दक्षिणपंथ के झुकाव वाले लोगों को हर प्राकृतिक चीज़ विज्ञान लगती है!

Animesh Mukharjee : बतख से ऑक्सीजन का बनना… बिप्लब देब के बयान के बाद उसका वैज्ञानिक आधार सामने आ गया है. मीडिया में बतख से ऑक्सीजन बनने की खबर चलने लगी है. ये बात बिलकुल सही है कि बतख किसी तालाब का ऑक्सीजन लेवल ‘बनाए रखने’ में मददगार होती है. लेकिन बनाए रखना और बढ़ाना दोनों बिलकुल अलग बाते हैं। Continue reading

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मुस्लिम मताधिकार बयान : राउत, ओवैसी पर परिवाद दर्ज

लखनऊ : आईपीएस अमिताभ ठाकुर और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नूतन ठाकुरन आज सीजेएम लखनऊ के समक्ष शिव सेना सांसद और सामना के संपादक संजय राउत और एमआईएम नेता अकबरुद्दीन ओवैसी के विरुद्ध धारा 200 सीआरपीसी के अंतर्गत परिवाद दायर कर दिया.

परिवाद में कहा गया है कि संजय राउत ने जिस प्रकार 12 अप्रैल 2015 के सामना हिंदी दैनिक में “रोखटोक- मुंबई में ओवैसी की उछलकूद: सावधान बिल में संपोले हैं” शीर्षक लेख में मुसलमानों का मताधिकार छिनने की बात कही है, वह धारा 153 (ए), 295 (ए), 298, 504, 505 (1) (बी) व (सी), 505 (2) आईपीसी के तहत अपराध है. साथ ही लेख में श्री ओवैसी द्वारा कही गयी जो बातें बतायी गयी हैं, वे भी सामान धाराओं के अंतर्गत अपराध हैं.

वादी के अधिवक्ता त्रिपुरेश त्रिपाठी ने आरोपों को अत्यंत ही गंभीर और संवेदनशील बताते हुए इन दोनों को न्यायालय में तलब कर उन्हें नियमानुसार दण्डित करने का अनुरोध किया है. इस पर सीजेएम ने परिवाद दर्ज करते हुए अमिताभ ठाकुर को 25 अप्रैल को धारा 202 सीआरपीसी में अपना बयान दर्ज कराने के आदेश दिए.

समाचार अंग्रेजी में पढ़े – 

The complaint said that the way Sri Raut pleaded for taking away the voting rights of the Muslims in his article “Rokhtok- Mumbai me Owaisi ki Uchalkud:Sawdhan bil me sanpole hain” in Hindi daily Samna dated 12 April 2015, clearly amounts to offence under sections 153 (A), 295 (A), 298, 504, 505 (1) (b) & (c), 505 (2) IPC. Similarly the statements attributed to Sri Owaisi in this article also amount to same offences.

The complaint called the offence extremely serious and sensitive for which my counsel Tripuresh Tripathi prayed for summoning the two accused in the Court to punish them. CJM Lucknow directed registration of the compliant, asking me to get my statement recorded under section 202 CrPC on 25 April.

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रायपुर से लेकर लखनऊ वाया बनारस तक कौन-कौन ‘फासीवाद’ का आपसदार बन गया है, अब आप आसानी से गिन सकते हैं

Abhishek Srivastava : मुझे इस बात की खुशी है कि रायपुर साहित्‍य महोत्‍सव के विरोध से शुरू हुई फेसबुकिया बहस, बनारस के ‘संस्‍कृति’ नामक आयोजन के विरोध से होते हुए आज Vineet Kumar के सौजन्‍य से Samvadi- A Festival of Expressions in Lucknow तक पहुंच गई, जो दैनिक जागरण का आयोजन था। आज ‘जनसत्‍ता’ में ‘खूब परदा है’ शीर्षक से विनीत ने Virendra Yadav के 21 दिसंबर को यहीं छपे लेख को काउंटर किया है जो सवाल के जवाब में दरअसल खुद एक सवाल है। विनीत दैनिक जागरण के बारे में ठीक कहते हैं, ”… यह दरअसल उसी फासीवादी सरकार का मुखपत्र है जिससे हमारा विरोध रहा है और जिसके कार्यक्रम में वीरेंद्र यादव जैसे पवित्र पूंजी से संचालित मंच की तलाश में निकले लोगों ने शिरकत की।”

