गिन लो कितने रँगे सियार, पहुंचे रायपुर दरबार, भइया जी, स्माइल प्लीज़! (सन्दर्भ : रायपुर साहित्य महोत्सव)

Katyayani Lko : मनबहकी लाल बहुत दिनों बाद मिले। मैने कहा, ”कुछ सुनाइये।” वे चुप रहे। फिर जब मैंने भाजपा सरकार के रायपुर साहित्य महोत्‍सव में बहुतेरे सेक्युुलरों-प्रगतिशीलों की भागीदारी के बारे में उनकी प्रतिक्रिया जाननी चाही, तो उन्होंंने छूटते ही यह आशु कविता सुना डाली:

स्माइल प्लीज़!
(सन्दर्भ : रायपुर साहित्य महोत्सव)

चलो मिलाओ फिर सुर में सुर
नया रायपुर , नया रायपुर ।
सत्ता संग अब रास रचाओ
पोज़ मार फोटू खिंचवाओ । भइया जी , स्माइल प्लीज़ !

इधर न ताको , उधर न ताको
परदे के पीछे मत झाँको
नागड़धिन्ना ढोल बजा है
मंच सजा है, टंच मजा है। भइया जी, स्माइल प्लीज़ !

चलो, असहमति दर्ज कराओ
खूनी को जनतंत्र सिखाओ
कवि जी , कविता की धुन साधो
चिन्‍तक जी , तुम विचार पादो । भइया जी , स्माइल प्ली‍ज़ !

मंत्री आये , दाँत चियारो
उनकी महिमा धनि-धनि वारो
लाइन लगाओ , हाथ मिलाओ
सब मिलकर ‘जन-गण-मन’ गाओ । भइया जी , स्माइल प्लीज़ !

अक्कड़-बक्कड़ बम्बे बोल
अस्सी-नब्बे पूरे सौ
गिन लो कितने रँगे सियार
पहुंचे रायपुर दरबार । भइया जी, स्माइल प्लीज़ !

कहाँ चल रहा खूनी खेल
टॉर्चर, एनकाउण्टर, जेल
मिथ्या है, सब माया है
नया ज़माना आया है । भइया जी , स्मा‍इल प्ली‍ज़ !

बे लुच्चे , स्माइल प्लीज़ !
बे टुच्चे , स्माइल प्लीज़ !
बे नंगे , स्मा‍इल प्लीज़ !
अबे बेशरम , स्माइल प्लीज़ !
टुकड़खोर , स्माइल प्लीज़ !
कफ़नचोर , स्माइल प्लीज़ !

Abhishek Srivastava : जिन घटनाओं और कारणों को नज़रंदाज कर के हिंदी के कुछ लेखक और पत्रकार रायपुर साहित्‍य महोत्‍सव में मौजूद हैं, ठीक उन्‍हें ही गिनवाते हुए वरिष्‍ठ कवि विष्‍णु खरे इस आयोजन में बुलावे के बावजूद नहीं गए हैं। पत्रकार Awesh Tiwari ने विष्‍णु खरे की छत्‍तीसगढ़ सरकार को लिखी चिट्ठी अपने फेसबुक की दीवार पर सरकारी सूत्रों के हवाले से साझा की है। नपुंसकता और पस्‍तहिम्‍मती के इस दौर में यह चिट्ठी हम सब के लिए एक आईने की तरह हैं। इसे goo.gl/1ILfFq ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए।

Hareprakash Upadhyay : हिन्दी साहित्य की दुनिया में अच्छे दिनों की आहट। साहित्य अब मनोरंजन से ऊपर उठेगा और वह कार्निवाल, उत्सव, फेस्टिवल के लुत्फ उठाता हुआ बेबाक मानवीय चिंताओं को व्यक्त करेगा। वह रंगीन सोफों पर बैठकर महीन बातें करेगा। हिंदी का लेखक झोला-चप्पल और स्लीपर को त्यागकर उड़नखटोला पर उड़ेगा।

Shashi Bhooshan Dwivedi : रायपुर साहित्य महोत्सव हिन्दी लेखकों की “घर वापसी” का सरकारी आयोजन है. रायपुर साहित्य महोत्सव में लेखकों की जो कीमत लगी है उसका पता चल गया है-आने जाने का हवाई जहाज़ का किराया और २५ हज़ार रुपये. अब सिर्फ चाय पर होने वाली साहित्यिक गोष्ठियां नहीं होतीं। अब सिर्फ महोत्सव होते हैं। दिल्ली, लखनऊ, जयपुर, पटना, इलाहबाद, रायपुर, बनारस,बीकानेर कहीं देख लीजिये। इसका कुछ तो मतलब होगा। अगले साल गाँधीनगर में २ अक्तूबर को गाँधी दर्शन पर एक कार्यक्रम होना है जिसमे गाँधी दर्शन पर व्याख्यान और कविता पाठ भी होगा. उसमें प्रतिभागियों को ५१ हज़ार देने की बात तय हुई है. खबर पक्की है. उस कार्यक्रम के अंतिम दिन लेखकों को मोदी जी के साथ भोज भी करना होगा. देखना है उसमें कौन कौन अपनी कितनी कीमत लगाता है. वैसे सुना है कि रायपुर महोत्सव में कुछ लेखकों को ५-५ लाख भी मिले हैं.

कात्यायनी, अभिषेक, हरेप्रकाश और शशि भूषण के फेसबुक वॉल से.

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Comments on “गिन लो कितने रँगे सियार, पहुंचे रायपुर दरबार, भइया जी, स्माइल प्लीज़! (सन्दर्भ : रायपुर साहित्य महोत्सव)

  • Bhushan Sharma says:

    ‘रायपुर साहित्य महोत्सव’ वास्तव में रंगे सियारों का ही उत्सव है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है मध्यप्रदेश के महाभ्रष्ट जनसंपर्क अधिकारी सुरेश तिवारी की नकली साहित्यकार पत्नी (दूसरी) स्वाति तिवारी! जीवनभर मास्टरी करने वाली स्वाति तिवारी ने अपनी बहन की मौत के बाद जीजा से शादी की और कथित साहित्यकार बन गई। जबकि, वास्तव में स्वाति तिवारी को शुद्ध हिंदी का एक पन्ना तक लिखना नहीं आता! सुरेश तिवारी अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके पत्नी के लिए कुछ लोगों से घोस्ट राइटिंग करवाते हैं। जनसंपर्क विभाग से सरकारी विज्ञापन का लालच देकर पत्रिकाओं में स्वाति तिवारी की रचनाएँ छपवाते हैं। ‘रायपुर साहित्य महोत्सव’ में स्वाति तिवारी को आमंत्रण भी पति की सरकारी दखल से ही मिला है। अब, यदि ऐसे नकली साहित्यकार ‘रायपुर साहित्य महोत्सव’ में शिरकत करेंगे, तो कौन खुद्दार साहित्यकार अपना जमीर बेचकर इसमें भाग लेगा?

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