दक्षिणपंथ के झुकाव वाले लोगों को हर प्राकृतिक चीज़ विज्ञान लगती है!

Animesh Mukharjee : बतख से ऑक्सीजन का बनना… बिप्लब देब के बयान के बाद उसका वैज्ञानिक आधार सामने आ गया है. मीडिया में बतख से ऑक्सीजन बनने की खबर चलने लगी है. ये बात बिलकुल सही है कि बतख किसी तालाब का ऑक्सीजन लेवल ‘बनाए रखने’ में मददगार होती है. लेकिन बनाए रखना और बढ़ाना दोनों बिलकुल अलग बाते हैं। Continue reading

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झारखंड में क्रांतिकारी नारे लगाने पर 800 अज्ञात और 12 को नामजद कर एफआईआर दर्ज

विशद कुमार,  गिरिडीह से

गिरिडीह : जनता से आखिर इतना डर क्यों? यह सवाल मजदूर संगठन समिति के केंद्रीय महासचिव बच्चा सिंह उस वक्त कर रहे हैं जब पिछले 7 नवंबर को महान बोल्शेविक क्रान्ति के सौवें वर्षगांठ पर झारखंड के गिरिडीह जिला के मुफस्सिल थाना अन्तर्गत चतरो में “महान बोल्शेविक क्रान्ति की शताब्दी समारोह समिति” झारखंड, के तत्वावधान में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें क्षेत्र के लगभग 10 हजार लोगों ने भाग लिया। मंचीय कार्यक्रम के पूर्व एक रैली निकाली गई जो काफी शांतिपूर्ण तरीके से लगभग 5-6 कि.मी. की दूरी तय करते हुए वापस कार्यक्रम स्थल पर पहुंची और आयोजित समारोह भी काफी शांतिपूर्ण तरीके से सम्पन्न हुआ, जिसे सभी समाचार-पत्रों ने सहजता से छापा भी। बावजूद जिला प्रशासन ने रैली में शामिल लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज किया है जिसमें 800 अज्ञात तथा 12 लोगों को नामजद अभियुक्त बनाया गया है।

अपने ही सवाल के जवाब में वे कहते हैं कि जहां वामपंथ धारा के पक्षधरों द्वारा 7 नवंबर 1917 को रूस में हुई ऐतिहासिक परिवर्तन को प्रतीकात्मक रूप से बोल्शेविक क्रांति के सौवें वर्षगांठ को पूरे देश में मनाया जा रहा है वहीं हमारे द्वारा मनाये जा रहे कार्यक्रम के खिलाफ प्रशासन का यह रवैया इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में अभिव्यक्ति की आजादी पर एक खतरनाक हमला है। जिसका कारण मात्र यह है कि पिछले दिनों मजदूर संगठन समिति द्वारा राज्य के तीन जगहों मधुबन, चन्द्रपुरा और बोकारो थर्मल में मजदूरों के सवालों को लेकर जोरदार आंदोलन किया गया, परिणामस्वरूप इन तीनों जगहों के प्रबंधन को मजदूरों के आन्दोलन के सामने झुकना पड़ा और मजदूर की ताकत बढ़ी।

जाहिर है यह फासीवादी रघुवर की सरकार मजदूरों की बढ़ती ताकत को बर्दाश्त नहीं कर पा रही है। चूंकि “महान बोल्शेविक क्रांति की शताब्दी समारोह समिति” झारखंड, में शामिल 13 संगठनों में मजदूर संगठन समिति भी शामिल है अतः मसंस के बहाने मजदूरों कों मुकदमे में फंसाने की धमकी से डरा कर उन्हें चुप रखने की एक साजिश है और समारोह समिति द्वारा घोषित राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में आयोजित बोल्शेविक क्रांति के कार्यक्रमों को भी रोकने की साजिश का भी यह एक हिस्सा है, मगर मजदूर चुप नहीं रहने वाले हैं और न ही “महान बोल्शेविक क्रांति की शताब्दी समारोह समिति” झारखंड, के कार्यक्रमों में कोई बदलाव करने वाला है, हम इस फासीवादी रघुवर सरकार की किसी भी साजिश को सफल नहीं होने देंगे।

उल्लेखनीय है कि अक्टूबर में 13 संगठनों की एक बैठक करके बोल्शेविक क्रांति के सौवें वर्षगांठ पर पूरे झारखंड में कार्यक्रम मनाने की सहमति बनी और उक्त कार्यक्रम को “महान बोल्शेविक क्रांति की शताब्दी समारोह समिति” झारखंड, का नाम दिया गया, जिसमें ‘मजदूर संगठन समिति’ (झारखंड), ‘मेहनतकश महिला संघर्ष समिति’ (बोकारो), ‘आदिवासी, मूलवासी अधिकार मंच’ (बोकारो), ‘तेनुघाट विस्थापित बेरोजगार संघर्ष समिति’ (ललपनिया, बोकारो), ‘आदिवासी, मूलवासी विकास मंच’ (बोकारो), ‘उलगुलान बेरोजगार मंच’ (गिरिडीह), ‘भारतीय आदिम जनजाति परिषद’ (गढ़वा), ‘भारतीय भूईंया विकास परिषद’ (गढ़वा), ‘भारतीय आदिवासी विकास परिषद’ (गढ़वा), ‘जल, जंगल, जमीन रक्षा समिति’ (दुमका), ‘जन जागरण वनाधिकार संघर्ष समिति’ (गुमला, सिमडेगा), ‘भारत नौजवान सभा’ (गिरिडीह) , ‘महिला उल्गुलान संघ ‘(रांची) शामिल हुए। कार्यक्रम 7 नवंबर को गिरिडीह से शुरू करते हुए 30 नवम्बर को रांची में समाप्त करना तय हुआ। कार्यक्रम राज्य के विभिन्न स्थलों में में होना तय हुआ।

इसी संदर्भ में समारोह समिति के आयोजन कर्ताओं द्वारा अक्टूबर में ही गिरिडीह के बरवाडीह करबला मैदान मैनेजिंग कमिटी, गिरिडीह को एक पत्र देकर कार्यक्रम के लिए करबला मैदान को बुक करवा लिया गया था। मगर जब जिला प्रशासन के पास कार्यक्रम करने की अनुमति पत्र के लिए जब संपर्क किया गया, तब जिला प्रशासन द्वारा अनुमति पत्र को स्वीकृति देने के बजाय करबला मैदान मैनेजिंग कमिटी को ही कारण बताओ नोटिस भेज दिया कि वह बिना प्रशासन की अनुमति पत्र के मैदान आवंटित कैसे कर दिया ? परिणामत: जैसा होना लाजिमी था करबला मैदान मैनेजिंग कमिटी का प्रबंधन प्रशासन की घुड़की से डर कर आवंटित मैदान को रद्द कर दिया।

प्रशासन के इस हरकत से आक्रोशित ‘महान बोल्शेविक क्रांति की शताब्दी समारोह समिति’ के आयोजकों ने तय किया कि कार्यक्रम जिले के चतरो अवस्थित मजदूर संगठन समिति के शाखा कार्यालय के मैदान में मनाया जायगा और इसी तयशुदा कार्यक्रम के तहत समिति ने 7 नवंबर को कार्यक्रम मनाया जिसमें 10 हजार के करीब लोग शामिल हुए। कार्यक्रम के पूर्व एक रैली निकाली गई जो लगभग 7 कि0मी0 की दूरी तय करते हुए अजीडीह के चक्रव्यूह मैदान से वापस कार्यक्रम स्थल तक आई।

