जब PM मनमोहन के डांटने पर NDTV के मालिक प्रणय रॉय ने ‘बुरे मंत्रियों की सूची’ वाली खबर गिरा दी थी!

Samarendra Singh

PMO का दखल और क्रांतिकारी पत्रकारिता…. इन दिनों टीवी के दो बड़े पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी और रवीश कुमार अक्सर ये कहते हैं कि प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) की तरफ से चैनल के मालिकों और संपादकों के पास फोन आता है और अघोषित सेंसरशिप लगी हुई है. सेंसरशिप बड़ी बात है. जिस हिसाब से सरकार के खिलाफ खबरें आ रही हैं उनसे इतना स्पष्ट है कि सेंसरशिप जैसी बात बेबुनियाद है. Continue reading

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लो जी, 15 सितंबर से एनडीटीवी और रवीश कुमार भी निपट जाएंगे…

मोदी सरकार के राज में सत्ता विरोधी सुर रखने वाले न्यूज चैनलों / पत्रकारों को एक-एक कर निपटाया जा रहा है. एबीपी न्यूज से पुण्य प्रसून बाजपेयी को हटाया गया ताकि वह मास्टर स्ट्रोक जैसा जनपक्षधर शो न कर सकें. इसके पहले उनके शो के वक्त प्रसारण में लगातार व्यवधान पैदा किया गया जिससे जनता देख ही न सके… Continue reading

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हृदयेश जोशी एनडीटीवी से गए, सुनें रवीश ने फेयरवेल पार्टी में क्या कहा (देखें वीडियो)

Ravish Shukla : हृदयेश जोशी एक संजीदा, तेजतर्रार और पढ़ने-लिखने वाले साथी हैं। एनडीटीवी में रहते हुए हमने उनसे बहुत कुछ सीखने की कोशिश की है। आज उन्होंने एनडीटीवी को अलविदा कह दिया। वो एक ऐसे रिपोर्टर हैं जिनके बैग में हमेशा किताबें रहती है। सामान्यतया वो हम जैसे रिपोर्टरों की तरह बकैती और फंला नेता या अधिकारियों से मिलने की बात कहकर सामने वालों पर रौब नहीं झाड़ते हैं।

हृदयेश जोशी

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अय्याशी जारी रखने के लिए एनडीटीवी के तीन सौ कर्मियों की ले ली गई बलि, देखें वीडियो (पार्ट-3)

आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव से भड़ास संपादक यशवंत सिंह की बातचीत का यह तीसरा और आखिरी पार्ट है. इस वीडियो में एसके श्रीवास्तव ने साफ कहा कि प्रणय राय की अय्याशी की भेंट चढ़ गए तीन सौ एनडीटीवी कर्मी. अगर प्रणय राय अपनी लाइफस्टाइल पर खर्च कम करते व एनडीटीवी से पैसे चुराकर महंगी देश-विदेश में अरबों-खरबों की संपत्ति न बनाते तो एनडीटीवी समूह संकट में नहीं जाता. इस प्रकार तीन सौ कर्मियों की छंटनी भी नहीं की जाती.

देखें पूरी बातचीत….

ये है पहला और दूसरा पार्ट :

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समय बीतने के साथ एनडीटीवी की मानहानि की कीमत कम होती गई और अब शून्य हो चुकी है… देखें इंटरव्यू भाग-दो

चर्चित आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव को एनडीटीवी के आर्थिक घपलों को पकड़ने के कारण बहुत प्रताड़ित किया गया. इस अफसर के पास एनडीटीवी की पूरी कुंडली है. भड़ास से बातचीत में एसके श्रीवास्तव ने खुलासा किया था कि मनमोहन राज में तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने NDTV पर छापा डालने जा रहे इनकम टैक्स अफसरों को रोक दिया था.

IRS अफसर एसके श्रीवास्तव से भड़ास संपादक यशवंत सिंह की बातचीत का दूसरा पार्ट हाजिर है…. इस वीडियो के जरिए जानिए… आखिर प्रणय राय और पी. चिदंबरम में इतनी तगड़ी यारी के पीछे का कारण क्या है… -एनडीटीवी प्रबंधन में दम है तो वह कंपनी के संकट और कालेधन से रिश्ते को लेकर पब्लिक डिबेट करा ले…. -प्रणय राय कंपनी को लूट खा गए, अब एनडीटीवी को इसके मीडियाकर्मियों के हवाले कर देना चाहिए….-समय बीतने के साथ एनडीटीवी की मानहानि की कीमत कम होती गई और अब शून्य हो गई है… वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

फर्स्ट पार्ट पढ़ने के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें :

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प्रणय राय की काली कमाई की पोल खोल दी इस IRS अधिकारी ने, देखें वीडियो

प्रणय राय अपना अफ्रीका वाला फार्म हाउस गिरवी रख देते तो सैकड़ों कर्मचारियों की नौकरी बच जाती… 

Yashwant Singh :  आपको मालूम है, प्रणय राय ने काली कमाई से अफ्रीका में सैकड़ों एकड़ का फार्म हाउस खरीद रखा है जिसमें ऐय्याशी के सारे साजो-सामान उपलब्ध है. प्रणय राय ने गोवा में समुद्र किनारे बंगला खरीद रखा है. दिल्ली और देहरादून में बंगले खरीद रखे हैं. एक हेलीकाप्टर भी खरीदा हुआ है. अगर वो सिर्फ अफ्रीका का अपना सैकड़ों एकड़ वाला रैंच या गोवा का सी-बीच वाला बंगला गिरवी रख दें तो सैकड़ों करोड़ रुपया मिल जाएगा. इस पैसे से वह एनडीटीवी की माली हालत ठीक कर सकते थे. सैकड़ों कर्मियों का ‘कत्ल’ करने से बच सकते थे.

लेकिन जिस शख्स का इरादा सिर्फ अपना फायदा देखना हो, वह अपने कर्मियों का हित क्यों देखेगा. सरोकारी पत्रकारिता का दावा करने वालों की कलई एक आईआरएस अधिकारी ने खोली. ये वही अधिकारी हैं जिन्हें मीडियाा हाउस और सत्ता ने मिलकर पागलखाने भिजवा दिया था, क्योंकि इनने एनडीटीवी के घपले-घोटाले-काली कमाई के सारे दस्तावेज एकत्र कर लिए थे. कल उनसे मैंने विस्तार से बातचीत की. इंटरव्यू का पहला पार्ट आज रिलीज कर रहा हूं. दूसरे और तीसरे पार्ट को क्रमश: कल परसों अपलोड किया जाएगा. आप ध्यान से पूरे वीडियो को देखें-सुनें. वीडियो ये रहा…

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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एनडीटीवी में अभिव्यक्ति की आज़ादी हमेशा से एकतरफा ही थी

Abhiranjan Kumar : एनडीटीवी एक भला चैनल था। अन्य चैनलों में बकवास बहुत चलता था, लेकिन एनडीटीवी पर सिर्फ़ ख़बरें चलती थीं। हालांकि इसके साथ ही वहां एक बड़ी बुराई भी थी कि अक्सर ख़बरों में मिलावट कर दी जाती थी। सांप्रदायिक तत्व वहां काफी पहले से और ठीक-ठाक मात्रा में मौजूद थे। मुझे याद आती है एक पुरानी स्टोरी, जिसके मुताबिक किसी ट्रेन की मिलिट्री बोगी में घुसने पर एक युवक की पिटाई कर दी गई थी। चैनल पर यह रिपोर्ट बड़े ताम-झाम से चली। संयोग से उस युवक का नाम था शफ़कत और वह कश्मीरी था। फिर क्या था, चैनल के प्रबुद्ध विचारकों को मसाला मिल गया। स्क्रिप्ट की पहली लाइन ही यह लिखी गई- “एक तो मुसलमान, ऊपर से कश्मीरी। शायद शफ़कत का यही गुनाह था।”

मैंने स्क्रिप्ट की इस लाइन का विरोध किया। कहा कि यह नफ़रत और सांप्रदायिकता फैलाने वाली लाइन है। साथ ही, पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांतों और तय मर्यादाओं के ख़िलाफ़ भी। इस लाइन को लिखने की कोई तुक नहीं। स्टोरी इस लाइन के बिना भी लिखी जा सकती है। एक ज़िम्मेदार राष्ट्रीय चैनल को इस तरह की हेट्रेड फैलाने से बचना चाहिए। मुमकिन है कि कोई हिन्दू अथवा ग़ैर-कश्मीरी भारतीय भी किसी मिलिट्री बोगी में घुस जाए, तो उसके साथ भी ऐसा हो सकता है। …और हमें तो यह भी नहीं पता कि शफ़कत के मिलिट्री बोगी में घुसने पर और क्या-क्या हुआ? क्या नाम पूछते ही सैनिकों ने उसपर हमला कर दिया या फिर मार-पीट से पहले दोनों के बीच कुछ बहसबाज़ी भी हुई। क्या सिर्फ़ शफ़कत के बयान को ही अंतिम सत्य माना जा सकता है? क्या स्टोरी में मिलिट्री का भी पक्ष शामिल नहीं किया जाना चाहिए?

बहरहाल, मेरी बात न सुनी जानी थी, न सुनी गई, क्योंकि पता चला कि वह स्टोरी एक हाई-लेवल प्लानिंग का हिस्सा थी। चैनल के बड़े संपादकों ने मनमोहन सरकार के तत्कालीन गृह मंत्री संभवतः पी चिदंबरम से शफ़कत की मीटिंग भी फिक्स करा रखी थी और ये मुलाकात हुई भी।

एक अन्य मौके पर, मुंबई पर आतंकवादी हमले के ठीक बाद मैंने एनडीटीवीख़बर.कॉम के लिए एक लेख लिखा था। चूंकि इस घटना में सैंकड़ों बेगुनाह लोग मारे गए थे, इसलिए क्षुब्ध पूरा देश था और ज़ाहिर तौर पर मैं भी था। अपने लेख में मैंने सरकार की कुछ चूकों और नीतियों को लेकर तीखी आलोचना की थी, लेकिन उसकी एक भी पंक्ति तथ्य से परे नहीं थी। वह लेख एनडीटीवीख़बर.कॉम पर जाते ही वायरल हो गया। कुछ ही देर में उसपर सैकड़ों कमेंट्स आ चुके थे और ज़्यादातर टिप्पणियों में लेख में कही गई बातों का ज़ोरदार समर्थन था। इसके कुछ ही देर बाद मुझे एनडीटीवी इंडिया के तत्कालीन मैनजिंग एडिटर का ई-मेल मिला, जो एनडीटीवीख़बर.कॉम के प्रभारी को लिखा गया था और मुझे भी सीसी मार्क किया गया था। उस ई-मेल में लेख को साइट पर से अविलंब उतारने का निर्देश था, जिसके बाद उस लेख को फौरन उतार लिया गया।

बाद में हमने मैनेजिंग एडिटर से पूछा कि आख़िर लेख में समस्या क्या हुई? इसपर उन्होंने कहा कि “लेख बहुत अच्छा था, लेकिन तुम तो जानते हो यार!” इसके बाद मैंने उन्हें धर्मसंकट में डालना उचित नहीं समझा, इसलिए कुछ नहीं पूछा, लेकिन खुलते-खुलते बात खुल ही गई कि पीएमओ ने उस लेख पर एतराज किया था और पीएमओ से संदेश मिलने के बाद उस लेख को उतारने में इतनी हड़बड़ी दिखाई गई थी। मज़े की बात यह थी कि बाद में कुछ कांग्रेसी नेताओं के वे निराधार, बेसिरपैर और नफ़रत फैलाने वाले बयान ज़ोर-शोर से चलाए जा रहे थे, जिसमें वे उस हमले में आरएसएस का हाथ बता रहे थे, लेकिन हमारी निष्पक्ष और तथ्यात्मक बातें संस्थान के प्लेटफॉर्म पर जगह नहीं बना पाईं। इसीलिए, जब आज ये लोग कहते हैं कि वे सरकार से लड़ रहे हैं, तो हंसी आती है। एक सरकार की चापलूसी करने वाला संस्थान अगर दूसरी सरकार से लड़ रहा है, तो समझना मुश्किल नहीं कि क्यों और किसके इशारे पर लड़ रहा है।

यानी एनडीटीवी में अभिव्यक्ति की आज़ादी हमेशा से एकतरफ़ा ही थी और इस प्रकार निष्पक्षता भी हमेशा से ही संदिग्ध थी। अगर हम जैसे न्यूट्रल लेखक-पत्रकार अपनी बात रखना चाहते, तो उसके लिए एनडीटीवी में स्पेस तब भी बहुत कम था।

वरिष्ठ पत्रकार अभिरंजन कुमार की एफबी वॉल से.

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एनडीटीवी में भयंकर छंटनी पर प्रेस क्लब आफ इंडिया ने लिखा प्रणय रॉय को पत्र

To

Dr. Prannoy Roy,
Founder-Chairperson, NDTV
NEW DELHI

Dear Dr. Roy,

Warm Greetings from the Press Club of India.

As this year comes to an end, there are disturbing reports emanating from the NDTV which refer to massive reduction and lay-offs of employees connected with the news operations of your organisation.

As you are aware, the Press Club of India has been in the lead role of organising protest meets whenever NDTV was targeted by the government or curbs were sought to be put on it. The PCI has led the struggle for upholding the freedom of the press and expression. There is considerable concern among journalistic community over the current reported move of your organisation which might have been taken considering economic viability of running the news channel.

We would like to invite you over to the Press Club of India to address a meet and make the stance of NDTV clear so that the journalistic community can understand the logic and reason behind any such move of large scale retrenchment. As you have been forthcoming in your approach, we are sure you would accept our invitation to address a meet at PCI which we plan to hold over the next few days.

Looking forward to your response.

With Warm Regards

(Gautam Lahiri)
President

(Vinay Kumar)
Secretary General

मूल खबर….

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एनडीटीवी के बुरे दिन : इनकम टैक्स विभाग ने चैनल के शेयर जब्त कर लिए

कभी कांग्रेस के यार रहे एनडीटीवी और प्रणय राय के दिन इन दिनों भाजपा राज में बुरे चल रहे हैं. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और तत्कालीन केंद्र सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे पी. चिदंबरम व एनडीटीवी के मालिक प्रणय राय की मिलीभगत से ईमानदार इनकम टैक्स अधिकारी संजय कुमार श्रीवास्तव को प्रताड़ित करते हुए पागलखाने तक भिजवा देने का पाप अब असर दिखाने लगा है. इनकम टैक्स विभाग ने एनडीटीवी के शेयर जब्त कर लिए हैं.

दरअसल इनकम टैक्स विभाग के अफसर संजय कुमार श्रीवास्तव ने अपने कार्यकाल में प्रणव राय और पी चिदंबरम की मिलीभगत से 2जी स्कैम के पैसे को हवाला के जरिए ब्लैक से ह्वाइट करने समेत कई किस्म के गड़बड़ घोटाले पकड़े थे जिसके कारण संजय को बुरी तरह से प्रताड़ित किया गया. इन्हें पागलखाने तक भिजवा दिया गया. इनके उपर कई फर्जी केस लगवा दिए गए. अब एनडीटीवी और प्रणय राय को उन्हीं पापों की सजा भुगतनी पड़ रही है. पी चिदंबरम भी अपने पुत्र के लगातार केंद्रीय एजेंसियों के जाल में फंसते जाने को लेकर एक तरह से उसी पाप की सजा भुगत रहे हैं.

एनडीटीवी के साथ ताजा प्रकरण ये हुआ है कि इनकम टैक्स विभाग ने एनडीटीवी के स्वामित्व वाली कंपनी आरआरपीआर होल्डिंग प्राइवेट लिमिटेड के सभी शेयर अस्थायी तौर पर जब्त कर लिए हैं. मीडिया कंपनी ने शेयर बाजारों को भेजी सूचना में यह जानकारी दी है. कंपनी के पास कुल 1 करोड़ 88 लाख 13 हजार 928 शेयर हैं जो कुल शेयर का 29.12 प्रतिशत हिस्सा है. आरआरपीआर न्यू दिल्ली टेलिविजन लि. में सबसे बड़ी प्रवर्तक समूह की कंपनी है. यह कंपनी एनडीटीवी 24X7, एनडीटीवी इंडिया और एनडीटीवी प्रॉफिट न्यूज चैनलों का संचालन करती है.

कंपनी की तरफ से बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज को बताया गया है कि उसे इनकम टैक्स के डिप्टी कमिश्नर की ओर से 25 अक्टूबर को एक पत्र प्राप्त हुआ है, जिसमें कहा गया है कि आयकर कानून, 1961 की धारा 281बी के तहत अस्थायी तौर पर आरआरपीआर की कंपनी में पूरी हिस्सेदारी कुर्क की जा रही है. यह हिस्सेदारी 1.88 करोड़ इक्विटी शेयरों की बैठती है.

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अंग्रेजी वाले श्रीनिवासन जैन अब हिंदी में ‘रियल्टी चेक’ कर रहे हैं!

कानाफूसी है कि हिंदी मीडिया के धुर विरोधी अंग्रेजी चैनल एनडीटीवी 24×7 के इंग्लिश एंकर श्रीनिवासन जैन को अब हिंदी चैनल एनडीटीवी इंडिया पर जाने किस मजबूरी में हिंदी में ही रियल्टी चेक करना पड़ रहा है. बेचारे हिंग्लिश बोल रहे हैं. आखिर पापी पेट का सवाल जो ठहरा. ज्ञात हो कि श्रीनिवासन जैन ने अमित शाह के बेटे जय शाह पर एक स्टोरी लिखी थी जिसे बाद में एनडीटीवी प्रबंधन ने एनडीटीवी की वेबसाइट से हटवा दिया.

श्रीनिवासन जैन ने इसका विरोध किया और इस बाबत पब्लिक डोमेन में अपनी बात रखी. उधर एनडीटीवी का कहना था कि उसने श्रीनिवासन की स्टोरी वकीलों की सलाह पर हटाई. इस प्रकरण के बाद श्रीनिवासन जैन को अब एनडीटीवी के हिंदी चैनल पर भी कार्यक्रम पेश करने के लिए कह दिया गया. लोग इस घटनाक्रम के अपने अपने तरीके से निहितार्थ निकाल रहे हैं.

