‘एनडीटीवी 24×7’ की एंकर ने लाइव डिबेट में भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा को शो से जाने के लिए कह दिया

Vineet Kumar : ये संबित पात्रा का अपमान नहीं, टीवी में भाषा की तमीज बचाने की कोशिश है… कल रात के शो में निधि राजदान (NDTV 24X7) ने बीजेपी प्रवक्ता और न्यूज चैनल पैनल के चर्चित चेहरे में से एक संबित पात्रा से सवाल किया. सवाल का जवाब देने के बजाय संबित ने कहा कि ये एनडीटीवी का एजेंडा है, चैनल एजेंडे पर काम करता है. निधि राजदान को ये बात इतनी नागवार गुजरी कि उसके बाद आखिर-आखिर तक सिर्फ एक ही बात दोहराती रही- ”प्लीज, आप इस शो से जा सकते हैं. आप प्लीज ये शो छोड़कर चले जाएं. ये क्या बात हुई कि आपसे कोई सवाल करे तो आपको वो एजेंडा लगने लग जाए.”

संबित इसके बावजूद शो में बने रहे और कहा कि वो चैनल को एक्सपोज करेंगे, निधि ने आगे जोड़ा- ”आपको दूरदर्शन की तरह जो चैनल ग्लोरिफाय करके दिखाते हो, वहीं जाएं, एनडीटीवी पर मत ही आएं.”

इस पूरी घटना के कई पाठ हो सकते हैं. इसे संबित पात्रा सहित देश की सबसे बड़ी पार्टी का अपमान के साथ जोड़कर देखा जा सकता है. दूसरी तरफ निधि राजदान की बतौर एक एंकर ताकत का भी अंदाजा लगाया जा सकता है. उनकी हीरोईक प्रेजेंस को सिलेब्रेट किया जा सकता है और विरोधी पार्टी के लोग रात से ही शुरु हो गए हैं. ये भी कहा जा सकता है कि एक एंकर जब अपने काम को ठीक-ठीक समझ पाए तो वो बहस के नाम पर कुछ भी बोलने नहीं दे सकते. लेकिन इन बहुस्तरीय पाठ के बीच जो सबसे जरुरी चीज है कि निधि राजदान ने जिस अंदाज में संबित पात्रा को शो से जाने कहा और एजेंड़े शब्द पर आपत्ति दर्ज की, वो इस बात की मिसाल है कि टीवी में तेजी से खत्म होती भाषा के बीच उसे बचाने की जद्दोजहद और तमीज बनाए रखने की कोशिश है. तथ्य के बदले पर्सेप्शन या धारणा, सहमति-असहमति के बजाय खुली चुनौती और देख लेंगे के अंदाज में जो नुरा कुश्ती चलती रहती है, उससे अलग निधि का इस तरह टोका जाना इस बात का संकेत है कि आप कहने के नाम पर कुछ भी नहीं कह सकते.

व्यावसायिक स्तर पर एनडीटीवी ग्रुप के अपने कई पेंच हो सकते हैं और उन्हें वैधानिक स्तर पर चुनौती मिलती रही है लेकिन एक एंकर जब सतर्कता से अपने पैनलिस्ट को पर्सेप्शन बनाने से रोकते हैं तो इसका एक अर्थ ये भी है कि वो अपने चैनल ब्रांड को लेकर कॉन्शस है. उन्हें पता है कि जब एजेंडा शब्द को पचा लिया जाएगा तो इसकी ब्रांड वैल्यू पर बुरा असर पड़ेगा. इसे सुनकर रह जाना खुद की क्रेडिबिलिटी पर बड़ा सवाल है.

आज जबकि हर दूसरे-तीसरे चैनल के एंकर ब्रांडिंग और वीरगाथा काल में फर्क करना तेजी से भूलते जा रहे हों, निधि राजदान का ये हस्तक्षेप टीवी में भाषा की तेजी से खत्म होती तमीज की तरफ इशारा है. एक मीडिया छात्र के नाते हमें इस सिरे से भी सोचना होगा कि एक तरफ जब एंकर खुद बेलगाम होते जा रहे हों, वो खुद ऐसे शब्दों का प्रयोग करते आए हों जिन्हें सुनकर आपकी उम्मीदें घुट-घुटकर दम तोड़ दे रही हों, निधि राजदान का ये अंदाज न्यूज चैनल की एक दूसरी परंपरा जो तेजी से खत्म होती जा रही है, याद करने की बेचैनी है, उसे बचाए रखने की कोशिश है.

आनेवाले समय में बहुत संभव है संबित सहित पूरी तरह उनकी पार्टी भी इस चैनल का बायकॉट कर दे लेकिन इससे पहले इस वीडियो से गुजरा जाएं तो आप इस बात से असहमत नहीं हो सकेंगे कि भाषा की ध्वस्त परिस्थिति में एक एंकर ऐसा करके दरअसल खुद को, अपने पेशे की गरिमा बचाने की कोशिश कर रही हैं. अपने सालों की उस मेहनत को जो नौकरी से कहीं आगे की चीज हैं. एक मीडियाकर्मी यदि भाषा के स्तर पर समझौते कर लेता है तो इसका मतलब है कि बाकी का उसका पूरा काम व्याकरण ठीक करते रहने में निकल जाएगा. भाषा व्याकरण से कहीं आगे एक बेहतर समाज की परिकल्पना है.

वीडियो के लिए चटकाएं.

https://www.youtube.com/watch?v=mhSKGOEHM9A

मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार की एफबी वॉल से.

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मोदी जी की सरकार बनने के बाद पूरी पत्रकार बिरादरी दो फाड़ हो चुकी है

Nadim S. Akhter : एबीपी न्यूज वाले पत्रकार अभिसार शर्मा ने शानदार-जानदार लिखा है. सच सामने लाना एक खांटी पत्रकार का अंतिम ध्येय होता है और अभिसार ने वही किया है. सारी मुश्किलों और चुनौतियों के बावजूद (Read between the lines- नौकरी पे खतरे के बावजूद !!) क्या आज हमें ये कहने में कोई हिचक होनी चाहिए कि देश में अघोषित आपातकाल लगा हुआ है. जो दक्षिणपंथ और उसके सारे कुकर्मों-बचकाना हरकतों के साथ है (देश को नुकसान पहुंचाने की कीमत पर भी), वह -राष्ट्रप्रेमी- घोषित किए जा रहे हैं और जो मोदी सरकार को एक्सपोज कर रहे हैं, उनकी गलतियों और खामियों की ओर इशारा कर रहे हैं, उन्हें -राष्ट्रद्रोही- होने का तमगा दिया जा रहा है.

तो क्या ऐसे माहौल में एक पत्रकार को अपनी नैतिकता और पेशेवर निष्ठा से समझौता कर लेना चाहिए? क्या उसे समर्पण करके घुटने के बल झुकना नहीं चाहिए, बल्कि लेट जाना चाहिए ताकि सत्ता का हनहनाता रथ उसके सीने पर से गुजर के उसे जमींदोज कर दे! या फिर उसे पूरी ताकत लगाकर देश को सच बताना चाहिए और अपना काम करते रहना चाहिए. सारी मुसीबतों और जान पर खतरे के बावजूद!

