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सुख-दुख

जेठमलानी जी, आज पत्रकारों से ज्यादा गरीब कौन है?

जेठमलानी जी, अब तक पता नहीं था आप इतने दयालु है । गरीबों के लिए मुफ्त काम करने को तैयार रहते हैं । लोग तो यही समझते हैं कि वकील कोई भी हो, बिना पैसा लिये अदालत जा कर पैरवी करना तो दूर, जरा सा मशवरा तक देने को तैयार नहीं होता । लोग तो यही समझते हैं कि सुप्रीम कोर्ट का मरगिल्ला से मरगिल्ला वकील भी अदालत में एक पेशी का लाखों वसूले बिना न तो अपनी कलम चलाता है और न ही अपनी जुबान । भला हो – भाजपा नेताओं का और दिल्ली के सीएम का । अब हमें ही क्या, पूरे मुल्क को पता चल गया है कि जेठमलानी जी गरीबों को अपनी सेवाएं मुफ्त में देने को तैयार रहते हैं।

<p>जेठमलानी जी, अब तक पता नहीं था आप इतने दयालु है । गरीबों के लिए मुफ्त काम करने को तैयार रहते हैं । लोग तो यही समझते हैं कि वकील कोई भी हो, बिना पैसा लिये अदालत जा कर पैरवी करना तो दूर, जरा सा मशवरा तक देने को तैयार नहीं होता । लोग तो यही समझते हैं कि सुप्रीम कोर्ट का मरगिल्ला से मरगिल्ला वकील भी अदालत में एक पेशी का लाखों वसूले बिना न तो अपनी कलम चलाता है और न ही अपनी जुबान । भला हो - भाजपा नेताओं का और दिल्ली के सीएम का । अब हमें ही क्या, पूरे मुल्क को पता चल गया है कि जेठमलानी जी गरीबों को अपनी सेवाएं मुफ्त में देने को तैयार रहते हैं।</p>

जेठमलानी जी, अब तक पता नहीं था आप इतने दयालु है । गरीबों के लिए मुफ्त काम करने को तैयार रहते हैं । लोग तो यही समझते हैं कि वकील कोई भी हो, बिना पैसा लिये अदालत जा कर पैरवी करना तो दूर, जरा सा मशवरा तक देने को तैयार नहीं होता । लोग तो यही समझते हैं कि सुप्रीम कोर्ट का मरगिल्ला से मरगिल्ला वकील भी अदालत में एक पेशी का लाखों वसूले बिना न तो अपनी कलम चलाता है और न ही अपनी जुबान । भला हो – भाजपा नेताओं का और दिल्ली के सीएम का । अब हमें ही क्या, पूरे मुल्क को पता चल गया है कि जेठमलानी जी गरीबों को अपनी सेवाएं मुफ्त में देने को तैयार रहते हैं।

सच पूछो तो आज पत्रकारों  ( मेरा मतलब मीडिया के सभी कर्मचारियों से है ) से ज्यादा गरीब कौन होगा । पत्रकारों की एक क्रीमी लेयर को छोड़ दें तो आज देश का हर पत्रकार इतना असहाय है कि बता नहीं सकता । प्रायः सभी पत्रकार दीन ही हैं । भले ही अपनी दयनीय आर्थिक दशा को ढापते फिर रहे हों । हां, कुछ ऐसे पत्रकार अपवाद हो सकते है जो अखबार मालिकों के लिए लाइजनिंग भी कर रहे हों या दलाली जैसे मिलते-जुलते काम भी कर रहे हों ।

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सरकारी अफसर हो या कर्मचारी, उद्यमी हो या व्यापारी, डाक्टर हो या वकील, समाज का कोई वर्ग हो । अमीर हो या गरीब, अकेला हो या कोई समूह उसकी मांग को समाज के सामने लाने में सरकार के सामने लाने में पत्रकार पीछे नहीं रहता । उसके साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने को हमेशा तैयार रहता है । मगर जब पत्रकारों के साथ अन्याय होता है तो कौन आगे आता है ?
यह कड़वी सच्चाई है कि पत्रकारों की आवाज दबा दी जाती है । उनकी मांग, उनका दर्द कोई अखबार नहीं छापता । कोई टीवी चैनल उनकी आवाज बुलंद नहीं करता । यही डर रहता है कि अगर पत्रकारों की आवाज बुलंद हुई तो अखबार मालिकों और टीवी चैनल मालिकों की पोल खुल जाएगी । उनके चेहरे पर लगा मुखौटा उतर जाएगा। अखबार और टीवी चैनल की आड़ में उनके मालिक और मालिकों के भाई-भतीजे क्या – क्या कर रहे हैं, किसे पता ? काले को सफेद और  सफेद को काला कर रहे हैं मगर ये सब कैसे उजागर हो पाएगा?