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बरखा दत्त ने एनडीटीवी और प्रणय राय की पोल खोलते हुए फेसबुक पर जो कुछ लिखा है, उसे हू-ब-हू पढ़ें…

I certainly don’t see NDTV as either victim or crusader…

Barkha Dutt : For the last few days I have observed with cynical amusement a public debate around NDTV taking down a story related to Amit Shah. I am not getting into the specifics of the story here and whether the story was right or wrong but I did point out when I first heard the controversy that the axing of stories at NDTV is hardly new and those seeking the higher moral ground today remained absolutely silent when some of us fought with the owners and management over these issues.

So when a former colleague calls this an “aberration” surely that is a knowing falsehood. The said former colleague and some others who have lately tried to claim the mantle of free speech crusaders- are all aware of the many different times stories were taken down or simply disallowed at NDTV. All of these people were totally silent then or rationalized the management decisions. An interview Nitin Gokhale did with the outgoing Navy Chief was taken down. There were other guests we were instructed not to call on the channel but the management did not want to put this in writing lest the mail leak. I was disallowed from pursuing a story on what was called the Jayanti Tax controversy.

I was given hell for a story I did on Robert Vadra; the only reason that story was not taken down is because it was already published on the website and at the time the management was convinced that it would draw too much attention to take it down Later. Then an innocuous bread and butter interview I did with Chidambaram was taken off air during the aftermath of the surgical strikes. An internal memo was circulated to justify this and went so far as to say that no politician should be given air time – a diktat that lasted all of a day. Already on the wrong side of the network for my argument over the Vadra story I protested this censorship.

I said while I worked at NDTV I could not criticise them in public but there was no way I could defend this strange axing either. When asked in public I would simply say it was a management decision above my pay grade. Over the next two months , for the stand I took, I was clearly punished with a hostile newsroom environment that sought to push me out of any big news story that the top bosses were anchoring. It was later told to me that my protest was seen as a “betrayal” and that I argued too much about the news.

I was then offered a non daily- news arrangement at NDTV and was told that they – the owners -did not want to hear arguments of the kind I had on News stories like the Vadra issue or the PC axing or other stories. I said that a lack of engagement with the news or elections that were imminent did not suit me and I would rather exit….since my mails had just been hacked ( you can read the fight over the axed PC interview in them) I said I did not want my parting to be linked to that and we agreed I would leave a month later.

What I do know is this : 1. I was punished for taking a stand and speaking my mind on news – censorship. The fights I had applied to both BJP & Congress stories. 2. NDTV wanted me off daily news so that no one would question it’s arbitrary decisions 3. Maybe at that stage NDTV was trying to make peace with the BJP. Incidentally it’s Senior folks have approached a slew of govt ministers for help in the last few months while pretending to fight the BJP at Press Club and so on..so utterly fake. 4. Am adult enough to know that stories are censored in other newsrooms too but who else pretends to be this self righteous and morally Superior. It’s the humbug and hypocrisy that really gets me : say one thing and do another. So forgive me if I laugh at the narrative the company is trying to claim as an anti establishment crusader. Even through this entire period they have repeatedly sought help from the BJP.
I took a stand on censorship and paid a price. So be it. But I don’t see ex colleagues doing that. Nor did they speak up earlier though all were aware of these facts.

And I certainly don’t see NDTV as either victim or crusader. Oh please. This is what is fake liberalism.

चर्चित टीवी पत्रकार बरखा दत्त की एफबी वॉल से.

पूरे प्रकरण को समझने के लिए इन्हें भी पढ़ें…

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एनडीटीवी ने अपने मैनेजिंग एडिटर श्रीनिवासन जैन की अमित शाह के बेटे पर की गई स्टोरी को हटा दिया!

एनडीटीवी और प्रणय राय की असलियत सामने आती जा रही है. ताजा मामला है अपने ही मैनेजिंग एडिटर श्रीनिवासन जैन की स्टोरी को हटा देना. एनडीटीवी के मैनेजिंग एटिडटर श्रीनिवासन जैन ने ट्विटर और फेसबुक पर लिखित में आरोप लगा है कि उनने और मानस प्रताप सिंह ने अमित शाह के बेटे जय शाह पर जो स्टोरी की थी, उसे एनडीटीवी ने अपनी वेबसाइट से हटा दिया है. श्रीनिवासन जैन ने अपने पोस्ट में लिखा है कि एनडीटीवी मैनेजमेंट ने उनसे कहा है कि वो रिपोर्ट ‘कानूनी जाँच’ के लिए हटायी गयी है. श्रीनिवासन जैन ने आगे कहा है कि वो इस मामले को ‘दुखद अपवाद’ मानकर अभी एनडीटीवी के संग काम जारी रखेंगे।

एनडीटीवी के मैनेजिंग एडिटर श्रीनिवासन जैन ने अमित शाह के बेटे जय शाह की कंपनी को दिए लोन पर एक स्टोरी की जिसे बाद में एनडीटीवी ने हटा दिया. तब श्रीनिवासन जैन ने लिखा- ‘एनडीटीवी के वकीलों ने कहा कि स्टोरी को कानूनी वजह से हटाना पड़ेगा. ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि रिपोर्ट पूरी तरह सार्वजनिक रूप से मौजूद तथ्यों पर आधारित है. इसमें किसी तरह का निराधार या अवांछित आरोप नहीं लगाया गया है. ऐसे हालत में पत्रकारों के लिए काम करना काफी मुश्किल है. अभी मैं इसे एक परेशानी भर मान रहा हूं. मैं फिलहाल एनडीटीवी पर पत्रकारिता जारी रखूँगा. ये बातें एनडीटीवी को भी बता दी है.’

उधर, श्रीनिवासन जैन की खबर हटाने को लेकर बरखा दत्त ने भी एनडीटीवी पर हमला किया है और कहा है कि एनडीटीवी में खबर हटाने का ऐसा धंधा होता रहा है. बरखा का कहना है कि उन्हें एनडीटीवी के अंदर खबरों को दबाने के खिलाफ बोलने के लिए सजा दी गयी. बरखा ने दावा किया कि वो बीजेपी और कांग्रेस दोनों से जुड़ी स्टोरियों के लिए मैनेजमेंट से लड़ी थीं. बरखा ने आरोप लगाया कि जहाँ एक तरफ एनडीटीवी अभिव्यक्ति की आजादी की बात करता है तो दूसरी तरफ वो बीजेपी से मदद भी मांगता है. बरखा ने कहा है कि उन्होंने खबरों को दबाने का विरोध किया और उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ी.

पूरे प्रकरण को समझने के लिए इन्हें भी पढ़ें…

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एनडीटीवी में खबरें रोकने का विरोध किया तो उसकी कीमत मुझे नौकरी गंवा कर चुकानी पड़ी : बरखा दत्त

(…पार्ट एक से आगे…)

एनडीटीवी के मैनेजिंग एडिटर श्रीनिवासन जैन की स्टोरी हटाने के बाद एनडीटीवी से हटाई गईं बरखा दत्त ने सोशल मीडिया पर एनडीटीवी और प्रणय राय की पोल खोल दी. बरखा दत्त ने सर्जिकल स्ट्राइक के दिनों में कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम के इंटरव्यू के रोके जाने के प्रकरण पर भी खुलासा किया. बरखा के मुताबिक इंटरव्यू में चिदंबरम ने मोदी सरकार पर जमकर निशाना साधा था. चैनल प्रबंधन ने उस इंटरव्यू को ऑनएयर होने से रोक दिया. इंटरव्यू रोकने के बाद प्रबंधन ने एक इंटरनल मेल जारी किया जिसमें चैनल में काम कर रहे सभी पत्रकारों को हिदायत दी गई कि किसी नेता को जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम ना दें.

बरखा आगे लिखती हैं- ”इससे पहले मैंने रॉबर्ट वाड्रा को लेकर भी एक स्टोरी कवर की थी. इस पर भी प्रबंधन का ऐसा ही रुख था. तब मैंने प्रबंधन के सामने विरोध दर्ज कराया. नतीजा ये हुआ कि मुझे दो महीने तक बड़ी खबरों को कवर करने से रोक दिया गया. कारण पूछे जाने पर कहा गया कि आपका विरोध प्रबंधन की नजरों में बगावत है. खबर को लेकर आपने प्रबंधन से कुछ ज्यादा ही बहस कर ली थी. मालिक प्रणय रॉय की इच्छा के कारण मुझे मेन स्ट्रीम की खबरों को छोड़ नॉन न्यूज स्टोरी करने को कह दिया गया. चुनाव के माहौल में रिपोर्टिंग से दूर किया जाना मेरे लिए काफी कष्टदायी धा. तब मैंने प्रबंधन से कह दिया कि इससे बेहतर यही है मैं इस्तीफा दे दूं. इस पर चैनल के मालिक और प्रबंधन राजी हो गए. तब मैंने इस्तीफा दे दिया.”

बरखा खुद के इस्तीफे के प्रकरण के बारे में विस्तार से बताती हैं- ”एनडीटीवी के मालिक ने मुझे खबरें करने से इसलिए रोका क्योंकि आगे कोई उनसे खबरों को लेकर सवाल ना कर सके. हो सकता है कि मुझे चैनल से किनारे कर के प्रणय राय बीजेपी से समझौता करने की फिराक में हों. मेरे कुछ वरिष्ठ सहयोगी सरकार के मंत्रियों से एनडीटीवी टैक्स मामले में सहयोग चाहते थे. ये वही सहयोगी थे जो प्रेस क्लब में बीजेपी के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे. एनडीटीवी की कथनी और करनी में बहुत फर्क और विरोधाभास है. चैनल के मालिक प्रणय रॉय कतई कांतिकारी नहीं हैं. एनडीटीवी भी न तो विक्टिम हैं और ना ही क्रांतिकारी. प्रणय राय चुनाव बाद से लगातार बीजेपी से मदद मांगते रहे. खबरों को रोकने का जो विरोध मैंने किया उसकी कीमत मुझे नौकरी गंवा कर चुकानी पड़ी. लेकिन मेरे कुछ पुराने साथी ऐसा नहीं कर पा रहे हैं.”

इसके पहले का पार्ट एक पढ़ने के लिए नीचे दिए हेडिंग पर क्लिक करें :

इन्हें भी पढ़ सकते हैं…

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बरखा दत्त ने खोली पोल- ‘एनडीटीवी और प्रणय राय न तो क्रांतिकारी हैं, न ही सरकार विरोधी!’

बरखा दत्त सोशल मीडिया पर लगातार धमाके कर रही हैं. उनके निशाने पर हैं एनडीटीवी चैनल के मालिक प्रणय राय. बरखा ने साफ कहा- ”प्रणय राय सरकार विरोधी होने का महज नौटंकी करता है, दिखावा करता है. सच्चाई ये है कि एनडीटीवी के मालिक लगातार बीजेपी के आगे झुकते रहे और खबरें रोकते रहे. एक बात तो सच है कि ना तो एनडीटीवी विक्टिम है और ना ही क्रांतिकारी. चुनाव के बाद से लगातार प्रणय रॉय बीजेपी से मदद ही मांगते रहे. विरोध की कीमत मुझे नौकरी गंवा कर चुकानी पड़ी.”

बरखा ने बताया कि टैक्स चोरी के आरोपों में घिरे चैनल के मालिक प्रणय रॉय खबरों को रुकवा दिया करते थे. बीजेपी विरोधी होने का और सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने या सरकार से लोहा लेने का जो नाटक एनडीटीवी और उसके मालिक कर रहे हैं, वो महज दिखावा है. प्रणय रॉय अपने फायदे के हिसाब से खबरों को चलाने और रोकने का आदेश देते थे. जो प्रबंधन के इन फैसलों का विरोध करता, उनकी रिपोर्टिंग तक रोक लगा दी जाती थी.

उल्लेखनीय है कि एनडीटीवी के मैनेजिंग एडिटर श्रीनिवासन जैन ने कुछ दिन पहले अमित शाह के बेटे जय शाह की कंपनी को दिए लोन पर एक स्टोरी की थी जिसे बाद में हटा दिया गया. तब श्रीनिवासन जैन ने लिखा- ‘एनडीटीवी के वकीलों ने कहा कि स्टोरी को कानूनी वजह से हटाना पड़ेगा. ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि रिपोर्ट पूरी तरह सार्वजनिक रूप से मौजूद तथ्यों पर आधारित है.  इसमें किसी तरह का निराधार या अवांछित आरोप नहीं लगाया गया है. ऐसे हालत में पत्रकारों के लिए काम करना काफी मुश्किल है. अभी मैं इसे एक परेशानी भर मान रहा हूं. मैं फिलहाल एनडीटीवी पर पत्रकारिता जारी रखूँगा. ये बातें एनडीटीवी को भी बता दी है.’

…जारी…

अगला पार्ट पढ़ें…

ये भी पढ़ सकते हैं…

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क्या एनडीटीवी पर नियंत्रण के लिए कॉरपोरेट तख्तापलट की कोशिश की जा रही है?

Sanjaya Kumar Singh : क्या एनडीटीवी पर नियंत्रण के लिए क्या कॉरपोरेट तख्ता पलट की कोशिश की जा रही है? शुक्रवार की सुबह एनडीटीवी के बिक जाने की खबर पढ़कर मुझे याद आया कि प्रणय राय को अगर कंपनी बेचनी ही होती तो वे आईसीआईसीआई बैंक के 48 करोड़ रुपए के लिए पड़े सीबीआई के छापे के बाद प्रेस कांफ्रेंस क्यों करते। क्यों कहते कि झुकेंगे नहीं। मुझे इंडियन एक्सप्रेस की खबर पर यकीन नहीं हुआ।

मैंने पूरी खबर पढ़ी और अंदर मिल गया कि इसकी पुष्टि नहीं हुई है और स्पाइस जेट के अधिकारी ने तो खबर को पूरी तरह गलत और निराधार कहा था। इसके बावजूद इंडियन एक्सप्रेस ने यह खबर छापी थी तो कारण सूत्र पर भरोसा होगा और इसके पक्ष में तर्क यह था कि एनडीटीवी ने इसपर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। मेरे हिसाब से ऐसी खबरों के सही होने की संभावना आधी-आधी ही रहती है। इसलिए मैं अगर ब्रेकिंग चलाने की जल्दी ना हो तो इंतजार करना पसंद करता हूं। दोपहर तक स्पष्ट हो गया कि इंडियन एक्सप्रेस चूक गया था। मेरा मानना है कि इस तरह गलत खबर प्लांट करने या कराने की कोशिश करने वालों को सबक सीखाना चाहिए पर अब नहीं लगता कि वैसे दिन कभी आएंगे। हालांकि वह अलग मुद्दा है।

शाम तक मुझे समझ में आ गया कि हो ना हो यह एनडीटीवी में तख्ता पलट की कोशिश चल रही होगी। देश में कॉरपोरेट तख्ता पलट का पहला और संभवतः सबसे चर्चित मामला अनिवासी भारतीय स्वराज पॉल और देसी उद्योग समूह डीसीएम तथा एस्कॉर्ट्स से जुड़ा था। डीसीएम यानी दिल्ली क्लॉथ मिल को तब खादी के बाद देसी कपड़ों यानी भारतीयता का प्रतीक माना जाता था। एस्कॉर्ट्स को उस समय उसके मालिक नंदा परिवार के लिए जाना जाता था। राजन नंदा दूसरी पीढ़ी के मालिक थे उनके पिता हर प्रसाद आजादी के समय पाकिस्तान से आए थे। राजन नंदा की पत्नी राजकपूर की बेटी ऋृतु हैं और उनके बेटे निखिल की शादी अमिताभ बच्चन की बेटी श्वेता से हुई है। यह विवरण ये बताने के लिए स्वराज पॉल ने किससे किसलिए पंगा लिया होगा और क्यों नाकाम रहे। एस्कॉर्ट्स समूह पर नंदा परिवार का नियंत्रण पांच से 10 प्रतिशत के बीच की हिस्सेदारी से था और नियंत्रण की इस कोशिश के बाद कई महीनों तक भारतीय उद्योग जगह में उत्सुकता औऱ चिन्ता छाई रही। आखिरकार स्वराज पॉल ने हथियार डाल दिए।

अब स्थिति थोड़ी अलग है। तख्ता पलट का उद्देश्य भी। एक मीडिया संस्थान जो सरकार के खिलाफ है उसे सरकार समर्थक ताकतें नियंत्रण में लेना चाहती हैं। तरीके वही आजमाए जा सकते हैं औऱ कल जो सब हुआ वह ऐसी ही कोशिश का हिस्सा लगता है। इसमें करना सिर्फ यह होता है कि बाजार से किसी कंपनी के इतने शेयर खरीद लिए जाएं कि जिसका नियंत्रण है उससे ज्यादा हो जाए या निदेशक मंडल में बहुमत हो जाए। यह आसान नहीं है पर तकनीकी रूप से संभव है। इसे कंपनी का बिकना नहीं कहा जाएगा पर स्थिति वैसी ही होगी। सैंया भये कोतवाल से यह संभव है। वैसे ही जैसे थानेदार अपना हो तो कितने भी पुराने किराएदार को भगा ही देगा। इसलिए मामला अभी खत्म नहीं हुआ है। पिक्चर अभी बाकी है दोस्तों।

जनसत्ता समेत कई अखबारों में काम कर चुके और इन दिनों सोशल मीडिया पर बेबाक लेखन के लिए चर्चित पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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नए एनडीटीवी में भी यही होगा, बस तरीक़ा बदल जाएगा!

