यशवंत ने जमाने बाद दिल्ली में लखनऊ जिया! पढ़ें भाऊ के बुक लांच समारोह की रिपोर्ट

Yashwant Singh : ज़माने बाद दिल्ली में लखनऊ को जिया। भाऊ Raghvendra Dubey के बुक लांच आयोजन में इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में जो जुटान हुई, उसमें मुझे नखनऊ मिल गया। गुरुवर Anil Kumar Yadav, Ravindra Ojha, Suresh Bahadur Singh, खुद राघवेंद्र दुबे भाऊ संग जो मस्ती मटरगश्ती बतकही पियक्कड़ी लुहेड़ई हुई, उसने मुझे 20 साल पहले वाले दौर में पहुंचा दिया जब मैं पत्रकारिता का छोटा बच्चा हुआ करता था।

गुरुवर Shrikant Asthana , पंकज श्रीवास्तव, Abhishek Srivastava, रविशंकर, संजय सिंह, कुमार नरेंद्र सिंह, Atul Shankar Pandey समेत दर्जनों छोटे बड़े साथी मिले। हम गाए, बतियाए, ठहाके लगाए, चिल्लाए, सड़क तक सेल्फ़ियाये, महफ़िल लुट जाने के बाद भी दिल मांगे मोर की त्वरा में आयोजक भाऊ के पीछे लोमड़ियाये और भाऊ सदा की तरह सबको गोली देकर रात वाले अपने लक्षित लक्ष्य की ओर लम्बे लम्बे डग भरते हुए पोलो ले लिए!

चित्र में अपने गुरुवर अनिल यादव और रविन्द्र ओझा जी के साथ मैं!

कुछ लम्हें, कुछ तस्वीरें टाइम ट्रेवल कराते हुए धड़ाक से दस बीस साल पीछे ले जाती हैं!

भड़ास संपादक यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

Abhishek Srivastava : कल इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में राघवेंद्र दुबे ‘भाऊ’ के पुस्‍तक लोकार्पण कार्यक्रम के बहाने मोटामोटी यह तय पाया गया कि ‘दिल्‍ली’ की चौहद्दी पर किराये या ईएमआइ के मकानों में बसने वाला हिंदी का ‘बौद्धिक’ तबका भी राहुल गांधी की ताजपोशी का ख्‍वाहिशमंद है। इस मंच से राहुल गांधी की तारीफ में कल जितने कसीदे गढ़े गए, सुनते हुए मैं सोच रहा था कि राहुल वहां होते तो पता नहीं क्‍या प्रतिक्रिया देते। पुरुषोत्‍तम अग्रवाल, असग़र वजाहत तो मंच पर ही थे। जो नीचे थे वे भी कम अभिभूत नहीं थे। इसको साइकोफैंसी कहें या मजबूरी का दांव, तय कर पाना मुश्किल है।

कुछ लोगों का कहना था कि लेखक के बड़े संपर्क तंत्र के कारण इतनी भारी भीड़ जुटी। इंडिया इंटरनेशनल जैसी जगह पर हिंदी का एक तकरीबन संन्‍यस्‍त पत्रकार जिसने आजीवन उत्‍तर प्रदेश के अखबारों में काम किया हो, इतनी भीड़ कभी नहीं जुटा सकता। भीड़ आई तो उसके पीछे आयोजक-मेजबान डीपीटी का तंत्र रहा होगा या फिर राहुंल गांधी के नाम पर हिंदी की किताब का असर। पांच साल का मोदीराज इतना भारी पड़ रहा है कि पढ़े-लिखे लोगों की स्‍मृति घास चरने चली गई है। हाशिमपुरा से लेकर मंदिर का ताला खुलवाने और ग्रीनहंट चलाने जैसे तमाम कारनामे भुला दिए गए हैं। पांच साल के गोराष्‍ट्रवाद ने कांग्रेस को एक पवित्र गाय में तब्‍दील कर दिया है और शिवभक्‍त राहुल गांधी आधुनिक ऋषि बन गए हैं।