सबकुछ काफी शान्ति से सम्पन्न हुआ और कार्यक्रम के बाद काफी शान्ति के साथ सारे लोग अपने अपने घर वापस हो गए। एक बात उल्लेखनीय रही कि कार्यक्रम की समाप्ति तक जिला प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद रहा और इस कोशिश में लगा रहा कि कार्यक्रम अव्यवस्थित हो जाय, मगर आयोजकों की सावधान मुस्तैदी ने प्रशासन की हर कोशिश पर पानी फेर दिया जिसका इजहार प्रशासन ने दूसरे दिन 8 नवंबर को समारोह में शामिल लोगों और आयोजकों पर एफआईआर दर्ज करके किया। जिला के मुफस्सिल थाना में प्रशासन ने जिला उद्योग केंद्र के उद्योग विस्तार पदाधिकारी परमेश्वर सिंह द्वारा शिकायत दर्ज करवाते हुए 800 अज्ञात एवं 12 नामजद लोगों के खिलाफ भदवि की धारा 147, 148, 149, 341, 342, 323, 504, 506, 353 के तहत प्राथमिकी दर्ज कराई गई।

गिरिडीह से विशद कुमार की रिपोर्ट.

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सीपीएम के मुखपत्र ‘गणशक्ति’ में मोदी सरकार की दो वर्ष की उपलब्धि का फुल पेज विज्ञापन

Shikha : सीपीएम के दैनिक मुखपत्र अखबार “गणशक्ति” के प्रथम पृष्ठ पर मोदी सरकार की दो वर्ष की “उपलब्धि” का फुल पेज विज्ञापनl क्या अब सीपीएम के “इमानदार” कार्यकर्ताओं को (यदि कोई बचे हैं तो) अपने पार्टी मुख्यालयों पर धावा बोलकर अपने गद्दार नेत्रित्व के हाथ से लाल झंडा छीनकर उनसे किनारा नहीं कर लेना चाहिए? और कितना कलंकित करेगी यह पार्टी महान लाल झंडे को?

कामरेड शिखा के उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Shishir Gupta : मैंने और कई और लोगों ने भी माकपा के ‘गणशक्ति’ अखबार के मुख्य पृष्ठ पर मोदी सरकार का फुल पेज का विज्ञापन निकालने वाली पोस्ट डाली थी. इस पर बहुत से लोग तर्क दे रहे हैं कि अखबार सरकारी विज्ञापन के लिए कानूनन मना नहीं कर सकते. तो किसने कहा था आप विज्ञापन निकालने के लिए सरकारी विभाग में आवेदन डालिए? (अखबारों को शुरू में आवेदन करना पड़ता है, और कुछ न्यूनतम मानकों पर खरा उतरने पर ही अखबारों को सरकारी विज्ञापन के लिए सूचीबद्ध किया जाता है.) माकपा तो नव-उदारवादी पार्टियों और उनकी नीतियों का विरोध करती है (हालाँकि नीतियाँ उसकी भी कमोबेश वैसी ही होती हैं), फिर इस तरह का आवेदन करने के पहले क्या इस पार्टी को नहीं पता था कि कांग्रेस, भाजपा जैसी पार्टियाँ नव-उदारवादी हैं और अंततः उन्हीं के विज्ञापन देने पड़ेंगे? दूसरे ये तो ख़ुद को मजदूरों-किसानों की पार्टी कहते हैं तो पूंजीपतियों की सरकार के पैसे के दम पर अखबार निकालने का क्या मतलब हुआ? बात का सार ये है कि माकपा अब बहुत हद तक ख़ुद खुले तौर पर नंगा होकर सामने आ रही है. तो समझिये बात को. लाल रंग से इतने सम्मोहित ना हो जाइए कि जहाँ लाल दिखा हाँफते-डांफते पहुँच गए सलामी देने. अंतत: निराशा और अवसाद के अलावा और कुछ हाथ नहीं लगने वाला उससे. बेहतर होता कि आप मार्क्सवाद का अध्ययन करते, और लेनिन के शब्दों में उसे “ठोस परिस्थितियों का ठोस मूल्यांकन” कर कार्यान्वित करने की बात करते.

Ashish Thakur The rules of central govt. advertisements have been written down in the “DIRECTORATE OF ADVERTISING AND VISUAL PUBLICITY” smile emoticonhttp://www.davp.nic.in/Newspaper_Advertisement_Policy.html). The sub clause f of clause 18 says: “A newspaper may be suspended from empanelment by DG, DAVP with immediate effect if It refuses to accept and carry an advertisement issued by DAVP on behalf of the Ministries/Departments of Government of India, public sector undertakings and autonomous bodies on more than two occasions.”

Ish Mishra CPM — Corporate Promoted Marxists

Dinesh Aastik बन्गाल me इसी वजह se इनकी aisi durdasha hui hai. इन्ही paartiyo की वजह se log साम्यवाद ko अव्यवहारिक maanne का भ्रम karne lage.

Gulshan Kumar Ajmani is prakar ke vigyapan ke liye CPM ko lajja aani chaihiye. agar sabhi tarah k sarkari vigyapan hi deikhane hai to Gan shakti ka Party jornal hone ka kya matalab hai.

Amarnath Madhur लाल झंडा जल्द ही बजरंग बली के लाल लंगोट की जगह बाँधा जाएगा.

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पश्चिम बंगाल चुनाव : लेफ्ट फ्रंट वापस सत्ता में आ जाए तो हैरत नहीं

बंगाल में लेफ्ट फ्रंट का नारा है- तृणमूल हटाओ, बंगाल बचाओ… मोदी हटाओ, देश बचाओ….

पश्चिम बंगाल में तकरीबन 34 साल तक सत्ता पर काबिज रहनेवाली लेफ्ट फ्रंट इसी नारे के सहारे फिर सत्ता पर काबिज होना चाहती है। इस नारे में बड़ा सवाल भी है। सवाल ये कि तृणमूल सरकार के दौर में लेफ्ट फ्रंट ने ऐसा क्या चमत्कार किया कि वो वापसी की आस लगा बैठी है? क्या, महज कांग्रेस के साथ प्रत्यक्ष या परोक्ष चुनावी गठबंधन लेफ्ट को खोया राज वापिस दिला सकती है? या फिर लेफ्ट फ्रंट को सत्ता से बेदखल करने के लिए मोटे तौर पर जिम्मेदार नंदीग्राम और सिंगूर में हालात बदल गए हैं, जहां पांचवें और छठे दौर में मतदान होने हैं।

इन सवालों का जवाब तलाशने के लिए हमें उन हालातों पर गौर करना होगा जो लेफ्ट फ्रंट के विनाश का कराण बनीं। हमें पता लगाना होगा कि एक जमाने में कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करनेवाली लेफ्ट फ्रंट ने 34 साल में ऐसा क्या किया कि उनपर मर मिटने वाली बंगाल की जनता ने उसे सिरे से ही नकार दिया। ममता बनर्जी में वो कौन सा जादू था कि बांसुरीवाले की तरह प्रदेश की जनता उनके पीछे दौड़ी चली आई। या फिर ये महज कांग्रेस के साथ गठबंधन का चमत्कार था, जिसने ममता बनर्जी को राइटर्स बिल्डिंग तक पहुंचा दिया।