Harsh Vardhan Tripathi : लिखा जा रहा है कि मोदी-शाह के क़रीबी अजय सिंह ने NDTV ख़रीद लिया। तो पूरा लिखिए कि सीपीएम नेता प्रकाश करात के रिश्तेदार प्रणय-राधिका रॉय को 100 करोड़ रुपए इस बिक्री से मिलेंगे। 400 करोड़ रुपये का क़र्ज़ भी अजय सिंह चुकाएँगे। मेरा मानना है कि कारोबारी बेवक़ूफ़ नहीं होता कि सिर्फ ख़रीदकर बन्द करने के लिए चैनल ले रहा होगा। हाँ, यह जरूर है कि चैनल चलाना और हवाई जहाज़ चलाना एकदम अलग बात है।

टीवी चैनल के मालिक तो जहाज़ से भी ऊपर उड़ते रहे हैं। दोनों में घाटा ही घाटा होता है फिर भी मालिक की बल्ले-बल्ले होती है। देखिए ना, सैकड़ों कर्मचारियों को निकालने के बाद डॉ राय दम्पति को 100 करोड़ कैश मिल जाएगा। 20% हिस्सेदारी बनी ही रहेगी। लेकिन, अब पूरी खबर लिखने की आदत किसी को कहाँ रही है। अपने मतलब भर का वीओ और उसी को साबित करने वाली बाइट। ज़्यादा साबित करने के लिए अपने पसन्दीदा मेहमान के साथ प्राइम टाइम। नए एनडीटीवी में भी यही होगा, बस तरीक़ा बदल जाएगा। मुझे इस बिकने में अच्छा यह दिख रहा है कि कुछ नएके पत्रकारों को नौकरी मिल जाएगी।

Alok Kumar : NDTV बिक गया। एतराज का एक और सुर बंद हो जाएगा। बाजार की ताकत बेमिसाल है। एतबार के बीच कबीरा को बाजार में आना पडा। NDTV के editorial content के नए मालिक बीजेपी के करीबी एक उद्योगपति होंगे। कभी प्रमोद महाजन के ओएसडी रहे अजय सिंह ने रॉय दंपति को मुंह मांगा कीमत देकर NDTV का 40 फीसदी शेयर खरीद लिया। प्रणय रॉय और राधिका के पास अब बस बीस फीसदी शेयर रह गए।

Vishnu Nagar : तो क्या एनडीटीवी भी बिक गया भाजपा के हाथों? लगता यही है क्योंकि इंडियन एक्सप्रेस ने यह ख़बर मुखपृष्ठ पर छापी है तो यह अखबार ऐसा नहीं है कि अफ़वाह को ख़बर बना दे! वैसे यह ख़बर अफ़वाह साबित हो जाए तो क्या बात है! तो भाजपा ने अपने खासमखास अजय सिंह -जो कि स्पाइसजेट के मालिक हैं -के ज़रिये खेल खेल दिया है ताकि मीडियावाले हल्ला करने की स्थिति में न रहें! भाजपा की दृष्टि से यह स्मार्ट मूव है चतुराईभरा खेल है। मगर क्या सारे चैनलों पर क़ब्ज़ा करना सचमुच स्मार्टनेस है? दूरगामी दृष्टि से सोचें-जिससे राजनीतिक दल सोच नहीं सकते-यह भाजपा के लिए घातक है। अगर हरेक का गला दबा दोगे, विरोध की सभी आवाज़ों को हर जगह से दबा दोगे तो अस्थायी जीत तो मिल जाएगी मगर पतन का रास्ता भी बहुत जल्दी खुल जाएगा। लेकिन हम-आप क्या कर सकते हैं? पूँजी और सत्ता के सामने हमारी एक कमज़ोर और बहुधा अकेली सी आवाज़ है, वह भी कब तक उठा सकेंगे, मालूम नहीं। लेकिन लोगों मानो या न मानो-चाहे मोदीभक्ति में आँखें मूँदे रहो- बहुत बुरे दिन आ चुके हैं सभी के लिए। उसके बाद जब सचमुच के (मोदीछाप नहीं) अच्छे दिन आएँगे तब तक काफ़ी बर्बादी हो चुकेगी। तो क्या एनडीटीवी के बढ़िया पेशेवर पत्रकारों से अलविदा कहने के दिन आ गये? हिंदी-अंग्रेज़ी दोनों चैनलों के सारे बेहतरीन एंकर और संवाददाता क्या अब विदा! रवीश कुमार क्या विदा, सचमुच विदा?

Dilip Khan : NDTV ख़रीदने की ख़बरों के बीच देखिए कि SpiceJet वाले अजय सिंह को टाइमिंग की कितनी ज़्यादा समझदारी है। 1. पहली NDA सरकार में वो प्रमोद महाजन के साथ जुड़े। उस वक़्त प्रमोद महाजन का क्या रुतबा था, सब जानते हैं। राजनीतिक गलियारों में पैठ बनाई। परिवहन पर काम किया। मार्केट समझ लिया। 2. 2004 में SK मोदी के ModiLuft को ख़रीदा। नया नाम दिया- स्पाइसजेट। यूपीए-1 तक पूरा चलाया। घाटा हुआ। 3. फिर अगली बार 2009 में भी UPA की सरकार आ गई। 2010 में कलानिधि मारन (मुरासोली मारन का बेटा, दयानिधि मारन का भाई और करुणानिधि की बहन का पोता) के हाथों SpiceJet को बेच दिया। 4. कलानिधि मारन ने स्पाइसजेट को खूब विस्तार दिया। 2011-12 में जब घाटा हुआ तो मारन ने इसमें और पैसे झोंक दिए। स्पाइसजेट चल निकला। DMK सरकार में हिस्सेदार थी। परिवार के लोगों का रसूख था। स्पाइसजेट का विस्तार तो खूब हुआ, लेकिन 2013 के बाद मुनाफ़ा गिरने लगा। 5. इस बीच हवा भांपकर अजय सिंह फिर से बीजेपी के साथ हो चले। नरेन्द्र मोदी के चुनावी अभियान से जुड़ गए। मेहनत की। स्लोगन डिपार्टमेंट का सारा पैसा अजय सिंह ने पे किया। रिजल्ट आया। बीजेपी जीत गई। मोदी प्रधानमंत्री बन गए। 6. दिसंबर 2014 में जब लगातार पांच तिमाही SpiceJet को घाटा हुआ तो कलानिधि मारन और अजय सिंह के बीच फिर डील हुई। अब मोदी जी की सरकार थी। कमान अजय सिंह ही बढ़िया संभाल सकते थे। 7. जनवरी 2015 में अजय सिंह ने कलानिधि मारन से सारा शेयर ख़रीद लिया। SpiceJet तब से बम-बम कर रहा है। 8. अभी मोदी जी जब अमेरिका गए थे, तो अजय सिंह की कंपनी SpiceJet के लिए 100+ बोइंग विमान ख़रीदने का डोनल्ड ट्रंप से करार किया। एस के मोदी से अगर ModiLuft अजय सिंह नहीं ख़रीदे होते तो नरेन्द्र मोदी कैसे अमेरिका से SpiceJet की डील कर पाते!

Rakesh Kayasth : पूरी ख़बर आने पर ही असली बात ठीक से समझ में आएगी। लेकिन फिलहाल यही लग रहा है एनडीटीवी के मालिक डॉक्टर प्रणय रॉय अब उसी तरह पवित्र हो गये हैं जैसे नीतीश कुमार। पवित्र होने के लिए गंगा नहाना ज़रूरी नहीं है, वैसे भी क्योटो बहुत दूर है। अंबानी, अडानी या अजय सिंह जैसा कोई व्यक्ति अपना थोड़ा सा `पुण्य’ छिड़क दे, यही काफी है। सौ करोड़ रुपये लेकर डॉक्टर राय पूरी दुनिया में जहां चाहे वहां सेटेल हो सकते हैं। अपना पसंदीदा संगीत सुन सकते हैं, दुनिया के मशहूर विश्वविद्यालयों में लेक्चर दे सकते हैं या तीसरी दुनिया में मीडिया की स्थिति पर कोई चर्चित किताब लिख सकते हैं। वैसे 100 करोड़ में कोई छोटा जनपक्षधर मीडिया हाउस भी खड़ा हो सकता है। लेकिन बहुत झंझट का काम है। इतना सब देखने के बाद यकीनन डॉक्टर रॉय का मोहभंग हो गया होगा। क्या रखा है, इन पचड़ों में। यहां-वहां तैर रही आधी ख़बरें आजकल गलत भी साबित होती हैं। देखते हैं आगे क्या होता है।

Rajendra Tiwari : एनडीटीवी को लेकर एक बिजनेस डील हुई है। इसको लेकर हाय-तौबा क्यों? क्या इस डील में कुछ ऐसा दिखाई दे रहा है जो कानूनन वैध नहीं है। अपने यहां ऐसा कानून तो है नहीं कि दूसरे क्षेत्रों में बिजनेस इंटरेस्ट वाले मीडिया में न आ सकें। भाई, अगर ऐसा लग रहा है कि भाजपा समर्थक मीडिया पर काबिज हो रहे हैं तो भाजपा विरोधियों को किसी ने रोका है क्या? उनने रिपब्लिक शुरू किया तो आप डेमोक्रैटिक चैनल शुरू करो। वो एनडीटीवी पर काबिज हो रहे तो तुम किसी और के शेयर खरीदो….किसने रोका

Nadim S. Akhter : प्रणव रॉय, रजत शर्मा, राजीव शुक्ला और सुभाष चंद्रा ने शून्य से शिखर तक जाकर जिस तरह मीडिया अंपायर बनाया और उसे चला रहे हैं, उससे आप प्रेरणा ले सकते हैं। बाकी प्रणब रॉय को SPICE JET से डील में आम के आम और गुठली के भी दाम मिल गए हैं। नाम बना रहेगा और आर्थिक ज़िम्मेदारियों से भी छुटकारा मिला। कम से कम CNN IBN वाले राघव बहल और राजदीप सरदेसाई सा हाल तो नहीं होगा! और क्या चाहिए? बच्चे की जान लेंगे क्या? एक पुराने वरिष्ठ ने बताया था कि अगर दूरदर्शन ना होता तो ना तो NDTV होता और ना ही INDIA TV। ‘आज तक’ चैनल को भी उसमें कुछ हद तक जोड़ सकते हैं। सो नैतिकता का ज्ञान कृपया ना बघारें। बाजार में उतरेंगे तो इसी के नियम से चलना पड़ेगा। अब SNAPDEAL को अमेज़न खरीदे या फ्लिपकार्ट, क्या फ़र्क़ पड़ता है? हम दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है, जिधर चल देंगे रास्ता बन जायेगा। पत्रकार भी ऐसा ही होता है। मर्यादा में रहे तो सींचकर बस्तियां बसा दे और किनारा तोड़े तो तबाही ला दे।

सौजन्य : फेसबुक

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एनडीटीवी ने मुंह खोला- ‘नहीं बिके हैं हम!’

सुबह इंडियन एक्सप्रेस ने एनडीटीवी के बिकने की खबर छापकर तहलका मचाया तो दोपहर आते आते द हिंदू की वेबसाइट पर खबर आ गई कि एनडीटीवी ने बिकने से इनकार कर दिया है. दो बड़े अखबारों की इन दो अलग अलग विरोधाभासी खबरों से पूरे देश का मीडिया जगत हलकान रहा. फिलहाल द हिंदू की वेबसाइट पर प्रकाशित खबर पढ़ें और इसके ठीक बाद इस खबर को लेकर आईं नई प्रतिक्रियाओं को देखें…

NDTV denies reports of takeover by SpiceJet owner

“Not even a single sentence of these reports is true”, says a senior NDTV official

Special Correspondent

New Delhi , September 22, 2017

Sources in NDTV have denied reports of SpiceJet’s Ajay Singh taking over majority holding in the news channel. A formal statement on the issue is expected by Friday evening. It was reported that New Delhi Television Limited, one of the oldest news channels that was founded by Prannoy Roy and Radhika Roy in 1988, will change hands soon. The reports mentioned that the founders will be reduced as minority shareholders with merely 20 per cent shares, while Mr. Singh will have 40 per cent shares.

“Not even a single sentence of these reports is true,” a senior NDTV official told The Hindu.

The last few months have been eventful for NDTV. On June 5, the CBI raided the residences of the Roys. Calling them a “blatant attack on the freedom of the press,” NDTV, in a statement, said the CBI filed its FIR based on a “shoddy complaint” by a “disgruntled” former NDTV consultant, who has not obtained a “single order from the courts.”

In November last, former Information and Broadcasting Minister Venkaiah Naidu imposed a one-day ban on NDTV for its coverage of the Pathankot air base attack. The government claimed that NDTV imperiled national security by broadcasting the sensitive details about the air base. The ban was, however, put on hold after strong protests from the journalists’ union and the Supreme Court’s decision to hear NDTV’s plea.


सोशल मीडिया पर इस खबर पर आईं कुछ प्रमुख प्रतिक्रियाएं यूं हैं…

Om Thanvi : पता चला है प्रणव रॉय ने एनडीटीवी के सहयोगियों से चैनल स्पाइस जेट को जाने की पुष्टि नहीं की है। चैनल की तरफ़ से अख़बारों को यह भी कहा जा रहा है कि बिक्री की ख़बर सही नहीं है। अगर ऐसा है तो मीडिया की आज़ादी के लिए चिंतित लोगों के लिए यह बड़ी राहत की बात होगी। फ़िलहाल इसमें रहस्य है कि एनडीटीवी के शेयर चंद रोज़ पहले अचानक कैसे उछले या क्या स्पाइस जेट ने चैनल के शेयर नहीं ख़रीदे हैं। बहरहाल, ख़बर ग़लत निकले तो निश्चय ही बहुत ख़ुशी की बात होगी।

Sanjaya Kumar Singh : मीडिया के लिए, मीडिया के बारे में, मीडिया के लोग… एनडीटीवी के बिकने और स्पाइस जेट के अजय सिंह द्वारा खरीदे जाने की खबर को हिन्दू ने गलत बताया है। एनडीटीवी के अधिकारियों के अनुसार इस संबंध में खबर की एक भी लाइन सही नहीं है। हालांकि, इंडियन एक्सप्रेस ने भी अपनी मूल खबर में लिखा है, When asked about the NDTV deal, a SpiceJet official said “it’s absolutely false and baseless.” Messages and emails sent to NDTV officials did not elicit any response. हालांकि एनडीटीवी या उसकी ओर से किसी ने कोई ट्वीट नहीं किया है। इसलिए मामला सीधा नहीं है। इसके बावजूद इकनोमिक टाइम्स ने लिखा है इस खबर से एनडीटीवी के शेयरों के भाव बढ़ गए हैं। और मनीकंट्रोल ने लिखा है, समाचार चैनल के शेयर मूल्य पांच प्रतिशत बढ़ जाने पर बांबे स्टॉक एक्सचेंज ने पूछा है कि इस संबंध में स्पष्टीकरण दे। चैनल क्यों दे? यह समझ में नहीं आया। एक्सप्रेस की मूल खबर में ही लिखा है कि खबर पक्की नहीं है। फिर भी भाई लोगों ने इसकी पुष्टि की और फैलाते रहे। नजीतन शेयर बाजार से कमाने वालों ने शेयर खरीदने के लिए लाइन लगा दी और कीमत बढ़ गई तो चैनल से ही पूछा जा रहा है कि सच क्या है। स्क्रॉल डॉट इन हिन्दू के हवाले से एनडीटीवी ने अधिग्रहण की खबरों से इनकार किया है। कुल मिलाकर, अभी तक मामला यह है कि बिकने पर एनडीटीवी की चुप्पी से उसके शेयरों के भाव बढ़ रहे हैं और उससे कहा जा रहा है बोलो, बोलते क्यों नहीं कि बिक गए। इस बीच एक खबर यह भी है कि अजय सिंह एनडीटीवी को नियंत्रण में लेने के लिए तैयार हैं। तैयार तो बहुत लोग बहुत समय से हैं। पर….

Pankaj Chaturvedi : एनडीटीवी मना कर रहा है कि उसे किसी ज़हाज वाले ने ख़रीदा है, लेकिन चम्पू स्यापा कर रहे है… कब तक दूसरों का बेनर उठा कर क्रांति करोगे, दम हो तो सारे गोदी चेनल देखना बंद करो दो… शहर शहर उनको ना देखने का आन्दोलन चलाओ.. लेकिन जब घर बैठ कर माउस के कीबोर्ड से बकलोल क्रांति हो सकती है तो कौन कुछ सार्थक सडक पर करे? इसी निकम्मेपन और सरकारी पैसे पर आरामतलबी का खामियाजा देश आज भयंकर साम्प्रदायिकता और निरंकुशता के रूप में भुगत रहा है… वक़्त कागज काले करने या क्लब में गला साफ़ करने का नहीं– अरे वहाँ तो आप उन्हें ज्ञान देते हो जो पहले से यह जानते हैं– तनिक बस्ती, पटरी, पगडण्डी का रुख करों– वरना आप केवल बकलोल हो..

Anil Bhaskar : बिक गया NDTV..  यह शोर सोशल के साथ वेब मीडिया पर भी खूब मचा है। उधर प्रणय रॉय बेचने की पुष्टि नहीं कर रहे तो कथित ख़रीदार अजय सिंह साफ़ कह रहे- हमने तो नहीं ख़रीदा। इसे कहते हैं, बेगानों की शादी में अब्दुल्ला दीवाना। लगे रहो मुन्ना भाई…..

Aditya Pandey : प्रणय रॉय कह रहे हैं कि एनडीटीवी ‘अजय सिंह के हाथों’ नहीं बिका है, हमें एक घंटे का भी चैनल चलाना पड़ा तो चलाएंगे… सर, वैसे अब आपको ‘द वर्ल्ड दिस वीक’ के लिए रामायण और महाभारत के स्लॉट से ज्यादा पैसे चुकाने वाले घोष अंकल दूरदर्शन में नहीं हैं… फिर भी 600 करोड़ की डील और सौ करोड़ ‘रनिंग’ की खबर गलत है तो तत्काल इंडियन एक्सप्रेस पर केस करें और यह भी बताएं कि आखिर क्यों और कैसे एनडीटीवी का शेयर पिछले 15 दिनों में दोगुना तक बढ़ गया?

