PNB फ्रॉड पर एक सर्राफा कारोबारी ने दो साल पहले PM मोदी को पत्र भेजा था पर हुआ कुछ नहीं

Anil Singh : सारी सज़ा कांग्रेस को, सारा मज़ा इन बेशर्मों का! कितन बेशर्म हैं ये लोग! पंजाब नेशनल बैंक के प्रबंध निदेशक सुनील मेहता खुद कह रहे हैं कि 11,360 करोड़ रुपए का घोटाला इसी जनवरी माह के तीसरे हफ्ते में उजागर हुआ। जो लेटर ऑफ अंडरटेकिंग जारी किए गए और जिनके आधार पर ये सारा फ्रॉड हुआ, वो पिछले दो साल में जारी किए गए। लेकिन ये कह रहे हैं कि यह घोटाला यूपीए के शासनकाल का है।

पहले वित्त मंत्रालय के अधिकारी से कहलवाया कि यह सिलसिला 2011 से चल रहा है और फिर पीएनबी के एमडी ने वही बात दोहरा दी। अब उसी की आड़ में अपनी जवाबदेही से बच रहे हैं। इनकी जुबान को तब लकवा मार जाता है जब पूछा जाता है कि सर्राफा कारोबारी हरिप्रसाद ने जुलाई 2016 में ही मेहुल चौकसी की कंपनी में हो रहे फ्रॉड के बारे में सीधे प्रधानमंत्री को जो पत्र लिखा था, उस पर कुछ क्यों नहीं किया गया। असल में हरिप्रसाद ने कंपनी की बैलेंस शीट में आस्तियों, देनदारियों व बैंक ऋण के मिलान के बाद प्रधानमंत्री के पास विस्तृत शिकायत भेजी थी।

पहले प्रसाद ने बेशर्मी दिखाई, अब सीतारमण की बचकानी सफाई!

पीएनबी घोटाले में अपना दामन पाक-साफ दिखाने में भाजपा के छक्के छूट रहे हैं। पहले कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने पूछा कि आखिर गीतांजलि जेम्स का बिजनेस 2011 से 2013 के बीच दोगुना कैसे हो गया? सीधे-सीधे उनका आरोप था कि कांग्रेस की कृपा से ऐसा हुआ है। लेकिन प्रसाद बाबू, गीतांजलि जेम्स लिस्टेड कंपनी है। उसकी बिक्री वित्त वर्ष 2010-11 में 5122.47 करोड़ रुपए और शुद्ध लाभ 224.60 करोड़ रुपए था। सच है कि वित्त वर्ष 2012-13 में उसकी बिक्री 10,380.67 करोड़ रुपए और शुद्ध लाभ 265.16 करोड़ रुपए हो गया। इस तरह दो सालों में उसकी 42.36 प्रतिशत की सालाना चक्रवृद्धि दर से बढ़ी, लेकिन शुद्ध लाभ में सालाना वृद्धि दर मात्र 8.65 प्रतिशत रही। इसलिए इस पर आंखें चमकाने की कोई ज़रूरत नहीं है। अगर आपको लगता है कि गीतांजलि जेम्स ने इस दौरान कुछ घोटाला किया था, तब तो सत्यम जैसा मामला बनता है। इससे तो शेयर बाज़ार में हज़ारों लिस्टेड कंपनियां संदेह के घेरे में आ जाएंगी। इसलिए आपसे विनम्र आग्रह है कि अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए देश की उभरती इक्विटी संस्कृति को खतरे में मत डालिए।