2011 के विधानसभा चुनावों में करीब 4 करोड़ 76 लाख वैध मत पड़े थे। इनमें लेफ्ट फ्रंट की सबसे बड़ी पार्टी सीपीएम को 30.08 फीसदी, ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक को 4.80 फीसदी, आरएसपी को 2.96 फीसदी और सीपीआई को 1.84 फीसदी वोट मिले। जबकि यूपीए गठबंधन में तृणमूल को 38.93 फीसदी और कांग्रेस को 9.09 फीसदी वोट मिले। गोरखा जनमुक्ति मेर्चा के साथ चुड़ाव लड़ रही बीजेपी को महज 4.06 फीसदी वोट ही मिले।

गठबंधन का सबसे ज्यादा फायदा तृणमूल और कांग्रेस की झोली में आया। तृणमूल के 226 उम्मीदवार मैदान में थे, जिनमें से 184 कामयाब रहे। कांग्रेस के 66 उम्मीदवारों में से 42 को कामयाबी मिली। वहीं लेफ्ट फ्रंट की बात करें तो सीपीएम के 213 में से 40 और सीपीआई के 14 में से 2 उम्मीदवारों को ही कामयाबी मिली। चौंकाने वाली बात ये रही कि लेफ्ट फ्रंट की छोटी पार्टियों का प्रदर्शन उतना बुरा नहीं रहा। ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक के 34 में से 11 और आरएसपी के 23 में से 7 उम्मीदवार कामयाब रहे। बीजेपी का प्रदर्शन सबसे खराब रहा। 289 सीटों पर प्रत्याशी उतारने के बाद भी वो अपना खाता तक नहीं खोल पाई।

अब बात एक बार फिर से लेफ्ट फ्रंट की। लेफ्ट फ्रंट के हाथ से सत्ता फिसली कैसे? ये जानने के लिए आपको साल 2011 के चुनावों से पहले जाना होगा। जब नंदीग्राम और सिंगूर में लेफ्ट रोजगार और विकास के नाम पर उन्हीं पूंजीपतियों से हाथ मिला रही थी, जिनके विरोध की राजनीति वो करती आई थी। नंदीग्राम और सिंगूर की फसली जमीनों को अंग्रेजों के जमीन अधिग्रहण कानून के सहारे किसानों से जबरन छीना गया और विरोध करने पर लाठी-डंडे और गोलियां तक बरसाईं गईं। सत्ता में बैठे कुछ लुंपन तत्व, विकास और रोजगार के नाम पर इसे सही ठहराते रहे। पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं को ये समझ नहीं आया कि राज्यसत्ता की कार्रवाइयों को वो जायज कैसे ठहराएं। आम किसानों के सामने सबसे बड़ा सवाल ये था कि जो पार्टी खेत जोतने वाले को जमीन देने की बात करती थी वो उन्हें खेतों से बेदखल कैसे कर सकती है?

दुविधा से घिरे लेफ्ट फ्रंट के सिपहसालार ये समझने और समझाने में नाकाम रहे कि राज्य में भूमि सुधार के तहत 10 लाख एकड़ से ज्यादा भूमि 30 लाख किसानों में बांटने वाली पार्टी नंदीग्राम में रसायन केंद्र (केमिकल हब) और सिंगूर में ‘टाटा नयनो’ की बात कैसे करने लगी? ऑपरेशन बरगा के तहत राज्य में बटाईदारों को लाखों एकड़ भूमि का कानूनी हक दिलाने वाली पार्टी उनका हक छीनने पर कैसे अमादा हो गई।

लंबे अरसे से सत्ता की आस में बैठी ममता बनर्जी ने वर्ग संघर्ष में आए इस भटकाव का पूरा फायदा उठाया। उन्होंने मौके की नजाकत को भांपते हुए कांग्रेस से हाथ मिलाया, जो 34 साल से लेफ्ट के किले को ध्वस्त करने का सटीक औजार ढूंढ रही थी। इस काम में उन्हें उन माओवादियों का साथ भी मिला जो लेफ्ट फ्रंट सरकार की इस नई पहल से इत्तेफाक नहीं रखते थे। नक्सलवाड़ी आंदोलन की विचारधारा को जीने वाले लोगों ने भी ममता का साथ दिया। नंदीग्राम में 14 किसानों की मौत के बाद सीपीएम की जमीन तेजी से खिसकने लगी और देखत-देखते ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की सबसे कद्दावर नेता बन बैठी। वो उसी आवाज में बोलने लगीं, जिसमें कभी ज्योति बसु और हरकिशन सिंह सुरजीत बोलते थे।

लेफ्ट फ्रंट के नेताओं को जब तक इसका एहसास होता, बहुत देर हो चुकी थी। वो ये बात समझ नहीं पाए कि साल 2006 के विधानसभा चुनाव में 50 फीसदी से ज्यादा वोट और 235 सीट जीतने वाला लेफ्ट गठबंधन साल 2011 में महज 58 सीटो तक कैसे सिमट गया। इसकी झांकी तीसरे प्लेनम के मौके पर कोलकाता के ब्रिगेड में आयोजित रैली में भी नजर आई। जहां दूर-दराज से आए पार्टी कार्यकर्ताओं के चेहरे पर आशा और उम्मीद की किरण तो थी, लेकिन तृणमूल के कार्यकर्ताओं और पुलिस का आतंक भी सिर चढ़कर बोलता नजर आया । ब्रिगेड ग्राउंड की रैली में 171 शहीदों की सूची भी उऩमें जोश भरने से ज्यादा उन्हें डराने का काम करती नजर आई। कार्यकर्ता यही रट लगाते नजर आए-‘लाइन लगाकर वोट हुआ तो पार्टी फिर सत्ता में आएगी।‘ ये समझना थोड़ा मुश्किल था कि ‘लाइन लगाकर वोट’ का मतलब क्या है? बाद में पता चला कि इसका मतलब है अगर वोट डाल पाएंगे तो।

कोलकाता से सिंगूर के रास्ते में हर जगह इस डर का अहसास होता है। झंडे भले ही बदल गए हों, लेकिन लोग वहीं हैं। सिविल डिफेंस के नाम पर युवाओं की एक फौज खड़ी की गई है। कहने के लिए तो वो हाइवे पर ट्रैफिक कंट्रोल का काम करते हैं, पर वास्तव में वो पुलिस के निजी सहयोगी हैं। चंदा वसूली का काम पहले वो लेफ्ट के लिए करते थे, अब ये काम तृणमूल के लिए करते नजर आते हैं। बड़ी बेफिक्री से एक युवा कहता है, “बताइए, 4 हजार में जीवन चलता है क्या?” दरअसल लेफ्ट ने जिन सर्वहारा को सत्ताधारी बना दिया उसे फिर से सर्वहारा बनाने की चुनौती है। बड़ा सवाल यही है कि क्या उऩ्हें इस भौतिकवाद से बाहर निकाला जा सकता है, जिनके वो आदि हो चुके हैं।