Nadim S. Akhter : NDTV के बिकने वाली खबर अगर इंडियन एक्सप्रेस के रिपोर्टर ने गलत दी है, तो मुझे एक्सप्रेस के संपादक से सहानुभति नहीं, उनकी समझ पे अफसोस होगा। कई दफा रिपोर्टर सूत्र के हवाले से पक्की खबर देता है लेकिन खबर कितनी पकी-पकाई है, ये रिपोर्टर और संपादक के बीच छुपा होता है। कई दफा सूत्र धोखा दे देते हैं या जानबूझकर गलत जानकारी दे देते हैं। ऐसे हालात में रिपोर्टर और संपादक को अपने विवेक से काम लेना होता है कि जो बताया जा रहा है, वो सोलह आने सही है या आठ आने या फिर इस सूचना की औकात दो कौड़ी की भी नहीं है!! और ये सब समझ संपादक को अनुभव से आती है। सो अगर खबर बड़ी है और संपादक को उसे लेकर संशय है, तो हर हाल में वो खबर रोक लेनी चाहिए। विश्वनीयता से कोई समझौता नहीं। उम्मीद करता हूँ कि इंडियन एक्सप्रेस के अनुभवी संपादक से इतनी बड़ी चूक नहीं हुई होगी।

अगर कोई दानी पैसे लगाकर NDTV के कर्जे उतार दे, तो ये चैनल नहीं बिकेगा। कोई है? या फिर मुफ्त का ‘निष्पक्ष मीडिया’ चाहिए। चैनल चलाने में खर्चा आता है। आप तो 10 रुपये के आलू पे मोलभाव कर लेते हो, बेचारा चैनल का मालिक कहाँ जाए? या फिर सारा ज्ञान पत्रकारों के लिए है। पेट पे पत्थर बांध के कब तक चौथे खंभे का बोझ उठा लेगा??!! आपका तो एक महीने का TA-DA नहीं मिलता तो आसमान सिर पे उठा लेते हैं। उस बेचारे को तो मालिक भी मारता है, नेता भी कूचते हैं और पब्लिक भी दौड़ा लेती है। इसलिए NDTV को अगर बिकने से बचाना है तो अपनी बचत राशि का 5 फीसद बैंक एकाउंट में जमा कराएं। प्रणब रॉय से पूछकर एकाउंट नम्बर मैं दे दूंगा। देखते हैं कितने लोग आगे आते हैं! और, अगर ये नहीं कर सकते तो निष्पक्ष मीडिया के लिए छाती मत पीटिये। हार्ट अटैक आ जाएगा, दिल बहुत नाजुक होता है। मसला ये नहीं है कि पत्रकार बाजार के नियमों के मुताबिक चल रहा है। मसला ये है कि वो बाजार में उतरने के बाद भी इज़्ज़त बचाये हुए है या नहीं! बहुत महीन फ़र्क़ है लेकिन ये बहुत बड़ा फ़र्क़ है।

Avinish Mishra : इंडियन एक्सप्रेस के संपादक राजकमल झा से ये उम्मीद नहीं थी.. मुझे जब भी लगता है पत्रकारिता में जो हम कर रहे हैं.. वो गलत है.. तब राजकमल झा का गोयनका अवार्ड के दौरान दिया गया भाषण सुनने लगता हूँ.. डिमोर्लाइज्ड हुआ हौसला फिर से वापस आने लगता है.. और फिर से पत्रकारिता के मूल रूप पर वापस आ जाता हूँ.. आज सुबह एक रिपोर्ट देखा जिसमें सत्यता के नाम पर कोरी अफवाह था.. जिस सूत्र के हवाले से ये ख़बर लिखी गयी थी.. शायद उस सूत्र को ये नहीं पता था.. की “अबकी बार मोदी सरकार” का नारा पीयूष पांडे ने लिखा था.. और जो सबसे अहम बात है की गोयनका जी के सिद्धांत की बात करने वाले इंडियन एक्सप्रेस शायद यह भूल गये की बिना पुष्टि किये ख़बर नहीं चलाया जाना चाहिए पत्रकारिता का सबसे मूल सिद्धांत है… मुझे उम्मीद है की अगर इस ख़बर का प्रमाणित तथ्य इंडियन एक्सप्रेस के पास नहीं है (जैसा की प्रणब राय ने पुष्टि किया है कि एनडीटीवी का शेयर अभी नहीं बेचा जा रहा है) तो राजकमल झा को सरेआम इंडियन एक्सप्रेस से माफी मंगवाना चाहिए.. और पत्रकारिता मूल्यों को फिर से बरकरार रखते हुए जनपक्षधर का विश्वास हासिल करना चाहिए… धन्यवाद !!

Ak Lari : नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ने इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के बारे में एनडीटीवी से स्पष्टीकरण मांगा है। Ndtv को बेचे जाने की खबर अफवाह है। न कोई एनडीटीवी को खरीद रहा है न ही बिक रहा है। प्रणव राय ने कहा है कि अगर हमें एक घण्टे का भी चैनल चलाना पड़ा तो हम चलाएंगे।

मूल खबरें ये हैं…

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बिकने के बाद भी एनडीटीवी में काम करेंगे रवीश कुमार?

Ashwini Kumar Srivastava :  ”अब तेरा क्या होगा रवीश कुमार…” एनडीटीवी पर भी कब्जा कर चुके मोदी-अमित शाह और उनके समर्थक शायद ऐसा ही कुछ डॉयलाग बोलने की तैयारी में होंगे। जाहिर है, रवीश हों या एनडी टीवी के वे सभी पत्रकार, उनके लिए यह ऐसा मंच था, जहां वे बिना किसी भय के सरकार की आलोचना या खामियों की डुगडुगी पीट लेते थे। उनकी इसी डुगडुगी को अपने लिये खतरा मानकर संघ और भाजपा के समर्थकों की नजर में ये पत्रकार और एनडीटीवी सबसे बड़े शत्रु बने हुए थे।

कौन नहीं जानता कि लोकतंत्र में पक्ष से कहीं ज्यादा जरूरी विपक्ष होता है और मीडिया के जरिये पत्रकार भी विपक्ष की ही भूमिका निभाते हैं। हालांकि यह मामूली सी समझ भी केवल उनको ही हो सकती है, जिन्हें वास्तव में देश और लोकतंत्र से प्यार होगा। सरकार के खिलाफ भी बेबाकी से बोलने एनडी टीवी जैसे मीडिया का भी यदि देश में अभाव होगा, तो वह दिन दूर नहीं जब इस देश में लोकतंत्र सिर्फ यादों में जीवित रह जायेगा। लोकतंत्र की क्या अहमियत है, यह मोदी-अमित शाह के समर्थकों को शायद तभी पता चल पाएगा, जिस दिन उनके नेता लोकतंत्र की समस्त संस्थाओं को एनडीटीवी की ही तरह खुद या अपने कारिंदों द्वारा एक एक करके निगल जाएंगे। तब तक यूं ही अच्छे दिनों के आने का जश्न मनाते रहिये… (लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और उद्यमी अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.)

Uday Prakash : तो अब एनडीटीवी भी बिक गया? ख़बर प्रामाणिक है। स्पाइस जेट मालिक अजय सिंह, जो २०१४ के चुनाव अभियान में भाजपा के सहयोगी रहे हैं, वही अब सारे सम्पादकीय अधिकारों के साथ एनडीटीवी के मालिक होंगे। (जाने माने साहित्यकार उदय प्रकाश की एफबी वॉल से.)

Nitin Thakur : कितना सच और कितना झूठ ये नहीं मालूम लेकिन बीजेपी के समर्थक और मोदी की कैंपेनिंग में जुटी कोर टीम के मेंबर, प्रमोद महाजन के पूर्व सचिव और स्पाइसजेट नाम की सस्ती और सर्विस में बकवास (मेरी निजी राय) एयरलाइंस चलानेवाले अजय सिंह ने एनडीटीवी खरीद लिया है. अब उनके एनडीटीवी में सबसे ज़्यादा शेयर हैं. उनके पास चैनल के संपादकीय अधिकार सुरक्षित होंगे और वही तय करेंगे कि एनडीटीवी कौन सी खबर किस एंगल से चलाए. अगर वो कायदे के इंसान हुए तो एकाध परसेंट चांस ही हो सकता है कि दखलअंदाज़ी से बचें. (सोशल मीडिया के चर्चित युवा लेखक नितिन ठाकुर की एफबी वॉल से)

Om Thanvi : एनडीटीवी को ख़रीदने वाले अजय सिंह कौन हैं? वही जिन्होंने नारा गढ़ा था- अबकी बार मोदी सरकार। जी हाँ, अजय सिंह 2014 के चुनाव में भाजपा अभियान समिति के सदस्य थे। नारा सुझाने का श्रेय उन्हें दिया जाता है। अटलबिहारी वाजपेयी के ज़माने में अजय भाजपा के सामान्य सेवक थे, प्रमोद महाजन के क़रीबी। महाजन ने उन्हें अपना ओएसडी बनाया, नई संचार नीति बनाने का ज़िम्मा सौंपा। मोदी के पदार्पण पर वे उनके साथ हुए। सौदेबाज़ी और तकनीकी ‘बुद्धि’ की जितनी पहचान महाजन को थी, मोदी को उनसे कम नहीं। अजय सिंह को साथ लेकर और अब चैनल ख़रीद में आगे खड़ा उन्होंने यही साबित किया है। (वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.)

Priyabhanshu Ranjan : NDTV का भावी मालिक – अजय सिंह (भाजपाई)। News18 के अंग्रेजी और हिंदी न्यूज चैनल के अलावा पूरा ETV नेटवर्क- मुकेश अंबानी (मोदी जी का जिगरी यार)।  आजतक, India Today और ABP News —- महीने में 28 दिन ‘मोदी-मोदी’ जपेंगे और दो-तीन दिन इधर-उधर के भाजपाइयों के खिलाफ खबरें दिखाएंगे, ताकि ‘बैलेंस’ बना रहे और लोगों की नजरों में ये ‘निष्पक्ष’ बने रहने का ढोंग कर सकें। Doordarshan की तो खैर, क्या ही बताऊं। लोकसभा टीवी और राज्यसभा टीवी में भी मोदी जी और RSS के ‘चेले’ सेट कर दिए गए हैं। Times Now, Republic, Zee News और सुदर्शन न्यूज़ के आगे तो दूरदर्शन और अंबानी के चैनल भी शर्मा जाएं। अब आप खुद तय कर लें कि असल खबरें देखने के लिए आपको कौन सा चैनल देखना है! (पीटीआई के तेजतर्रार पत्रकार प्रियभांशु रंजन की एफबी वॉल से.)

Dilip Khan : पूरा मीडिया ग़लत लिख-बोल रहा है। इंडियन एक्सप्रेस ने लिख दिया तो देखा-देखी सारे अख़बार, सारी वेबसाइट्स ने छाप दिया कि “अब की बार मोदी सरकार” का नारा स्पाइसजेट वाले अजय सिंह ने लिखा था। सच ये है कि ये नारा पीयूष पांडेय का लिखा हुआ है। “अच्छे दिन आने वाले हैं” का नारा अनुराग खंडेलवाल ने दिया था। “सौगंध मुझे इस मिट्टी की, मैं देश नहीं झुकने दूंगा” प्रसून जोशी ने लिखा था। अजय सिंह कैंपेन में शामिल था, लेकिन लिखा क्या, ये मैं भी जानना चाहता हूं। अब शायद NDTV के लिए ही कुछ लिखे। एक नारा छूट रहा है। अजय सिंह चाहे तो उसपर क्लेम कर सकते हैं। शंकराचार्य वगैरह के नाक-भौं सिकोड़ने के बाद बनारस में नारे को डाइल्यूट कर दिया गया था। नारा था- हर-हर मोदी, घर-घर मोदी। इसके लेखक को मैं नहीं जानता। वेबसाइट्स वाले भेड़चाल चलने लगे हैं। देखा-देखी छापते हैं। फैक्ट्स चेक नहीं करते। (टीवी जर्नलिस्ट और सोशल मीडिया के चर्चित लेखक दिलीप खान की एफबी वॉल से.)

Yashwant Singh : एनडीटीवी का बिकना दुर्भाग्यपूर्ण है. ऐसे दौर में जब सत्ता की पोलखोल वाली खबरों की सर्वाधिक जरूरत है, एनडीटीवी पर छापे मार मार कर उसे घुटनो के बल बैठने के लिए मजबूर करना और बिक्री के रास्ते पर ले जाना यह बताता है कि सत्ता से ताकतवर कोई चीज नहीं होती. लोकतंत्र में इस किस्म का रवैया बेहद निराशाजनक है. एनडीटीवी और प्रणय राय से मेरे लाख मतभेद रहे हों, पर एनडीटीवी का मुंह बंद करने के लिए उसे पहले डराना धमकाना फिर बिक्री के लिए दबाव डालना चौथे स्तंभ के लिए खतरनाक है. ये नए किस्म का आपातकाल ही है. ये नए किस्म का फासिज्म ही है. (भड़ास संपादक यशवंत की एफबी वॉल से.)

मूल खबर….

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एनडीटीवी बिक गया, स्पाइस-जेट वाले अजय सिंह ने खरीदा

Om Thanvi : आख़िर NDTV भी क़ब्ज़े कर लिया गया। मसालों के नाम पर स्पाइस-जेट हवाई कम्पनी चलाने वाले अजय सिंह अब यह तय करेंगे कि एनडीटीवी के चैनलों पर क्या दिखाया जाए, क्या नहीं। इसका मुँह-चाहा फ़ायदा उन्हें सरकार से मिलेगा। इस हाथ दे, उस हाथ ले। एक मसाला-छाप व्यापारी को और क्या चाहिए? इस ख़रीदफ़रोख़्त के बीच कुछ पत्रकार तो पहले ही एनडीटीवी छोड़कर जा चुके हैं। कुछ चले जाएँगे। कुछ को चलता कर दिया जाएगा। फिर एक संजीदा सच दिखाने वाले चैनल में बचा क्या रह जाएगा? हींग-जीरा, लौंग-इलायची?

मैंने कुछ ही रोज़ पहले एक विश्वविद्यालय में बोलते हुए कहा था कि यह दौर मीडिया को मैनेज करने का उतना नहीं, जितना उसे ख़रीद लेने का है। न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी। ससुरी बजेगी तो बेसुरी बजेगी। जब इस सरकार के लिए इतनी पहले से बज रही हैं – Zee News, CNN-IBN, ETV आदि – तो एक और सही। उन्हें भी ख़रीद कर पीछे से क़ब्ज़े किया गया था। एनडीटीवी भी उसी गति को प्राप्त हुआ। उम्मीद है अब उसे छापों आदि से शांति नसीब होगी। कह सकते हैं एनडीटीवी वालों पर छापे मार मार कर झुका दिया। नए ज़माने में चैन से ज़िंदा रहना ज़रूरी है, जूझते रहने से। इस बिक्री में अजय सिंह के पास प्रणय रॉय परिवार से दुगुने शेयर हो गए। एनडीटीवी के बिकने की कल ख़बर सुनी थी। आज इंडियन एक्सप्रेस में पहले पेज पर पढ़ भी लिया। नीचे दिया लिंक पढ़ सकते हैं तसल्ली के लिए.. goo.gl/XuY3h8

जनसत्ता अखबार के संपादक रह चुके वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.


एनडीटीवी के बिकने को लेकर इंडियन एक्सप्रेस में आज छपी पूरी खबर इस प्रकार है…

SpiceJet’s Ajay Singh set to take control of NDTV

According to the source, Ajay Singh, chairman and managing director for SpiceJet, will have controlling stake in NDTV of around 40 per cent and the promoters Prannoy Roy and Radhika Roy will hold around 20 per cent in the company.

Written by Sandeep Singh | New Delhi |

With its founders Prannoy Roy, Radhika Roy and promoter firm RRPR Holding Pvt Ltd facing a CBI probe for allegedly concealing a share transaction, NDTV is set to change hands, it is learnt. Sources confirmed to The Indian Express that Ajay Singh, co-founder and owner of SpiceJet who was part of the BJP’s 2014 poll campaign, has picked up majority holding in the news channel. When asked if NDTV has been sold to SpiceJet’s Ajay Singh, the source said, “Yes, the deal has been finalised and Ajay Singh will take control of NDTV along with editorial rights.”

On June 5, the CBI conducted searches at the residences of the Roys. Calling the raids a “blatant attack on the freedom of the press,” NDTV, in a statement, said that the CBI had filed its FIR based on a “shoddy complaint” by a “disgruntled” former NDTV consultant who has not obtained a “single order from the courts.”

According to the source, Ajay Singh, chairman and managing director for SpiceJet, will have controlling stake in NDTV of around 40 per cent and the promoters Prannoy Roy and Radhika Roy will hold around 20 per cent in the company.

According to the data available with BSE, the promoter holding in NDTV as of June 2017 stood at 61.45 per cent. Public shareholding in the company stands at 38.55 per cent. The source said that Ajay Singh will also pick up NDTV’s debt of over Rs 400 crore and the total deal is valued at around Rs 600 crore.

A part of the cash (up to Rs 100 crore) will also go to the Roys.

When asked about the NDTV deal, a SpiceJet official said “it’s absolutely false and baseless.” Messages and emails sent to NDTV officials did not elicit any response.

A first-generation entrepreneur, Singh acquired SpiceJet in January 2015 and has turned it around. Having coined BJP’s 2014 campaign slogan “abki baar Modi Sarkar,” Singh served as OSD to Pramod Mahajan during the first NDA government. It was in this period that he played an active role in the launch of DD Sports and was also behind the planning of DD News. Singh played a role in 2014 Lok Sabha campaign of the BJP as part of the core advertising/campaigning team.

In 1996, he was asked to serve on the Board of Delhi Transport Corporation and prepare a plan to revamp DTC. He is known to have played a key role in its turnaround and in the two and a half years that he spent at DTC, its fleet rose from 300 to about 6000. He also turned around the grounded ModiLuft and renamed and launched it as SpiceJet. An alumnus of Delhi’s St. Columba’s school, Singh is a graduate of IIT Delhi, an MBA from Cornell University and a Bachelor’s degree in Law (LLB) from Law Faculty, University of Delhi.