आगे के आंकड़े यह हैं कि यूपीए शासन के आखिरी साल वित्त वर्ष 2013-14 में गीतांजलि जेम्स को 7343.04 करोड़ रुपए की बिक्री पर 22.65 करोड़ रुपए का शुद्ध घाटा लगा था। लेकिन उसके बाद एनडीए का शासन शुरू होते ही उसके सितारे बुलंद हो गए और उसने 2016-17 में 10,464.77 करोड़ रुपए की बिक्री पर 39.72 करोड़ रुपए का शुद्ध लाभ कमा लिया। अगर आपका ही तर्क लगाया जाए तो क्या आप बताएंगे कि ऐसी क्या कृपा आप लोगों ने कर दी कि गीतांजलि का धंधा ही नहीं बढ़ा, बल्कि वह 22.65 करोड़ रुपए के घाटे से 39.72 करोड़ रुपए के मुनाफे में आ गई! इसलिए महोदय, उल्लू बनाना बंद कीजिए। जनता उतनी नासमझ नहीं है जितनी आप लोग समझते हैं।

अब रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण अपनी टेढ़ी मुस्कान के साथ मैदान में उतरी हैं। बेशर्मी इतनी कि दावा कर रही हैं कि उनकी ही सरकार ने यह घोटाला उजागर किया है। अगर ऐसा है तो फिर आपके वित्त मंत्रालय ने क्यों नहीं इसकी जानकारी दी? पीएनबी ने सीबीआई के पास एफआईआर कराने के 15वें दिन जब स्टॉक एक्सचेंज को सूचना दी, तब सारे देश को इसकी जानकारी मिली। पीएनबी को भी यह घोटाला तब पता चला कि जब उसके एक सामान्य कर्मचारी ने लेटर ऑफ अंडरटेकिंग (एलआईयू) के लिए नीरव मोदी के लोगों से 100% कैश मार्जिन देने की मांग कर दी तो पहले की करतूतों का भंडाफोड़ होता गया। निर्मला जी, क्यों ऐसी हरकत कर रही हैं जैसे ज़मीन पर मुंह के बल पर गिरने पर बच्चे को खुश किया जाता है कि तूने तो धरती को पटककर गिरा दिया।

आप कह रही हैं कि यह घोटाला 2011 से चल रहा था। अच्छी बात है। लेकिन सीबीआई यह क्यों कहे जा रही है कि 2017-18 के दौरान ही अधिकांश एलआईयू जारी किए गए या रिन्यू किए गए। उसने छापों के बाद दर्ज नई एफआईआर में कहा है कि सारा का सारा पीएनबी घोटाला 2017-18 के दौरान हुआ है। यानी, नीरव मोदी जब वित्त मंत्री अरुण जेटली के साथ दावोस में वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम की बैठक में शिरकत करने के बाद देश वापस लौटे, तब से। आप कहती हैं कि ये सब पहले से हो रहा था, लेकिन आपने अब पकड़कर सामने रखा है। कमाल है! महोदया, पब्लिक इतनी मूर्ख नहीं है। आप बस एक बात बताइए कि अगर सारा मामला आपकी सरकार ने उजागर किया है तो 31 जनवरी को पीएनबी द्वारा शुरुआती एफआईआर दर्ज कराने के बाद 14 फरवरी तक के पंद्रह दिनों तक सीबीआई और ईडी हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठे रहे?

साथ ही यह भी बताइए कि मेहुल चौकसी और नीरव मोदी के ठिकानों पर जनवरी 2017 में आयकर छापों से बरामद 4900 करोड़ रुपए के कालेधन पर वित्त मंत्रालय ने क्यों आखें मूंद लीं? जब आभूषणों की 50,000 रुपए या उससे ज्यादा की खरीद पर पैन कार्ड दिखाना जरूरी था, तब आपकी सरकार ने वह सीमा बढ़ाकर फिर से दो लाख रुपए क्यों कर दी? सवाल बहुत सारे हैं। आप अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनेंगी तो ये वहां से भी ललकार रहे होंगे। लेकिन अगर अंतरात्मा ही मर गई हो तब तो आपकी जमात को सत्ता से बाहर निकालने का काम भारतीय अवाम को ही करना होगा।

मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार और अर्थकाम डाट काम के संस्थापक अनिल सिंह की एफबी वॉल से.

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