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दूसरों को नैतिकता सिखाने वाला विनीत कुमार लिफाफा और एयर टिकट पाकर ‘हत्यारी’ रमन सिंह सरकार के पीआर कंपेन का हिस्सा बन गया

Yashwant Singh : दलालों रंडियों से क्या बहस करना. जो एयर टिकट और लिफाफा देखकर कहीं भी मुंह मारने पहुंच जाते हैं. वैसे तो ये रोना रोते हैं कि वो देखो सहारा जैसा चोर स्पांसर कर रहा है स्पोर्ट्स टीम को… और फलाने जगह कितना बड़ा अनैतिक काम हो गया…लेकिन पच्चीस हजार रुपये के पैकेट और एयर टिकट ने इनकी आंखों कानों को रमन सिंह सरकार और उनके संरक्षित प्रशासन द्वारा चूहा मार दवा खिलाकर मारी गईं सैकड़ों महिलाओं की चीखों को सुनने से मना कर दिया..

Yashwant Singh : दलालों रंडियों से क्या बहस करना. जो एयर टिकट और लिफाफा देखकर कहीं भी मुंह मारने पहुंच जाते हैं. वैसे तो ये रोना रोते हैं कि वो देखो सहारा जैसा चोर स्पांसर कर रहा है स्पोर्ट्स टीम को… और फलाने जगह कितना बड़ा अनैतिक काम हो गया…लेकिन पच्चीस हजार रुपये के पैकेट और एयर टिकट ने इनकी आंखों कानों को रमन सिंह सरकार और उनके संरक्षित प्रशासन द्वारा चूहा मार दवा खिलाकर मारी गईं सैकड़ों महिलाओं की चीखों को सुनने से मना कर दिया..

ये चिरकुट लोग कभी किसी जमाने में दूसरों के अपराधी और निर्दोष होने का सर्टिफिकेट जारी करते थे. मैं भी भुक्तभोगी रहा हूं. अब हरामखोर जब खुद फंसे हैं तो दार्शनिक दर्शन पेल रहे हैं. अबे इसमें वामपंथ कहां घुस गया. ये तो सामान्य अकल की बात है यार. छत्तीसगढ़ सरकार ने अपने द्वारा किए जा रहे बड़े बड़े अपराधों को छिपाने के लिए एक प्रोग्राम बनाया और उन्हीं लिक्खाड़ों को बुलाया जो उनकी छवि खराब कर रहे थे. बस, सब लार पटकाते पहुंच गए और उसके बाद नसबंदी चूहामार दवा महिला उत्थान आदि सब चले गए तेल लेने…. बेशर्मों को तो शर्म भी नहीं माती. मैंने तो इगनोर करने की सोच रखा था लेकिन इस थेथर को थेथरई देखकर खुद लिखने से नहीं रोक सका. लगता है इसे नंगा करना ही पड़ेगा अब. अपन तो पूरे नंगे हैं. इसकी भी चड्ढी खोलकर अपने समकक्ष ले आएंगे. जय. जय.

यशवंत का उपरोक्त कमेंट युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के इस एफबी स्टेटस पर आया है…

Vineet Kumar : रायपुर साहित्य उत्सव को व्यक्तिगत तौर पर मैं स्वच्छ भारत अभियान का ही हिस्सा मानता हूं और कुछ नहीं तो इसके लिए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री माननीय रमन सिंह को एक बार बधाई देनी तो बनती है. उनने इस कार्यक्रम के जरिए फर्जी-पायरेटेड वामपंथी और प्रतिबद्ध-कटिबद्ध वामपंथी का स्पष्ट विभाजन करके वामपंथी आंदोलन की जमीन मजबूत कर दी. ऐसा करके उन्होंने सालों से चली आ रही उस दुविधा और पेंचीदगी को खत्म कर दिया कि किसे प्रतिबद्ध कहा जाए और किसे नहीं ? अब बिल्कुल दूध और पानी की तरह साफ है..जो रायपुर साहित्य महोत्सव गए वो फर्जी-पायरेटेड और जो नहीं गए वो प्रतिबद्ध-कटिबद्ध और आजीवन सरोकारी और इन दोनों के बीच जो बुलावे को ठुकरा दिया, वो अवतारवाद की अवधारणा से मुठभेड़ करते हुए भी साक्षात महामानव. विशुद्ध वामपंथियों के हाथों मैं जिस दुनिया की कल्पना कर रहा हूं, वो यूटोपिया नहीं..वो यथार्थ है जिसके खिलाफ हम-आप बीए-एमए में दस नंबर के सवाल का जवाब लिखते रहे.

विनीत कुमार के उपरोक्त एफबी स्टेटस पर आए कुछ कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Abhishek Srivastava मैं वाकई समझना चाहता हूं कि वामपंथ पर खींचकर बार-बार इस मसले को क्‍यों लाया जा रहा है? बहुत से ऐसे लोग भी विरोध में हैं जो खुद को वामपंथी नहीं कहते। उसी तरह बहुत से ऐसे लोग वहां गए हैं जो वामपंथी कहे जाते रहे हैं। मामला लोगों की ताज़ा मौतों और स्‍टेट की पॉलिसी का है।

Vineet Kumar अभिषेकजी, बस इसलिए कि हमें जो टिप्पणियां मिल रही है और जो तंज कसे जा रहे हैं, उसके इर्द-गिर्द ये शब्द का सुर सबसे उंचा है..आखिर हम भी तो भूतपूर्व ही सही, रहे थे.

Abhishek Srivastava यह बहस 24 कैरट का वामपंथी तय करने के लिए नहीं हो रही। जो कर रहा है वो मूरख है। सामान्‍य मानवीयता के नाते कुछ बातें हो रही हैं। स्‍टेट के चरित्र को लेकर सवाल हैं। सलवा जुडुम है। आदिवासी हैं। वामपंथ कहां से आ गया जबरिया?

Vineet Kumar ठीक है..वैसे इन सबके बीच जो कहा है मैंने रायपुर में, आज सुबह उसे मोबाईल से सुनकर ट्रांसक्रिप्ट किया है..मौका मिलेगा तो सुनिएगा..ये जानते हुए कि क्या कहा गया के बदले बाकी लोगों के लिए क्यों गए की बहस भारी है..फिर भी. आपसे तो अपील की ही जा सकती है…

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