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अपने उपर लगे आरोपों का कमाल खान ने दिया करारा जवाब

..मेरी पत्नी रुचि के पिता की पलामू में बॉक्साइट की दो बहुत बड़ी माइंस थी जिससे एल्युमीनियम बनता था और बिरला की एल्युमीनियम फैक्ट्री को सप्लाई होता था… जब उनके पिता बुजुर्ग हो गए तो उन्होंने अपने पिता से कहा कि आपको अब इस उम्र में भागदौड़ नहीं करनी चाहिए इसलिए उन्होंने उनकी दोनों माइंस सरकार को सरेंडर करा दी.. अगर उनको यही चिरकुट टाइप बेईमानी करनी होती तो इसके बजाय वो अपने पिता की खानें चला कर उससे बहुत ज़्यादा पैसा कमा लेतीं… आपके तर्क के मुताबिक अगर पत्रकार को अच्छा वेतन पाना, खुशहाल होना या सम्पत्ति खरीदना अपराध है तो फिर पत्रकारों को मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिश लागू करने के लिए संघर्ष नहीं करना चाहिए… क्योंकि इतना पैसा तो सभी मीडिया हाउस देते हैं कि पत्रकार झोला लटका के साइकिल पर घूम सके…

(कमाल खान के जवाब का एक अंश)

लखनऊ से प्रकाशित ‘दृष्टांत’ मैग्जीन में वरिष्ठ पत्रकार कमाल खान और उनकी पत्रकार पत्नी रुचि कुमार पर गंभीर आरोप लगाकर कवर स्टोरी का प्रकाशन किया गया… पर पूरी स्टोरी में कमाल और उनकी पत्नी रुचि का कोई पक्ष नहीं दिया गया… न ही उनका पक्ष जानने की कोशिश की गई… भड़ास4मीडिया ने कमाल खान और उनकी पत्नी से पूरे प्रकरण पर अपना पक्ष रखने का अनुरोध किया तो उन्होंने एक-एक आरोप और उन पर अपने जवाब को सिलसिलेवार ढंग से तथ्यों के साथ लिखकर भड़ास के पास प्रकाशन के लिए भेजा. भड़ास पर वरिष्ठ पत्रकार कमाल खान और रुचि कुमार के पक्ष को पूरे सम्मान के साथ प्रकाशित किया जा रहा है. साथ ही ‘दृष्टांत’ मैग्जीन के संचालकों से अपेक्षा है कि वो भी अगले अंक में कमाल और रुचि के पक्ष को जरूर प्रमुखता से प्रकाशित करेंगे ताकि दोनों पक्षों की बातों का प्रकाशन करने की परंपरा का पालन कर पत्रकारीय गरिमा का सम्मान किया जा सके.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


‘दृष्टांत’ मैग्जीन बदनीयत, सारे आरोप गलत और बेबुनियाद : कमाल खान

दृष्टांत पत्रिका के अगस्त अंक में कवर पेज पर मेरी फ़ोटो छाप के मेरे बारे में लिखा गया है. इसमें मेरे ऊपर लगाए गए सभी आरोप मनगढ़ंत, तथ्यों से परे, मेरी प्रतिष्ठा को धूमिल करने और मानहानि करने वाले है. ये आपकी बदनीयती भी जारी करते हैं क्योंकि आपने मेरे ऊपर सार्वजनिक रूप से आरोप लगाने से पहले मेरा पक्ष जानने का कोई प्रयास नहीं किया. हमारे पास ना तो आपके बताये गोमती नगर के दो प्लाट हैं, ना पुरसैनी गांव में कोई ज़मीन है और ना ही हम किसी भी कम्पनी के डायरेक्टर या शेयर होल्डर हैं. मैं पिछले करीब तीन दशकों से पत्रकारिता कर रहा हूं. पिछले 22 साल से एनडीटीवी में हूं और मेरी पत्नी रुचि पिछले 24 साल से ब्रॉडकास्ट जर्नलिस्ट हैं और एक प्रतिष्ठित परिवार से सम्बन्ध रखती हैं.

हमारे मीडिया संस्थान हमें इतनी सैलरी देते हैं कि हम दोनों ने मिलके पिछले फायनेंशल ईयर में करीब नब्बे हज़ार रुपये महीना इनकम टैक्स दिया है जो टीडीएस की शक्ल में कम्पनी ने काट के भेजा है. अगर हम नब्बे हज़ार रुपये महीना टैक्स देते हैं तो आप समझ सकते हैं कि हम अपने लिए इससे भी ज़्यादा खरीदने की हैसियत रखते हैं. हमारे ऊपर दृष्टान्त पत्रिका में चार बड़े आरोप लगाए गए है, जिनके बारे में हमारा पक्ष यूं है…

(1) आरोप : कि हमारे पास गोमती नगर के विराज खण्ड में प्लाट नम्बर 1/97 और विकल्प खण्ड में प्लाट नम्बर 1/315 है..

मेरा जवाब : ये दोनों प्लाट कभी हमारे पास नहीं थे… अगर ये हमारे प्लाट हैं तो हमारे नाम इनकी रजिस्ट्री निकलवा के हमें कब्ज़ा दिलवा दीजिये। एलडीए से मैंने इन दोनों प्लाट्स के डाक्यूमेंट्स  निकलवाये तो पता चला विराज खण्ड का प्लाट नम्बर 1/97 कमाल खान नहीं बल्कि किन्हीं कलाम खान और असमा कलाम को 30 मार्च 1996 से एलाट है… जबकि 1/315 विकल्प खण्ड किन्हीं मयूरी शर्मा को 2001 से एलाट है…

(2) आरोप : कि हमारे पास मोहनलाल गंज के पुरसैनी गांव में काफी ज़मीन है…

हमारा जवाब : इस गाँव मे हम चार दोस्तों ने मिलके चार बीघा खेत खरीदे थे जिसमें मेरे नाम से एक बीघा और रुचि के नाम से एक बीघा खेत थे.. इन्हें करीब 4 साल पहले बेच कर हमने लखनऊ से 36 किलोमीटर दूर मोहनलालगंज के गौरा गांव में खेती की दूसरी ज़मीन खरीदी थी.. अब मेरे या रुचि के नाम से पुरसैनी में कोई ज़मीन नहीं है…पुरसैनी की खतौनी के पेज नम्बर तीन अगर आपने देखा होता तो पता चल जाता कि चार साल पहले ये ज़मीन बेची जा चुकी है..

(3) आरोप : कि हम लोग किसी केएपीएस ट्रेडिंग कम्पनी में डायरेक्टर हैं और इसमें हमारा शेयर है…

जवाब : हमे केएपीएस ट्रेडिंग कम्पनी में डायरेक्टरशिप और शेयर होल्डिंग से सम्बंधित कम्पनी के दस्तावेज़ दिला देंगे तो हम इस कम्पनी से डायरेक्टर की हैसियत से अपना पैसा मांग सकेंगे क्योकि इस कम्पनी का नाम हमने आज पहली बार सुना है। हमें पता ही नहीं था कि हम इसमें डायरेक्टर और शेयर होल्डर हैं। आपने अपनी मैग्ज़ीन में पुरसैनी गाँव की ज़मीन की खतौनी छापी है, जिसमें आपने साबित करने की कोशिश की है कि खसरा नम्बर 988 में मैं और रुचि केएपीएस ट्रेडिंग कम्पनी के डायरेक्टर अम्बरीष अग्रवाल के साथ पार्टनर हैं और कम्पनी के डायरेक्टर हैं.. आपने लिखा है कि हमने ये ज़मीन कंपनी के डायरेक्टर अम्बरीष अग्रवाल को दे रखी है.. रेवन्यू रिकॉर्ड में खसरा होता है… खसरा ज़मीन का बहुत बड़ा हिस्सा होता है.. एक ही खसरा नम्बर में कई लोगों की ज़मीन होती है… एक खसरे में अगर बहुत सारे नाम लिखे हैं इसका ये मतलब नहीं कि वो सब पार्टनर हैं… आपने जो खतौनी छापी है वो सिर्फ ये बताती है कि 988 नम्बर के खसरे में कई अलग-अलग लोग ज़मीनों के मालिक हैं.. और, आप बदनीयत नहीं होते तो इसी खतौनी के पेज नम्बर तीन को भी दिखाते जिसमें साफ साफ लिखा है कि ये ज़मीन हमने चार साल पहले किन्हीं और लोगों को बेच दी थी और खरीदने वाले अम्बरीष अग्रवाल या केएपीएस ट्रेडिंग कम्पनी नहीं है.. उस इलाके में अम्बरीष अग्रवाल की ज़मीन होने से आपने हमे उनकी कम्पनी का डायरेक्टर बताया है… कम्पनी के दस्तावेज निकाल के साबित कीजिये कि हम उस कम्पनी के डायरेक्टर हैं और हमारा कम्पनी में शेयर हैं…

(4) आरोप: कि हमारे पास मोहनलालगंज में विशाल फार्म हाउस है जिसकी कीमत करीब 12 करोड़ है..

मेरा जवाब : मैं अपना ये खेत आपकी बताई गई कीमत के एक चौथाई दाम तीन करोड़ में बेचने को तैयार हूं… आप तुरंत बिकवा दें… खरीदने वाले को नौ करोड़ का फायदा हो जाएगा…

पत्रकारिता के क्षेत्र में मेरे किये गए कार्यों के लिये मुझे पांच नेशनल और एक इंटनेशनल अवार्ड मिला है… मुझे दो बार भारत के राष्ट्रपति ने नेशनल अवार्ड दिए हैं… ऐसे में ये साफ है कि आप अपनी बदनीयती से  मेरी निजी और पेशेगत प्रतिष्ठा को चोट पहुंचाना चाहते हैं.. मेरी पत्नी रुचि इंडिया टीवी में एसोशिएट एडिटर हैं और 24 साल से ब्रॉडकास्ट जर्नलिस्ट हैं… उन्होंने देश के सबसे बड़े मीडिया हाउसेस में काम किया है… वो एक सम्मानित प्रतिष्ठित पत्रकार हैं और एक प्रतिष्ठित परिवार से हैं.. आपकी जानकारी के लिए मेरी पत्नी रुचि के पिता की पलामू में बॉक्साइट की दो बहुत बड़ी माइंस थी जिससे एल्युमीनियम बनता था और बिरला की एल्युमीनियम फैक्ट्री को सप्लाई होता था… जब उनके पिता बुजुर्ग हो गए तो उन्होंने अपने पिता से कहा कि आपको अब इस उम्र में भागदौड़ नही करनी चाहिए इसलिए उन्होंने उनकी दोनों माइंस सरकार को सरेंडर करा दी.. अगर उनको यही चिरकुट टाइप बेईमानी करनी होती तो इसके बजाय वो अपने पिता की खाने चला कर उससे बहुत ज़्यादा पैसा कमा लेतीं… आपके तर्क के मुताबिक अगर पत्रकार को अच्छा वेतन पाना, खुशहाल होना या सम्पत्ति खरीदना अपराध है तो फिर पत्रकारों को मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिश लागू करने के लिए संघर्ष नहीं करना चाहिए… क्योकि इतना पैसा तो सभी मीडिया हाउस देते हैं कि पत्रकार झोला लटका के साइकिल पर घूम सके…

कमाल खान
Resident Editor, NDTV
kamalkhanlko@gmail.com

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एनडीटीवी : जंग हारने पर यहां हर बार सिपाही हलाल होते हैं, सिपहसालार और राजा कतई ज़िम्मेदार नहीं!

एनडीटीवी चैनल में कम से कम 40 लोग होंगे जो दस लाख से ज्यादा महीना कमाते हैं, और ये वो लोग हैं जो नंबर वन चैनल को आख़िरी पायदान पर ले आए… फिर भी हर दिन अच्छे पत्रकार, कैमरामैन, एडिटर चैनल छोड़ रहे हैं या उन्हें छोड़ने पर मजबूर किया जा रहा है… एक तरफ जहां नौकरी जा रही है वहीं दूसरी तरफ अभिजात्य 40-50 लोगों के लिये ऑडी गाड़ियां आती है, कमरों में एयर प्यूरीफायर लगता है, हर रोज़ हज़ारों के फूल सजाए जाते हैं … कॉस्ट कटिंग जरूरी है तो अपनी लाखों की तनख्वाह छोड़ें… शेयरधारकों का पैसा डुबोने का हक़ इन्हें किसने दिया…

अनुराग द्वारी ने भी एनडीटीवी छोड़ दिया… दो दशकों का साथी, साथ काम करने का तजुर्बा … बेहतरीन प्रोफेशनल, ज़िंदादिल इंसान … एक दशक से ज्यादा वक्त बिताने के बाद उसने भी एनडीटीवी छोड़ दिया। डेस्क, खेल, राजनीति, क्राइम, शहर, गांव, संगीत हर विषय पर उसकी पकड़ थी … जिस भेंडी बाज़ार को मुंबई में हमने सिर्फ अंडरवर्ल्ड की नज़र से देखा वहां भी वो संगीत का घराना ढूंढ लाया … जुनूनी ऐसा कि किसी ख़बर पर बॉस से भी भिड़ना पड़े तो भिड़ जाए … जिस दौर में स्ट्रिंगरों की खबर पर दिल्ली-मुंबई में बैठे पत्रकार बाईलाइन लूटते हैं उसने अपनी ज़िद से उनकी पीटीसी तक लगवा दी … उनके एक एक बिल के लिये लड़ने वाला … साफ कहता था हमारी तनख्वाह बढ़ती तो उनके लिये क्या महंगाई घटती है।

बहरहाल, एनडीटीवी ने उसकी क्षमताओं का पूरा दोहन किया … डेस्क से लेकर रिपोर्टिंग तक … हिन्दी से लेकर अंग्रेज़ी तक … खेल में कई ख़बरें उसने ब्रेक की होंगी लेकिन हर मौके पर चैनल अपनी कुलीन मानसिकता दिखाता रहा … देश में वो भागे, विदेश जाने का मौका आए तो ऐसे लोग भेजे जाते रहे जिन्होंने ताउम्र सिर्फ चिरौरी की, अपनी अंग्रेज़ियत का हवाला देते रहे … उसका दोस्त होने के नाते हम कई बातों के सामने गवाह रहे, कई बातें वो कहता भी था .. लेकिन एक संतोष के साथ चलो यार अपना नंबर भी आएगा … उसके चेहरे का असंतोष पढ़ पाओ तो पढ़ लो … नहीं तो पंडितजी गरिया देते थे …

चैनल के आख़िरी दिनों में पारिवारिक वजहों से उसने मध्यप्रदेश के ब्यूरो प्रमुख की ज़िम्मेदारी संभाली तो साबित कर दिया कि रिपोर्टिंग के मायने क्या होते हैं, जिन चैनलों को लगता है खबर दिल्ली-मुंबई है वहां उसने हक़ से चैनल का एयर टाइम छीन लिया। उसे लगातार हम टीवी पर देखते रहे और उसकी एनर्जी को सराहते रहे।

बहुत दिनों से लिखना चाह रहा था लेकिन लगता था उसकी नौकरी पर दिक्कत ना आए, वैसे वो इतना डरपोक नहीं चाहे स्टार में रहा चाहे एनडीटीवी में जब जो ग़लत लगा न्यूज़ रूम हो या उसका अपना स्पेस वो खुलकर बोल देता था … उसका साफ मानना है कि ना लेफ्ट ग़लत हैं ना राइट, और ना दोनों ही एब्सोल्यूट में सही हैं … हमारा काम विचारधारा नहीं बल्कि नीतियों का मूल्यांकन है। क्रांति होगी तो लाला के पैसों से नहीं ख़ुद के दम पर …

जब उसने ख़ुद फेसबुक पर अपनी जाने की ख़बर पोस्ट की, तो लगा कमाल है … हर एक शख्स उसे याद है चाहे वो दस साल पहले ही क्यों ना गया हो या उसे निकाला गया हो … नाम-काम के साथ… बहरहाल उसकी नई पारी के लिये शुभकामना…

लेकिन सवाल जो एनडीटीवी प्रेमी हैं उनसे भी पूछना चाहता हूं कि क्या यहां मामला निवेशकों के साथ धोखे का नहीं .. ये ठीक है कि सरकार चैनल के पीछे है … वो कोर्ट तय कर देगा कौन सच है कौन झूठ … लेकिन जिस बरखा दत्त ने अपनी सफाई के लिये, खुद को बड़ा बनाने चैनल में कोर्ट चला दिया आज वही चैनल पर भ्रष्टाचार की बातों को रिट्वीट करती हैं, जो आज भी चैनल के दिये करोड़ों के बंगले में रहती हैं।

आज भी एनडीटीवी चैनल में कम से कम 40 लोग होंगे जो दस लाख से ज्यादा महीना कमाते हैं, और ये वो लोग हैं जो नंबर वन चैनल को आख़िरी पायदान पर ले आए … फिर भी हर दिन अच्छे पत्रकार, कैमरामैन, एडिटर चैनल छोड़ रहे हैं या उन्हें छोड़ने पर मजबूर किया जा रहा है।

अभिजात्य होने का नमूना देखिये… एक तरफ जहां नौकरी जा रही है यहां वहीं अभिजात्य 40-50 लोगों के लिये ऑडी गाड़ियां आती है, कमरों में एयर प्यूरीफायर लगता है, हर रोज़ हज़ारों के फूल सजाए जाते हैं … ये चैनल को भारी नहीं लगता… अरे, जंग हारने पर हर बार सिपाही हलाल होगा, सिपहसालार और राजा की कोई ज़िम्मेदारी नहीं… दो कौड़ी का आइडिया देकर मोबाइल से टीवी चैनल चलवा रहे हैं… कॉस्ट कटिंग जरूरी है तो अपनी लाखों की तनख्वाह छोड़ें… शेयरधारकों का पैसा डुबोने का हक़ इन्हें किसने दिया…

अभी भी चैनल में काम कर रहे कई साथियों से बात होती है सब हताश हैं, निराश हैं लेकिन कुछ कहने की हिम्मत नहीं … उनसे बात करेंगे तो पता लगेगा कि सच्चाई क्या है। उनकी ग़लती भी क्या है, जिसने जैसा आदेश दिया, उन्होंने वैसा काम किया… वो आज भी बेहतरीन प्रोफेशनल हैं लेकिन विचारधारा के दबाव में दबाए जा रहे हैं… फील्ड में गालियां उन्हें मिलती हैं और आपके स्टार पत्रकार कॉन्फ्रेंस में जाकर तालियां बजवाते हैं…

लेखक अजय कुमार इन दिनों मुंबई में पदस्थ हैं और अनुराग द्वारी के साथ भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकरिता विश्वविद्यालय में साथ पढ़ाई कर चुके हैं. अजय और अनुराग कई मीडिया संस्थानों जैसे स्टार न्यूज़ और एनडीटीवी में साथ काम कर चुके हैं. अजय ने कुछ साल पहले खबर की दुनिया से रुखसत ले लिया और अब वो डिजिटल स्पेस में सक्रिय हैं.