अच्‍छा होता यदि विनीत अपनी बात को वीरेंद्र यादव (और कहानीकार अखिलेश भी) तक सीमित न रखकर उन सब ”लोगों” के नाम गिनवाते जो ‘फासीवादी सरकार के मुखपत्र’ के आयोजन में होकर आए हैं। हो सकता है विनीत को सारे नाम न पता हों या वे भूल गए हों, लेकिन इस छोटी सी भूल के चलते उनके लेख का मंतव्‍य बहुत ”निजी” हो जा रहा है और ऐसा आभास दे रहा है मानो वे बाकी लोगों को बचा ले जाना चाह रहे हों। बहरहाल, उनकी बात बिलकुल दुरुस्‍त है और आज का उनका लेख ‘फासीवादी सरकार के मुखपत्र’ के आयोजन के क्रिएटिव कंसल्‍टेंट Satyanand Nirupam को तो सीधे कठघरे में खड़ा करता ही है। उसके अलावा Piyush Mishra, Swara Bhaskar, Prakash K Ray, Rahat Indori, Waseem Bareillvy, Munawwar Rana, malini awasthi, बजरंग बिहारी तिवारी, शिवमूर्ति समेत ढेर सारे लोगों को विनीत कुमार फासीवाद का साझीदार करार देते हैं जो लखनऊ के ‘संवादी’ में गए थे या जिन्‍होंने जाने की सहमति दी थी।

अब आप आसानी से गिन सकते हैं कि रायपुर से लेकर लखनऊ वाया बनारस तक कौन-कौन ‘फासीवाद’ का आपसदार बन गया है। सबसे दिलचस्‍प बात यह है कि इस आपसदारी में कहीं कोई खेद नहीं है, क्षमा नहीं है, अपराधबोध नहीं है और छटांक भर शर्म भी नहीं है। ‘हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे’ की तर्ज पर जवाब दिए जा रहे हैं। अपनी-अपनी सुविधा से खुद को और अपने-अपने लोगों को बख्‍श दिया जा रहा है। समझ में नहीं आ रहा कि कौन किसके हाथ में खेल रहा है। सच कहूं, मुझे तो कांग्रेस फॉर कल्‍चरल फ्रीडम के पढ़े-सुने किस्‍से अब याद आने शुरू हो गए हैं। इस नाम को गूगल पर खोजिएगा, मज़ा आएगा।

मीडिया विश्लेषक और सरोकारी पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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रायपुर महोत्सव : रमन सिंह बोले- ये मेरे 11 साल पूरे होने का जलसा, अमित शाह बोले- बीजेपी सरकार ने खूब काम किया

Sharad Shrivastav : बीजेपी सरकार ने रायपुर मे हिन्दी साहित्य के एक उत्सव कराया है। रमण सिंह सरकार के 11 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य मे रायपुर साहित्य सम्मेलन रचाया गया है। इस सम्मेलन मे बहुत से मूर्धन्य साहित्यकार शामिल होने गए हैं, और बहुत से बड़े साहित्यकारों ने बुलावे के बावजूद शामिल होने से इंकार किया है। ये भी पता चला है की साहित्यकारों को उनकी हैसियत के मुताबिक आने जाने का किराया और शामिल होने की फीस भी दी गयी है। इस सम्मेलन के उदघाटन मे रमण सिंह और अमित शाह दोनों थे। हिन्दी के विद्वान लोग इसलिए गए थे की वो रमण सिंह सरकार का प्रतिकार करेंगे, मंच से उनके खिलाफ साहित्य के माध्यम से आवाज उठाएंगे। लेकिन रमण सिंह और अमित शाह ने मामला पलट दिया। उदघाटन भाषण मे इस समारोह को रमण सिंह ने अपने 11 साल पूरे होने का जलसा बना दिया और अमित शाह ने बीजेपी सरकार की उपलब्धि बताने का जरिया।

अफसोस की बात है की हिन्दी साहित्यकारों की कोई कदर नहीं। अब जो साहित्यकार वहाँ नहीं पहुँच सके वो अपने ही साथियों की टांग खींच रहे हैं। उन्हें जलील कर रहे हैं। सालों की साहित्य साधना, गरीब दलित, मजदूर, स्त्री के हित मे लेखन बेकार हो गया। वो सब बुद्धिजीवी अब कम्युनिस्ट नहीं रहे, संघी हो गए। कम्युनिस्ट होने के लिए कैसे कैसे रास्ते पर चलना पड़ता है, कितनी सावधानी बरतनी पड़ती है। एक गलत कदम और आप संघी हो जाते हैं। इसके उलट पल्प साहित्य या लोकप्रिय साहित्य जो किसी गिनती मे नहीं आता। जिसका नाम लेने से इन तथाकथित बुद्धि जीवियों का धर्म भ्रष्ट हो जाता है। उसके लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक का उनके फैन ने खुद सम्मान किया। किसी संस्था, किसी सरकार का मोहताज नहीं बने। किसी का मुंह नहीं देखा किसी से उम्मीद नहीं की कि वो मदद करें।