अभिसार बता रहे हैं कि उनकी पत्नी ने उन्हें सुबह-सबह टहलने से रोक दिया है क्योंकि उन्हें धमकियां मिल रही हैं. ऐसे और कई पत्रकार होंगे, जो इसी खतरे में जी रहे होंगे लेकिन सार्वजनिक मंच पर कुछ नहीं बोल रहे और चुपचाप अपना काम करते जा रहे हैं.

टाइम्स नाऊ वाले अर्नब गोस्वामी कह रहे हैं कि पाक परस्त पत्रकारों का ट्रायल होना चाहिए. तो ये कैसे साबित होता है कि अर्नब गोस्वामी के लहू में सिर्फ देशभक्ति की आरबीसी यानी रेड ब्लड कॉपरसेल्स हैं. और अर्नब ये कैसे साबित करेंगे कि तथाकथित पाक परस्त पत्रकारों के लहू में ये कॉपरसेल्स नहीं हैं? कश्मीर में युवा अगर सेना पर पत्थर फेंक रहे हैं तो क्या आप पैलेट गन का इस्तेमाल करके उनके बदन को जख्मों और छर्रों से छलनी कर देंगे, उन्हें अंधा कर देंगे? अगर सेना और सीआरपीएफ वहां इस तरह की गलतियां कर रही है तो क्या किसी पत्रकार को इसे देश को नहीं बताना चाहिए कि सरकार इस और ध्यान दे और इस गलती को सुधारा जाए? क्या उन गुस्साए नौजवानों पर पानी की बौछार या रबड़ की गोलियों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, जैसा देश के अन्य हिस्सों में होता है, जिससे भीड़ तितर-बितर हो जाए और किसी को कोई जानलेवा नुकसान भी ना पहुंचे?

बहुत सारी बातें है. क्या-क्या बोलूं. ये भी अभूतपूर्व है कि देश की जानी-मानी पत्रकार बरखा दत्त ने ट्वीट करके अर्नब गोस्वामी की ओर इशारा करते हुए ये कह दिया कि उन्हें शर्म आ रही है, कि जिस पेशे में अर्नब है, वो भी उसी पेशे में हैं. मोदी जी की सरकार बनने के बाद पूरी पत्रकार बिरादरी दो फाड़ हो चुकी है. एक वो पत्रकार हैं जो भक्तों की जमात में शामिल हो के मोदी जी की हर बात पे –मोदी-मोदी-मोदी-मोदी— चिल्ला रहे हैं (Pro Modi ) और एक वो हैं, जो हमेशा की तरह ईमानदारी से अपना पत्रकारीय दायित्वों को निभा रहे हैं (जैसा उन्होंने यूपीए काल में भी निभाया था और तब बीजेपी उनसे बहुत खुश रहा करती थी, Pro Public Journalsits), सारे खतरों को झेलकर.

मेरा मानना है कि सत्ता के दबाव में Pro Modi और Pro Public पत्रकारों के बीच कटुता अभी और बढ़ेगी. एक धड़ा सत्ता के इशारे पे जनता को फिक्स रंग दिखाएगा और दूसरा धड़ा सारे रंग दिखाने की कोशिश करेगा ताकि देश सच्चाई जान सके. और इसका नतीजा आपको अगले लोकसभा चुनाव में देखने को मिलेगा, जब पब्लिक सब जानने-समझने के बाद वोट देने बाहर निकलेगी. वैसे एक बात के लिए मैं आश्वस्त हूं कि प्रोपेगेंडा ज्यादा चल नहीं पाता. आखिर में जीत सच यानी सत्य की ही होती है. सो सत्यमेव जयते. जय हो!

पत्रकार और शिक्षक नदीम एस. अख्तर की एफबी वॉल से.

अभिसार शर्मा के लिखे मूल लेख को पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें….

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सत्ता के आगे लोट जाता है अमिताभ बच्चन

Vineet Kumar : जो बोरोप्लस के लिए आपकी परंपरा का रंग बदल सकता है, वो कुछ भी कर सकता है… बहुमत की सरकार के दो साल पूरे होने पर अमिताभ बच्चन ने जिस तरह के कसीदे पढ़े, सत्ता के आगे लोटते नजर आए, आप आहत हो सकते हैं क्योंकि अभी भी आप उनके लिए इस्तेमाल किए जानेवाले मेटाफर सदी का महानायक से बाहर नहीं निकल पाए हैं. लेकिन उदारवादी अर्थव्यवस्था के शुरुआती दौर से ही जो आदमी बीपीएल इलेक्ट्रॉनिक्स का विज्ञापन ये कहते हुए कर रहा है कि देश की कंपनी है, इसमे भारतीयता है और दूसरी तरफ आगे चलकर आइसीआइसीआई जैसे बैंक का तो मुझे समझने में रत्तीभर परेशानी नहीं हुई कि एलपीजी प्रोजेक्ट (लिबरलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन और ग्लोबलाइजेशन) के तहत आपको जितना ग्लोबल होना होता है, उतना ही नेशनल और लोकल भी.

आप जितने आक्रामक तरीके से अपने को देशी, भारतीय, राष्ट्रीय बनाते-बताते हैं, वैश्विक बाजार में आपकी संभावना उतनी अधिक बढ़ती है. नब्बे के दशक में अमिताभ बच्चन यदि बीपीएल और सिनेमा के जरिए भारतीय हो रहे थे तो ये उसी प्रोजेक्ट का हिस्सा रहा है जो अब अन्तर्रा्त्मा से भारतीय और राष्ट्रभक्त की शक्ल में पेश किया जा रहा है.

पहली बात तो ये कि यदि आप उनकी बंडी को लेकर किसी तरह के वैचारिक सवाल में उलझते हैं तो वक्त की बर्बादी है. वो डिटॉल के विज्ञापन में हरे रंग की ब्लेजर पहन लेंगे बल्कि पहनना होगा..देखा नहीं बोरोप्लस में स्टोल का रंग कैसा हुआ करता है ? न्यूज चैनल अपने ब्रांड का रंग भले ही चाहे जो रखे लेकिन टॉप टेन खबरों के वक्त रंग अचानक से आइडिया, एसबीआइ, अंबुजा जैसे ब्रांड के रंगों में जाकर बिला जाते हैं. तो बंडी के रंग से विचारधारा को कोई संबंध नहीं है बल्कि ब्रांड पोजिशनिंग के व्याकरण का पालन भर है.