पूरे प्रकरण को समझने के लिए इसे भी पढ़ें….

 

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एनडीटीवी से हटाए जाने वाले मीडियाकर्मियों की संख्या 100 के पार हो गई

एक बड़े मीडिया संस्थान में मीडियाकर्मियों की छंटनी की जा रही है और पूरा मीडिया जगत चुप्पी साधे है. खासकर वो लोग भी जो दूसरों जगहों पर छंटनी या बंदी के सवालों पर मुखर होकर अपने यहां स्क्रीन काली कर प्राइम टाइम दिखाते थे. एनडीटीवी के लोग इस छंटनी के पक्ष में भांति भांति के तर्क दे रहे हैं लेकिन सवाल यही है कि क्या दूसरों को नसीहत देने वालों को अपना घर ठीक-दुरुस्त रखने की कोशिश नहीं करनी चाहिए.

सवाल और भी हैं…

क्या छंटनी ही एकमात्र रास्ता था.

क्या सेलरी कटौती या फिर उन्हें नए कामों में लगाकर उनके परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा नहीं किया जा सकता था.

क्या यह कहीं नियम बना हुआ है कि अपने घर की गंदगी / उपद्रव / छल / छंटनी / फ्राड / चीटिंग आदि पर बिलकुल बात नहीं करनी है और दुनिया भर के मामलों में मुंह फाड़ कर चिल्लाना है.

एनडीटीवी के भीतरी सूत्र बताते हैं कि छंटनी से प्रभावित होने वालों की संख्या कुल सौ के पार जा चुकी है. ये छंटनी एनडीटीवी ग्रुप के अंग्रेजी और हिंदी समेत सभी न्यूज चैनलों से की गई है. दिल्ली और मुंबई आफिस को मिलाकर अब तक सौ लोग निकाले जा चुके हैं. एनडीटीवी के दिल्ली आफिस की बात करें तो यहां से कुल 35 इंजीनियर्स हटाए गए हैं. 25 कैमरापर्सन्स पर भी गाज गिरी है. 7 असिस्टेंट हटाए गए हैं. वीडियो एडिटर कुल छह हटाए गए हैं. एमसीआर से आठ लोगों की बलि ली गई है. दो ड्राइवरों को पैदल कर दिया गया है.

एनडीटीवी के मुंबई आफिस से खबर है कि 13 कैमरापर्सन्स प्रणय राय की छंटनी नीति की भेंट चढ़ाए गए हैं. यहां भी इंजीनियरों पर गाज गिरी है जिनकी संख्या तीन है. एक एंकर अनीश बेग को भी हटाए जाने की सूचना है. छंटनी और बर्खास्तगी के घटनाक्रम से ठीक एक रोज पहले हालात की नजाकत भांपकर 6 इंजीनियरों ने खुद ही जाब छोड़ दिया था. इस तरह सारे नंबर्स को जोड़ लें तो संख्या सौ के पार जा रही है.

देखना है कि रवीश कुमार एनडीटीवी के इस कोहराम पर कब प्राइम टाइम करते हैं और दुनिया भर के मीडिया संस्थानों में छंटनी के ट्रेंड पर प्रकाश डालते हुए जनसंचार के अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय विद्वानों को उद्धृत करते हुए कब विषय विशेषज्ञों से बहस कर जनता की चेतना को जाग्रत करने का काम करते हैं ताकि जनता भी मीडिया की अर्थनीति और कूटनीति से दो-चार होकर मीडिया के प्रति अपने नजरिए सरोकार को रीडिफाइन कर सके.

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एनडीटीवी का मालिक दूध का धुला ना हो तो भी सरकार को सबसे ज़्यादा दिक्कत उसी से है!

Nitin Thakur : सब जानते हैं कि एनडीटीवी की छंटनी किसी पूंजीपति के मुनाफा बढ़ाने का नतीजा नहीं है. वो किसी नेटवर्क18 या ज़ी ग्रुप की तरह मुनाफे में होने के बावजूद लोगों को नहीं निकाल रहा. एनडीटीवी एक संस्थान के बिखरने की कहानी है. यही वजह है कि उनका कोई कर्मचारी मालिक को लेकर आक्रोशित नहीं है. वो जानते हैं कि उनसे ज़्यादा ये मुसीबत संस्थान के प्रबंधन की है. बावजूद इसके किसी को तीन महीने तो किसी को छह महीने कंपन्सेशन देकर विदा किया जा रहा है.

एनडीटीवी को जाननेवालों को मालूम है कि यहां ऐसे बहुतेरे हैं जिन्होंने दशकों तक आराम से नौकरी की और कहीं जाने की ज़रूरत नहीं समझी. सैलरी फंसाना, जाते हुए कर्मचारी की सैलरी मार लेना, किश्तों में तन्ख्वाह देना या चार चार पैसे पर इंटर्न पाल कर उनका शोषण वहां उस तरह नहीं हुआ जिस तरह इंडस्ट्री के दर्जन भर कई चैनलों में होता है. सबसे ऊंची सैलरी पर करियर की शुरूआत इसी चैनल में होती रही है. ये जो छंटनी -छंटनी का राग अलाप कर एनडीटीवी को सूली पर चढ़ाने की भक्तिपूर्ण चालाकी भरी कोशिश है वो धूर्तता के सिवाय कुछ नहीं.

ये वही हैं जो एनडीटीवी को रोज़ बंद होने की बददुआ देते थे और आज जब सरकार के खिलाफ मोर्चा लेते हुए वो तिनका तिनका बिखर रहा है तो किसी की जाती हुई नौकरी पर तालियां बजाने की बेशर्मी भी खुलकर दिखा रहे हैं. बीच बीच में कुटिल मुस्कान के साथ “बड़ा बुरा हुआ” भी कह दे रहे हैं. इनकी चुनौती है कि एनडीटीवी वाले अपनी स्क्रीन पर अपने ही यहां हो रही छंटनी की खबर दिखाएं. भाई, आप यही साहस अपने चैनलों और अखबारों में क्यों नहीं दिखा लेते? मुझे तो नहीं याद कि उस चैनल ने कहीं और छंटनी की खबर भी दिखाई हो.. फिर आप ये मांग आखिर किस नीयत से कर रहे हैं?

आपने पी7, श्री न्यूज़, जिया न्यूज़, ज़ी, आईबीएन में रहते हुए खुद के निकाले जाने या सहयोगियों के निकाले जाने पर खबर बनाई या बनवाई थी?? दरअसल आपकी दिक्कत पत्रकार होने के बावजूद वही है जो किसी पार्टी के समर्पित कैडर की होती है. आप उस चैनल को गिरते देखने के इच्छुक हैं जो चीन विरोधी राष्ट्रवाद के शोर में भी CAG की रिपोर्ट पर विवेकवान चर्चा कराके लोगों का ध्यान सरकार की लापरवाही की तरफ खींच रहा है. आपकी आंतें तो डियर मोदी जी की आलोचना की वजह से सिकुड़ रही हैं, वरना किसी की नौकरी जाते देख खुश होना किसी नॉर्मल इंसान के वश से तो बाहर की बात है.

मैंने यहां पहले भी लिखा है कि मैं चैनल दिखने की एक्टिंग करते संघ के अघोषित इलेक्ट्रॉनिक मुखपत्र चैनलों के बंद होने के भी खिलाफ हूं. वो चाहे जो हों मगर आम लोगों की रोज़ी रोटी वहां से चल रही है. विरोधी विचार होना एकदम अलग बात है.. मगर सिर्फ इसीलिए किसी की मौत की दुआ करना अपनी गैरत के बूते से बाहर का सवाल है. एनडीटीवी का मालिक दूध का धुला ना हो तो भी सरकार को सबसे ज़्यादा दिक्कत उसी से है. ये तो उसी दिन पता चल गया था जब पठानकोट हमले की एक जैसी रिपोर्टिंग के बावजूद ऑफ एयर का नोटिस बस एनडीटीवी इंडिया को मिला था. चैनल को लेकर सरकारी खुन्नस छिपी हुई बात नहीं है. इसे रॉय का वित्तीय गड़बड़झाला घोषित करके मूर्ख मत दिखो.

रूस में एनटीवी हो या तुर्की में आधा दर्जन सरकार विरोधी मीडिया संस्थान.. सबको ऐसे ही मामले बनाकर घेरा और मारा गया है. आज सरकार की बगल में खड़े पत्रकारनुमा कार्यकर्ताओं के लिए जश्न का दिन है. उसे खुलकर सेलिब्रेट करो. किसी की मौत की बददुआ करके.. अब जब वो मर गया तो उस पर शोक का तमाशा ना करो. थोड़ी गैरत बची हो तो सिर्फ जश्न मनाओ. जिस चैनल पर एक दिन के बैन को भी सरकार को टालना पड़ा था अंतत: वो सरकार के हाथों पूरी तरह “बैन” होने जा रहा है. अब आप कहां खड़े हैं तय कीजिए, वैसे भी इतिहास कमज़ोर राणा के साथ खड़े भामाशाह को नायक मानता है, मज़बूत अकबर के साथ खड़े मान सिंह को नहीं।

सोशल मीडिया के चर्चित युवा लेखक नितिन ठाकुर की एफबी वॉल से.

मूल खबर…

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एनडीटीवी ने 70 कर्मचारियों को निकाला, रवीश कुमार ने चुप्पी साधी

हर मसले पर मुखर राय रखने वाले पत्रकार रवीश कुमार अपने संस्थान एनडीटीवी के घपलों-घोटालों और छंटनी पर चुप्पी साध जाते हैं. ताजी सूचना के मुताबिक एनडीटीवी ने अपने यहां से छह दर्जन से ज्यादा मीडियाकर्मियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है. इनमें से ज्यादातर तकनीकी कर्मी हैं. करीब 35 तो कैमरामैन ही हैं. बाकी टेक्निकल स्टाफ है. वे कैमरामैन में जो पहले एडिटोलियल टीम के सदस्य थे, अब एचआर ने उन्हें टेक्निकल स्टाफ में कर दिया है.

ये सभी ग्रुप के अंग्रेजी हिंदी व अन्य चैनलों में काम करते थे. संपादकीय विभाग के अन्य लोगों पर भी गाज गिर सकती है. सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं क्या रवीश कुमार भी इस छंटनी के मसले पर कुछ बोलेंगे… क्या वे इस मामले में मुंह खोलेंगे. उल्लेखनीय है कि सीबीआई रेड पड़ने पर एनडीटीवी के पक्ष में तमाम बुद्धिजीवी खड़े हो गए थे. अब एनडीटीवी से 70 लोग निकाले गए हैं तो इनके परिवारों के पक्ष में कोई दो लाइन लिखने के लिए आगे आने वाला नहीं है.

आउटलुक मैगज़ीन की रिपोर्ट के अनुसार एनडीटीवी प्रबंधन ने अपने यहां से 70 कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। ज्ञात हो कि पिछले कुछ दिनों से एनडीटीवी ने MoJo यानि मोबाइल जर्नलिज्म शुरू किया है. इसके बाद ही माना जा रहा था कि कैमरामैन निकाल दिए जाएंगे. मोजो जर्नलिज्म के प्रयोग के बाद अब रिपोर्टर के साथ कैमरामैन नहीं जाता है. रिपोर्टर खुद मोबाइल से वीडियो बनाता है. एनडीटीवी भी कहता है कि वह मोजो यानी मोबाइल बेस जर्नलिज्म की ओर बढ़ रहा है.

इस छंटनी को लेकर फेसबुक पर आई कुछ प्रतिक्रियाएं इस प्रकार हैं :

राजीव राय : एनडीटीवी से तकरीबन 60 लोगों को बाहर निकाल दिया गया है. उम्मीद है Ravish Kumar जी! इसपर भी कोई ब्लॉग या पोस्ट लिखेंगे और अपने साथी पत्रकारों के लिए ठीक वैसे ही आवाज़ बुलंद करेंगे जैसे अपने मालिक प्रणाॅय राॅय के लिए किया था.
Mayank Saxena : 6 महीने पहले ही जब एनडीटीवी ने अपने रिपोर्टर्स को मोबाइल दे कर उससे स्टोरी और लाइव करने को कहा था…तभी मुझे लग गया था कि छंटनियां होने वाली हैं…कैमरापर्सन्स ही सबसे ज़्यादा होंगे, मेरे हिसाब से इन 70 लोगों में…
Rajat Amarnath : NDTV ने सफेद हाथियों की सैलरी कम करने की जगह अपने करीब100 लोगों को बाहर का रास्ता दिखाने का फैसला किया है (ज्यादातर टैक्निकल स्टाफ है). इस मौके पर एक प्राइम टाईम तो बनता है- “जुबां पे सच,दिल में इंडिया… NDTV इंडिया”
Ajay Prakash : एनडीटीवी ने की 70 कर्मचारियों की छंटनी… देखना होगा कि कौन से नेता और बुद्धिजीवी बाहर किये जाने वाले लोगों के समर्थन में आकर जंतर—मंतर पर प्रदर्शन करते हैं.

इस बीच, एनडीटीवी समूह ने एक बयान जारी कर कहा है- ‘दुनियाभर के अन्य न्यूज ब्रॉडकास्टर की तरह एनडीटीवी भी मोबाइल जर्नलिज्म पर ध्यान केंद्रित करते हुए अपने न्यूज रूम और रिसोर्सेज का पुनर्गठन कर रही है। एनडीटीवी ने हमेशा प्रारंभिक स्तर पर ही नई टेक्नोलॉजी को ग्रहण किया है और हम (एनडीटीवी) देश का पहला नेटवर्क है, जिसने मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर खबरों को शूट करने के लिए अपने पत्रकारों को प्रशिक्षित किया है। यह सिर्फ कॉस्ट-कटिंग नहीं है, बल्कि यह निश्चित रूप से हमारे लिए किसी भी अन्य बिजनेस की तरह या यूं कहें कि ऑपरेशंस का महत्वपूर्ण फैक्टर है।”

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बाबू मोशाय प्रणय रॉय, शीशे​ के घर में रहने वाले दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकते

इंद्र वशिष्ठ


कृपया क्या कोई बता सकता है कि मीडिया मालिक/संपादक द्वारा शोषित, पीड़ित, प्रताड़ित, नौकरी से निकाले गए पत्रकारों को न्याय दिलाने, मजीठिया वेतन बोर्ड लागू कराने के लिए या बीमारी से जूझ रहे किसी पत्रकार के लिए प्रेस क्लब और एडिटर गिल्ड ने कभी कोई पहल की है। जैसे धोखाधड़ी और आपराधिक साज़िश के आरोपी प्रणय रॉय के लिए की जा रही है। क्या इंडिया टीवी पर प्रताड़ना का आरोप लगा कर जहर खाने वाली तनु शर्मा को इंसाफ दिलाने के लिए कुछ किया था।

100 करोड़ की वसूली के आरोपी जेल भोगी जी न्यूज के सुधीर चौधरी ने लाइव इंडिया में दिल्ली की टीचर उमा खुराना के बारे फर्जी स्टिंग दिखा कर छात्राओं से वेश्यावृत्ति कराने काआरोप लगा कर उसका जीवन बर्बाद कर दिया। सुधीर की इस हरकत से दरिया गंज जैसे संवेदनशील इलाके में दंगा होने की नौबत आ गई थी। पुलिस ने दंगा होने के डर से चैनल की खबर पर विश्वास करके बिना जांच के ही टीचर को जेल भेज दिया। बाद में जांच में चैनल की खबर फर्जी निकली तो पुलिस को अपनी गलती का अहसास हुआ। उस समय सुधीर किसी तरह बच गया उसके रिपोर्टर को गिरफ्तार किया गया।

कहावत है न कि चोर की मां कब तक खैर मनाएगी। सुधीर वसूली के आरोप में जेल पहुंच गया। सह आरोपी जी का मालिक हरियाणे का बानिया सुभाष चन्द्र जेल जाने से बच गया । लेकिन कब तक क्योंकि शिकायत कर्ता भी मामूली आदमी नहीं वो भी हरियाणे​ का ही तगड़ा बानिया नवीन जिंदल है। क्या इन संस्थाओं ने इन मठाधीशों के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत दिखाई है। आरोपी सुभाष चंद्र की किताब का विमोचन प्रधानमंत्री निवास पर करना और सुधीर को पुलिस सुरक्षा देना देख लगा कि मोदी और कांग्रेस में ज्यादा फ़र्क नहीं है।

अब बात बाबू मोशाय प्रणय रॉय की जिनकी आऊट आफ टर्न तरक्की की बुनियाद भी दूरदर्शन के बाबू मोशाय की गोद में रखी गई थी। किसी अन्य व्यक्ति के खिलाफ सीबीआई या पुलिस कार्रवाई करती है तो ये मठाधीश आरोपी को बिल्कुल झूठा साबित करने की होड़ करते हैं पुलिस और सीबीआई को सत्यवादी मान उसका स्तुति गान करते हैं।जैसा कि पत्रकार इफ्तिखार गिलानी के मामले में नीता शर्मा और दीपक चौरसिया ने भी किया था। अब यही बात बाबू मोशाय पर भी तो लागू होनी चाहिए। कहावत है कि अपने लगी तो हित में और दूसरे के लगे तो भित (दीवार ) में। मतलब अपने लगे तो दर्द होता​ हैं।