लेकिन हिन्दी के साहित्य मे ऐसा नहीं हो सकता। यहाँ लोग फैन नहीं एक दूसरे के दुश्मन हैं। गरीब दलित स्त्री के हित कि बात करने वाले असल मे ये लोग उनके सबसे बड़े दुश्मन खुद हैं। हिन्दी के दुश्मन, साहित्य के दुश्मन, जिसकी बात करते हैं उसके दुश्मन। यहाँ ऐसा हो ही नहीं सकता कि किसी पुरस्कार मे कोई राजनीति न हो, किसी के सम्मान से किसी और को दिक्कत न हो। एक ऊपर चढ़ता है तो चार उसे नीचे खींचते हैं। सबसे गंदी दुनिया हिन्दी के साहित्य की है। लेकिन दूसरी दुनिया पर हंसने मे सबसे आगे यही लोग होते हैं। इनकी बातें सुनिए, इनके लेख पढ़िये यही जैसे दुनिया के सबसे पवित्र इंसान हैं, कोई बुराई इन्हें छूकर नहीं गयी। दुनिया को सुधारने का ठेका इन्हीं ने लिया है। इनके अलावा बाकी सब भ्रष्ट हैं।

पाठक साहब जैसा सच्चा इंसान मिलना मुश्किल है। हम कुल जमा 40 लोग थे, जब दो साल पहले हम सबने मिलकर उनका सम्मान किया था प्रेस क्लब दिल्ली मेx। खुद सभी ने मिलकर पैसे जुटाये, पाठक साहब को बुलाया, उनके लिए उपहार लिया , सभी के खाने पीने का प्रबंध किया, सम्मान के बाद सबने पाठक साहब के साथ जीभर के बातचीत की। पाठक साहब भी बड़ी आत्मीयता के साथ सबसे मिले। लेकिन ऐसा आप हिन्दी के किसी साहित्यकार के साथ करने की सोच ही नहीं सकते। अगर मैं चाहूं की किसी बड़े नाम वाले साहित्यकार को बुलाकर सम्मान करूँ जहां हम उनके साथ बातचीत कर सकें उन्हें शुक्रिया अदा कर सकें तो वो नामुमकिन है। सबके अपने अहम हैं। ये लोग आपस मे एक दूसरे के लिए सिर्फ बने हैं। एक बुद्धिजीवी सिर्फ दूसरे बुद्धिजीवी की सुनता है। इनकी सीमित दुनिया है। ये बंगाल का भद्रलोक नहीं हिन्दी की गंदगी है। यहाँ फेसबुक पर खूब दिखती है।

शरद श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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गिन लो कितने रँगे सियार, पहुंचे रायपुर दरबार, भइया जी, स्माइल प्लीज़! (सन्दर्भ : रायपुर साहित्य महोत्सव)

Katyayani Lko : मनबहकी लाल बहुत दिनों बाद मिले। मैने कहा, ”कुछ सुनाइये।” वे चुप रहे। फिर जब मैंने भाजपा सरकार के रायपुर साहित्य महोत्‍सव में बहुतेरे सेक्युुलरों-प्रगतिशीलों की भागीदारी के बारे में उनकी प्रतिक्रिया जाननी चाही, तो उन्होंंने छूटते ही यह आशु कविता सुना डाली:

स्माइल प्लीज़!
(सन्दर्भ : रायपुर साहित्य महोत्सव)

चलो मिलाओ फिर सुर में सुर
नया रायपुर , नया रायपुर ।
सत्ता संग अब रास रचाओ
पोज़ मार फोटू खिंचवाओ । भइया जी , स्माइल प्लीज़ !

इधर न ताको , उधर न ताको
परदे के पीछे मत झाँको
नागड़धिन्ना ढोल बजा है
मंच सजा है, टंच मजा है। भइया जी, स्माइल प्लीज़ !

चलो, असहमति दर्ज कराओ
खूनी को जनतंत्र सिखाओ
कवि जी , कविता की धुन साधो
चिन्‍तक जी , तुम विचार पादो । भइया जी , स्माइल प्ली‍ज़ !

