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सुख-दुख

अमिताभ बच्चन जिस स्कूल से पढ़े हैं, देखिए वो कैसे अभिभावकों को लूट रहा है!

एसके यादव-

एक दो नहीं पूरे के पूरे आधा दर्जन बाउंसर, हट्टे कट्टे पहलवान, काली चुस्त टी-शर्ट में गठीला कसरती शरीर, भुजायें जैसे टी-शर्ट की आस्तीन को फाड़ देने को आतुर। कुछ के हाथ में डंडे तो कुछ के हाथ में राइफल भी है।

यह किसी बॉडीबिल्डिंग शो का विवरण नहीं है और ना ही किसी अरबपति सेलिब्रिटी की सुरक्षा व्यवस्था का बखान!

नर्सरी से लेकर इंटर तक के बच्चों और उनके अभिभावकों के (स्वागत में खड़े कहना ठीक नहीं होगा) उनको डराने और आतंकित करने के लिए यह बाउंसर एक बुक शॉप की सुरक्षा में लगाए गए हैं।

नई सरकार को शपथ लिए अभी हफ्ता भर भी नहीं बीता था इधर मार्च महीना खत्म होते होते प्राइवेट स्कूलों की लूट और कमीशन खोरी का धंधा चालू हो गया। क्योंकि स्कूल परिसर में अब दुकान खोलकर पाठ्य सामग्री बेचने पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है, तो उससे बचने का भी हर साल कोई ना कोई नायाब तरीका निकाला जा रहा है। इस बार तो बाकायदा इलाहाबाद के एक बड़े प्राइवेट मिशनरी स्कूल के गेट के ठीक सामने किसी कारपोरेट हाउस की तरह एक बड़े कार शोरूम के बगल में नई बुक शॉप खुल गई है। ग्राहकों के स्वागत में रेड कारपेट बिछा है, हालांकि इन सब खर्चों की वसूली अभिभावकों के जेब से ही होनी है।

सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने जिस विद्यालय से शिक्षा ग्रहण की हो, उसका हाल अब यह है कि रिपोर्ट कार्ड डे के दिन रिपोर्ट कार्ड के ऊपर बाकायदा इस बुक शॉप का विजिटिंग कार्ड रखकर क्लास रूम से ही टीचर द्वारा थमा दिया गया है। पूछने पर कि किताबों की लिस्ट मिलेगी क्या?

उत्तर मिला नहीं और बुक शॉप के विजिटिंग कार्ड की तरफ इशारा कर दिया गया।

स्कूल गेट के बाहर बुक शॉप के आधा दर्जन कारिंदे हर निकलने वाले अभिभावकों को सामने स्थित उसी दुकान की तरफ इशारा कर पाठ्य सामग्री खरीदने के लिए इंगित कर रहे हैं। सड़क पार कर जब बच्चे के साथ अभिभावक उस बुक शॉप पर पहुंचते हैं तो आतंक का पर्याय बने बाउंसरों से पहले सामना होता है।

शॉप के अंदर जाने पर सुंदर सी महिला ने हाथ जोड़कर स्वागत किया। मैंने कहा आप तो इतने अच्छे से मुस्कुरा कर स्वागत कर रही हैं, लेकिन बाहर तो काली ड्रेस में खड़े आपके पहलवानों को देखकर डर लग रहा है। वह मुस्कुराईं और झट से विषयांतर करते हुए पूछा कौन सी क्लास है, क्लास का नाम सुनने के बाद उन्होंने पहले से पैक किया रखा बंडल आगे बढ़ा दिया। मैंने कहा क्या मैं इसमें से अपनी पसंद की कुछ किताबें नहीं ले सकता? मुझे पता था उनका जवाब ना में होगा. कहा गया अभी पूरा बंडल मिलेगा। फुटकर सामान लेने के लिए 15 दिन बाद बात कीजिए। आप समझ गए होंगे इतना पैसा खर्च करके आधा दर्जन पहलवान नुमा बाउंसर ड्यूटी पर किस लिए लगाए गए हैं!

विजिटिंग कार्ड पर और दुकान के बाहर लगे बड़े से फ्लेक्स बैनर पर भी इस बात पर ज्यादा जोर है ” फुल सेट आफ स्कूल बुक्स”!

उधर नई सरकार ने तेल पानी कर अपने बुलडोजर तैयार कर लिए हैं, क्या आपको नहीं लगता कुछ बुलडोजरों की दिशा इस तरफ भी घुमाने की भी जरूरत है। वरना लोग तो यही कहेंगे इसमें सब की मिली भगत है?

( मोबाइल से खींची गई तस्वीरें उसी शॉप के रिसेप्शन की है, और अखबार की कटिंग आज की एक फेसबुक पोस्ट से।

पेट्रोल डीज़ल की तरह इन पर भी सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। अन्यथा सरकार तो कठोर कदम उठाने के लिए तैयार बैठी है, और अभिभावक तो इनके मायाजाल के इतने ग़ुलाम हो चुके हैं कि इनकी हर मनमानी को सर आँखों पर लेने के लिए विवश हैं। -समीरात्मज मिश्रा

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