अब रही बात संस्कृति रक्षक, राष्ट्रभक्त और तरक्कीपसंद (विकास के पापा वाली सरकार) के पक्ष में खड़े होने, बच्चों से बातचीत करने और राष्ट्रीय शिक्षक के तौर पर अपने को पेश करने की..मैं आपसे सीधा सा सवाल करता हूं, चाहे इस बात में आपकी आस्था न हो. आपने अपने जीवन में बच्चे को किसी की नजर न लग जाए, काले की जगह कितनी बार सफेद टीका लगाते देखा है ? अव्वल तो काले टीके का संबंध सिर्फ पाखंड से है नहीं. वो बच्चे के नहाने-तैयार होने की अवधि का सूचक है. माथे का वो काटा टीका बिखर जाए, मिट जाते तो इसका मतलब है अब फिर से तैयार करने, कपड़े बदलने की जरूरत है. दूसरा कि ये काला टीवी अपने भदेस, देशज सामाजिक जीवन के बीच से निकलकर आता है जिसमे बड़े-बुजुर्गों की दर्जनों नसीहतें घुल-मिल जाती हैं.

बोरोप्लस जैसे उत्पाद के लिए आपका ये सदी का महानायक काले की जगह सफेद टीका लगाने को तर्क की शक्ल में पेश कर सकता है तो लोकतंत्र के इस विकास के दावे के साथ आई सरकार के पक्ष में कसीदे पढ़ने में उसे भला क्या दिक्कत हो सकती है? किसी भी उत्पाद के जब विज्ञापन तैयार किए जाते हैं तो उसके व्याकरण में अपील शामिल होती है. अपील मतलब आइडिया और कॉन्सेप्ट. यानी प्रोडक्ट का जो टार्गेट कन्ज्यूमर है, उसके बीच किस एक आधार के साथ मैंदान में उतरा जाए. आमतौर पर एफएमसीजी के प्रोडक्ट लॉजिकल अपील के साथ बनाए जाते हैं. सात दिनों में गोरापन, दो रूपये की महाबचत, ये क्यों ले, वो क्यों न लें आदि-आदि. उसी तरह लग्जरी, विलासिता की चीजें इमोशनल अपील पर बेची जाती हैं. दो लाख की घड़ी आप किस तर्क से बेचेंगे. इमोशनल अपील भिड़ा दें.. गर्लफ्रेंड की पेंच फंसा दें और फिर आगे स्टेटस में कन्वर्ट कर दें.

तो इस लिहाज से दो साल की बहुमत की ये सरकार जानती है कि वो एफएमसीजी यानी रोजमर्रा की उत्पाद नहीं है. उसे जनतंत्र के बाजार में आगे तीन साल और रहना है. इसके लिए जरूरी है कि दो साल जो बीत गए, उन तर्कों के साथ मैरिज एनिवर्सरी से हजारों गुणा भव्य उत्सव नहीं मनाए जा सकते और न ही इस अपील के साथ विज्ञापन किए जा सकते हैं. ऐसे में जरूरी है कि इसे इमोशनल अपील में ठेल दिया जाए.

अब अमिताभ बच्चन ने जो कहा, उस पर गौर करें… सबकुछ हायपर इमोशनल, विज्ञापन की लेआउट के अनुरूप. बेटी बचाओ का ध्यान है लेकिन आए दिन होनेवाली हत्या और बलात्कार पर क्या कार्रवाई हुई, कोई चर्चा नहीं. डिजिटल इंडिया बातचीत में शामिल है सोशल मीडिया पर देशभक्तों की ट्रोल पर कोई बात नहीं. स्किल इंडिया है लेकिन सालों से स्थापित यूनिवर्सिटी और पढ़ने-लिखने की दुनिया के रौंद दिए जाने पर कोई बात नहीं. स्वाभाविक है कि विज्ञापन अपने उत्पाद के खिलाफ नहीं जा सकता.

ये सच है कि जिन बच्चों को इस महानायक से बातचीत करने का मौका मिला होगा, उनके लिए ऐतिहासिक क्षण बनकर यादों में हमेशा के लिए कैद हो जाएगी..लेकिन सीधा सवाल है कि जो आपके काले टीके को एक स्किन क्रीम बेचने के लिए सफेद करने की भौंड़ी कोशिश करे, एक तेल बेचने के लिए टेंशन जाएगा पेंशन लेने (पेंशन का प्रावधान खत्म होने के बावजूद) जैसे वाक्य दोहरा सकता है, वो किसी भी चीज को, किसी भी सरकार को विज्ञापन की लेआउट के हिसाब से पेश कर सकता है.

नहीं तो इसी महानायक के लिए कभी इंदिरा गांधी की हत्या, उनकी मां, देश की मां की हत्या हो गई थी और दूरदर्शन पर खुलेआम कहा था- इसके खून के छींटे उन पर भी पड़ेंगे जिन्होंने ऐसा किया है. जाहिर है, ये कोई फिल्मी डायलॉग नहीं थी और न ही न्यायपालिका की तरफ से फैसले की बात. सीधे-सीधे अपने हाथ में कानून लेकर फैसला करने की बर्बरता. इस मामले में केस की सुनवाई की खबर हाल-हाल तक आती रही है..वो तब आपको बर्बर हो जाने की सलाह दे रहे थे और अब बर्बरता के खिलाफ की आवाज को गुलाबी कागज में लपेटकर राष्ट्रभक्त हो जाने की..

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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जब ‘राष्ट्रवादी’ संपादक सुधीर चौधरी अपने प्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए बदज़ुबानी कर गए!

Vineet Kumar : दाग़दार संपादक सुधीर चौधरी ने प्रधानमंत्री की गरिमा को पहुँचायी चोट… जिस दाग़दार संपादक सुधीर चौधरी को प्रधानमंत्री के साथ पहली सेल्फी लेने का गौरव प्राप्त हो, वो प्रधानमंत्री किसी भारतीय मीडिया को इंटरव्यू न देकर विदेशी अख़बार को इंटरव्यू दे, ये पीड़ा आप और हम नहीं समझ सकते.

सेल्फी और कोयना सम्मान हासिल करने के बाद चौधरी संपादक का मंसूबा यहाँ तक रहा होगा कि वो उनके शो डीएनए को प्रधानमंत्री देश का राष्ट्रीय शो घोषित कर दें..अब ऐसे में उन्हें फरंगी शब्द इस्तेमाल करने की ज़रूरत पड़ जाती है तो आप एक कटिबद्ध संपादक की पीड़ा का अंदाज़ा लगा पाना हमारे बूते की बात नहीं है..

आप बस इतना समझ लीजिए कि ऐसे राष्ट्रवादी संपादक जब प्रधानमंत्री के लिए बदज़ुबानी कर सकते हैं तो बाकी के लिए….लेकिन फ़िरंगी शब्द इस्तेमाल करने से पहले संपादक चौधरी को सोचना चाहिए कि वो देश के प्रधानमंत्री पर ही नहीं, उस ग्लोबल छवि पर भी चोट कर रहे हैं जिसका लोहा पूरी दुनिया मान रही है. लिहाज़ा इससे वैश्विक स्तर पर अच्छा संदेश नहीं जाएगा..