मंत्री आये , दाँत चियारो
उनकी महिमा धनि-धनि वारो
लाइन लगाओ , हाथ मिलाओ
सब मिलकर ‘जन-गण-मन’ गाओ । भइया जी , स्माइल प्लीज़ !

अक्कड़-बक्कड़ बम्बे बोल
अस्सी-नब्बे पूरे सौ
गिन लो कितने रँगे सियार
पहुंचे रायपुर दरबार । भइया जी, स्माइल प्लीज़ !

कहाँ चल रहा खूनी खेल
टॉर्चर, एनकाउण्टर, जेल
मिथ्या है, सब माया है
नया ज़माना आया है । भइया जी , स्मा‍इल प्ली‍ज़ !

बे लुच्चे , स्माइल प्लीज़ !
बे टुच्चे , स्माइल प्लीज़ !
बे नंगे , स्मा‍इल प्लीज़ !
अबे बेशरम , स्माइल प्लीज़ !
टुकड़खोर , स्माइल प्लीज़ !
कफ़नचोर , स्माइल प्लीज़ !

Abhishek Srivastava : जिन घटनाओं और कारणों को नज़रंदाज कर के हिंदी के कुछ लेखक और पत्रकार रायपुर साहित्‍य महोत्‍सव में मौजूद हैं, ठीक उन्‍हें ही गिनवाते हुए वरिष्‍ठ कवि विष्‍णु खरे इस आयोजन में बुलावे के बावजूद नहीं गए हैं। पत्रकार Awesh Tiwari ने विष्‍णु खरे की छत्‍तीसगढ़ सरकार को लिखी चिट्ठी अपने फेसबुक की दीवार पर सरकारी सूत्रों के हवाले से साझा की है। नपुंसकता और पस्‍तहिम्‍मती के इस दौर में यह चिट्ठी हम सब के लिए एक आईने की तरह हैं। इसे goo.gl/1ILfFq ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए।

Hareprakash Upadhyay : हिन्दी साहित्य की दुनिया में अच्छे दिनों की आहट। साहित्य अब मनोरंजन से ऊपर उठेगा और वह कार्निवाल, उत्सव, फेस्टिवल के लुत्फ उठाता हुआ बेबाक मानवीय चिंताओं को व्यक्त करेगा। वह रंगीन सोफों पर बैठकर महीन बातें करेगा। हिंदी का लेखक झोला-चप्पल और स्लीपर को त्यागकर उड़नखटोला पर उड़ेगा।

Shashi Bhooshan Dwivedi : रायपुर साहित्य महोत्सव हिन्दी लेखकों की “घर वापसी” का सरकारी आयोजन है. रायपुर साहित्य महोत्सव में लेखकों की जो कीमत लगी है उसका पता चल गया है-आने जाने का हवाई जहाज़ का किराया और २५ हज़ार रुपये. अब सिर्फ चाय पर होने वाली साहित्यिक गोष्ठियां नहीं होतीं। अब सिर्फ महोत्सव होते हैं। दिल्ली, लखनऊ, जयपुर, पटना, इलाहबाद, रायपुर, बनारस,बीकानेर कहीं देख लीजिये। इसका कुछ तो मतलब होगा। अगले साल गाँधीनगर में २ अक्तूबर को गाँधी दर्शन पर एक कार्यक्रम होना है जिसमे गाँधी दर्शन पर व्याख्यान और कविता पाठ भी होगा. उसमें प्रतिभागियों को ५१ हज़ार देने की बात तय हुई है. खबर पक्की है. उस कार्यक्रम के अंतिम दिन लेखकों को मोदी जी के साथ भोज भी करना होगा. देखना है उसमें कौन कौन अपनी कितनी कीमत लगाता है. वैसे सुना है कि रायपुर महोत्सव में कुछ लेखकों को ५-५ लाख भी मिले हैं.

कात्यायनी, अभिषेक, हरेप्रकाश और शशि भूषण के फेसबुक वॉल से.

