पत्रकार से पॉवर ब्रोकर बने डॉ प्रणय रॉय का पाखंड और एनडीटीवी का पतन – भाग (2)

Samarendra Singh

पार्ट वन से आगे…. दिबांग का कहना था कि खेल जाओ और इस आदेश के साथ ही पूरी टीम हरकत में आ गई. फिर क्या था हमने इस खबर के अलग-अलग पहलुओं को एक धागे में पिरो कर बुलेटिन तैयार कर दिया. ब्रेकिंग न्यूज की पट्टियां तैयार कर दी गईं और रिपोर्टर को लाइव के लिए मुस्तैद कर दिया गया. जब सारी तैयारी हो गई तो सुबह की व्हील जल्दी तोड़ने का फैसला ले लिया गया. तय हुआ कि सुबह सिर्फ यही खबर चलेगी. इसलिए कुछ और रिपोर्टर इस खबर पर तैनात किए गए.

सारे रिकॉर्डेड प्रोग्राम गिरा दिये गए और सुबह 5.55 पर यानी आमतौर पर सुबह 6 बजे शुरू होने वाले बुलेटिन से पांच मिनट पहले व्हील तोड़ कर हम इस खबर पर आ गए. मकसद बढ़त बनाना था. खबरों की दुनिया में लीड और फॉरवर्ड प्लानिंग का महत्व बहुत बड़ा होता है. सिर्फ बढ़त लेने से काम नहीं चलता. उसे बरकरार रखने के लिए फॉरवर्ड प्लानिंग भी मजबूत रहनी चाहिए. वरना पिछड़ने में देर नहीं लगती.

हमारी तरह कई और चैनलों ने भी तैयारी की हुई थी. चंद ही मिनट के भीतर सब उस खबर पर उतर आए. आमतौर पर सुबह की शिफ्ट आठ बजे खत्म हो जाती थी, लेकिन उस दिन में सुबह 10:30 बजे तक दफ्तर में रहा. स्पोर्ट्स बुलेटिन को छोड़ कर सारे रिकॉर्डेड प्रोग्राम गिरा दिए गए. 9.30 बजे चलने वाले “खबरों की खबर” प्रोग्राम को बदल कर “खास खबरों की खबर” प्रोग्राम चला गया और जाह्नवी प्रकरण पर आधे घंटे का स्पेशल तैयार करके चलाया गया. इन साढ़े चार घंटों के दौरान मेरी सभी अधिकारियों से लगातार बात होती रही. पंकज पचौरी, मनोरंजन भारती, सोनाल जोशी सब फोन लाइन पर बारी बारी आए. किसी ने भी खबर गिराने की बात नहीं की. खबर का विरोध नहीं किया.

पंकज पचौरी और मनोरंजन भारती समेत सभी इस खबर के समर्थन में थे. 10.30 बजे मैं घर के लिए निकला और तब तक इस खबर का दूसरा पक्ष सामने आ चुका था. जाह्नवी की पिछली शादी और उसके बच्चे की खबर भी सामने आ चुकी थी. केंद्र में कांग्रेस की मनमोहन सरकार थी और महाराष्ट्र में कांग्रेस के विलासराव देशमुख मुख्यमंत्री थे. उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी. सभी से अभिषेक बच्चन के परिवार के अच्छे संबंध थे. खबर सामने आने के तुरंत बाद सारा तंत्र सक्रिय हो चुका था. कुछ घंटों के भीतर जाह्नवी को कठघरे में खड़ा कर दिया. बिना जांच उसकी हरकत को पब्लिसिटी स्टंट करा दिया गया. वह झूठी घोषित कर दी गई. और जब औरत झूठी घोषित कर दी जाए तो फिर समाज और परिवार की सहानुभूति भी उसके पक्ष में नहीं रहती. इसलिए जाह्नवी के समर्थन में कोई नहीं आया. न परिवार और ना ही समाज. खबर पूरी तरह पलट गई. खबर पलटने के साथ ही एनडीटीवी के भीतर यह सवाल उठा कि आखिर इसे चलाने का फैसला किसने लिया था? यह “घोर अनैतिक” काम किसने किया था?