नंदीग्राम में आप किसी से खुलकर बात नहीं कर सकते। लोग कतराते हैं। बाजार में लोग आपसे बात तो करेंगे, लेकिन डर-डर कर। कहीं कोई देख ना लें। लोग कहते हैं, ‘कुछ बदला नहीं है, बस झंडे बदल गए हैं।’ सीपीएम से जुड़े लोग मानते हैं कि पार्टी में लुंपन तत्वों का डेरा हो गया था। अब वो सब तृणमूल के साथ है। सिंगूर के लोग बताते हैं, सैकड़ों किसानों के मुआवजे का मामला कोर्ट में चल रहा है। फैक्ट्री लगती तो काम मिलता। जिनकी खेत गई और मुआवजा नहीं मिला, सरकार उन्हें 2000 रुपये मुआवजा देती है। जो नाकाफी है। मामला कोर्ट में है और लोग परेशान हैं। जबसे खबर आई है कि बंगाल सरकार टाटा से हाथ मिलाकर नैनौ कार फैक्ट्री शुरू करवाना चाहती है, तबसे इलाके में सुगबुगाहट है। दरअसल ममता ने प्रस्ताव रखा है कि टाटा 1000 एकड़ की जगह 600 एकड़ में फैक्ट्री लगाए और 400 एकड़ जमीन उन किसानों को वापिस कर दे जो इसे बेचना नहीं चाहते।                     

लेफ्ट ने खोई सत्ता वापिस पाने के लिए कांग्रेस से हाथ मिलाया है। वोटों के गणित को देखें तो ये काम उतना मुश्किल नजर नहीं आता। लेकिन सवाल वैचारिक धरातल का है। बंगाल के वोटरों में अब युवाओं की तादाद 35 से 40 फीसदी है जिनमें बहुतों को मार्क्सवाद-लेनिनवाद फैशनेबल तो लगता है, लेकिन वैचारिक जुड़ाव कमजोर है। वो महात्मा गांधी के ‘सत्य और अहिंसा के प्रयोग’ की तरह ही ‘दुनिया के मजदूरों एक हों’ और ‘सत्ता बंदूक की नली से निकलती है’, जैसे चालू नारों और मुहावरों से आकर्षित तो होते हैं, लेकिन इन नारों के पीछे के लंबे संघर्ष की जानकारी नहीं है। ना ही जानने में ज्यादा रुचि है। ऐसे में उन्हें बरगलाना और फुसलाना आसान है। जिसका खामियाजा तात्कालिक नारों की जगह वैचारिक आधार वाली पार्टियों को भुगतना पड़ रहा है।

सस्ता और सबकुछ मुफ्त में देनेवाली पार्टियां आज ज्यादा सफल दिखाई देतीं हैं। इऩसे निपटना चुनौती है, लेकिन कोई और रास्ता भी नहीं है। ऐसे में लेफ्ट फ्रंट के सामने चुनौतियां बड़ी है। बंगाल के गांव-देहातों से तृणमूल और लेफ्ट फ्रंट के कार्यकर्ताओं के बीच संघर्ष की जो खबरें आ रहीं हैं, उसे लेफ्ट के पुनर्जागरण के तौर पर तो देखा और महसूस किया जा सकता है। इऩ खबरों की तुलना 2011 के विधानसभा चुनाव से पहले तृणमूल के उदय और लेफ्ट के सूर्यास्त के दौर वाली खबरों से की जा सकती है जिसकी अनुगूंज ममता बनर्जी की बौखलाहट में साफ नजर आ रही है।

लेखक संजय कुमार Rajya Sabha Television में Executive Producer हैं. उन्होंने हाल में ही WB elections के मद्देनजर Nandigram और Singur की यात्राएं कीं. उनसे संपर्क 9810882015 या या sanjaykumary2kok@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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रायपुर से लेकर लखनऊ वाया बनारस तक कौन-कौन ‘फासीवाद’ का आपसदार बन गया है, अब आप आसानी से गिन सकते हैं

Abhishek Srivastava : मुझे इस बात की खुशी है कि रायपुर साहित्‍य महोत्‍सव के विरोध से शुरू हुई फेसबुकिया बहस, बनारस के ‘संस्‍कृति’ नामक आयोजन के विरोध से होते हुए आज Vineet Kumar के सौजन्‍य से Samvadi- A Festival of Expressions in Lucknow तक पहुंच गई, जो दैनिक जागरण का आयोजन था। आज ‘जनसत्‍ता’ में ‘खूब परदा है’ शीर्षक से विनीत ने Virendra Yadav के 21 दिसंबर को यहीं छपे लेख को काउंटर किया है जो सवाल के जवाब में दरअसल खुद एक सवाल है। विनीत दैनिक जागरण के बारे में ठीक कहते हैं, ”… यह दरअसल उसी फासीवादी सरकार का मुखपत्र है जिससे हमारा विरोध रहा है और जिसके कार्यक्रम में वीरेंद्र यादव जैसे पवित्र पूंजी से संचालित मंच की तलाश में निकले लोगों ने शिरकत की।”

अच्‍छा होता यदि विनीत अपनी बात को वीरेंद्र यादव (और कहानीकार अखिलेश भी) तक सीमित न रखकर उन सब ”लोगों” के नाम गिनवाते जो ‘फासीवादी सरकार के मुखपत्र’ के आयोजन में होकर आए हैं। हो सकता है विनीत को सारे नाम न पता हों या वे भूल गए हों, लेकिन इस छोटी सी भूल के चलते उनके लेख का मंतव्‍य बहुत ”निजी” हो जा रहा है और ऐसा आभास दे रहा है मानो वे बाकी लोगों को बचा ले जाना चाह रहे हों। बहरहाल, उनकी बात बिलकुल दुरुस्‍त है और आज का उनका लेख ‘फासीवादी सरकार के मुखपत्र’ के आयोजन के क्रिएटिव कंसल्‍टेंट Satyanand Nirupam को तो सीधे कठघरे में खड़ा करता ही है। उसके अलावा Piyush Mishra, Swara Bhaskar, Prakash K Ray, Rahat Indori, Waseem Bareillvy, Munawwar Rana, malini awasthi, बजरंग बिहारी तिवारी, शिवमूर्ति समेत ढेर सारे लोगों को विनीत कुमार फासीवाद का साझीदार करार देते हैं जो लखनऊ के ‘संवादी’ में गए थे या जिन्‍होंने जाने की सहमति दी थी।

अब आप आसानी से गिन सकते हैं कि रायपुर से लेकर लखनऊ वाया बनारस तक कौन-कौन ‘फासीवाद’ का आपसदार बन गया है। सबसे दिलचस्‍प बात यह है कि इस आपसदारी में कहीं कोई खेद नहीं है, क्षमा नहीं है, अपराधबोध नहीं है और छटांक भर शर्म भी नहीं है। ‘हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे’ की तर्ज पर जवाब दिए जा रहे हैं। अपनी-अपनी सुविधा से खुद को और अपने-अपने लोगों को बख्‍श दिया जा रहा है। समझ में नहीं आ रहा कि कौन किसके हाथ में खेल रहा है। सच कहूं, मुझे तो कांग्रेस फॉर कल्‍चरल फ्रीडम के पढ़े-सुने किस्‍से अब याद आने शुरू हो गए हैं। इस नाम को गूगल पर खोजिएगा, मज़ा आएगा।