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जनविरोधी छवि सुधारने के वास्ते छत्तीसगढ़ सरकार ने एक अरब रुपए खर्च कर रायपुर साहित्य महोत्सव का आयोजन किया

कोई महामूर्ख ही इस आयोजन को साहित्यिक आयोजन कहेगा

रमन सिंह गंदी नीयत से अपने बचाव में साहित्य का इस्तेमाल कर रहा

Vikram Singh Chauhan : छत्तीसगढ़ सरकार ने एक अरब रूपए खर्च कर रायपुर साहित्य महोत्सव का आयोजन किया है। इस अरब रूपए में रमन सिंह बिलासपुर नसबंदी कांड, बस्तर में रोज होती आदिवासी मौतों, किसानों की दुर्दशा और उनकी आत्महत्या और उस तरह के तमाम दर्दनाक सरकार प्रायोजित ‘हत्या’ को दबाने का प्रयास कर रही है। मुख्यमंत्री ने राज्य सरकार पर अचानक होते हमलों के बाद इससे निपटने जनसंपर्क विभाग को कहा था। जिसके बाद ये आईडिया सामने आया। इसके बाद सभी राष्ट्रीय और प्रादेशिक अख़बारों, मैगजीन, चैनलों को 33 करोड़ के विज्ञापन बांटे गए।

इसके अलावा करोड़ों रुपए लिफाफों में भरकर रखे गए है जिसें उन साहित्यकारों को दिया जायेगा जो राज्य में इस गमगीन माहौल में साहित्य पाठ करेंगे और काजू , किशमिश खाते हुए राज्य के विकास के बारे में बात करेंगे। शर्म से डूब मरना चाहिए उस सरकार को जो इस तरह के आयोजन में राज्य की जनता के हक़ का पैसा विज्ञापनों में देकर करोड़ों रूपए पानी की तरह बहा रही है। वे किसानों के धान को खरीद नहीं पा रहे है। उनके पास नसबंदी कांड के बच्चों के लिए पैसा नहीं है। बस्तर उनके नियंत्रण से बाहर है आदिवासियों को जवान भी मार रहे है और नक्सली भी।

कोई महामूर्ख ही इस आयोजन को साहित्यिक आयोजन कहेगा। साहित्य को पैसे की दरकार नहीं होता । रमन सिंह गंदी नीयत से अपने बचाव में साहित्य का इस्तेमाल कर रहा है। दूसरी ओर राज्य में आदर्श आचार सहिंता भी लगा है। मैं इसकी कड़े शब्दों में भर्त्सना करता हूँ। मुझे पता है इस साहित्य महोत्सव में मेरे कई फेसबुक के गणमान्य मित्र भी शरीक हुए है। आप ये जरूर सोचियेगा कि आपके सामने टेबल में जो काजू रखा जायेगा वो यहाँ के गरीबों के खून से तो नहीं सने है और जो लिफाफा आपके जेब में रखा जायेगा वो किसानों के घर से चोरी कर तो आप नहीं ले जा रहे! सोचियेगा जरूर…

जन पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट विक्रम सिंह चौहान के फेसबुक वॉल से.

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रायपुर के सैलानियों, विष्‍णु खरे का पत्र पढ़ो और डूब मरो!

विष्णु खरे


((करीब चार दर्जन लाशों पर खड़े होकर छत्‍तीसगढ़ की भाजपा सरकार साहित्‍य का महोत्‍सव मना रही है और हमेशा की तरह हिंदी साहित्‍य और पत्रकारिता के कुछ चेहरे न सिर्फ लोकतांत्रिकता का दम भरते हुए वहां मौजूद हैं, बल्कि अशोक वाजपेयी की मानें तो वे वहां इसलिए मौजूद हैं क्‍योंकि ”साहित्‍य राजनीति का स्‍थायी प्रतिपक्ष है” (नई दुनिया)। खुद को ”प्रतिपक्ष” और ”प्रगतिशील” ठहराते हुए एक हत्‍यारी सरकार के मेले में शिरकत करने की हिंदी लेखकों की आखिर क्‍या मजबूरी हो सकती है, जबकि उनकी नाक के ठीक नीचे खुद को लेखक कहने वाला राज्‍य का भूतपूर्व प्रमुख दरोगा यह बयान तक दे देता है सबसे बड़ा समझदार अकेला वही है? ठीक वही कारण जिन्‍हें नज़रंदाज़ कर के बाकी लेखक रायपुर में मौजूद हैं, उन्‍हें गिनवाते हुए वरिष्‍ठ कवि विष्‍णु खरे इस आयोजन में बुलावे के बावजूद नहीं गए हैं। पत्रकार आवेश तिवारी ने विष्‍णु खरे की सरकार को लिखी चिट्ठी अपने फेसबुक की दीवार पर सरकारी सूत्रों के हवाले से साझा की है। नपुंसकता और पस्‍तहिम्‍मती के इस दौर में यह चिट्ठी हम सब के लिए एक आईने की तरह हैं। नीचे हम आवेश तिवारी के लिखे इंट्रो के साथ पूरी चिट्ठी छाप रहे हैं – अभिषेक श्रीवास्तव, मॉडरेटर, जनपथ))

