्रताड़ित किये जाने से ले कर बहुत कुछ इस कहानी में है जो अपने आप में अनूठी कथा है.

हमने देहरादून में मौके पर जा कर देखा और पाया कि कोई मंद बुद्धि व्यक्ति भी अगर सिर्फ एक बार ज़ा कर देखेगा तो समझ जाएगा कि जमीन वन विभाग की है पर फिर भी एक अत्यंत उच्चपदस्थ अधिकारी ने वह जमीन एक मरे हुए आदमी के नाम पर दुसरे नत्थूराम से खरीदी जिसपर स्वयं उत्तराखंड के मुख्य सचिव ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में हलफनामा दिया है कि प्रतिवादी संख्या चार (बीएस सिद्धू) द्वारा अपने पद का दुरुपयोग किया गया है.

मुझे यह मामला प्रताड़ित लोगों में से एक ने बताया. उन्हें कहीं से हमारे बारे में मालूम हुआ कि हम इस तरह के बेवकूफी भरे काम करते हैं और दूसरों के फटे में अपनी टांग घुसा कर आ बैल मुझे मार करने के आदती हैं. हमारी उस सज्जन से कई बार लम्बी बात हुई और उन्होंने हमें ईमेल पर तमाम दस्तावेज़ भेजे. वे अभिलेख इतने स्पष्ट थे कि कोई सामान्य बुद्धि का आदमी भी समझ सकता था कि इसमें सीधे-सीधे अपराध हुआ है, एक बड़े अफसर ने अपने पद और रसूख का बेजा फायदा उठाया है और वह अफसर अब अपनी ताकत का गलत प्रयोग कर लोगों को बुरी तरह परेशान कर रहा है.

हमारी मजबूरी यह है कि हम इस तरह के मामलों में घुसते रहते हैं. क्यों घुसते हैं? कारण कई हैं- एक तो खुलेआम इस तरह ताकत का दुरुपयोग देख कर मन परेशान हो जाता है, दूसरे कुछ अच्छा करने की आतंरिक इच्छा है, तीसरा खुला अत्याचार देख अपनी ताकत भर उसका प्रतिरोध करने की गन्दी आदत पड़ गयी है. बदले में किसी धन-दौलत, लाभ की इच्छा दूर-दूर तक नहीं है, हाँ एक इच्छा जरुर रहती है-सम्मान की, सराहना की. मैं मानता हूँ यह इच्छा भी नहीं रहनी चाहिए पर क्या करूँ अभी इससे मुक्त नहीं हो पा रहा हूँ.

अतः जब इस प्रकरण की जानकारी मिली, इसका अध्ययन किया और यह समझ में बात आ गयी कि इस मामले में अत्याचार हुआ है तो हमने यह निर्णय किया कि मौका मिलते ही देहरादून जायेंगे, मौके पर बात समझेंगे और उसके बाद कार्यवाही करेंगे. इसी सोच के साथ हमने देहरादून जा कर मौके पर जांच की जिससे हमारा मत और पुख्ता हो गया. अगले दिन हमने अपनी बात लोगों के सामने रखने के लिए प्रेस कांफ्रेंस रखा. इस कांफ्रेंस में मैं एक बार फिर समझा कि सच की लड़ाई में कितने तरह के जाने-अनजाने खतरे होते हैं.

हमने ग्यारह बजे प्रेस कांफ्रेंस का समय दिया था. जो पहले पत्रकार बंधू आये उन्हें देख कर आसानी से समझा जा सकता था कि वे हमसे नाराज़ हैं. तमतमाए चेहरे से उन्होंने मुझसे सवाल किया- “तो क्या आप उत्तराखंड की सारी जांच करेंगे? आप एडीजी श्रीवास्तव वाली जांच भी करेंगे?”

मैं समझ नहीं पाया ये एडीजी श्रीवास्तव कौन शख्स हैं और उनका क्या मामला है. मैंने कहा यदि मुझे जानकारी दी जाए तो मैं बिलकुल जांच करूँगा. वे सज्जन मेरे उत्तर से तनिक भी संतुष्ट नहीं दिखे. उन्होंने कहा-“आप श्रीवास्तव जी के मोबाइल फोन वाले मामले की भी जांच करेंगे?”