सीधी सी बात है सीबीआई ने धोखाधड़ी और आपराधिक साज़िश का मामला दर्ज किया है और अभी तो जांच चल ही रही। जांच के बाद मामला कोर्ट में जाएगा वहां साफ़ हो ही जाएगा कि सच क्या है। जांच में दखल तो​ कोर्ट भी नही देता। प्रणय से तो बढ़िया नेता हैं जो जेल जाने के बाद भी कह देते हैं कि न्यायालय पर उनको पूरा भरोसा है। शायद बाबू मोशाय को नहीं है या वह खुद अपनी असलियत तो जानते ही है । इसीलिए अपने निजी आपराधिक मामले को मीडिया पर हमला बनाने की कोशिश कर रहे हैं। बाबू मोशाय खुद सामने आने की बजाय अपने जैसों को आगे कर रहे हैं।

बाबू मोशाय कोई गिलानी जैसे कमजोर तो है नहीं कि हलवा समझ कर सरकार खा लेगी। यह तो बकायदा एक शक्तिशाली न्यूज​ मठ के मठाधीश है अरबपति हैं चिदंबरम जैसे नेता,नामी वकील दोस्त ​है। फिर भला पत्रकारों की संस्थाआें की मदद लेने की क्या जरूरत पड़ गई। इससे तो यही लगता है कि बाबू मोशाय को मालूम है इस केस में नहीं तो ईडी के केस में, या किसी अन्य में जेल यात्रा हो सकती हैं। इसलिए मीडिया बनाम सरकार बनाने के लिए एक ही थैली के चट्टे बट्टे मठाधीशों की गिरोह बंदी करने की कोशिश में है। हालांकि एकजुट होने की संभावना कम है क्योंकि सब मठ भले न्यूज सम्प्रदाय के हो लेकिन किसी की आस्था कांग्रेस महामंडलेश्वर में तो किसी की भाजपा भजन में है तो कोई जगत गुरु अंबानी अखाड़े का हैं। यही वजह है कि मठाधीशों का कुछ नहीं बिगड़ता। लेकिन​ कहते हैं कि देेर हैं अंधेेर नहीं। इसलिए जो ईमानदारी से पत्रकारिता कर रहे हैं वह सावधानी बरतें और अपने कंंधे का इस्तेमाल​ इन मठाधीशों को न करने दें। सिर्फ खाटू के श्याम बाबा की तरह साक्षी भाव से युद्ध देखें। ईमानदार पत्रकारों के संकट के समय में ये मठाधीश भी ऐसा ही करते रहे हैं। बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना न बने।

क्या मीडिया की इन संस्थाओं​ ने अपने बीच से इन गंदी मच्छलियों को बाहर करने के लिए कभी कुछ किया है।अगर किया होता तो आज पत्रकारिता का पूरा तालाब गंदा नहीं माना जाता। अब बात साहेब की उनकी साख से ज्यादा सीबीआई की साख दांव पर है।कोर्ट पिंजरे का तोता कह चुका है। मोदी अगर ईमानदार है तो उन सब मठाधीशों पर कार्रवाई करके दिखाए जिन पर CBI ED Policeमें केस दर्ज है। अगर कार्रवाई नहीं की गई तो यह साफ़ हो जाएगा कि कार्रवाई करने की धमकी भरी तलवार लटका कर मीडिया को भोंपू बनाने की नीयत हैं। ED ने 2030 करोड़ के फेमा मामले में प्रणय रॉय को दो साल पहले नोटिस दिया था उसमें आगे क्या कार्रवाई हुई इसका खुलासा करके सरकार सच सामने रखें।

1998 में सीबीआई ने दूरदर्शन को चूना लगाने का जो केस दर्ज किया था उसका भी खुलासा सरकार करें। वैसे तो यह साफ-साफ आपराधिक मामला है जिसे प्रणय मीडिया से जबरन जोड़ रहा है। सभी पत्रकारों को गोदी पत्रकार कहने वाले बाबू मोशाय तो अभी तक गोदी में ही है पता नहीं गोद से उतर कर चलना कब सीखेंगे। बाबू मोशाय की बात ही मान लें कि मोदी बदला ले रहा है तो स्वाभाविक है कि बदला वहीं लेगा जिसके साथ अन्याय हुआ हो। यह तो उस समय सोचना चाहिए था बाबू मोशाय जब मठ के चेले चेलियों राजदीप सरदेसाई,बरखा समेत गुजरात दंगों में पत्रकारिता के नाम पर तमाशा किया। इशरत जहां एनकाउंटर केस में इसी सीबीआई को सत्य वादी हरीश चंद्र मान कर मोदी को फांसी चढ़ाना चाहा। बाबू मोशाय बैंक से लेन देन तो तुमने किया, तुम पर बैंक को 48 करोड़ रुपए का नुकसान पहुंचाने का आरोप न होता तो भला मोदी कैसे बदला ले सकता था।

अपने अपराध के लिए दूसरे को दोषी मत ठहराओ। बाबू मोशाय तुमने जो बोया वही काटना है। तुम भूल गए जिनके घर शीशे के होते हैं उनको दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकने चाहिए। मनुष्य बलि ना होत है होत समय बलवान भीलन लूटी गोपियां वहीं अर्जुन वहीं बाण।। ईमानदार पत्रकारों उम्मीद है कि मठाधीशों के पाप के घड़े भरने शुरू हो गए।बस फूटने का इंतजार करे। उम्मीद है कि आने वाले समय में पत्रकारिता की पवित्रता और इज्जत दोबारा कायम होगी। अब तो सुब्रत रॉय सहारा ,तरूण तेजपाल, सुधीर, सुभाष चंद्र भी प्रेस क्लब और एडीटर गिल्ड से समर्थन मांगने के हकदार हो गए।वैसे सुब्रत रॉय सहारा को तो ऐसे मठाधीशों के कल्याण के लिए अपना ही क्लब और गिल्ड बना लेना चाहिए।

इंद्र वशिष्ठ
पूर्व क्राइम रिपोर्टर सांध्य टाइम्स (टाइम्स ग्रुप))
पूर्व विशेष संवाददाता दैनिक भास्कर।
9868270534
indervashisth@gmail.com

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देश के सभी बड़े न्यूज चैनलों में अंबानी का पैसा लगा है!

Pushya Mitra : एनडीटीवी वाले मामले से और कुछ हुआ हो या न हो, मगर यह जरूर पता चल गया कि देश के टॉप टेन चैनलों में से शायद ही कोई बचा हो जिसमें अम्बानी का ठीक ठाक पैसा न लगा हो (NDTV में भी प्रणव-राधिका के तमाम शेयर अंबानी के पास गिरवी हैं)। इस हिसाब से राष्ट्रवादी हो, बहुराष्ट्रवादी हो या साम्यवादी हो। तकरीबन हर न्यूज़ चैनल अंततः अम्बानी न्यूज़ ही है। फर्क सिर्फ इतना है कि कोई चीख कर बातें करता है तो कोई मृदुल स्वर में। कोई राष्ट्रवादियों को शेयरिंग कंटेंट उपलब्ध कराता है तो कोई उदारवादियों को।

इस लिहाज से अखबार अभी बचे हुए हैं। दो चार बड़े अखबार ही होंगे जिनमें अम्बानी का पैसा लगा होगा। बाकी अंबानी के विज्ञापन के लिए ही मुंह जोहते रहते हैं। अखबार वाले विज्ञापन पर बिकते हैं, जबकि tv वाले परमानेंटली बिके हुए हैं, किसी रोज अंबानी इन पर कब्जा कर सकता है। अगर विज्ञापन न मिले तो अखबार वाले किसी भी रोज राजस्थान पत्रिका की तरह सीना तानकर खड़े हो सकते हैं। मगर tv वालों को छापे के दिन का इंतजार करना पड़ता है। और हां, ये सरकार के खिलाफ तो खड़े हो सकते हैं मगर अंबानी के खिलाफ खड़ा होना मुश्किल होता है। रस्मी खबरें चला देना अलग बात है।

हां, बीबीसी और स्क्रॉल डॉट इन की बात अलग है। इन दो मीडिया हाउस को आमदनी से कोई लेना देना नहीं है। इन्हें सिर्फ खर्च करना है। और खर्च करने के लिये इनके पास इफरात पैसा है। लिहाजा इनको न अम्बानी की गरज है और न ही davp-prda की। क्रांति करने के लिए ऐसी आदर्श स्थिति तो चाहिए ही होती है। बीबीसी का पैसा कहां से आता है, यह तो मालूम है। बस स्क्रॉल का सोर्स ऑफ इनकम नहीं मालूम। लगता है कोई जादुई चिराग है इनके पास।

प्रभात खबर अखबार में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पुष्य मित्र के उपरोक्त एफबी स्टटेस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Alok Kumar द वायर भी

Pushya Mitra वायर वाले तो कहते हैं, चार दोस्तों ने 1-1 लाख मिलाकर शुरू किया था।

Alok Kumar विप्रो का पैसा लगा है.. अजीम जी समेत कई घरानों ने मीडिया के लिए खास तौर पर फंड जेनरेट किए हैं.. स्टार्ट अप स्कीम के तहत भी कुछ घराने पैसा दे रहे हैं.. आइडिया दीजिए पैसा लीजिए.. खोलिए दुकान..

Pushya Mitra और स्क्रॉल में?

Arvind Das The wire को IPSMF ने फंड किया है औरों ने भी किया है…हेल्थ बीट वगैरह के लिए वे हेल्थ सेक्टर से जुड़े संस्थानों से भी सहयोग लेते हैं…यहाँ देखिएगा…http://ipsmf.org/ एनडीटीवी में अंबानी का पैसा लगा है, यह तो पुरानी ख़बर है. Caravan ने इस पर कवर स्टोरी की थी: http://www.caravanmagazine.in/reportage/the-tempest-prannoy-radhika-roy-ndtv

Pushya Mitra आपको सोर्स मालूम है क्या अरविंद जी? कैसे कोई पोर्टल लाखों की सैलरी बांटता है और विज्ञापन नहीं लेता है। Ipsfm की आमदनी का स्रोत क्या है?

Arvind Das जाहिर है, केवल विज्ञापन से तो अखबार भी नहीं चलता. छोटे-मोटे वेबसाइट के बारे में पता नहीं, हो सकता है राजनीतिक पार्टियों का सहयोग हो, चिट फंड कंपनियों का सहयोग हो, ब्लिडरों का सहयोग हो…लेकिन वायर या स्क्रॉल या क्विंट या कैच के बारे में जानकारी पाना मुश्किल नहीं…

Arvind Das IPSFM के वेबसाइट पर donor की पूरी लिस्ट लगी है: DONORS.. The Foundation has received donations from the following (names in alphabetical order): The Foundation has received donations and significant commitments of donations from over a dozen individuals and charitable organizations. Donors wish to have no say in funding decisions taken by the Foundation, and have entrusted the Trustees to run the IPS Media Foundation as an independent entity with the help of an operating team.
1. Mr. Aamir Khan
2. Azim Premji Philanthropic Initiatives Private Limited
3. Mr. Cyrus Guzder
4. Ms. Kiran Mazumdar-Shaw
5. Lal Family Foundation
6. Manipal Education and Medical Group India Pvt Ltd
7. Piramal Enterprises Limited
8. Pirojsha Godrej Foundation
9. Quality Investment Pvt. Ltd.
10. Ms. Rohini Nilekani
11. Rohinton and Anu Aga Family Discretionary No. 2 Trust
12. Sri Nataraja Trust
13. Tejaskiran Pharmachem Ind. P. Ltd.
14. Unimed Technologies Ltd.
15. Viditi Investment Pvt. Ltd.

Pushya Mitra स्क्रॉल के बारे में मैं सचमुच जानना चाहता हूँ।

Arvind Das मैंने भी कभी गौर नहीं किया, कोशिश करता हूँ या आलोक जी बताए मेहनत से बच जाऊँगा

Pushya Mitra यह फार्मूला अच्छा है। वैसे क्या ये लोग कंटेंट पर भी कंट्रोल करते हैं?

Arvind Das पता नहीं, पर कुछ ना कुछ तो इनका say रहता ही होगा…ज्यादा कंट्रोल नहीं करते होंगे, ऐसा मुझे लगता है…

Arvind Das In India, Omidyar has invested in Scroll.in and Newslaundry.com. Madhukar admits that he’s often asked why Omidyar invested in a left-of-centre media product, Scroll.in. “When we invested in Scroll, it was just an idea. All we were promised was a compelling editorial product. We have also invested in Newslaundry and don’t know where to place it really. The genesis of our investment is agnostic of ideology,” he says. ये देखिएगा… http://www.livemint.com/Opinion/CUrOd5ytWmYd3qREoDqgdK/The-ideology-behind-media-investments.html

Diwakar Ghosh Share Ambani k pass girbi hai ka kya saboot hai aap k pass ?koi documents ho to bataeye ,nahi to mana jayega ki aap bhi …,

Pushya Mitra अरे सर। इंडियन एक्सप्रेस में खबर छपी है, पढ़ लीजिये। बांकी मानने को तो जो मानना है मान सकते हैं। आप सर्च कीजिये। मिल जाएगा। नहीं तो मेरे पुराने पोस्ट पर लिंक है। सोर्स ऑफ इनफार्मेशन सीमित नहीं रखिये।

Vikas Kushwaha Kha se aata hai bbc ka paisa??

Pushya Mitra ब्रिटेन की सरकार से। यह तो वहां के विदेश मंत्रालय का उपक्रम है।

अभिषेक मिश्रा राजस्थान पत्रिका तो राजस्थान की मुख्यमंत्री की तस्वीर और नाम छापने से परहेज करता हैI

Pushya Mitra क्योंकि विज्ञापन बन्द हो गया था।

अभिषेक मिश्रा जी और सिलसिला आज भी जारी है, लेकिन जनता सब समझती है वहां की, लिहाजा संपादकीय नीति का विरोध भी कर रही हैI

नबीन चंद्रकला कुमार अम्बानी के पास गिरवी नही है कुछ शेअर अम्बानी के पास भी है । जिसने केस किया था उसके पास भी 1-2 % शेअर है । गिरवी आईसीआईसीआई के पास था

Pushya Mitra नवीन भाई। ठीक से पता कीजिये। अम्बानी ने 403 करोड़ का लोन इस शर्त पर दिया है कि 99.99 फीसदी शेयर गिरवी रहेंगे।

नबीन चंद्रकला कुमार अभी तक ऐसा कुछ फर्म नही आया है शगुफा चल रहा है । तरह तरह के न्युज आ रहे है ।

Pushya Mitra अगर आपका सोर्स सिर्फ Ndtv होगा तो सब शिगूफा लगेगा। कभी कभी इंडियन एक्सप्रेस भी पढ़ना चाहिये।

नबीन चंद्रकला कुमार ना भाई जी इंडियन एक्सप्रेस न्यु इंडियन एक्सप्रेस मय पढते है। एनडीटीवी की खबर हम इस मामले में खाली आईसीआईसीआई वाला लेटर पढे है और कुछ नहीं। चलिये इसपे भी क्लेरिफिकेसन जल्दिये आ जायेगा। सच बाहर होगा।

इसे भी पढ़ें….

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मैं रवीश कुमार, एनडीटीवी पर पेश है प्राइम टाइम, प्रायोजक हैं ‘पतंजलि’!

Samar Anarya : बस सनद रहे कि रवीश कुमार का आज का शानदार प्राइम टाइम भी पतंजलि प्रायोजित है! बोले तो लड़ाई बहुत मुश्किल है, बहुत बहुत मुश्किल। Gentle Reminder: Even today’s gallant Prime Time of Ravish Kumar is sponsored by Patanjali. The battle is going to be difficult, very very difficult.

Subhash Rai : रवीश कुमार कह रहे हैं कि कुछ को छोड़कर सभी पत्रकार डर गये हैं। मुझे लगता है, वे खुद डरे हुए हैं। अगर प्रणव राय ने कोई गलती नहीं की है तो सरकार या सीबीआई उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकती। उन्हें अपनी जांच करने दें, आप जो काम कर रहे थे, वो करें। आप अगर यह समझते हैं कि सारी जनता अंधे कुएं में चली गयी है और वह सच और झूठ में फर्क करना भूल गयी है तो आप गलती कर रहे हैं। किसी सच को कई झूठ बोलकर कोई नहीं दबा सकता। न सरकार, न प्रेस, न वे, न आप।

पत्रकार द्वय समर अनार्या और सुभाष राय की एफबी वॉल से.

इसे भी पढ़ें…

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एनडीटीवी पर छापे के पक्ष में पोस्ट और कमेंट लिखने वाले आदमी नहीं, पाजामा हैं!

Sheetal P Singh : वित्त मंत्रालय के अनुसार देश में करीब 5500 willful defaulters हैं जिन से बैंकों को करीब साठ हजार करोड़ रुपये वसूलने हैं। माल्या के अलावा। प्रणव राय के उपर यह राशि 43 करोड़ बताई गई है जिसे वे अदा कर चुके हैं सिर्फ़ ब्याज पर यह FIR दायर है। बाकी किसी पर होमगार्ड तक नहीं पहुंचा। क्या यह तथ्य जानने के बाद भी आप सीबीआई की रेड के लिए पक्ष में पोस्ट लिख सकते हैं, कमेन्ट कर सकते हैं? आप आदमी हैं कि पाजामा?