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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ऐसे मीडिया सलाहकारों और इनकी फर्जी बातों के बहकावे में न आएं

टीवी टुडे नेटवर्क का मीडिया स्कूल टीवीटीएमआइ आपसे दो लाख से ज्यादा रूपये लेगा. इसी तरह देश के दर्जनों अखबार और चैनल के अपने मीडिया स्कूल हैं. आप इनके विज्ञापनों से गुजरेंगे तो लगेगा कि कोर्स खत्म होने के साथ ही एंकर श्वेता सिंह, राहुल कंवर, पुण्य प्रसून वाजपेयी की छुट्टी कर दी जाएगी और प्राइम टाइम पर आप होंगे. शुरु के दो-चार दस दिन आपको ऐसा एहसास भी कराया जाएगा.

आप पहले ही दिन से कहीं भी आ जा सकते हैं, माइक छू सकते हैं, स्टूडियो खाली होने पर मॉक एंकरिंग कर सकते हैं, जिन चेहरे से मिलने की आपको हसरत रही है, वो आपको कैंटीन में चाय-कॉफी ऑफर करेंगे. लेकिन सालभर फैंटेसी की ये दुनिया कब खत्म हो जाएगी, आपको पता तक नहीं चलेगा. करीब तीन से चार लाख गंवाने के बाद आप आइआइएमसी, जामिया, डीयू से पढ़े लोगों की ही तरह कतार में होंगे. प्रोफेशनली जो सीखेंगे, वो काम तब तो आए जब उसके लिए अवसर भी हों. ये बात मैं इस दावे के साथ इसलिए कह रहा हूं कि मैंने अपने कुछ छात्रों को बहुत साफ-साफ समझाया लेकिन उन्होंने इसकी चमकीली दुनिया के आगे मेरी सलाह को दरकिनार कर दिया और अब अफसोस करते हैं.

अभी अखबारों में ऐसे सलाहकारों की बाढ़ आई हुई है. ये सलाहकार जिस अंदाज में करियर की बात करते हैं, वो विज्ञापन के करीब होते हैं. आप एक-एक लाइन पढ़िए, महसूस कीजिए. मैं आपको दावे के साथ बताता हूं कि जिस साहस, काम करने का जुनून, जज्बा व्लॉ-ब्लॉ की बात ये कर रहे हैं, आपमे ये दिख गया तो पूरी कोशिश होगी कि आपको दरकिनार कर दिया जाए. टीवी टुडे नेटवर्क अपनी क्लास में मोबाईल, रिकॉर्डिंग तक की इजाजत नहीं देता. खिलाफ बोलना-लिखना तो बहुत दूर की बात है. मैं बार-बार इस संस्थान की चर्चा इसलिए कर रहा हूं कि ये सबसे ज्यादा अवसर और प्रोफेशनलिज्म के दावे करता है जबकि भीतर की सच्चाई बेहद कुरूप और कोर्स करने के बाद आपको तोड़ देनेवाली है. यकीन न हो तो थोड़ी मेहनत करके यहां से निकले लोगों की बैच के बारे में पता कीजिए.

मेरे पास भी ऐसे सलाह लिखने के ऑफर आते हैं लेकिन मुझे लगता है हजार-दो हजार लिखने के तो मिल जाएंगे लेकिन इससे पूरी की पूरी पीढ़ी बुरी तरह गुमराह होगी. जितना संभव हो पाता है, इनबॉक्स में जवाब दे पाता हूं लेकिन ऐसे अखबारी सलाह आपको गुमराह करेंगे मुझसे इस पेशे को बेहद चमकीला, पैसे और जज्बे से भरा बताने के लिए कहा जाएगा जबकि इसकी सच्चाई कुछ और है. मैं आपसे ये बिल्कुल नहीं कह रहा, मीडिया में मत आइए. लेकिन इस तरह की राइट अप पढ़कर नहीं, ढंग की दो-चार किताबें पढ़कर आइए. इन विज्ञापननुमा सलाहों में आपके सपने बेचे जाते हैं जबकि आपको सपने बिकने नहीं देना है, उन्हें सहेजना है.

सिर्फ एंकरिंग और रिपोर्टिंग नहीं है पत्रिकारिता

मीडिया संस्थानों के विज्ञापनों पर गौर करेंगे खासकर जो होर्डिंग्स,कटआउट, किऑस्क या बसों पर लगाए जाते हैं तो आपको लगेगा कि पत्रकारिता का मतलब सिर्फ एंकरिंग या रिपोर्टिंग है. इसमे यही दो काम है जिसमें इज्जत है, पैसा है, शोहरत है, ग्लैमर है. यहां तक कि एंकरिंग करते हुए जिन खूबसूरत चेहरे के साथ कैमरामैन को दिखाया जाता है, वो मीडिया के साइड कैरेक्टर की तरह..

मीडिया के मेरे जो दोस्त एंकर, रिपोर्टर और विशेष संवाददाता हैं वो बेहतर महसूस करते हैं कि न्यूजरूम में उनकी क्या हैसियत है ? उनकी स्टोरी कैसे मारी जाती है, एंकरिंग के नाम पर कैसे केले बेचने जैसी हांक लगानी पड़ती है. आठ-आठ, दस-दस हजार रुपये पर कोल्हू की तरह जोता जाता है. दूसरी तरफ असाइनमेंट, फीड, पीसीआर, गेस्ट कॉर्डिनेशन आदि जगहों पर दर्जनों काम है जिसके बारे में ये संस्थान अपने विज्ञापनों में एक लाइन चर्चा तक करना जरूरी नहीं समझते. वो कोर्स के नाम पर केवल एंकर, रिपोर्टर बनने के आपके सपने को बेचते हैं. असल में सिनेमा और खुद शो के दौरान एंकर-रिपोर्टर को पेश किया जाता है तो आम दर्शकों के बीच ऐसी छवि बनती है कि पूरा चैनल क्या ये देश भी उन्हीं के दम पर चल रहा है. नतीजा मीडिया में आने की तमाम वजहों में से सबसे बड़ी वजह ये भी होती है कि हमारी शक्ल टीवी पर दिखेगी.

मैं एक साल में कम से कम दो से तीन हजार ऐसे छात्रों से मिलता हूं जो या तो मीडिया का कोर्स कर रहे होते हैं या फिर करने जा रहे होते हैं. अधिकांश लोगों के भीतर रिपोर्टर या एंकर बनने की इच्छा रहती है. कुछ तो बहुत ही खुले तौर पर जाहिर करते हैं, कुछ थोड़ी महीनी से..दो-चार बार ऐसा भी अनुभव रहा है कि बिना ये ध्यान दिए कि देखने में सुंदर है, पूछ बैठा- आप मीडिया में क्या करना चाहती हैं और तपाक से जो जवाब मिला वो मेरी अज्ञानता पर चोट थी- ऑविएसली एंकरिंग.