मतलब सुबह 4 बजे से लेकर दिन के 11 बजे तक जो लोग इस सनसनीखेज खबर के बावजूद सो रहे थे वो सभी अचानक जाग उठे. उनका जमीर जाग उठा. उनकी नैतिकता जाग उठी. उस दिन घर पहुंचने पर भी मैं सो नहीं सका. थोड़ी-थोड़ी देर पर कभी दिबांग का तो कभी नरेंद्र पाल सिंह का फोन आता. दोनों अपने-अपने तरीके से पूरे घटनाक्रम की जानकारी लेते. बार-बार लेते. भयंकर तनाव था. मेल के खेल में बरखा दत्त, पंकज पचौरी, सोनाल जोशी समेत सभी कूद पड़े थे. सबने मिल कर दिबांग को घेर लिया. सबसे पहला ई-मेल बरखा दत्त का आया. उन्होंने दोपहर 12:30 बजे के करीब कहा कि अंग्रेजी चैनल पर यह खबर नहीं चलेगी. बरखा इन दिनों एनडीटीवी और डॉ प्रणय रॉय से नाराज चल रही हैं. दरअसल उन्हें भ्रम हो गया था कि वो एनडीटीवी की सिपहसालार नहीं बल्कि मालकिन हैं. इसी भ्रम में वो एनडीटीवी के हर उस खेल में शामिल रहीं जो डॉ प्रणय रॉय ने अपने आकाओं के इशारे पर शुरू किया. चाहे वो वोल्कर कांड में नटवर सिंह को फंसा कर कांग्रेस को बचाने का मामला हो या फिर कोई और. डॉ प्रणय रॉय का खेल खेलते-खेलते बरखा को यह लगने लगा कि एनडीटीवी उनके बगैर चल नहीं सकता. यह भ्रम बहुत से लोगों को हो जाता है. शुरुआती दिनों में मेरा एक ऐसे ही संपादक से पाला पड़ा था और उस संपादक के विश्वासघात की वजह से मुझे एक मीडिया संस्थान की नौकरी छोड़नी पड़ी थी.

खैर, जाह्नवी प्रकरण में ध्यान रखने लायक एक बात यह भी है कि खबर सुबह 4 बजे आयी थी और खबर अंग्रेजी चैनल (एनडीटीवी 24X7) पर नहीं चलाई जाएगी यह फरमान बरखा दत्त ने दोपहर 12:30 बजे सुनाया. साढ़े आठ घंटे बाद. बरखा के ई-मेल के डेढ़-दो घंटे बाद पंकज पचौरी ने ई-मेल भेजा. पंकज ने गजब की पलटी मारी थी. अपनी ऐसी ही कलाबाजियों की बदौलत वह आगे चल कर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार बने. उस दिन सुबह वो खबर के समर्थन में थे. उन्होंने मुझे फोन करके कहा था कि जाह्नवी शादीशुदा है तो क्या हुआ? शादीशुदा महिला का भी शोषण हो सकता है. मतलब वो चैनल पर उन लोगों को घेरने को कह रहे थे जो जाह्नवी के शादीशुदा होने का दावा करके अभिषेक के बचाव का आधार तैयार कर रहे थे. लेकिन बाद में उन्होंने बड़ी जोरदार कलाबाजी दिखाई और बरखा के ई-मेल को आगे बढ़ाते हुए हमसे पूछा कि “क्या दोनों चैनलों की एक संपादकीय नीति नहीं हो सकती है? अगर अंग्रेजी चैनल इस खबर को नहीं ले रहा है तो फिर हिंदी चैनल ने इसे इतना अधिक महत्व क्यों दिया?”

जैसे इंटरटेनमेंट हेड सोनाल जोशी इंतजार में बैठी हों या फिर यह सब तय रणनीति का हिस्सा हो. चंद पलों के भीतर उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया दी. पंकज को धन्यवाद दिया और उसी क्रम में उन्होंने मुझे लपेट लिया. सोनाल ने कहा कि उन्होंने फोन पर इस खबर का विरोध किया था, लेकिन मैंने उनकी एक न सुनी. वो सरासर झूठ बोल रही थीं. उन्होंने सुबह 9:30 के बाद मुझे फोन किया था और कहा था कि एंकर बार बार यह क्यों कह रही है कि “ब्रेक के बाद लौटते हैं इस अहम खबर पर”. मैंने उनसे यही कहा था कि हम जो कुछ भी अपने चैनल पर चलाते हैं वह अहम होता है. अगर आपको लगता है कि यह खबर अहम नहीं है तो इंटरटेनमेंट हेड होने के नाते आप फैसला लीजिए, दिबांग सर से मैं बात कर लूंगा और हम यह खबर गिरा देंगे. तब उन्होंने फोन पटक दिया था.