मीडिया विश्लेषक और सरोकारी पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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रायपुर महोत्सव : रमन सिंह बोले- ये मेरे 11 साल पूरे होने का जलसा, अमित शाह बोले- बीजेपी सरकार ने खूब काम किया

Sharad Shrivastav : बीजेपी सरकार ने रायपुर मे हिन्दी साहित्य के एक उत्सव कराया है। रमण सिंह सरकार के 11 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य मे रायपुर साहित्य सम्मेलन रचाया गया है। इस सम्मेलन मे बहुत से मूर्धन्य साहित्यकार शामिल होने गए हैं, और बहुत से बड़े साहित्यकारों ने बुलावे के बावजूद शामिल होने से इंकार किया है। ये भी पता चला है की साहित्यकारों को उनकी हैसियत के मुताबिक आने जाने का किराया और शामिल होने की फीस भी दी गयी है। इस सम्मेलन के उदघाटन मे रमण सिंह और अमित शाह दोनों थे। हिन्दी के विद्वान लोग इसलिए गए थे की वो रमण सिंह सरकार का प्रतिकार करेंगे, मंच से उनके खिलाफ साहित्य के माध्यम से आवाज उठाएंगे। लेकिन रमण सिंह और अमित शाह ने मामला पलट दिया। उदघाटन भाषण मे इस समारोह को रमण सिंह ने अपने 11 साल पूरे होने का जलसा बना दिया और अमित शाह ने बीजेपी सरकार की उपलब्धि बताने का जरिया।

अफसोस की बात है की हिन्दी साहित्यकारों की कोई कदर नहीं। अब जो साहित्यकार वहाँ नहीं पहुँच सके वो अपने ही साथियों की टांग खींच रहे हैं। उन्हें जलील कर रहे हैं। सालों की साहित्य साधना, गरीब दलित, मजदूर, स्त्री के हित मे लेखन बेकार हो गया। वो सब बुद्धिजीवी अब कम्युनिस्ट नहीं रहे, संघी हो गए। कम्युनिस्ट होने के लिए कैसे कैसे रास्ते पर चलना पड़ता है, कितनी सावधानी बरतनी पड़ती है। एक गलत कदम और आप संघी हो जाते हैं। इसके उलट पल्प साहित्य या लोकप्रिय साहित्य जो किसी गिनती मे नहीं आता। जिसका नाम लेने से इन तथाकथित बुद्धि जीवियों का धर्म भ्रष्ट हो जाता है। उसके लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक का उनके फैन ने खुद सम्मान किया। किसी संस्था, किसी सरकार का मोहताज नहीं बने। किसी का मुंह नहीं देखा किसी से उम्मीद नहीं की कि वो मदद करें।

लेकिन हिन्दी के साहित्य मे ऐसा नहीं हो सकता। यहाँ लोग फैन नहीं एक दूसरे के दुश्मन हैं। गरीब दलित स्त्री के हित कि बात करने वाले असल मे ये लोग उनके सबसे बड़े दुश्मन खुद हैं। हिन्दी के दुश्मन, साहित्य के दुश्मन, जिसकी बात करते हैं उसके दुश्मन। यहाँ ऐसा हो ही नहीं सकता कि किसी पुरस्कार मे कोई राजनीति न हो, किसी के सम्मान से किसी और को दिक्कत न हो। एक ऊपर चढ़ता है तो चार उसे नीचे खींचते हैं। सबसे गंदी दुनिया हिन्दी के साहित्य की है। लेकिन दूसरी दुनिया पर हंसने मे सबसे आगे यही लोग होते हैं। इनकी बातें सुनिए, इनके लेख पढ़िये यही जैसे दुनिया के सबसे पवित्र इंसान हैं, कोई बुराई इन्हें छूकर नहीं गयी। दुनिया को सुधारने का ठेका इन्हीं ने लिया है। इनके अलावा बाकी सब भ्रष्ट हैं।

पाठक साहब जैसा सच्चा इंसान मिलना मुश्किल है। हम कुल जमा 40 लोग थे, जब दो साल पहले हम सबने मिलकर उनका सम्मान किया था प्रेस क्लब दिल्ली मेx। खुद सभी ने मिलकर पैसे जुटाये, पाठक साहब को बुलाया, उनके लिए उपहार लिया , सभी के खाने पीने का प्रबंध किया, सम्मान के बाद सबने पाठक साहब के साथ जीभर के बातचीत की। पाठक साहब भी बड़ी आत्मीयता के साथ सबसे मिले। लेकिन ऐसा आप हिन्दी के किसी साहित्यकार के साथ करने की सोच ही नहीं सकते। अगर मैं चाहूं की किसी बड़े नाम वाले साहित्यकार को बुलाकर सम्मान करूँ जहां हम उनके साथ बातचीत कर सकें उन्हें शुक्रिया अदा कर सकें तो वो नामुमकिन है। सबके अपने अहम हैं। ये लोग आपस मे एक दूसरे के लिए सिर्फ बने हैं। एक बुद्धिजीवी सिर्फ दूसरे बुद्धिजीवी की सुनता है। इनकी सीमित दुनिया है। ये बंगाल का भद्रलोक नहीं हिन्दी की गंदगी है। यहाँ फेसबुक पर खूब दिखती है।

शरद श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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गिन लो कितने रँगे सियार, पहुंचे रायपुर दरबार, भइया जी, स्माइल प्लीज़! (सन्दर्भ : रायपुर साहित्य महोत्सव)

Katyayani Lko : मनबहकी लाल बहुत दिनों बाद मिले। मैने कहा, ”कुछ सुनाइये।” वे चुप रहे। फिर जब मैंने भाजपा सरकार के रायपुर साहित्य महोत्‍सव में बहुतेरे सेक्युुलरों-प्रगतिशीलों की भागीदारी के बारे में उनकी प्रतिक्रिया जाननी चाही, तो उन्होंंने छूटते ही यह आशु कविता सुना डाली:

स्माइल प्लीज़!
(सन्दर्भ : रायपुर साहित्य महोत्सव)

चलो मिलाओ फिर सुर में सुर
नया रायपुर , नया रायपुर ।
सत्ता संग अब रास रचाओ
पोज़ मार फोटू खिंचवाओ । भइया जी , स्माइल प्लीज़ !

इधर न ताको , उधर न ताको
परदे के पीछे मत झाँको
नागड़धिन्ना ढोल बजा है
मंच सजा है, टंच मजा है। भइया जी, स्माइल प्लीज़ !

चलो, असहमति दर्ज कराओ
खूनी को जनतंत्र सिखाओ
कवि जी , कविता की धुन साधो
चिन्‍तक जी , तुम विचार पादो । भइया जी , स्माइल प्ली‍ज़ !

मंत्री आये , दाँत चियारो
उनकी महिमा धनि-धनि वारो
लाइन लगाओ , हाथ मिलाओ
सब मिलकर ‘जन-गण-मन’ गाओ । भइया जी , स्माइल प्लीज़ !

अक्कड़-बक्कड़ बम्बे बोल
अस्सी-नब्बे पूरे सौ
गिन लो कितने रँगे सियार
पहुंचे रायपुर दरबार । भइया जी, स्माइल प्लीज़ !

