हिन्दुस्तान लखनऊ के लोकल स्टाफर ने नौकरी जाने के बाद एफबी पर क्या लिखा, पढें

पल्लव शर्मा हिन्दुस्तान अखबार के लखनऊ संस्करण में सिटी के स्टाफर रहे हैं. इस अखबार में चले छंटनी के भीषण दौर में वे भी कार्यमुक्त कर दिए गए. पल्लव ने नौकरी जाने के बाद बजाय निराश होने के, सब कुछ को एक खेल की बतौर उदात्त भाव से लिया. उनका लिखा ऐसे कइयों को सबक दे गया जो जॉब जाने के बाद से मातम मना रहे हैं और डिप्रेशन में चले गए हैं. ध्यान रखें, नौकरी-चाकरी जीवन का एक हिस्सा भर है. पूरा जीवन जीना-समझना है तो इस प्रकृति को देखिए-समझिए. न अन्न की कमी होगी, न रोजगार की. बस, मन मिजाज उदात्त हो, सीखने वाला हो, संघर्षों से दो-दो हाथ करने वाला हो.

पल्लव के पाजिटिव थाट्स को पढ़ें-

जिन्दगी है खेल- कोई पास कोई फेल
अनाड़ी है कोई- खिलाड़ी है कोई

इस गीत के बोल जीवन की सच्चाई बन जायेंगे कभी सोचा भी न था।

वर्ष 2000 से मेरी पत्रकारिता का शुभारम्भ एक प्रशिक्षार्थी के रूप में “हिदुस्तान” से हुआ वो दौर भी क्या दौर था बी-कॉम करके निकला था पर राह मेरी मुझे पत्रकारिता की ओर ले जाना चाहती थी तो मैं भी चुपचाप अरमानों की गठरी सिर पे उठा चल दिया इस निष्ठुर “पत्रकारिता” की डगर पर।

समय अपनी गति से चल रहा था और मैं पत्रकारिता के मोहजाल में फँसकर अपनी जीवनयात्रा का खट्टा मीठा प्रसाद प्राप्त कर रहा था।

पत्नी और बच्चों की देखरेख की जिम्मेदारी के साथ सामाजिक दायित्वों का निर्वहन और पत्रकारिता की रोटी खा कर लगभग इन बीस वर्षों में क्या पाया-क्या खोया ये सोचने का दिवस मेरी जिन्दगी में आज यानि 3-9-2020 आया।

जिस संस्थान की सेवा में मैनें अपने जीवन की कीमती 20 वर्ष लगा दिये, दिन को दिन नही समझा-रात को रात नही उस संस्थान ने मुझसे मेरा इस्तीफा उपहार स्वरूप मांगा जो मैनें खुशी खुशी दे दिया।

“मुझे गम नही इस दर्द का
मुझे गम है तेरी सोच का”

बीते इन 20 वर्षों में हिन्दुस्तान परिवार ने बहुत कुछ दिया ऐसा प्रतीत होता था ये ही मेरा अपना परिवार है काम के समय काम और मौज के समय मस्ती| ये थी हमारी कार्यप्रणाली के साथ साथ हंसती खेलती जिन्दगी।

मुझे अपने हिन्दुस्तान परिवार पर पहले भी गर्व था आज भी है और भविष्य में भी रहेगा। सभी अपने अग्रज-अनुज साथियों को मेरा सलाम-राम राम और ढेर सारा प्यार। मित्रों-ये जीवन की सच्चाई है।

मिलन के साथ बिछोह।

न जाने समय फिर कब हमें पुन: मिलने को मजबूर कर दे तो साथियों

मैं यही कहूंगा-:

न निराश हो न निराश कर
ये जिन्दगी का ही खेल है
पहले थे हम जुदा जुदा
पर आज हममें मेल है।
न मिले समय कुछ गम नही
हर दिल से दिल मिलते रहें
बस आरजू इतनी मेरी
जब भी मिलें खुश हो मिलें
अन्त में लखनऊ के समस्त
उन मित्रों संस्थाओं का आभारी हूँ जिन्होने मुझे और मेरी पत्रकारिता
को इतना मान और सम्मान दिया।
एक पत्रकार के नाते न सही एक छोटे भाई की तरह पल्लव को अपने दिल में बसा कर रखियेगा।
यही मेरा जीवन उपहार होगा।

पुन: हिन्दुस्तान परिवार को मेरा बहुत बहुत प्यार।

फिर मिलेंगे।

आपका प्यारा

पल्लव शर्मा

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