मैं हतप्रभ था कि इस वन विभाग वाले मामले में एडीजी श्रीवास्तव क्यों और कैसे आ गए हैं, ये एडीजी हैं कौन, इनका मामला क्या है, पर वे सज्जन लगातार इसी पर जमे हुए थे. मैंने कई बार कहा कि यदि मुझे बताया जाए तो मैं अपनी तरह से मामले की जांच करने की पूरी कोशिश करूँगा पर वे अंत तक संतुष्ट नहीं हुए. यही नहीं उन्होंने मुझे मेरी हैसियत से भी रूबरू कराया, कहा कि यदि आप इतने बड़े जांचकर्ता हैं तो बताये कि आप स्वयं सुपरसीड किये गए हैं, आप आईजी सिविल डिफेन्स क्यों हैं, किसी जिम्मेदार पद पर क्यों नहीं हैं?

इसके बाद एक दूसरे सज्जन आये. वे एक बड़े इलेक्ट्रॉनिक चैनल से थे. उन्होंने मामले पर पूछने की जगह मुझसे पूछा कि मैं लखनऊ से देहरादून क्यों चला आया. फिर उन्होंने कहा कि आखिर मुझसे इस मामले का क्या मतलब. उन्होंने मुझसे मेरी सेवा शर्तों, सेवा नियमावली, आचरण नियमावली आदि पर कई सवाल किये. उनकी भाव-भंगिमा से साफ़ दिख रहा था कि वे मुझे यह बताना चाह रहे थे कि मेरा आईपीएस अफसर हो कर लखनऊ से देहरादून आ कर इस तरह की जांच करना यदि एक आपराधिक कृत्य नहीं है तो कम से कम दुराचरण तो है ही जिसके लिए मुझे शर्मिंदा होना चाहिए.

एक तीसरे सज्जन आये. उन्होंने भी मुझसे एडीजी श्रीवास्तव और उनके मोबाइल की बात पूछी और यह कहा कि यदि आपको जांच का इतना शौक है तो आप एडीजी के मोबाइल मामले की जांच क्यों नहीं करते.

एक बड़े हिंदी अख़बार के साहब आये, उन्होंने भी मेरे लखनऊ से देहरादून आने पर अपनी स्पष्ट आपत्ति जताई, फिर मेरी सेवा नियमावली और इस जांच की वैधानिकता और औचित्य पर चर्चा की. यह अलग बात है कि अगले दिन उन्होंने इस प्रकरण को अपने समाचारपत्र में कोई स्थान ही नहीं दिया.

पांचवे सज्जन ने इस बात पर आपत्ति जताई कि जब घटना इतनी पुरानी है तो मैं अब क्यों आ रहा हूँ, आखिर इस प्रकार अचानक मेरे अवरित होने का कारण और निहितार्थ क्या है? इस प्रकार एक अच्छी संख्या में सम्मानित पत्रकार साथियों ने मूल मुद्दे की जगह एडीजी श्रीवास्तव के मोबाइल प्रकरण, लखनऊ से देहरादून आ कर जांच करने, आईपीएस अफसर होने के बावजूद जांच करने, मेरी सेवा शर्तों, ऐसी जांच की आधिकारिकता पर अपना ध्यान केन्द्रित रखा और इनमे से कईओं के स्वर से नाराजगी स्पष्ट झलक रही थी.

बाद में मुझे दो-तीन पत्रकार साथियों ने कहा कि दरअसल एक अफवाह चारों ओर उड़ाई गयी है कि हम यूपी के किसी रिटायर्ड एडीजी श्रीवास्तव के कहने पर देहरादून आये हैं जिनके खिलाफ स्वयं किसी मोबाइल चोरी के मामले में कोई गंभीर जांच चल रही अर्थात हम कोई बयाना या सुपारी ले कर आये हैं. मतलब यह कि हमारे आने का उद्देश्य ही अपवित्र और स्वार्थ-प्रेरित है. मेरे लखनऊ आने के बाद मेरे एक पुराने सुहृद ने मुझे बताया कि कई लोगों को यह बात कही गयी थी कि हमारे इस पूरे अभियान में ही खोट और छलावा है और इस कारण कई लोगों ने हमारी बातों को उसी चश्मे से देखा और उन्हें स्वाभाविक रूप से नज़रंदाज़ किया.