कहाँ चल रहा खूनी खेल
टॉर्चर, एनकाउण्टर, जेल
मिथ्या है, सब माया है
नया ज़माना आया है । भइया जी , स्मा‍इल प्ली‍ज़ !

बे लुच्चे , स्माइल प्लीज़ !
बे टुच्चे , स्माइल प्लीज़ !
बे नंगे , स्मा‍इल प्लीज़ !
अबे बेशरम , स्माइल प्लीज़ !
टुकड़खोर , स्माइल प्लीज़ !
कफ़नचोर , स्माइल प्लीज़ !

Abhishek Srivastava : जिन घटनाओं और कारणों को नज़रंदाज कर के हिंदी के कुछ लेखक और पत्रकार रायपुर साहित्‍य महोत्‍सव में मौजूद हैं, ठीक उन्‍हें ही गिनवाते हुए वरिष्‍ठ कवि विष्‍णु खरे इस आयोजन में बुलावे के बावजूद नहीं गए हैं। पत्रकार Awesh Tiwari ने विष्‍णु खरे की छत्‍तीसगढ़ सरकार को लिखी चिट्ठी अपने फेसबुक की दीवार पर सरकारी सूत्रों के हवाले से साझा की है। नपुंसकता और पस्‍तहिम्‍मती के इस दौर में यह चिट्ठी हम सब के लिए एक आईने की तरह हैं। इसे goo.gl/1ILfFq ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए।

Hareprakash Upadhyay : हिन्दी साहित्य की दुनिया में अच्छे दिनों की आहट। साहित्य अब मनोरंजन से ऊपर उठेगा और वह कार्निवाल, उत्सव, फेस्टिवल के लुत्फ उठाता हुआ बेबाक मानवीय चिंताओं को व्यक्त करेगा। वह रंगीन सोफों पर बैठकर महीन बातें करेगा। हिंदी का लेखक झोला-चप्पल और स्लीपर को त्यागकर उड़नखटोला पर उड़ेगा।

Shashi Bhooshan Dwivedi : रायपुर साहित्य महोत्सव हिन्दी लेखकों की “घर वापसी” का सरकारी आयोजन है. रायपुर साहित्य महोत्सव में लेखकों की जो कीमत लगी है उसका पता चल गया है-आने जाने का हवाई जहाज़ का किराया और २५ हज़ार रुपये. अब सिर्फ चाय पर होने वाली साहित्यिक गोष्ठियां नहीं होतीं। अब सिर्फ महोत्सव होते हैं। दिल्ली, लखनऊ, जयपुर, पटना, इलाहबाद, रायपुर, बनारस,बीकानेर कहीं देख लीजिये। इसका कुछ तो मतलब होगा। अगले साल गाँधीनगर में २ अक्तूबर को गाँधी दर्शन पर एक कार्यक्रम होना है जिसमे गाँधी दर्शन पर व्याख्यान और कविता पाठ भी होगा. उसमें प्रतिभागियों को ५१ हज़ार देने की बात तय हुई है. खबर पक्की है. उस कार्यक्रम के अंतिम दिन लेखकों को मोदी जी के साथ भोज भी करना होगा. देखना है उसमें कौन कौन अपनी कितनी कीमत लगाता है. वैसे सुना है कि रायपुर महोत्सव में कुछ लेखकों को ५-५ लाख भी मिले हैं.

कात्यायनी, अभिषेक, हरेप्रकाश और शशि भूषण के फेसबुक वॉल से.

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जनविरोधी छवि सुधारने के वास्ते छत्तीसगढ़ सरकार ने एक अरब रुपए खर्च कर रायपुर साहित्य महोत्सव का आयोजन किया

कोई महामूर्ख ही इस आयोजन को साहित्यिक आयोजन कहेगा

रमन सिंह गंदी नीयत से अपने बचाव में साहित्य का इस्तेमाल कर रहा

Vikram Singh Chauhan : छत्तीसगढ़ सरकार ने एक अरब रूपए खर्च कर रायपुर साहित्य महोत्सव का आयोजन किया है। इस अरब रूपए में रमन सिंह बिलासपुर नसबंदी कांड, बस्तर में रोज होती आदिवासी मौतों, किसानों की दुर्दशा और उनकी आत्महत्या और उस तरह के तमाम दर्दनाक सरकार प्रायोजित ‘हत्या’ को दबाने का प्रयास कर रही है। मुख्यमंत्री ने राज्य सरकार पर अचानक होते हमलों के बाद इससे निपटने जनसंपर्क विभाग को कहा था। जिसके बाद ये आईडिया सामने आया। इसके बाद सभी राष्ट्रीय और प्रादेशिक अख़बारों, मैगजीन, चैनलों को 33 करोड़ के विज्ञापन बांटे गए।

इसके अलावा करोड़ों रुपए लिफाफों में भरकर रखे गए है जिसें उन साहित्यकारों को दिया जायेगा जो राज्य में इस गमगीन माहौल में साहित्य पाठ करेंगे और काजू , किशमिश खाते हुए राज्य के विकास के बारे में बात करेंगे। शर्म से डूब मरना चाहिए उस सरकार को जो इस तरह के आयोजन में राज्य की जनता के हक़ का पैसा विज्ञापनों में देकर करोड़ों रूपए पानी की तरह बहा रही है। वे किसानों के धान को खरीद नहीं पा रहे है। उनके पास नसबंदी कांड के बच्चों के लिए पैसा नहीं है। बस्तर उनके नियंत्रण से बाहर है आदिवासियों को जवान भी मार रहे है और नक्सली भी।

कोई महामूर्ख ही इस आयोजन को साहित्यिक आयोजन कहेगा। साहित्य को पैसे की दरकार नहीं होता । रमन सिंह गंदी नीयत से अपने बचाव में साहित्य का इस्तेमाल कर रहा है। दूसरी ओर राज्य में आदर्श आचार सहिंता भी लगा है। मैं इसकी कड़े शब्दों में भर्त्सना करता हूँ। मुझे पता है इस साहित्य महोत्सव में मेरे कई फेसबुक के गणमान्य मित्र भी शरीक हुए है। आप ये जरूर सोचियेगा कि आपके सामने टेबल में जो काजू रखा जायेगा वो यहाँ के गरीबों के खून से तो नहीं सने है और जो लिफाफा आपके जेब में रखा जायेगा वो किसानों के घर से चोरी कर तो आप नहीं ले जा रहे! सोचियेगा जरूर…

जन पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट विक्रम सिंह चौहान के फेसबुक वॉल से.

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रायपुर के सैलानियों, विष्‍णु खरे का पत्र पढ़ो और डूब मरो!

