पीएम के नाम पर सपा-बसपा एक राय नहीं

लखनऊ : अयोध्या में भगवान राम का मंदिर कब बनेगा, इसको लेकर विरोधी दलों के नेता अक्सर बीजेपी तंज कसते हुए कहते रहते हैंं,‘मंदिर वहीं बनाएंगे,पर तारीख नहीं बतायेंगे।‘ अब चुनावी मौसम में इसी तरह का तंज बीजेपी विरोधी दलों के नेता विरोधियों पर कसते हुए कहने लगे हैं,‘ प्रधानमंत्री हम बनवाएगें, पर नाम नहीं बतायेगें।’

भाजपा के इस हमले से विरोधी दलों के नेताओं की त्योरियां ठीक वैसे ही चढ़ जाती हैं जैसे मंदिर की तारीख बताने के नाम पर बीजेपी नेता आग-बबुला हो जाया करते हैं। वैसे आज विपक्षी दलों के नेता भले ही कुछ कहें, लेकिन सच्चाई यही है कि भारत के राजनैतिक इतिहास में ऐसे मौके एक-दो बार ही आएं हैं जब कोई दल या गठबंधन प्रधानमंत्री के रूप में किसी चेहरे को आगे करे बिना चुनाव लड़ा हो।

1977 में आपातकाल के बाद जब कांग्रेस के खिलाफ विपक्ष लोकनायक जय प्रकाश नारायण की अगुवाई में जनता पार्टी का गठन करके चुनाव लड़ा था,तब जरूर पीएम के लिए किसी नेता के नाम की घोषणा नहीं की गई थी, जबकि जनता पार्टी में एक से एक धुरंधर नेता मौजूद थे। इन चुनावों में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक को हार का मुंह देखना पड़ा था। जनता पार्टी के बहुमत हासिल करने के बाद जय प्रकाश नारायण ने वरिष्ठ के आधार पर मोरार जी देसाई का नाम फाइनल किया था और वह पीएम बने थे,लेकिन देसाई सरकार का हश्र बहुत बुरा हुआ और अंतरविरोधों के चलते अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले ही यह सरकार गिर गई थी।

1977 में इंदिरा गांधी के खिलाफ विपक्ष में जो एकजुटता देखी गई थी,वैसा ही नजारा आजकल मोदी विरोधी पेश कर रहे हैं। कांग्रेस को छोड़कर पूरा विपक्ष मोदी के खिलाफ लामबंद होने की कोशिश में लगा है, लेकिन तब जनता पार्टी के प्रति मतदाताओं का विश्वास हिलोरे ले रहा था,ऐसा लग रहा था जैसे इंदिरा गांधी के चंगुल से देश को जनता पार्टी ही बचा सकती है। उस समय कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता की एक लाइन,‘ सिघांसन खाली करो कि जनता आती है।’ को सियासी मंचों पर खूब दोहराया जाता था।कविता का मुखड़ा कुछ इस प्रकार था।
सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी,

मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है,
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

यहां यह बता देना भी जरूरी है कि ‘दिनकर की जिस कविता की एक लाइन विरोधी दलों के नेता आतापकाल के बाद इंदिरा गांधी सरकार को बेदखल करने के लिए दीवारों से लेकर जनसभाओं तक में क्रांतिकारी नारे के रूप में दोहराया करते थे, .वही दिनकर जी जीवन के आखिरी कुछ वर्षों को छोड़ दें तो ताउम्र कांग्रेस की सत्ता के करीब बने रहे, पंडित जवाहर लाल नेहरु , इंदिरा गांधी के गुणगान करते रहे. लेकिन उनकी मृत्यु के बाद 1975 से 1977 तक सम्पूर्ण क्रांति तक यही कविता गाते दिख जाते थे, दीवारों पर लिखते थे। यह कविता इस बात की प्रमाणिकता है कि रचना को लेखक के जीवन से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। लेखक की देह शांत हो जाती है, लेकिन उसकी रचनाएँ बार-बार अपनी प्रासंगिकता को साबित करके जीवंत होते देखी जा सकती हैं।

बात जय प्रकाश नारायण के व्यक्तित्व की कि जाए तो जयप्रकाश नारायण जिन्हें उनके करीबी प्यार से जेपी कहकर पुकारते थे, भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और राजनेता थे। उन्हें 1970 में इंदिरा गांधी के विरुद्ध विपक्ष का नेतृत्व करने के लिए जाना जाता है। इन्दिरा गांधी को पदच्युत करने के लिये उन्होने ‘सम्पूर्ण क्रांति’ नामक आन्दोलन चलाया था। वे समाज-सेवक थे, जिन्हें ‘लोकनायक’ के नाम से भी जाना जाता है। 1998 में उन्हें मरणोपरान्त भारत रत्न से सम्मनित किया गया था। इसके अतिरिक्त उन्हें समाजसेवा के लिए 1996 में मैगससे पुरस्कार प्रदान किया गया था