मैं सभी सम्मानित पत्रकार साथियों से कहना चाहूँगा कि मुझे आदतन ज्यादा झूठ बोलने की आदत नहीं है. यदि ऐसे किसी भले आदमी (श्रीवास्तव जी) ने हमें भेजा होता तो मुझे उनका नाम लेने में बहुत देर नहीं लगता. यह तो है कि हमें यह मामला इस प्रकरण से जुड़े किसी व्यक्ति ने ही बताया था और उसके द्वारा भेजे दस्तावेजों के आधार पर ही  हम देहरादून गए थे. मैं उस भले आदमी का नाम सार्वजनिक नहीं कर रहा यद्यपि उसे समझना उतना मुश्किल भी नहीं है. पर इतना है कि हम किसी श्रीवास्तव जी नाम के एडीजी के कहने पर देहरादून नहीं गए थे और मैं यह बात लिखते समय तक नहीं जानता कि इस श्रीवास्तव एडीजी के मोबाइल फ़ोन चोरी का क्या मामला है. यह अलग बात है कि अब मैं यह मामला जानना चाहता हूँ और प्रयत्न कर जल्दी जान भी लूँगा.

मैं पुनः देहरादून के सम्मानित पत्रकार साथियों से कहना चाहूँगा कि मैं और मेरी पत्नी डॉ नूतन ठाकुर सिवाय एक ताकतवर आदमी के गलत कार्यों का विरोध करने, कुछ प्रताड़ित लोगों की मदद करने और अपनी समझ से न्याय की एक लड़ाई लड़ने के सिवाय किसी भी अन्य मोटिव या उद्देश्य से देहरादून नहीं गए थे. हाँ, जैसा मैंने ऊपर कहा मेरा यदि कोई फायदा और लालच था तो वह था सम्मान, कृतज्ञता और सराहना की इच्छा. लेकिन इस सम्मान, कृतज्ञता और सराहना के लिए हमने अच्छी कीमत भी चुकाई थी- पूरे मामले को गहराई में समझना, सहारनपुर से अपनी गाडी से अपने पेट्रोल के खर्चे पर चल कर आना, अपने पैसे से गेस्ट हाउस में रुकना, एक दिन की छुट्टी लेना, दिन भर मेहनत कर मौके पर जाना और पूछताछ करना आदि. हाँ, यह सही है कि इस नेक काम में कई अच्छे लोगों ने हमारी मदद भी की जिनमे आपकी तरह के पत्रकार बंधू शामिल थे जो हमसे परिचित थे और जिन्हें प्रतिपक्षी द्वारा उड़ाई अफवाह की जगह हमारी नेकनीयत पर अधिक आस्था थी. उन कृपालु सज्जनों के कारण हमें प्रेस कांफ्रेंस का स्थान निशुल्क मिल गया जिससे बड़ी राहत रही.

यद्यपि इन बातों का कोई बहुत मतलब नहीं है फिर भी मैंने इन्हें अपनी तसल्ली के लिए लिखा है ताकि मुझे यह ना लगे कि मैंने अपनी बात कहने की कोशिश तक नहीं की. मैं आसानी से समझ सकता हूँ कि यदि किसी भी व्यक्ति को एक स्थानीय उच्च-पदस्थ व्यक्ति द्वारा एक नवागंतुक अपरिचित के विषय में ऐसी नकारात्मक बातें कही जायेगी तो उसका उस नवागंतुक को गहरे शक की निगाहों से देखना और उसके सभी कार्यों में घिनौना निहितार्थ खोजना बहुत स्वाभाविक होगा. अतः मेरे पत्रकार साथियों ने जो किया वह वाजिब था. बस इतना निवेदन अवश्य है कि यदि खुले दिलो-दिमाग से वार्ता हुई होती तो निश्चित रूप से परिणाम दूसरे होते. इसके अतिरिक्त यह भी निवेदन है कि चूँकि हम अच्छी तरह समझ चुके हैं कि यह एक बहुत गंभीर मामला है, अतः हम बिना लाभ-हानि और व्यक्तिगत हित-अहित सोचे अपनी औकात भर इस पर आगे भी प्रयास करेंगे.

अंतिम बात मैं यह कहना चाहूँगा कि यदि मेरी बातों में थोड़ी सी भी सच्चाई का अंश दिखे तो हमारे इस अभियान को अपना अभियान समझ कर उसमे अपना सहयोग प्रदान करने की कृपा करें क्योंकि प्रकरण काफी गंभीर है और सीधे-सीधे अधिकारों के व्यापक दुरुपयोग से जुड़ा हुआ है जिस पर आपके विशेष सहयोग की महती आवश्यकता है.

लेखक अमिताभ ठाकुर वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी हैं. अमिताभ जनपक्षधरता और बेबाकी के लिए जाने जाते हैं.

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