विष्णु खरे


((करीब चार दर्जन लाशों पर खड़े होकर छत्‍तीसगढ़ की भाजपा सरकार साहित्‍य का महोत्‍सव मना रही है और हमेशा की तरह हिंदी साहित्‍य और पत्रकारिता के कुछ चेहरे न सिर्फ लोकतांत्रिकता का दम भरते हुए वहां मौजूद हैं, बल्कि अशोक वाजपेयी की मानें तो वे वहां इसलिए मौजूद हैं क्‍योंकि ”साहित्‍य राजनीति का स्‍थायी प्रतिपक्ष है” (नई दुनिया)। खुद को ”प्रतिपक्ष” और ”प्रगतिशील” ठहराते हुए एक हत्‍यारी सरकार के मेले में शिरकत करने की हिंदी लेखकों की आखिर क्‍या मजबूरी हो सकती है, जबकि उनकी नाक के ठीक नीचे खुद को लेखक कहने वाला राज्‍य का भूतपूर्व प्रमुख दरोगा यह बयान तक दे देता है सबसे बड़ा समझदार अकेला वही है? ठीक वही कारण जिन्‍हें नज़रंदाज़ कर के बाकी लेखक रायपुर में मौजूद हैं, उन्‍हें गिनवाते हुए वरिष्‍ठ कवि विष्‍णु खरे इस आयोजन में बुलावे के बावजूद नहीं गए हैं। पत्रकार आवेश तिवारी ने विष्‍णु खरे की सरकार को लिखी चिट्ठी अपने फेसबुक की दीवार पर सरकारी सूत्रों के हवाले से साझा की है। नपुंसकता और पस्‍तहिम्‍मती के इस दौर में यह चिट्ठी हम सब के लिए एक आईने की तरह हैं। नीचे हम आवेश तिवारी के लिखे इंट्रो के साथ पूरी चिट्ठी छाप रहे हैं – अभिषेक श्रीवास्तव, मॉडरेटर, जनपथ))

यूँ तो किसी का पत्र सार्वजनिक करना अच्छी बात नहीं होती, लेकिन कभी कभी यह पाप कर लेना चाहिए| रायपुर साहित्य महोत्सव शुरू हो चुका है, हम अपने मित्रों और अखाड़े के साथियों के लिए आलोचक-कवि विष्णु खरे द्वारा मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के निजी सचिव को प्रेषित यह पत्र साझा कर रहे हैं, जो इस कार्यक्रम के आयोजनकर्ताओं, इस आयोजन के समर्थकों, इसमें हिस्सा लेने वालों और इस कार्यक्रम से असहमत लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण सामग्री है| यहाँ यह स्पष्ट कर दूँ यह पत्र मुझे सरकारी स्रोतों से प्राप्त हुआ है – आवेश तिवारी, नई दुनिया, दिल्‍ली, फेसबुक पोस्‍ट 

सम्मान्य श्री रजत कुमार जी,

आपने मुझे इतने आदर और स्नेह से रायपुर साहित्य महोत्सव के लिए निमंत्रित किया, इसका आभारी हूँ. अफ़सोस यह है कि उसमें शामिल होने के लिए असमर्थ हूँ.

छत्तीसगढ़ में इतनी बेक़ुसूर, मजलूम, हर दृष्टि से निम्नवर्गीय औरतों की जानें चली गईं. अभी कुछ और भी मर सकती हैं. इस अपराध का संज्ञान राष्ट्र संघ तक ने लिया है. जो लेखक आदि रायपुर जाएँ, उनसे तो पूछा ही जाएगा, दूसरे सभी से पूछा जाएगा, पूछा जाना चाहिए, कि आख़िर आपका इस त्रासदी पर रुख क्या है ?

छत्तीसगढ़ प्रशासन कम-से-कम यह कर सकता था कि इस महोत्सव को सारी अभागी लाशों की तेरहवीं के बाद निकटतम फरवरी 2015 तक मुल्तवी कर देता. सही है कि तैयारियों में कुछ पैसा ख़र्च हुआ होगा लेकिन भला कितना? अभी तो भागीदारों के पास निमंत्रण ही पहुँच रहे हैं जबकि उत्सव में एक महीना भी नहीं बचा है.

मैं स्पष्ट कर दूँ कि मैं वामपंथी विचारधारा का समर्थक हूँ और मेरी कोई भी सहानुभूति चालू हिन्दुत्ववादी राजनीति से नहीं है. फिर भी यदि कोई भाजपा सरकार ऐसा आयोजन करे जिसमें मुझे लगता हो कि कोई जन-सार्थक, धर्मनिरपेक्ष, सांस्कृतिक-साहित्यिक बात निकल सकती हो, जिसमें कोई समझौता न करना पड़े, कोई दुराग्रह, दुरभिसंधि या दबाव न हो, तो मुझे उसमें शामिल होने से कोई गुरेज़ न होगा. मसलन यदि आप कभी किसी रायपुर वैश्विक फिल्म महोत्सव के बारे में सोचें तो उससे जुड़कर मुझे बहुत खुशी होगी. फिर भी बेहतर तो यही रहेगा कि ऐसे सारे आयोजन किसी तटस्थ, स्वायत्त, सार्वजनिक संस्था के माध्यम से किए जाएँ. बहरहाल, मैं सभी प्रभावित पक्षों के लिए कथनी और करनी के बीच की कठिनाइयाँ भी समझ सकता हूँ.

यह मेरा सौभाग्य है कि आपके निमंत्रण के कारण मुझे यह कुछ कहने और आप तक पहुँचाने का दुर्लभ मौक़ा मिला.

जो भी हो, छत्तीसगढ़ को स्नेह करने के और साहित्यिक-सांस्कृतिक चीज़ों में यत्किंचित् दिलचस्पी रखने के नाते मैं आपके इस महोत्सव की सफलता की कामना करता हूँ.

सधन्यवाद,
विष्णु खरे

पुनश्च : मेरा कुलनाम ”खरे” है और दुर्भाग्यवश मेरा कोई सम्बन्ध अनुपम खेर या कैलाश खेर जैसे बड़े और मशहूर नामों से नहीं है.


युवा पत्रकार और एक्टिविस्ट अभिषेक श्रीवास्तव के ब्लाग जनपथ से साभार.


इन्हें भी पढ़ें…

आपने वामपंथी नारीवादी होते हुए ऐसे समारोह में शि‍रकत की, जो फासि‍स्‍टों का तो था ही, जि‍स पर मासूमों के खून के दाग लगे थे?

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रायपुर महोत्सव में शामिल वामंपथियों, महिलावादियों, प्रगतिशीलों को श्रीफल मिलेगा!

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आपने वामपंथी नारीवादी होते हुए ऐसे समारोह में शि‍रकत की, जो फासि‍स्‍टों का तो था ही, जि‍स पर मासूमों के खून के दाग लगे थे?

Rahul Pandey : प्रश्‍न- आप रायपुर साहि‍त्‍य महोत्‍सव में गई थीं?
उत्‍तर- तुमसे मतलब?
प्रश्‍न- प्‍लीज सवाल का जवाब दें, क्‍या आप वहां गई थीं?
उत्‍तर- जान ना पहचान, बड़ी बी सलाम? जवाब दे मेरी जूती।