यूँ तो किसी का पत्र सार्वजनिक करना अच्छी बात नहीं होती, लेकिन कभी कभी यह पाप कर लेना चाहिए| रायपुर साहित्य महोत्सव शुरू हो चुका है, हम अपने मित्रों और अखाड़े के साथियों के लिए आलोचक-कवि विष्णु खरे द्वारा मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के निजी सचिव को प्रेषित यह पत्र साझा कर रहे हैं, जो इस कार्यक्रम के आयोजनकर्ताओं, इस आयोजन के समर्थकों, इसमें हिस्सा लेने वालों और इस कार्यक्रम से असहमत लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण सामग्री है| यहाँ यह स्पष्ट कर दूँ यह पत्र मुझे सरकारी स्रोतों से प्राप्त हुआ है – आवेश तिवारी, नई दुनिया, दिल्‍ली, फेसबुक पोस्‍ट 

सम्मान्य श्री रजत कुमार जी,

आपने मुझे इतने आदर और स्नेह से रायपुर साहित्य महोत्सव के लिए निमंत्रित किया, इसका आभारी हूँ. अफ़सोस यह है कि उसमें शामिल होने के लिए असमर्थ हूँ.

छत्तीसगढ़ में इतनी बेक़ुसूर, मजलूम, हर दृष्टि से निम्नवर्गीय औरतों की जानें चली गईं. अभी कुछ और भी मर सकती हैं. इस अपराध का संज्ञान राष्ट्र संघ तक ने लिया है. जो लेखक आदि रायपुर जाएँ, उनसे तो पूछा ही जाएगा, दूसरे सभी से पूछा जाएगा, पूछा जाना चाहिए, कि आख़िर आपका इस त्रासदी पर रुख क्या है ?

छत्तीसगढ़ प्रशासन कम-से-कम यह कर सकता था कि इस महोत्सव को सारी अभागी लाशों की तेरहवीं के बाद निकटतम फरवरी 2015 तक मुल्तवी कर देता. सही है कि तैयारियों में कुछ पैसा ख़र्च हुआ होगा लेकिन भला कितना? अभी तो भागीदारों के पास निमंत्रण ही पहुँच रहे हैं जबकि उत्सव में एक महीना भी नहीं बचा है.

मैं स्पष्ट कर दूँ कि मैं वामपंथी विचारधारा का समर्थक हूँ और मेरी कोई भी सहानुभूति चालू हिन्दुत्ववादी राजनीति से नहीं है. फिर भी यदि कोई भाजपा सरकार ऐसा आयोजन करे जिसमें मुझे लगता हो कि कोई जन-सार्थक, धर्मनिरपेक्ष, सांस्कृतिक-साहित्यिक बात निकल सकती हो, जिसमें कोई समझौता न करना पड़े, कोई दुराग्रह, दुरभिसंधि या दबाव न हो, तो मुझे उसमें शामिल होने से कोई गुरेज़ न होगा. मसलन यदि आप कभी किसी रायपुर वैश्विक फिल्म महोत्सव के बारे में सोचें तो उससे जुड़कर मुझे बहुत खुशी होगी. फिर भी बेहतर तो यही रहेगा कि ऐसे सारे आयोजन किसी तटस्थ, स्वायत्त, सार्वजनिक संस्था के माध्यम से किए जाएँ. बहरहाल, मैं सभी प्रभावित पक्षों के लिए कथनी और करनी के बीच की कठिनाइयाँ भी समझ सकता हूँ.

यह मेरा सौभाग्य है कि आपके निमंत्रण के कारण मुझे यह कुछ कहने और आप तक पहुँचाने का दुर्लभ मौक़ा मिला.

जो भी हो, छत्तीसगढ़ को स्नेह करने के और साहित्यिक-सांस्कृतिक चीज़ों में यत्किंचित् दिलचस्पी रखने के नाते मैं आपके इस महोत्सव की सफलता की कामना करता हूँ.

सधन्यवाद,
विष्णु खरे

पुनश्च : मेरा कुलनाम ”खरे” है और दुर्भाग्यवश मेरा कोई सम्बन्ध अनुपम खेर या कैलाश खेर जैसे बड़े और मशहूर नामों से नहीं है.


युवा पत्रकार और एक्टिविस्ट अभिषेक श्रीवास्तव के ब्लाग जनपथ से साभार.