पत्रकारों पर तो अखबार मालिकों की लगाम कसी है। नेताओं को भी अखबार मालिकों का साथ चाहिये । उनके भी अपने धंधे हैं अपने-अपने स्वार्थ है अखबार मालिकों के खिलाफ नहीं बोल सकते । आखिर उन्हें भी आगे चुनाव लड़ना है, सरकार बनानी है, मंत्री बनना है । देश की जनता को सपने बेचने है । और ये सब काम अखबार मालिकों के सहयोग के बिना नहीं हो सकता । पहले भी नही, आज भी नहीं, आगे भी नहीं । हां, शरद यादव जैसे कुछेक नेता संसद में पत्रकारों का दर्द उजागर करने का साहस करते हैं । अखबार मालिकों को उनकी असली औकात बताने का  ‘दुस्साहस’  भी करते है मगर उनकी आवाज भी नक्कारखाने में तूती बन कर रह जाती है।

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अगर संसद में पत्रकारों के हित में उठी आवाज को केन्द्र सरकार अनसुना कर देगी तो कौन इस सरकार को जनोन्मुखी और लोककल्याणकारी सरकार मानेगा ? अगर इस समाज के पढ़े-लिखे और जागरूक वर्ग ( पत्रकार ) को कई सालों से न्याय नहीं मिल पा रहा है तो यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि देश में अनपढ़, गरीब और असहाय लोगों, असंगठित मजदूर वर्ग को न्याय मिल पाएगा ।
पत्रकारों को बढ़ा वेतन और भत्ते कब मिलेंगे, उनका बकाया लाखों की रकम अखबार मालिकों की टेंट से कब बाहर निकलेगी कोई नहीं जानता । अखबार मालिकों के लिए कोई नियम-कानून नहीं है ? अखबार मालिक और टीवी चैनल के मालिक यूं ही कानून को धता बताते रहेंगे और करोड़ों का सरकारी विज्ञापन हड़पते रहेंगे ? मंत्रियों और नेताओं से साठगांठ कर अपना उल्लू यूं ही सीधा करते रहेंगे ? उनपर सरकार का कोई अंकुश नहीं ?

देश के हर व्यक्ति को अगर किसी पर भरोसा है तो है वो है न्याय व्यवस्था । आज पत्रकार भी अदालत की ओर टकटकी लगाए हुए है, उन्हें उम्मीद है कि अदालत न्याय दिलाएगी मगर सुप्रीम कोर्ट में लगातार देरी से पत्रकार बिरादरी में भारी निराशा है । जब अदालत में सुनवाई के दौरान कुछ कहा जाए और बाद में जारी आदेश में उन बातों का नामोनिशान न हो तो ऐसे हालात में नाउम्मीदी और बढ़ जाती है । सुनवाई और बहस की बात तो दूर, नये महाशय के आने के बाद से तो तारीख तक का अता-पता नहीं है ।  

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करोड़ों-अरबों में खेल रहे अखबार मालिक तो अपनी पैरवी के लिए बड़े-बड़े वकील लगा सकते है और उन्हें करोड़ों रुपये दे सकते हैं । वकील को एक पेशी पर कई लाख दे सकते हैं जो अपने कानूनी दांव-पेंच से मजीठिया केस को सालों तक लटकाए रह सकते हैं मगर किसी पत्रकार की इतनी हैसियत नहीं है कि वो एक पेशी के लिए किसी वकील को लाखों रुपये दे सके ।

तो माननीय जेठमलानी जी, गरीब पत्रकारों के बारे में भी कुछ सोचिये । उठिये,  काला चोंगा पहनिये, पत्रकारों की आवाज को बुलंद कीजिये, उनको न्याय दिलाने में भागीदार बनिये । आप तो गरीबों के मसीहा है, उनका केस मुफ्त में लड़ने को तैयार पहते हैं । भला आज , देश में निरीह पत्रकारों से ज्यादा गरीब और कौन है ?

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Dhiraj Singh
[email protected]

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0 Comments

  1. अरुण श्रीवास्तव

    April 8, 2017 at 9:14 am

    पहली बात तो यह कि पत्रकार गरीब हैं तो इसमें जेठमलानी जी की क्या गलती है। पत्रकार ने कभी अपनी गरीबी के लिए लड़ाई लड़ी है क्या ? रजत शर्मा, दीपक चौरसिया, अंजना ओम कश्यप, शशि शेखर, प्रताप सोमवंशी और रणविजय सिंह आदि गरीब हैं क्या?

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