खैर, आज मोदी के खिलाफ वैसी एकजुटता नहीं दिखाई जैसी इंदिरा गांधी के खिलाफ देखने को मिली थी। तब विपक्ष में देशभक्ति हिलारें ले रही थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तानाशाही तरीके से देश में आपातकाल लागू करके विपक्ष, मीडिया और जनता के सभी अधिकार छीन लिए थे। आज विपक्ष सत्ता के लिए एकजुट है। उसमें अंतर्विरोध दिख रहा है। जब यह नेता एक साथ एक मंच पर होते हैं तो कुछ कहते हैं और मंच की सीढ़िया उतरते ही इनकी जुबान बदल जाती है। इसका नजारा हाल ही में पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की बुलाई रैली में देखने को मिला।

ममता बनर्जी द्वारा आहुत ‘संयुक्त भारत रैली’ में करीब 20 से 22 दलों के 20 नेता एक मंच पर साथ आए, जिसमें कांग्रेस के दो बड़े नेता भी मौजूद थे। ये सब नेता एक मंच पर एक साथ आकर मोदी को हटाने का दम तो भर रहे थे, मगर सच्चाई यह भी है कि इनमें से कई ऐसे थे जो पहले ही लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से अलग जाने का फैसला ले चुके हैं। अगर एक मंच पर विपक्षी दलों के नेता एक साथ नजर आ भी जाते हैं तो अब सवाल उठता है कि क्या भाजपा को हराने के लिए एक साथ चुनावी मैदान में भी उतरेंगे? इसका जवाब ना में ही नजर आता है। क्योंकि हाल ही में उत्तर प्रदेश में मायावती और अखिलेश यादव ने सपा-बसपा के गठबंधन का ऐलान कर इस बात की तस्दीक कर दी कि यूपी में कांग्रेस अकेली हो गई है।

यानी यूपी में अब कांग्रेस को भाजपा से तो लड़ना है ही, साथ ही उसे बसपा और सपा से भी लड़ना है, लेकिन ममता की रैली में अखिलेश और बसपा के सतीश मिश्र कांग्रेस के साथ मंच साझा कर रहे थे। अखिलेश ने रैली में यह तो जरूर कहा कि देश को नया पीएम मिलेगा, लेकिन मौके की नजाकत को भांप कर पीएम यूपी का ही होगा, इस बात पर अखिलेश वहां चुप्पी साध गए, जबकि बसपा से गठबंधन के बाद प्रेस कांफ्रेस में अखिलेश ने साफ-साफ कहा था, पीएम यूपी का ही होगा। इसी प्रकार से कोलकता से सतीश मिश्रा के लखनऊ आते-आते प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के मुद्दे पर बहुजन समाज पार्टी ने अपने पत्ते खोल दिए। बसपा के प्रवक्ता सुधींद्र भदौरिया कह रहे हैं कि दलित, मुस्लिम, महिलाएं और गरीब, मायावती जी को प्रधानमंत्री पद पर देखना चाहते हैं। ऐसे दोहरे रवैये से तो यही लगता है कि विपक्षी पार्टियों के पास यह विजन तो स्पष्ट है कि केंद्र की सत्ता से मोदी सरकार को हराना है, मगर कैसे हटाना है यह तरीका नहीं पता है? देश के आगे ले जाने के लिये विपक्ष के पास क्या नीति और नियत है यह कोई बताने वाला नहीं है।

इसी तरह से बात तृणमूल कांग्रेस की नेता और पश्चिमी बंगाल की सीएम ममता बनर्जी की कि जाये तो उन्होंने कोलकता में भले ही विपक्षी एकता रैली का नेतृत्व किया था और मंच पर कांग्रेस के साथ दिखीं भी थीं, लेकिन लोकसभा के चुनावी मैदान में वह कांग्रेस के साथ दूर-दूर तक नजर नहीं आती हैं। ममता बनर्जी पहले ही ऐलान कर चुकी हैं कि वह लोकसभा चुनाव अकेली लड़ेंगी। यानी टीएमसी का कांग्रेस या वामपंथियों से कोई गठबंधन नहीं होगा। यहां भी कांग्रेस, भाजपा के साथ-साथ टीएमसी से भी लड़ेगी।वामपंथियों के साथ जरूर कांग्रेस हाथ मिला सकती है। इस तरह से तो यही लगता है कि विपक्षी पार्टियों के पास विजन स्पष्ट है कि उन्हें येनकेन प्रकारेगा केंद्र की सत्ता से मोदी सरकार को हराना है, मगर कैसे हटाना है ? हटाने के बाद देश को कैसे आगे बढ़ाना है ? यह तरीका मोदी विरोधियों को नहीं पता है।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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