Prabhat Dabral : अब तो मानना ही पड़ेगा कि अकेला NDTV ही है जिसने कोई कानून तोडा, बाकी सारे चैनल और उनके मालिक दूध के धुले हैं- ज़ी न्यूज़ भी…कानून तोडा है तो छापा भी पड़ेगा मुक़द्दमा भी दर्ज़ होगा…कानून अपना काम करेगा, हमें उसपर कोई टिप्पणी नहीं करनी चाहिए….आप जो ये कह रहे हैं न कि सी बी आई और इनकम टैक्स विभाग सरकार के इशारे पर काम कर रहे हैं, कोरी बकवास है…तब आप कहाँ थे जब इंदिरा गाँधी वाली इमरजेंसी में आर एस एस के अख़बार मदरलैंड को बंद किया गया था, बाकियों के गैरकानूनी निर्माण को नज़रअंदाज़ करते हुए सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस के गैरकानूनी निर्माण को सील किया गया था…सरकार का विरोध करोगे और चाहोगे कि सरकारी विभाग आँखे बंद करे रहें ये कैसे हो सकता है… वही तो हो रहा है जो इंदिरा गाँधी ने इमरजेंसी में किया था, इसलिए चिल्लाओ मत…..अभी तो विरोध करने वाले पत्रकारों की गिरफ्तारी भी नहीं हुई है, अभी से बोखला गए, ये ठीक नहीं है…

Shambhunath Shukla : सीबीआई का प्रणब रॉय के ग्रेटर कैलाश-वन स्थित आवास पर छापा हो सकता है कि रूटीन कार्रवाई के तहत हुआ हो पर यह समय गलत है। दो दिन पहले ही सत्तारूढ़ दल भाजपा के प्रवक्त संबित पात्रा को एनडीटीवी की एंकर निधि राजदान ने अपने शो से चले जाने को कहा था तब यह शुबहा होना लाजिमी है कि सरकार ने बदले की कार्रवाई के तहत यह छापा पड़वाया। मालूम हो कि श्री प्रणब रॉय एनडीटीवी के मालिक हैं। अगर श्री प्रणब रॉय और उनकी पत्नी राधिका रॉय पर आईसीआईसीआई बैंक के साथ किए गए एक करार के तहत यह छापा डाला गया तो भी इसे फिलहाल टाला जा सकता था। सरकार और सरकारी एजेंसियों को ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिससे पब्लिक में यह मेसेज जाए कि सरकार बदला ले रही है।

Jaishankar Gupta : एनडीटीवी के संस्थापक-संचालक प्रणय राय के यहां सीबीआई का छापा निंदनीय है। इसकी टाइमिंग के मद्देनजर यह बदले की कार्रवाई भी लग सकती है। कानून और जांच एजेंसियों को अपना काम स्वतंत्रता, निष्पक्षता और बिना किसी दबाव और भेदभाव के पूरा करना चाहिए। अगर एनडीटीवी और इसके मालिकान ने कुछ गलत किया है तो उसे सामने लाकर उन पर कार्रवाई की जा सकती है लेकिन हाल के घटनाक्रमों की पृष्ठभूमि को सामने रखकर देखें तो कुछ और ही लगता है। हमारी जांच एजेंसियों को असहमति की आवाज दबाने में टूल कतई नहीं बनना चाहिए।

Ankur Tiwary : कुछ दिन पहले NDTV पर कुतर्क कर रहे बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा को निधि राजदान ने स्टूडियो से भगाया था और आज एनडीटीवी के मालिक पर सीबीआई की रेड पड़ गई है। उफ्फ, सीबीआई जैसी एजेंसियों का इतना दुरुपयोग तो शायद ही किसी केंद्र सरकार ने किया होगा, जितना इस समय सरकार कर रही है। 3 साल से अधिक हो जाने पर यह बात तो तय हो गई है कि यदि कोई भी मोदी सरकार के कामकाज पर सवाल उठाने की हिमाकत करेगा तो उसे सीबीआई, आईटी जैसी एजेंसियों का डर दिखाकर मुंह पर लगाम लगाने की कोशिश की जाएगी। शर्मनाक।

Anil Singh : सत्य की परंपरा ही जीतेगी, झूठ हारेगा. रवीश ने ठीक कहा कि एनडीटीवी एक दिन में नहीं बना। जिस तरह वो सच दिखाने की राह पर चल रहा है, उसके पीछे सत्य के लिए लड़ने की हज़ारों सालों की भारतीय परंपरा है। वहीं, सत्ता झूठ का सहारा ले रही है, प्रसारण मंत्री वेंकैया नायडू कुछ न जानने का स्वांग रच रहे हैं, जो ऋण चुकाया जा चुका है, उसे बकाया बताकर सीबीआई से छापे मरवा रहे हैं। इसलिए तय मानिए कि अंततः झूठ की हार और सत्य की जीत निश्चित है। सत्यमेव जयते।

सौजन्य : फेसबुक

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Dayanand Pandey : एनडीटीवी पर आयकर और सीबीआई के संयुक्त छापे पर बहुत हाहाकार मचा हुआ है। यह व्यर्थ का हाहाकार है। जैसे सभी मीडिया घराने चोर और डाकू हैं, काले धन की गोद में बैठे हुए हैं, एनडीटीवी भी उनसे अलग नहीं है। एनडीटीवी भी चोर और डाकू है, अपने कर्मचारियों का शोषण करता है, क़ानून से खेलता है, काले धन की गोद में बैठा हुआ है। वह सारा कमीनापन करता है जो अन्य मीडिया घराने करते हैं। एनडीटीवी में चिदंबरम का ही काला धन नहीं बल्कि पोंटी चड्ढा जैसे तमाम लोगों का भी काला धन लगा है। सरकार से टकराना भी एनडीटीवी की गिरोहबंदी का हिस्सा है, सरोकार का नहीं। सरकार से टकराने के लिए रामनाथ गोयनका का डीएनए चाहिए जो आज की तारीख में किसी एक में नहीं है। अलग बात है कि आखिरी समय में व्यावसायिक मजबूरियों में घिर कर रामनाथ गोयनका भी घुटने टेक कर समझौता परस्त हो गए थे। इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप की धार रामनाथ गोयनका के जीवित रहते ही कुंद हो गई थी। अब तो वह धार भी समाप्त है।

कोई भी व्यावसायिक मीडिया बिना चोरी, छिछोरी, काला धन और कमीनेपन के नहीं चल सकता। एनडीटीवी भी नहीं। विरोध भी व्यवसाय का हिस्सा है। कोई भी व्यावसायिक घराना निष्पक्ष अखबार या चैनल नहीं चला सकता। निष्पक्ष होने के लिए काले धन और व्यवसाय से विरक्त होना पड़ेगा। नेहरु ने इस खतरे को समझ लिया था और कहा था कि अखबार को कोआपरेटिव सोसाईटी या ट्रस्ट के तहत ही चलाया जाना चाहिए। नेशनल हेरल्ड, नवजीवन, कौमी आवाज़ का प्रयोग भी उन्होंने किया था। जो मिस मैनेजमेंट और मीडिया घरानों के आगे दम तोड़ गया। हिंदू और ट्रिब्यून जैसे अखबार आज भी ट्रस्ट के तहत प्रकाशित होते हैं तो वहां कुछ खबर के सरोकार शेष हैं, कर्मचारियों के शोषण में कुछ अतिरेक नहीं है। अकबर इलाहाबादी याद आते हैं:
तीर निकालो न तलवार निकालो,
जब तोप मुकाबिल हो तो अख़बार निकालो
तो एनडीटीवी न तीर है, न तलवार, न तोप। किसी गैंग की तरह एकपक्षीय और लाऊड खबर की तलब में डूबा, सत्ता विरोध के खबर की आड़ में काले धन की खेती करता है एनडीटीवी भी। मनी लांड्रिंग और फेरा जैसे आरोपों में घिरा है। टू जी स्पेक्ट्रम, कोयला घोटाले में गले तक हिस्सेदार है। सिर्फ़ साफ सुथरी, हिप्पोक्रेसी भरी बातें करने से, सेक्यूलरिज्म का ताश फेंटने से, सत्ता विरोध की नकली हुंकार से ही कोई साफ सुथरा नहीं हो जाता। एनडीटीवी के सत्ता विरोध का एक हिस्सा और जान लीजिए कि वित्त मंत्री अरुण जेटली भी इस के सरपरस्तों में से एक हैं। वाम नेता वृंदा करात प्रणव रॉय की बीवी राधिका रॉय की बहन हैं। राजदीप सरदेसाई, बरखा दत्त आदि की दलाली की दुकान एनडीटीवी से ही तो संचालित होती थी कांग्रेस राज में। आप लोग इतनी जल्दी भूल गए? आदि-इत्यादि बहुत से किस्से हैं। फिर कभी।

अभी बस इतना ही जानिए कि सभी मीडिया घरानों की तरह एनडीटीवी भी पाप और भ्रष्टाचार का घड़ा है, काले धन के कारोबार पर टिका है। सो इस के पक्ष में अपनी भावना और ऊर्जा व्यर्थ में नष्ट करने से बचें। जो हो रहा है, होने दें। इसलिए भी कि यह मोदी विरोध की कीमत नहीं है, काले करतूत की कीमत है। इसका ही तकाज़ा है। बस इतना समझ लीजिए कि मीडिया होने की ताकत में एनडीटीवी का बहुत कुछ सड़ा हुआ सामने आने से बचा हुआ है। मोदी सरकार में हिम्मत नहीं है। हिम्मत होती तो प्रणव रॉय अपनी दाढ़ी के बाल नोचते हुए तिहाड़ की रोटी तोड़ रहे होते।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से.

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भड़ास के यशवंत ने एनडीटीवी छापे पर क्या लिखा, ये पढ़ें

Yashwant Singh : हां ठीक है कि ये लोकतंत्र पर हमला है, अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रहार है, मीडिया का गला घोंटने की कोशिश है.. लेकिन पार्टनर ये भी तो बता दीजिए कि जो आरोप लगे हैं आईसीआईसीआई बैंक के 48 करोड़ रुपये के फ्राड करने का, उस पर आपका क्या मत है.

ये भी तो बता दीजिए कि आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव ने चिदंबरम और प्रणय राय द्वारा मिल जुल कर 2जी स्कैम के पैसे के गोलमाल का जो खुलासा किया, उस पर आपका स्टैंड क्या है.

मुझे भी आपसे प्यार था. मैं भी भाजपा विरोधी रहा हूं और हूं. लेकिन आप जो कामरेड होने के नाम पर पैसों का गबन कर रहे हैं, स्कैम में सहयोगी बन रहे हैं, उसका कैसे समर्थन कर सकता हूं.

हां ये सही है कि जी न्यूज वाले चोर हैं, रजत शर्मा भाजपाई है, ऐसे ही अन्य भी जो हैं, वो सब आपके विरोधी हैं, लेकिन आप अपने ब्रांड के नाम पर जो घपले-घोटाले किए हैं और किए जा रहे हैं, उस पर आपको खुल कर सफाई देनी चाहिए, लेकिन आपने ऐसा नहीं किया, क्यों?

चिदंबरम और उनके बेटे के यहां जब इनकम टैक्स का छापा पड़ा था, तभी मुझे पता चल गया कि अब आपकी बारी है. पर आपने तब भी अपना स्टैंड क्लीयर नहीं किया, आपने आईसीआईसीआई बैंक के साथ किए गए फ्राड घोटाले के बारे में अपनी साइट या अपने चैनल पर कुछ नहीं लिखा दिखाया.

दुनिया को पारदर्शिता और लोकतंत्र सिखाने वाले प्रणय राय एंड कंपनी, आप लोग खुद को सरकार विरोधी होने का लाभ भले ले लो, जो कि लेना भी चाहिए, यही राजनीति है, यही तरीका है आजकल का, लेकिन सच यह है कि आपसे हम लोग यानि खासकर भड़ास वाले जमाने से पूछ रहे हैं कि जो काला धन सफेद किया है, तत्कालीन मनमोहन सरकार के मंत्री चिदंबरम के साथ मिलकर, जो आरोप आप पर आईआरएस अधिकरी संजय श्रीवास्तव ने लगाए, जो नोटिस तमाम सरकारी एजेंसीज ने समय समय पर आपको भेजी, उस पर आपकी सफाई क्या है?

एनडीटीवी और प्रणय राय के ऐसे तमाम फ्राड को लेकर आपने अपने यहां कुछ नहीं लिखा और न दिखाया, केवल गोलमोल सफाई देते रहे, जैसे आज दिया है. आपने इन मुद्दों पर अपने चैनल पर प्राइम टाइम डिबेट में न तो निधि राजदान को आगे किया और न रवीश कुमार को. ये लोग दुनिया भर के ढेर सारे मुद्दों पर बहस करते रहे, केवल एनडीटीवी-प्रणय राय के फ्राड को छोड़कर. आपको इन मुद्दों पर भी खुलकर लिखना दिखाना चाहिए था क्योंकि मीडिया तो सबकी और अपनी भी आलोचना करने के लिए जाना माना जाता है. पर आप ऐसा नहीं करेंगे न करने वाले हैं क्योंकि आप एड़ा बनकर पेड़ा खा रहे थे.

आप विचारधारा और पार्टीबाजी के आधार पर खुद को शहीद दिखाकर लाभ लेना चाह रहे थे और ले रहे हैं और लेंगे भी.

पर हम जैसे लोग जो मीडिया को बहुत नजदीक से देख रहे हैं, और जानते हैं कि यहां सिर्फ और सिर्फ लूट और कालाबाजारी है, सरोकार विचार संवेदना जैसी बातें सिर्फ दिखाने कहने वाली चीजें होती हैं, वो ये ठीक से समझते मानते हैं कि आप को ही नहीं, बल्कि इस समय के सारे कथित मुख्य धारा और संपूर्ण कारपोरेट मीडिया के मालिकों को सरेआम सूली पर चढ़ा देना चाहिए. वजह ये कि असल जीवन में आप सब लोग उतने ही बड़े चोट्टे हैं, जितने किसी दूसरे फील्ड के चोट्टे. आप थोड़े कम ज्यादा चोट्टे हो सकते हैं और लेकिन हैं चोट्टे ही.

आपको यह जानना चाहिए कि जिस लोकतंत्र की दुहाई देकर आप बार बार अपना बचाव कर रहे हैं, उसी लोकतंत्र ने जिन्हें चुनकर भेजा है, वो आपसे अपना हिसाब ले रहे हैं, लेकिन उन्हीं चीजों का, जो आपने गलत किया है और उनके हाथों में एक्शन लेने के लिए सौंप दिया है. ये घपले घोटाले आजकल के नहीं, बरसों पुराने है. आपने इन्हें साधने, पटाने की भी कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो पाए. आपकी ढेर सारी फाइलें पीएमओ में पड़ी हैं जो आपकी काली कहानी बांय बांय करके बता रही हैं.

जो आपने काला किया है, जो आपने फ्राड किया है, वो आपका ही है. ऐसे लोग भुगतते तो जरूर हैं, कोई देर तो कोई सबेर. कोई इस सरकार के आने पर तो कोई उस सरकार के आने पर. अब तो घपले घोटाले भी पार्टियां के संरक्षण में होता है इसलिए पार्टियां बदलते ही घपले घोटालेबाजों के चेहरे भी बदलने लगते हैं.

मेरी संवेदना आपके साथ है क्योंकि आप फिलहाल पीड़ित हैं और हम लोग पीड़ितों के साथ रहते हैं, भले ही वो चोर हो. लेकिन आप पर अत्याचार के खिलाफ जो मोर्चा निकलेगा, उसमें मैं कतई शरीक नहीं हूंगा. मेरी सदिच्छा आपके साथ कतई नहीं है क्योंकि आपके फ्राड हैं. मीडिया के चोरों को मैं नजदीक से जानता हूं, इसलिए आपके साथ तो कतई नहीं खड़ा रहूंगा.

माफ करिएगा, बड़े लोग, खासकर मीडिया के, अपनी चोरी और फ्राड को बड़े आराम से वैचारिक ताने बाने के जरिए ढंक तोप लेते हैं. मैं ऐसे लोगों को अब कतई सपोर्ट नहीं करता. मुझे न तो आपका साथ चाहिए और न आपके लोगों का. हां, ये भी जानता हूं कि आप आत्ममुग्ध लोग पीड़ित पत्रकारों का न कभी साथ दिए न देंगे. खुद आपके यहां के दर्जनों लोग बिना वजह निकाले गए और प्रताड़ित जीवन जीने को मजबूर किए गए. आप अपनी समृ्द्धि, संबंध और साम्राज्य में मस्त रहे. इसलिए आपको एक्सपोज होते हुए देखकर, आप पर एक्शन होते हुए देखकर, मुझे दिल से आनंद आ रहा है.

ऐसे दौर में जब राजनीति पूरी तरह भ्रष्टतम हो गई है, ऐसे दौर में जब राजनीति सिर्फ अपनी जनता का खून पीने का माध्यम बन गई है, मैं किसी को नहीं कहूंगा कि वह राजनीति या मीडिया जनित उत्तेजना का हिस्सा बने, किसी मोर्चे या मार्च का हिस्सा बने. ये सब आपका टाइम और धन वेस्ट करने का तरीका है.

फिलहाल तो आज का दिन मेरे लिए चीयर्स वाला है… आपके यहां छापा पड़ा, चाहें जिस बहाने से भी, मुझे सुकून पहुंचा है. मुझे खुशी है कि आज आईआरएस अफसर एसके श्रीवास्तव भी खुश होंगे जिन्हें आप लोगों ने पागलखाने भिजवाकर अपने फ्राड चोट्टई को ढंकने की कोशिश की थी.

भड़ास के आठवें स्थापना दिवस पर जब आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव ने एनडीटीवी के प्रणय राय और तत्कालीन वित्त व गृह मंत्री चिदंबरम द्वारा अपने घोटाले चोरकटई को ढंकने के लिए उन्हें जेल भिजवाने की कथा सुनाई तो मेरी ही नहीं, वहां मौजूद सारे लोगों के रोएं खड़े हो गए और एक झुरझुरी तैर गई शरीर में.

ये दौर मान्य संस्थाओं को नष्ट किए जाने का है, तो आपको भी नष्ट होना है क्योंकि आप महा चोरकट लोग हो. हां, सुपर चोरकटों से कुछ कम, कुछ बाएं, कुछ नीचे. तो आप लोग अपनी लड़ाई लड़ें. आपका अंजाम देखना मुझे अच्छा लगेगा.

चीयर्स.
यशवंत

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