प्रश्‍न- देखि‍ए, जवाब आपको देना पड़ेगा, आप मेरे शो में बातचीत करने ही आई हैं..
उत्‍तर- खबरदार जो मुझसे बातचीत करने की कोशि‍श की।
प्रश्‍न- खैर, हमें पता है कि आप वहां गई थीं। आपके जाने पर लोग सवाल उठा रहे हैं..
उत्‍तर- तो उठाते रहें, जवाब देगी मेरी जूती। मैने तो पड़ोस की श्रीवास्‍तव आंटी को कभी जवाब नहीं दि‍या।
प्रश्‍न- आप खुद को वामपंथी नारीवादी पोज करती हैं, इसपर भी लोग सवाल उठा रहे हैं…
उत्‍तर- वो तो मैं हूं और अपने दम पर हूं। पंकज भैया से पूछ लो
प्रश्‍न- पर वो आयोजन तो भाजपा का था?
उत्‍तर- तो क्‍या लोकलहर वाले या लि‍बरेशन वाले मुझे 25 हजार देते?
प्रश्‍न- मतलब आपको कोई भी पैसे देगा तो आप कोई सा भी काम कर लेंगी?
उत्‍तर- तू मेरा घर चलाने आता है ना?
प्रश्‍न- लोग यह भी कह रहे हैं कि..
उत्‍तर- चुप साले। पहले सुट्टा मारने दे
प्रश्‍न- लोगों का कहना है कि आप असल में वो नहीं, जैसा आप दि‍खाती हैं?
उत्‍तर- लोग चूति‍ये हैं साले
प्रश्‍न- और आप?
उत्‍तर- और मैं क्‍या? अकेली स्‍त्री का दर्द ये हरामी मर्द क्‍या जानें? इसीलि‍ए तो इन्‍हें अपनी जूती पर रखती हूं।
प्रश्‍न- मतलब आप पैसे के लि‍ए कुछ भी कर लेंगी?
उत्‍तर- उल्‍लू के पट्ठे, जिंदा रहने की कोशि‍श डि‍प्‍लोमेसी है।
प्रश्‍न- जिंदा तो जानवर भी रह लेते हैं, लोग इसीलि‍ए बोल रहे हैं क्‍योंकि खुद आपने अपनी एक इमेज बनाई हुई थी
उत्‍तर- तुम बेसि‍कली एक वि‍वेकहीन बुलडोजर हो जो कि‍सी को भी कुचल सकता है।
प्रश्‍न- देखि‍ए बात एक नृशंस समारोह और उसमें आपके जाने की हो रही है.
उत्‍तर- बात इसकी हो रही है कि हर आदमी कुत्‍ता होता है
प्रश्‍न- आप मेरी बात का सीधा जवाब क्‍यों नहीं देतीं?
उत्‍तर- तुम्‍हें मुझसे सवाल पूछने का हक कि‍सने दि‍या? कि‍स अधि‍कार से तुम ये सवाल कर रहे हो?
प्रश्‍न- देखि‍ए, ये एक पब्‍लि‍क गुफ्तगू है, जि‍समें एक पक्ष सवाल करता है, दूसरा जवाब
उत्‍तर- गू है तुम मर्दों के दि‍माग में। मैं पूछती हूं कि कि‍सी महि‍ला ने क्‍यों नहीं उठाए सवाल?
प्रश्‍न- महि‍लाओं ने भी उठाए हैं सवाल, जभी सवाल पूछे जा रहे हैं.
उत्‍तर- वो उन ति‍वारी आंटी या मि‍श्रा मौसी जैसी महि‍लाएं होंगी। खूब जानती हूं ऐसी औरतों को।
प्रश्‍न- नहीं, सबसे ज्‍यादा सवाल तो उनने उठाए हैं, जो सड़क पर महि‍लाओं के हक के लि‍ए लड़ रही हैं.
उत्‍तर- ये तुम नहीं, तुम्‍हारा मरदाना अहंकार बोल रहा है।
प्रश्‍न- फि‍र भी, सबसे बड़ा सवाल यही है कि आपने एक सम्‍मानि‍त बैकग्राउंड से होते हुए ऐसे समारोह में शि‍रकत की, जो फासि‍स्‍टों का तो था ही, जि‍सपर मासूमों के खून के दाग लगे थे?
उत्‍तर- तुम और तुम्‍हारी नजर मेरी जूती पर। भाड़ में जाओ।
प्रश्‍न- सुना उस समारोह में वामपंथि‍यों के जड़ से खात्‍मे पर भी वि‍चार वि‍मर्श हुआ?
उत्‍तर- मुझे वामपंथ ना सि‍खाओ। मैने बचपन से देखा है वामपंथि‍यों की बीवि‍यों की हालत
प्रश्‍न- क्‍या आपने उस वि‍चार वि‍मर्श में हि‍स्‍सा लि‍या?
उत्‍तर- साला गली का कुत्‍ता भी ‘मेल’ होता है तो सफाई मांगता है। तुम मर्दों को कि‍सने हक दि‍या सफाई मांगने का? भाड़ में जाओ
प्रश्‍न- आपको क्‍या लगता है, क्‍या आपका ये कृत्‍य सैद्धांति‍क रूप से सही था?
उत्‍तर- दरअसल मुझे जो सम्‍मान मि‍ला है, उससे मर्दाना अहंकार आहत हुआ है। लेकिन आप ये मानेंगे नहीं। मुझे हासिल करने के सारे सपनों पर कुठाराघात जो हो गया। मर्द कैसे बरदाश्‍त करे?

: पता नहीं इसे सीरीज में जगह देनी चाहि‍ए या नहीं… (पार्ट ऑफ डस्‍टबि‍न) :

कई अखबारों में वरिष्ठ पद पर काम कर चुके युवा पत्रकार राहुल पांडेय के फेसबुक वॉल से.

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रायपुर महोत्सव में शामिल वामंपथियों, महिलावादियों, प्रगतिशीलों को श्रीफल मिलेगा!

Vyalok Pathak : अवांतर प्रसंगः शर्म इनको क्यों कर नहीं आती? रायपुर में एक महोत्सव हो रहा है- साहित्य का। वहां की घोर सांप्रदायिक, जातिवादी, स्त्रीविरोधी, सलवा-जुडूम को शुरू करनेवाली, आम जन शोषक, आदिवासी-विरोधी आदि-इत्यादि भारतीय जनता पार्टी की सरकार के नेतृत्व में। अब इसमें भाग लेनेवाले नामचीनों पर गौर कीजिए। पहला नाम, माननीय पुरुषोत्तम अग्रवाल का है, जो अमूमन एंटरटेनमेंट चैनल पर अपना ढाका जैसा (भोजपुरी भाषी इसे समझ जाएंगे) मुंह खोलकर दक्षिणपंथ के खिलाफ विष-वमन करते रहते हैं। अब वहां जाकर श्रीफल लेंगे।

इसके अलावा केदारनाथ सिंह का भी नाम छत्तीसगढ़ सरकार ने अपने पोस्टर पर दिया है, वह गए या नहीं, यह मुझे पता नहीं है। लीलाधर मंडलोई जैसे महान नर-पुंगव और क्रांतिकारी कवि तो बानगी भर हैं, उन प्रगतिशीलों, स्त्री-अधिकारवादियों, आदिवासियों के अलंबरदारों की, जो इस महोत्सव में जाकर अपनी झोली भरने वाले हैं। धन्य हैं, ये महापुरुष। इन्हीं से यह सब संभव हो सकता है, क्योंकि हमारे यहां मैथिली में एक कहावत है- निर्लज्जा के पाछा मं गाछ जनमलइ, त कहलक, जे भने जनमल….छांहरि त भेल। नोटः इन सबसे बेहतर तो इस पीढ़ी के @Avinash Das ही रहे, जो जिस किसी भी दबाव के तहत, पर जाना टाल गए।

दक्षिणपंथी पत्रकार व्यालोक पाठक के फेसबुक वॉल से.

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