इन्हें भी पढ़ें…

आपने वामपंथी नारीवादी होते हुए ऐसे समारोह में शि‍रकत की, जो फासि‍स्‍टों का तो था ही, जि‍स पर मासूमों के खून के दाग लगे थे?

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रायपुर महोत्सव में शामिल वामंपथियों, महिलावादियों, प्रगतिशीलों को श्रीफल मिलेगा!

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आपने वामपंथी नारीवादी होते हुए ऐसे समारोह में शि‍रकत की, जो फासि‍स्‍टों का तो था ही, जि‍स पर मासूमों के खून के दाग लगे थे?

Rahul Pandey : प्रश्‍न- आप रायपुर साहि‍त्‍य महोत्‍सव में गई थीं?
उत्‍तर- तुमसे मतलब?
प्रश्‍न- प्‍लीज सवाल का जवाब दें, क्‍या आप वहां गई थीं?
उत्‍तर- जान ना पहचान, बड़ी बी सलाम? जवाब दे मेरी जूती।

प्रश्‍न- देखि‍ए, जवाब आपको देना पड़ेगा, आप मेरे शो में बातचीत करने ही आई हैं..
उत्‍तर- खबरदार जो मुझसे बातचीत करने की कोशि‍श की।
प्रश्‍न- खैर, हमें पता है कि आप वहां गई थीं। आपके जाने पर लोग सवाल उठा रहे हैं..
उत्‍तर- तो उठाते रहें, जवाब देगी मेरी जूती। मैने तो पड़ोस की श्रीवास्‍तव आंटी को कभी जवाब नहीं दि‍या।
प्रश्‍न- आप खुद को वामपंथी नारीवादी पोज करती हैं, इसपर भी लोग सवाल उठा रहे हैं…
उत्‍तर- वो तो मैं हूं और अपने दम पर हूं। पंकज भैया से पूछ लो
प्रश्‍न- पर वो आयोजन तो भाजपा का था?
उत्‍तर- तो क्‍या लोकलहर वाले या लि‍बरेशन वाले मुझे 25 हजार देते?
प्रश्‍न- मतलब आपको कोई भी पैसे देगा तो आप कोई सा भी काम कर लेंगी?
उत्‍तर- तू मेरा घर चलाने आता है ना?
प्रश्‍न- लोग यह भी कह रहे हैं कि..
उत्‍तर- चुप साले। पहले सुट्टा मारने दे
प्रश्‍न- लोगों का कहना है कि आप असल में वो नहीं, जैसा आप दि‍खाती हैं?
उत्‍तर- लोग चूति‍ये हैं साले
प्रश्‍न- और आप?
उत्‍तर- और मैं क्‍या? अकेली स्‍त्री का दर्द ये हरामी मर्द क्‍या जानें? इसीलि‍ए तो इन्‍हें अपनी जूती पर रखती हूं।
प्रश्‍न- मतलब आप पैसे के लि‍ए कुछ भी कर लेंगी?
उत्‍तर- उल्‍लू के पट्ठे, जिंदा रहने की कोशि‍श डि‍प्‍लोमेसी है।
प्रश्‍न- जिंदा तो जानवर भी रह लेते हैं, लोग इसीलि‍ए बोल रहे हैं क्‍योंकि खुद आपने अपनी एक इमेज बनाई हुई थी
उत्‍तर- तुम बेसि‍कली एक वि‍वेकहीन बुलडोजर हो जो कि‍सी को भी कुचल सकता है।
प्रश्‍न- देखि‍ए बात एक नृशंस समारोह और उसमें आपके जाने की हो रही है.
उत्‍तर- बात इसकी हो रही है कि हर आदमी कुत्‍ता होता है
प्रश्‍न- आप मेरी बात का सीधा जवाब क्‍यों नहीं देतीं?
उत्‍तर- तुम्‍हें मुझसे सवाल पूछने का हक कि‍सने दि‍या? कि‍स अधि‍कार से तुम ये सवाल कर रहे हो?
प्रश्‍न- देखि‍ए, ये एक पब्‍लि‍क गुफ्तगू है, जि‍समें एक पक्ष सवाल करता है, दूसरा जवाब
उत्‍तर- गू है तुम मर्दों के दि‍माग में। मैं पूछती हूं कि कि‍सी महि‍ला ने क्‍यों नहीं उठाए सवाल?
प्रश्‍न- महि‍लाओं ने भी उठाए हैं सवाल, जभी सवाल पूछे जा रहे हैं.
उत्‍तर- वो उन ति‍वारी आंटी या मि‍श्रा मौसी जैसी महि‍लाएं होंगी। खूब जानती हूं ऐसी औरतों को।
प्रश्‍न- नहीं, सबसे ज्‍यादा सवाल तो उनने उठाए हैं, जो सड़क पर महि‍लाओं के हक के लि‍ए लड़ रही हैं.
उत्‍तर- ये तुम नहीं, तुम्‍हारा मरदाना अहंकार बोल रहा है।
प्रश्‍न- फि‍र भी, सबसे बड़ा सवाल यही है कि आपने एक सम्‍मानि‍त बैकग्राउंड से होते हुए ऐसे समारोह में शि‍रकत की, जो फासि‍स्‍टों का तो था ही, जि‍सपर मासूमों के खून के दाग लगे थे?
उत्‍तर- तुम और तुम्‍हारी नजर मेरी जूती पर। भाड़ में जाओ।
प्रश्‍न- सुना उस समारोह में वामपंथि‍यों के जड़ से खात्‍मे पर भी वि‍चार वि‍मर्श हुआ?
उत्‍तर- मुझे वामपंथ ना सि‍खाओ। मैने बचपन से देखा है वामपंथि‍यों की बीवि‍यों की हालत
प्रश्‍न- क्‍या आपने उस वि‍चार वि‍मर्श में हि‍स्‍सा लि‍या?
उत्‍तर- साला गली का कुत्‍ता भी ‘मेल’ होता है तो सफाई मांगता है। तुम मर्दों को कि‍सने हक दि‍या सफाई मांगने का? भाड़ में जाओ
प्रश्‍न- आपको क्‍या लगता है, क्‍या आपका ये कृत्‍य सैद्धांति‍क रूप से सही था?
उत्‍तर- दरअसल मुझे जो सम्‍मान मि‍ला है, उससे मर्दाना अहंकार आहत हुआ है। लेकिन आप ये मानेंगे नहीं। मुझे हासिल करने के सारे सपनों पर कुठाराघात जो हो गया। मर्द कैसे बरदाश्‍त करे?

