स्मृति शेष- प्रमोद तिवारी : यादों के गीतकार..तुम बहुत याद आओगे यार…

स्वर्गीय प्रमोद तिवारी की फाइल फोटो

प्रमोद तिवारी यानि यादों का गीतकार..अब बस यादों में ही शेष रहेगा। बीती रात लालगंज(उप्र) से कवि सम्मेलन में ज़िन्दगी का आखिरी गीत गाकर दूसरी दुनिया में चला गया गीतकार..। कन्नौज के पास एक सड़क दुर्घटना में अपने साथी अवधी के हास्य कवि के डी शर्मा ‘हाहाकारी’ के साथ प्रमोद का निधन हो गया। आख़िरी तस्वीर कवि सम्मेलन की है जिसमें दोनों साथ बैठे हैं और आख़िरी सफर पर भी साथ गए। प्रमोद मूलतः पत्रकार थे। ‘जागरण’ कानपुर में वर्षों आला पदों पर रहे। फिर कवि ,गीतकार के रूप में व्यस्तता बढ़ी तो खबरनवीसी छोड़ दी। जल्द ही प्रमोद देश भर के कवि सम्मेलनों के सितारे बन गए। 

उनका यादों का गीत… “याद बहुत आते हैं गुड्डे गुड़ियों वाले दिन,  दस पैसे में दो चूरन की पूड़ियों वाले दिन..” श्रोताओं के सर चढ़ कर बोलने लगा। अनगिनत शानदार गीत और कविताएं लिखने वाले प्रमोद को यह गीत सुनाए बिना मंच छोड़ने ही नहीं दिया जाता था। ग्वालियर मेले के अखिल भारतीय कवि सम्मेलन, प्रभात वेलफेयर सोसाइटी के आयोजनों में प्रमोद के गीत भुलाये नहीं जा सकते। उनके गीत श्रोताओं को इस तरह याद थे कि वे एक पंक्ति पढ़ते तो दूसरी सभागार से गूंजती थी।

मेरा उनसे परिचय करीब दस साल पहले हुआ। मैं तब नईदुनिया ग्वालियर  में संपादक था। हमारे साथी सी. पी. श्रीवास्तव Chandra Prakash ने बताया कि कानपुर से गीतकार प्रमोद तिवारी मेले के कवि सम्मेलन में आ रहे हैं। सी पी कानपुर ‘जागरण’ में रहे हैं। कवि सम्मेलन के बाद रात डेढ़ बजे सीपी ने हम दोनों का परिचय कराया। बस उसके बाद दोस्ती परवान चढ़ती गयी। प्रमोद जब भी ग्वालियर आते , खूब गपशप होती। हर कवि सम्मेलन में वे मंच से कहते– “सामने राकेश भैया बैठे हैं..ये गीत उन पर न्यौछावर है..”

अभी दो साल पहले “हमारे अटल प्यारे अटल” नाम के भव्य कवि सम्मेलन में जब प्रमोद ने गीत सुनाए तो पूरा सभागार झूम उठा। लोग आधी रात भी श्रोता उन्हें छोड़ने को तैयार नहीं थे। वे सिर्फ कवि,गीतकार नहीं थे बल्कि अपने समय और समाज पर पैनी नज़रें रखने वाले ज़िम्मेदार नागरिक भी थे। वर्तमान सत्ता की विसंगतियों पर उनकी तीखी टिप्पणियां फेसबुक पर छायीं रहतीं थीं। प्रमोद तिवारी..तुम्हे इतनी जल्दी नहीं जाना था न यार… जानते हैं कि तुम उस जहां में पहुंच कर भी महफ़िल जमा लोगे और सुनाओगे..

राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं
ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं
आओ तुमको एक गीत सुनाते हैं
रिश्तों की खुशबू से नहलाते हैं..

बहुत याद आओगे यादों के गीतकार… अलविदा।

वरिष्ठ पत्रकार Dr.Rakesh Pathak से संपर्क rakeshpathak0077@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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