एंकर या रिपोर्टर बनने के सपने देखना बुरी बात नहीं है..बुरी बात इसमे है कि उसके कारण आपको बाकी के काम कमतर लगने लग जाएं और आपके भीतर इस बात को लेकर कॉम्प्लेक्स हो कि आपका चेहरा टीवी पर नजर नहीं आ रहा. ऐसा नहीं है कि ये सिर्फ नए लोगों में होता है. मैं न्यूज चैनल के एक से एक धुरंधर बॉस को देखता हूं जो स्क्रीन पर आने के लिए मार किए रहते हैं..स्पेस खुद से बनाते हैं और कुछ नहीं तो एंकर के साथ खुद पैनल में बतौर एक्सपर्ट बैठ जाते हैं. खैर

एक स्थिति तो ये है कि मीडिया संस्थान लाखों रूपये लेकर आपको सड़क पर छोड़ देता है. अभी पर्ल एकेडमी की फी देखी तो चार साल के कोर्स की कुल रकम पन्द्रह लाख से भी जयादा है. दूसरी स्थिति है कि आपको नौकरी तो मिल जाती है लेकिन एंकरिंग या रिपोर्टिंग की नहीं और आप फ्रस्ट्रेशन में होते हैं. अपने को कमतर मानने लग जाते हैं. आपकी इस कुंठा का विस्तार भी यही मीडिया संस्थान करते हैं क्योंकि इनके चैनल एंकर को रिंग मास्टर की तरह पेश करता है.

ऐसे में आपके लिए बेहद जरूरी है कि आप मीडिया कोर्स करते समय एंकरिंग- रिपोर्टिंग के अलावा बाकी के दर्जनों काम को पहले बारीकी से समझें. ये पहले दिन से तय कर लें कि आपको इनमे से दोनों काम नहीं मिलेंगे. कुछ ऐसे भी काम हो सकते हैं जो डीटीसी की पर्ची काटने से भी ज्यादा बोरिंग काम है. कुछ काम आपकी हैसियत और रूतबे के खिलाफ हो. मसलन पन्द्रह लाख देकर कोर्स करने के बाद आप ये तो नहीं चाहेंगे कि गेस्ट कॉर्डिनेशन में आकर गेस्ट को वाशरूम कहां है, साथ ले जाएं..फीकी चाय का इंतजाम करें, आउटडोर शूट में तंबू-टेंट का इंतजाम करें आदि. इसी बीच आपके किसी बैचलमेट को एंकर बना दिया जाए जिसका आधार टैलेंट न होकर शारीरिक सुंदरता हो, चमचई हो, सामनेवाले को खुश रखने की आदत हो.. मीडिया के उन दर्जनों काम को पहले समझना जरूरी है जिससे गुजरने के बाद आपको लगे कि इससे बेहतर बीएड, एमए, एमबीए जैसे दूसरे कोर्स करना है..आप इस कोर्स को चुनते वक्त अपने स्वभाव का विश्लेषण करें कि ये सब आप कर पाएंगे.

मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के एफबी वॉल से.

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कायदे से यही होना चाहिए जो अभी एनडीटीवी इंडिया पर हो रहा है

Vineet Kumar : कायदे से यही होना चाहिए जो अभी एनडीटीवी इंडिया पर हो रहा है. एबीवीपी और आइसा के छात्र नेता के बीच आमने-सामने बातचीत. (आज साकेत बहुगुणा, एबीवीपी और सहला रशीद, आइसा) कुछ नहीं, बाकी के चैनल एक सप्ताह यही काम करें, किसी राजनीतिक दल के प्रवक्ता, बुद्धिजीवी, पत्रकार के बजाय इन छात्र नेताओं को शो में शामिल करें, काफी कुछ बदल जाएगा. हम दर्शकों को काफी कुछ नया देखने को मिलेगा वो तो है ही.

न्यूज चैनलों के एंकर जो पार्टी प्रवक्ता का अवतार रूप लेकर टीवी स्क्रीन पर मौजूद होते हैं, उनके बदले सीधे छात्रों को अपनी बात रखने का मौका दें तो ज्यादा बेहतर और स्वस्थ लोकतंत्र की उम्मीद की जा सकती है. आप इन छात्र नेताओं से संभव है, सहमत न हों लेकिन अपना पक्ष रखने के लिए वो कहीं ज्यादा पढ़-लिखकर मौजूद होते हैं. हम दर्शकों को कहीं ज्यादा सुविधा होती है..हम खालिस छात्र नेता को देख पाते हैं, एंकर की शक्ल में पार्टी प्रवक्ता की पायरेसी तो नहीं ही..

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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जागरण के आजादी वाले कार्यक्रम में विनीत कुमार क्या जागरणकर्मियों के शोषण की बात रख पाएंगे?

Yashwant Singh : आज मंच जागरण का, परीक्षा विनीत कुमार की… ‘मीडिया मंडी’ किताब के लेखक विनीत कुमार मीडिया विमर्श में उभरते नाम हैं। विनीत बेबाक राय के लिए जाने जाते हैं। मीडिया संस्थानों के दोहरे मानदंडों को बेनकाब करने में विनीत कोई उदारता नहीं बरतते। सामाजिक मुद्दों पर भी विनीत की लेखनी ईमानदार और धारदार रही है। विनीत 4 अप्रैल यानि आज रोहतक में जागरण समूह की ओर से आयोजित किए जा रहे संवाद कार्यक्रम को मॉडरेट करने जा रहे हैं। कार्यक्रम ‘नारी से जुड़े आज़ादी और दायरा’ विषय पर है। इसका आयोजन रोहतक के झज्जर रोड पर स्थिति वैश्य महिला महाविद्यालय पर सुबह 11.30 बजे से है। कार्यक्रम की वक्ता शतरंज चैंपियन और लेखिका अनुराधा बेनिवाल हैं। विनीत ने अपने फेसबुक वॉल पर इस कार्यक्रम की बाकायदा पोस्टर के साथ जानकारी दी है।

विनीत ने अपनी इस पोस्ट के साथ लिखा-

“हम आपसे बातचीत करने रोहतक, हरियाणा आ रहे हैं। पिछले कुछ महीने में आजादी के इतने अलग-अलग मायने पैदा कर दिए गए हैं कि वे गुलामी के पर्याय बनकर हमारे सामने है। जमीनी स्तर पर जिस आजादी को हासिल करने की कोशिश की जा रही है, उसे परंपरा, राष्ट्रहित और संस्कार के नाम पर उन तहखानों में कैद करने के धत्तकर्म किए जा रहे हैं कि हमारे जेहन में बस एक ही सवाल बाकी रह जाता है। आजाद हुए तो क्या और गुलाम बने रहे तो क्या नुकसान? और इन सबके बीच सालों से इज़्ज़त की ख़ातिर, खोल में छिपी दास्ताँ तो है ही। इधर आजादी रोजमर्रा की जिंदगी और आसपास की दुनिया में बची हो चाहे नहीं, एक के बाद एक विज्ञापनों में चेंपने का काम जोरों पर है। पानी बिल से आजादी (दिल्ली जलबोर्ड), एयरपोर्ट पर लाइन लगने से आजादी (यात्रा डॉट कॉम), गीलेपन से आजादी (सेनेटरी नैपकिन के लगभग सारे विज्ञापन)…जमीनी स्तर पर आाजादी की आवाज बुलंद करनेवाले आंदोलनों से आइडिया चुराकर ये सारे विज्ञापनों ने अपनी कॉपी भर ली है। लेकिन आजादी की मार्केटिंग और मैनेजमेंट की जाने की कवायदों के बीच हमारी-आपकी दुनिया कितनी आजाद है, हम इन सारे बेसिक मुद्दों पर बात करेंगे। वैसे तो बातचीत का सिरा होगा अनुराधा बेनीवाल की किताब ‘आजादी मेरा ब्रांड’ लेकिन हम इसे विमर्श का जनाना डब्बा बनाने के बजाय, दूसरे उन कई मसलों पर बातचीत करेंगे जिनमे आपकी दिलचस्पी होगी। हम तो बस मौजूद होंगे, विमर्श के वजूद में तो आखिर तक आप ही बने रहेंगे। तो मिलते हैं कल।“