यह स्थिति ठीक नहीं है क्‍योंकि इसमें विकल्‍प की कोई गुंजाइश नहीं बचती। मोदी और राहुल के बीच की ज़मीन यहां गायब है। आरएसएस विपक्षमुक्‍त ‘एकल’ बना रहा है, तो आरएसएस विरोधी ‘बाइनरी’ गढ़ रहे हैं। कांग्रेस के राज में बहुवचनीयता का राग अलापने वाला हिंदी का पढ़ा-लिखा समाज अब राहुल गांधी की शख्सियत में बहुलतावाद की तलाश कर रहा है। हर आदमी खुद को राहुल का करीबी बताने को बेचैन है। क्‍या लेखक, क्‍या पत्रकार, क्‍या एक्टिविस्‍ट, क्‍या संस्‍कृतिकर्मी, क्‍या लिफाफिया, सब राहुल गांधी से वन-टु-वन हॉटलाइन पर हैं। सबको लग रहा है कि सुरंग के उस पार से रोशनी आ रही है। सुरंग ठसमठस है। अगर उधर से आ रही रोशनी किसी ट्रक की हेडलाइट निकली तब?

विश्लेषक अभिषेक श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

Raghvendra Dubey : ‘जैसे सांस देश की’ किताब के बारे में… जब लोकतांत्रिक मूल्य ताक पर रख कर, अनर्गल और आधारहीन सन्दर्भ ही कार्यनीतिक और रणनीतिक पहलू बनने लगें तो विपक्ष को बौद्धिक मजबूती और उसकी अपरिहार्यता के साथ प्रस्तुत करना भी पत्रकारीय दायित्व है। यह किताब विचार से व्यक्ति के उभार और टकराव दोनों ही फलक का आख्यान है।

वैसे भी किसी का विरोध अगर उसमें आंच है तो उसका कोई पक्ष भी स्वाभाविक ही है । इसीलिए पत्रकारीय तटस्थता और निष्पक्षता की चालाक आड़ लेकर , मुझसे वह कसीदाकारी तो नहीं हो सकती , जिसमें हर चेहरा संतुष्ट और चमकदार दिखे। इस किताब का संपादन वरिष्ठ पत्रकार पंडित रविशंकर तिवारी ने किया।

अनुग्रहीत और आभारी हूं अपने गुरु, राजनीतिक चिंतक, स्कॉलर डीपी त्रिपाठी का।

प्रो. अनिल कुमार उपाध्याय, देवेश देव, अनुभा उपाध्याय, शशिभूषण, सुविज्ञ दुबे जनेवि, मधुलिमा शेखर, बागीश धर द्विवेदी, शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी, धर्मेंद, मार्कंडेय मणि, राजशेखर, रेनू त्रिपाठी, पंकज श्रीवास्तव , दीपक कुमार राय , अनिल राय, अप्रतिम गद्यकार अनिल यादव, रवींद्र ओझा, अरशद जमाल, संजय तिवारी का ह्रदय से आभार। जीवन संगिनी आदरणीया मन्नू दुबे का कृतज्ञ तो हमेशा रहूंगा, जो मुझे आदमी बना सकीं। उन्हीं की वजह से आज भी मानवीय दुनिया का सपना जी रहा हूं।

This book is being launched at a time when the country is passing through very critical phase of It’s history . Every institution is being systematically attacked , humiliated and discarded to serve a particular political agenda . Fundamentalist forces have declared an all out war against all the pillars of parliamentary democracy . There is concerted effort laced with rumour mongering to declare democratic institutions as irrelevant . The situation is so grave that judiciary has to come in open to air it’s grievances, our apex investigating agency CBI’s reputation is at stake and the RBI’s autonomy is in danger . Media voice is being throttled . Government dissenters are being branded as urban naxals.

This book underlines the needs and urgencies of strong and united opposition to foil the government move to sideline democratic values and impose rule of majoritism over frightened linguistic religious minorities. The ruling class has many mouths to dictate it’s ahievement. Sycophant media and extra obedient civil servants are its main weapons.

This book is an honest attempt to analyse and evaluate opposition face Rahul Gandhi. It is pious duty of a dedicated journalist to give voice to the aspirations of teeming millions and get them acquainted with the true face of opposition.

किताब लेखक और आयोजक राघवेंद्र दुबे भाऊ की एफबी वॉल से.

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