: पता नहीं इसे सीरीज में जगह देनी चाहि‍ए या नहीं… (पार्ट ऑफ डस्‍टबि‍न) :

कई अखबारों में वरिष्ठ पद पर काम कर चुके युवा पत्रकार राहुल पांडेय के फेसबुक वॉल से.

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रायपुर महोत्सव में शामिल वामंपथियों, महिलावादियों, प्रगतिशीलों को श्रीफल मिलेगा!

Vyalok Pathak : अवांतर प्रसंगः शर्म इनको क्यों कर नहीं आती? रायपुर में एक महोत्सव हो रहा है- साहित्य का। वहां की घोर सांप्रदायिक, जातिवादी, स्त्रीविरोधी, सलवा-जुडूम को शुरू करनेवाली, आम जन शोषक, आदिवासी-विरोधी आदि-इत्यादि भारतीय जनता पार्टी की सरकार के नेतृत्व में। अब इसमें भाग लेनेवाले नामचीनों पर गौर कीजिए। पहला नाम, माननीय पुरुषोत्तम अग्रवाल का है, जो अमूमन एंटरटेनमेंट चैनल पर अपना ढाका जैसा (भोजपुरी भाषी इसे समझ जाएंगे) मुंह खोलकर दक्षिणपंथ के खिलाफ विष-वमन करते रहते हैं। अब वहां जाकर श्रीफल लेंगे।

इसके अलावा केदारनाथ सिंह का भी नाम छत्तीसगढ़ सरकार ने अपने पोस्टर पर दिया है, वह गए या नहीं, यह मुझे पता नहीं है। लीलाधर मंडलोई जैसे महान नर-पुंगव और क्रांतिकारी कवि तो बानगी भर हैं, उन प्रगतिशीलों, स्त्री-अधिकारवादियों, आदिवासियों के अलंबरदारों की, जो इस महोत्सव में जाकर अपनी झोली भरने वाले हैं। धन्य हैं, ये महापुरुष। इन्हीं से यह सब संभव हो सकता है, क्योंकि हमारे यहां मैथिली में एक कहावत है- निर्लज्जा के पाछा मं गाछ जनमलइ, त कहलक, जे भने जनमल….छांहरि त भेल। नोटः इन सबसे बेहतर तो इस पीढ़ी के @Avinash Das ही रहे, जो जिस किसी भी दबाव के तहत, पर जाना टाल गए।

दक्षिणपंथी पत्रकार व्यालोक पाठक के फेसबुक वॉल से.

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