विनीत ने इसी पोस्ट के 4 घंटे बाद अपने फेसबुक वॉल पर एक और पोस्ट डाली। इस पोस्ट में विनीत कुछ कुछ सफ़ाई देने वाले अंदाज़ में दिखे। विनीत को आखिर क्यों खुद को जस्टीफाई करने की ज़रूरत पड़ी। क्या ये ‘अपराधबोध’ था कि उन्होंने जागरण ग्रुप के कार्यक्रम का मॉडरेटर बनना स्वीकार किया। क्या उन्हें डर था कि कल को इस बात को लेकर उन पर सवाल उठाए जा सकते हैं। बहरहाल विनीत ने पहले ही डिफेंस मुद्रा में आना बेहतर समझा।

पढ़िए विनीत ने अपनी इस दूसरी पोस्ट में क्या लिखा-

“कल को मुझे पाञ्चजन्य, सामना, रामसंदेश, संदेश कमल जैसी पत्रिकाएं, अखबार और सुदर्शन जैसे चैनल भी अपनी बात रखने के लिए बुलाते हैं और मेरे पास समय होगा, मेरी सुविधा के हिसाब से इंतजाम होगा तब मैं बोलने जरूर जाऊंगा। इन सुविधाओं में घर से लाना-वापस छोड़ना, रास्तेभर पानी, फ्रूट्स, वॉशरूम का इंतजाम, राह खर्च और प्रोत्साहन राशि शामिल है। मैं मीडिया और साहित्य का छात्र हूं। मेरा एक ही धर्म है संवादधर्मिता। हम हर हाल में अपनी बात रखना चाहते हैं और कोई भी मंच मुझे अपने तरीके से बोलने देगा, सुरक्षित ले जाएगा और वापस घर छोड़ देगा तो मैं इस धर्म के साथ हूं। रही बात प्रतिबद्धता की तो वो मेरे भीतर गहरे रूप में मौजूद है, रहेगी। हमने इस मंच पर जाना है, उस मंच पर नहीं जाना। ये डिब्बाबंदी मुझे प्रतिबद्ध कम, मानसिक रोगी ज्यादा बना देगा। ये एक स्वस्थ समाज के लिए खतरनाक और नए किस्म की छुआछूत की बीमारी है और मुझे मेरे शुभचिंतकों ने कम से कम लोड लेकर जीने की सलाह दी है। मैं ऐसी बीमारी से दूर रहना चाहता हूं। हम कोई बुद्धिजीवी नहीं है, किसी पार्टी के कार्यकर्ता नहीं हैं। हम नॉलेज प्रोड्यसूर हैं और प्रोड्यूस करने के साधन जहां मिलेंगे, वहां करूंगा। मैंने अपने इस छोटे से जीवन में पार्टी, संस्थान, व्यक्ति के प्रति प्रतिबद्धता की होर्डिंग लगाकर, विचार और मौके पर फैसले के स्तर पर एक से एक धुरंधर लोगों को मैनेज होते, जनतंत्र विरोधी होते देखा है। ऐसे में मुझे बदनाम होकर, शक किए जाने पर भी अपने से अलग, विपरीत और असहमत लोगों, मंचों के बीच बोलना पसंद है।“

विनीत, आपने ये दोनों पोस्ट वैसी ही अच्छी और धाराप्रवाह लिखीं जैसे कि आप हमेशा लिखते रहे हैं। नहीं कह सकते कि आपने दूसरी पोस्ट सफ़ाई वाले अंदाज़ में क्यों लिखी। लेकिन इसमें आपने लिखा कि आप इस कार्यक्रम में हमारी-आपकी दुनिया कितनी आजाद है, उन सारे मुद्दों पर बातचीत करेंगे। आपने ये भी अच्छा कहा कि आप इस विमर्श का जनाना डब्बा बनाने के बजाय, दूसरे उन कई मसलों पर बातचीत करेंगे जिनमे आपकी दिलचस्पी होगी। विनीत ने दूसरी पोस्ट में ये भी कहा कि विपरीत और असहमत लोगों, मंचों के बीच बोलना पसंद है।

विनीत के मुताबिक जिन मसलों पर सबकी दिलचस्पी होगी, उन सभी पर विमर्श करेंगे। विनीत मेरी दिलचस्पी इस कार्यक्रम के आयोजक ‘जागरण ग्रुप’ से जुड़े कुछ मसलों पर हैं। और ये मसले ‘आजादी’ से ही जुड़े हैं। लेकिन इन मसलों पर आऊं, इससे पहले एक बात बताना चाहता हूं। पत्रकारिता के पुरोधा दिवंगत प्रभाष जोशी जी ने एक बार अरविंद केजरीवाल से अपनी नाराज़गी जताई थी। दरअसल प्रभाष जोशी ने आरटीआई यानी सूचना के अधिकार संबंधी घोषित पुरस्कार की जूरी में इसी ग्रुप के संपादक-मालिक के होने पर ऐतराज़ जताया था। यही ग्रुप रोहतक में भी संवाद कार्यक्रम करने जा रहा है। विनीत आपने अपनी पोस्ट में लिखा है कि आप किसी भी मंच पर जाकर बोलेंगे बशर्ते कि आपको अपने तरीके से बोलने दिया जाए। विनीत इस कार्यक्रम के मॉडरेटर हैं, इसमें कोई आपत्ति नहीं है। दिलचस्पी इस बात पर है कि विनीत इस कार्यक्रम में क्या बोलते हैं। क्या वे अपने मेज़बान आयोजक की विसंगतियों और खामियों पर सवाल उठा सकेंगे।

क्या विनीत कह सकेंगे कि आजादी पर विमर्श तभी सार्थक होगा जब जागरण ग्रुप अपने कर्मचारियों को भी ईमानदारी से उनके हक़ देगा। क्या उनके साथ गुलामों जैसा व्यवहार बंद कर सम्मान के साथ कार्य करने का अधिकार दिया जाएगा। क्या उचित मेहनताने के लिए आवाज़ उठाने वाले कर्मचारियों पर उत्पीड़न की कार्रवाई बंद की जाएगी। आईबीएन-सीएनएन से करीब 320 कर्मचारियों की छंटनी के ख़िलाफ़ जिस तरह आवाज़ उठाई गई थी, क्या जागरण के संवाद मंच से ही उसके कर्मचारियों के हक़ में आवाज़ उठाई जा सकेगी। विनीत इस पर क्या रुख अपनाते हैं, ये देखना दिलचस्प होगा।