उसके बाद करीब 4 बजे चैनल की मालकिन राधिका रॉय ने ई-मेल पर जवाब मांगा कि आखिर खबर चलाने का फैसला किसका था? यह सवाल वो चैनल के संपादक से सीधे भी पूछ सकती थीं, लेकिन उन्होंने पहले तो खबर पलटने का इंतजार किया. उसके बाद यह सवाल सार्वजनिक तौर पर उठा दिया था. खबरों की दुनिया में काम करने वाले जानते हैं कि कई बार खबर शुरू में जिस रूप में आती है बाद में वह वैसी नहीं रहती. इसलिए खबर जब जिस रूप में सामने आती है तब वह उसी रूप में पेश की जाती है. मतलब खबर अपने सभी रूपों में खबर है. लेकिन खबरों के नाम पर फिक्सिंग करने वालों के लिए खबर के रूप मायने रखते हैं. इससे उन्हें छद्म रचने और सौदा करने का अवसर मिलता है. इसे आप ऐसे समझिए कि जाह्नवी के किरदार में अभिषेक बच्चन के किरदार से ज्यादा दम होता तो फिर किसी की नैतिकता नहीं जागती. और अगर जाह्नवी अपने आरोप को साबित करने के लिए कोई पुख्ता सुबूत तुरंत पेश कर देती तो भी शायद नैतिकता का पाखंड इतना अधिक नहीं होता.

जब चैनल की मालकिन राधिका रॉय का ईमेल आया तो मैंने दिबांग के सामने प्रस्ताव रखा. मैंने कहा कि सर मैं इस फैसले को अपने सिर ले लेता हूं. कह देता हूं कि शिफ्ट इंचार्ज होने के नाते खबर चलाने का फैसला मेरा था. लेकिन दिबांग ने मना कर दिया. उन्होंने कहा कि “सुबह तुम्हारा फोन आया था और मैंने ही तुमसे कहा था कि खेल जाओ इसलिए तुम यह फैसला अपने सिर नहीं ले सकते. यह फैसला मेरा था और मैं ही इसकी जिम्मेदारी लूंगा. वैसे भी चैनल का संपादक होने के नाते इस पर जो भी चलता है उसकी जिम्मेदारी और जवाबदेही मेरी है.” उस मेल के खेल में सोनाल ने मेरा नाम ले लिया था और पंकज पचौरी ने गिरगिट की तरह रंग बदला था. इसलिए मैंने दिबांग से कहा कि उन दोनों को मैं जवाब देना चाहूंगा. उन्होंने कहा कि यह फैसला तुम्हारा होगा, तुम्हें जो बेहतर लगे वह करो. कुछ घंटे बाद यानी रात में दिबांग ने ई-मेल पर इस खबर की जिम्मेदारी ली. उन्होंने लिखा कि “हम भी अन्य चैनलों की तरह इस खबर के प्रवाह में बह गए. हमें ज्यादा सचेत रहना चाहिए था. हमने दोपहर बाद यह खबर उतार ली, लेकिन बाकी सभी चैनल लगातार इस खबर पर बने रहे.”

(क्रमश:)

लेखक समरेंद्र सिंह एनडीटीवी न्यूज चैनल में लंबे समय तक काम करने के बाद अब अपना उद्यम करते हुए फेसबुक पर बेबाक लेखन करते हैं.

इसके पहले वाला पार्ट पढ़ें…

पत्रकार से पॉवर ब्रोकर बने डॉ प्रणय रॉय का पाखंड और एनडीटीवी का पतन – भाग (1)

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Comments on “पत्रकार से पॉवर ब्रोकर बने डॉ प्रणय रॉय का पाखंड और एनडीटीवी का पतन – भाग (2)

  • Parmeshwar Maheshwari says:

    NDTV न्यूज़ चैनल की न्यूज़ सिर्फ मोदी,बीजेपी, संघ,और हिन्दू प्रतीकों को कौसने के इर्दगिर्द रहती ह। इसके वर्तमान एडिटर रबिश कुमार इतने मक्कार और लंपट ह,ये देश का बच्चा बच्चा जनता ह। इन मक्कारो को ही टुकड़े टुकड़े गैंग,अवार्ड वापसी गैंग को बढ़ावा देने का श्रेय जाता ह। मोदी ने भ्रष्टाचार करके ईरान का तेल का लोन चुकाया,सेना के लिए हथियार खरीदे।और काँग्रेस ने ईमानदार होकर भी सेना को निहत्ता कर दिया।

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  • Harihar dattagupta.h says:

    Sir doctor Roy you have tarnishes the whole world I had a great respect for you sis now shattered even we work under your elder brother serves as CME e.rly closely watched his integrity and sincerity really I have shocked sir.

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