विनीत आपने कहा कि ये कार्यक्रम मूलत: जनाना डिब्बे से जुड़े मसलों पर है। विषय भी है नारी से जुड़ा आज़ादी और दायरा। यहां भी जागरण ग्रुप से जुड़े दो मसले विचार के लिए आपकी पेश-ए-नज़र हैं। विनीत इस कार्यक्रम में विमर्श से पहले आगरा की समाज सेविका प्रतिमा भार्गव की कहानी ज़रूर जान जाइएगा। जागरण ग्रुप के ही अखबार आई-नेक्स्ट के दुर्व्यवहार, मानहानि, प्रताड़ना की कहानी सुनाते सुनाते प्रतिमा दिल्ली प्रेस क्लब में प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए रो पड़ीं थीं। मसालेदार खबर परोसने के चक्कर में इस समाजसेविका के चाल चलन चरित्र पर ऐसी फर्जी मनगढ़ंत खबर छाप दी कि इनका जीना मुश्किल हो गया। घर परिवार समाज में इनकी इज्जत दाव पर लग गई।

इसी ग्रुप से जुड़ा दूसरा किस्सा तो हाल ही का है। बुलंदशहर में महिला आईएएस बी. चंद्रकला के खिलाफ लगातार कुत्सित अभियान चलाने वाले दैनिक जागरण से नाराज होकर लोगों ने अखबार और इसके पदाधिकारियों का पुतला भी फूंका था। जागरण की इस मुहिम के शुरू होने का कारण जागरण के द्वारा उस आरोपी के साथ खड़े होकर उसकी पैरवी करना था जिसने डीएम के आफिस में घुसकर उनकी जबरन सेल्फी ली थी। डीएम तो छोड़िए क्या कोई किसी आम महिला के साथ भी बिना उसकी इजाज़त लिए सेल्फी लेने गुस्ताख़ी कर सकता है। क्या ये किसी महिला की आज़ादी में अतिक्रमण नहीं था। फिर ऐसे शख्स की पैरवी किस आज़ादी के अधिकार से। हो सकें तो विनीत इन मुद्दों पर आज के कार्यक्रम में ज़रूर बोलना। आपने खुद ही कहा है कि आपको अपने हिसाब से बोलने दिया जाए तो आप किसी भी मंच पर जाकर बोल सकते हैं। अब मंच जागरण का है…और बोलना आपको है…आप क्या बोलते हैं और जागरण क्या छापता है, इसी पर हम सब की नज़रें हैं।

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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हिन्दी चैनलों के संपादक अपने बॉस एंकर सुषमा स्वराज की हिन्दी चिंता पर टीटीएम में लगे हैं!

Vineet Kumar : हिन्दी चैनलों के संपादक ऑब्लिक बॉस एंकर सुषमा स्वराज की हिन्दी चिंता पर जिस कदर टीटीएम में लगे हैं, एक बार पलटकर सुषमा स्वराज पूछ दें कि आपने अपने चैनलों के जरिए किस तरह की हिन्दी को विस्तार दिया तो शर्म से माथा झुक जाएगा. इन संपादकों को इतनी भी तमीज नहीं है कि ये समझ सकें कि वो जो चिंता जाहिर कर रही है, उनमे हम संपादकों के धत्तकर्म भी शामिल हैं. आखिर उन्हें लाइसेंस हिन्दी चैनल चलाने के दिए जाते हैं, हिंग्लिश के तो नहीं ही न..

ये सब शर्मो हया धोकर गटर में डाल देने वाले हिन्दी के संपादक हैं… भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के हिन्दी की दुर्दशा पर चिंता जताए जाने की अदा पर राहुल देव, अजीत अंजुम, उमेश उपाध्याय जैसे संपादक, टीवी और मीडिया सेमिनारों के चमकीले चेहरे मार लहालोट हुए जा रहे हैं. बेशर्मी की हद तक जाकर वो जो अपडेट कर रहे हैं, उन्हें सुषमा स्वराज तक पहुंचाने की( वर्चुअली ही सही) पूरजोर कोशिश और नंबर बनाने में लगे हैं..लेकिन ये हिन्दी समाचार चैनलों के लिए काम करनेवाले वो दिग्गज चेहरे हैं जिन्हें आधे घंटे के एक कार्यक्रम के लिए हिन्दी के नाम तक नहीं सूझते.

अजीत अंजुम को भाषा पर महारथ हासिल है लेकिन चैनल सास, बहू और संस्पेंस के जरिए अनुप्रास अलंकार के आगे जाकर हांफने लग जाता है. इधर राहुल देव अंग्रेजी से एमए होने के बावजूद मीडिया सेमिनारों में हिन्दी की कंठी-माला जपते थकते नहीं. ये तस्वीर एक पत्रिका के पूरे पेज में छपे विज्ञापन की है. उस वक्त ये सीएनइबी के सीइओ हुआ करते थे. जो विज्ञापन आप पत्रिका में देख रहे हैं, उसकी कटआउट से पूरे शहर को पाट दिया गया था. यहां तक कि फ्लाईओवर से गुजरते हुए ये विज्ञापन दिखाई देते.

ये राहुल देव जब सीएनइबी के सीइओ रहे तो शहर को इस होर्डिंग से ऐसा पाट दिया कि कहीं से नहीं लगता था कि ये हिन्दी चैनल है..लेकिन सेमिनारों में भाषाई शुद्धता और हिन्दी प्रेम पर मार ठेले रहते हैं..

चैनल की भाषा भी हिन्दी थी और उसके सीईओ भी हिन्दी पर जान लुटा देनेवाले लेकिन विज्ञापन अंग्रेजी में. मतलब ये कि ये जिन कुर्सियों पर बैठकर काम करते आए हैं, चाहते तो चैनलों के जरिए लोगों के बीच हिन्दी का एक बेहतर रूप पेश कर सकते थे. कुछ नहीं तो इसे गैरजरूरी ढंग से हिंग्लिश होेते जाने से रोक सकते थे लेकिन नहीं..ऐसा करते तो फिर बाजार की पिछाड़ी बर्दाश्त करने की ताकत कैसे जुटा पाते.. अब सुषमा स्वराज हिन्दी भाषा को लेकर जिस तरह की चिंता जाहिर कर रही है, ये उनके आगे लहालोट हो जाने और नंबर बनाने का मुद्दा नहीं है, शर्म से सिर झुकाकर चुप मार जाने का है..अपने किए पर अफसोस करने का है. लेकिन शर्म भी जो एक चीज होती तब न..

मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से. उपरोक्त पोस्ट पर आए कई कमेंट्स में से एक मुख्य कमेंट यहां पेश है :

Som Prabh : राहुल देव बहुत पहले से संदिग्ध हो चुके हैं. यह एक वक्त में हिंदी के खत्म होने की भविष्यवाणी कर रहे थे. भोपाल में एक कार्यक्रम में भास्कर को भाषा के लिए शाबासी देने लगे. सभा में मैंने उठकर टोका कि कुछ भी कहें लेकिन गलत बयानी न करें. यह देख लें कि भास्कर लिख क्या रहा है. बहुत ही अति उत्साह से भरा कार्यक्रम था. प्रियदर्शन सर ने बढ़िया बोला था और भाषा के प्रति रवैये को लेकर खुले मन से आलोचना की थी. यह भी दिलचस्प है कि टीवी रिपोर्टर होकर अखिलेश शर्मा ने अपने ब्लॉग पोस्ट में टीवी की भाषा पर टिप्पणी नहीं किया. क्या अखबार ही खराब किस्म की भाषा इस्तेमाल कर रहे हैं.

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गौहर रज़ा हैं देशद्रोही कवि! शर्म करो जी न्यूज!!

Vineet Kumar : गौहर रज़ा हैं देशद्रोही कवि! शर्म करो जी न्यूज!! इन दिनों जी न्यूज अफजल प्रेमी गैंग नाम से खबरों की सीरिज चला रहा है. उसने राष्ट्रभक्ति का दायरा इतना संकुचित कर लिया है कि जो सत्ता के साथ नहीं है, जो लंपटता का विरोध करता है, वो इनके हिसाब से देशद्रोही है. प्रतिरोध में अपनी बात कहनेवाले को ये चैनल देशद्रोही का सर्टिफिकेट जारी करने में बहुत ज्यादा वक्त नहीं लगाता.

चैनल पर इनके एंकर अपने व्यावसायिक हितों और सत्ताधारियों के प्रति अपनी जड़ प्रतिबद्धता साबित करने के लिए ऐसी खबरों का लगातार प्रसारण तो कर ही रहे हैं, अपने निजी ट्विटर अकाउंट से भी देश के मीडियाकर्मियों, कलाकारों एवं लेखकों को देशद्रोही करार देने, अश्लील और भद्दी टिप्पणियां करने से बाज नहीं आ रहे. पिछले दिनों रोहित सरदाना और सुधीर चौधरी ने बरखा दत्त को लेकर जितनी भद्दी टिप्पणियां की मसलन वेश्या का बाजार जब मंदा पड़ जाता है तो वो कोठे से उतरकर सड़कों पर आकर ग्राहक खोजने लग जाती हैं, बरखा दत्त उसी तरह जेएनयू चली गईं आदि-आदि.

चैनल, वेबसाइट से लेकर निजी अकाउंट से अश्लीलता, अमानवीय हरकतों को प्रोत्साहित करने से लेकर लेखकों की जिंदगीभर की साख को दर्शकों के सामने खत्म करने का कुचक्र किस तरह ये चैनल रच रहे हैं, इसके शिकार कवि गौहर रजा भी हुए हैं. चैनल ने अपने अफजल प्रेमी गैंग सीरिज में इन्हें भी देशद्रोही बता दिया. अगर देशभक्ति की भाषा और उसकी परिभाषा यही है तो हम इस जी न्यूज की इस परिभाषा के प्रति अपनी गहरी असहमति व्यक्त करते हैं.

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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स्क्रीन पर स्त्री : जो खल चरित्र होंगी वो प्रगतिशील, पढ़ी-लिखी, कामकाजी, खुद की पहचान के लिए जद्दोजद करती नजर आएंगी

 

दिल्ली। टेलीविजन अपने चरित्रों को पहले लोकप्रिय बनाता है और फिर हमारे वास्तविक जीवन में उसकी दखल होती है। हम जो वास्तविक जिंदगी मे हैं वो व्यक्तित्व टेलीविजन बाहर निकालकर लाता है| उक्त विचार सुपरिचित मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार ने हिन्दू कालेज की वीमेंस डेवलपमेंट सेल के वार्षिक उत्सव समारोह मे ”स्क्रीन पर स्त्री ”विषय  संगोष्ठी में व्यक्त किए।

विषय के टेलीविजन से जुड़े पक्ष पर विनीत कुमार ने कहा कि इस दिल्ली शहर में दर्जनों ऐसी शॉप, शोरूम हैं जहां बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होता है- यहां टीवी सीरियलों की डिजाईन की जूलरी मिलती है। आप चले जाईए कटरा अशर्फी और सिरे से खारिज कीजिए साडियों की डिजाईन, लंहगे की स्टाईल और रंगों को..दूकानदार आपको सीधा जवाब देगा कि आप जिसे नापसंद कर रही हैं, उसे अक्षरा, काकुली, पार्वती, प्रिया भाभी पहनती हैं। कई बार दर्शक खुद ग्राहक की शक्ल में इनकी मांग करते हैं।

उन्होंने कहा कि दूसरी तरफ टीवी स्क्रीन का पर्दा अपने तमाम स्त्री चरित्रों को अच्छे-बुरे में विभाजित करता है। कोहेन ने सोप ओपेरा पर गंभीर अध्ययन करते हुए विस्तार से बताया है कि जो अच्छी चरित्र के खाते में होंगी वो परंपरा, परिवार, मूल्य, संस्कार आदि (भले ही वो कई स्तरों पर जड़ ही क्यों न हों) बचाने में सक्रिय होंगी जबकि जो खल चरित्र होंगी वो प्रगतिशील, पढ़ी-लिखी, कामकाजी, खुद की पहचान के लिए जद्दोजद करती नजर आएंगी. अकादमिक-साहित्यिक दुनिया से ये बिल्कुल उलट छवि हैं।

संगोष्ठी में पक्ष सिनेमा पर बात करते हुए युवा फिल्म आलोचक मिहिर पंड्या  ने बताया  कि हिन्दी सिनेमा हमेशा नायक प्रधान होता है जिसमे नायिका का काम नायक को उत्कर्ष तक पहुँचाना होता है। स्त्री को केन्द्र मे रखकर सिनेमा इतिहास पर बात करते हुए ”मदर इंडिया ” से इधर की ‘क्वीन’  और ‘मसान’  जैसी समसामयिक फिल्मों की चर्चा की।  मदर इंडिया के क्लाइमेक्स पर बात करते हुए ”राधा माँ” को भारत माँ का सुपर इंपोज़ होते हुए बताया जिसका सीधा संबंध आज़ाद भारत मे प्रेम के मानक को गढ़ना था। 1995 मे आई सुपर हिट फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएगे’ को उदारीकरण,भूमंडलीकरण से जोड़कर देखते हुए थम्स अप जैसे उत्पादों को सिनेमा द्वारा संकेतिक रूप से स्वीकारने की बात कही।

संगोष्ठी में मौजूद बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने दोनों वक्ताओं से अपने सवाल पूछे। संगोष्ठी के प्रारम्भ में दोनों वक्ताओं का परिचय देते हुए हिंदी विभाग के अध्यापक डॉ पल्लव ने कहा कि सिनेमा और टीवी की आलोचना को अकादमिक बहसों की गंभीरता के स्तर पर चिंतन योग्य बनाने में विनीत और मिहिर के लेखन की बड़ी भूमिका है। दोनों अतिथियों, सेल की छात्राओं और डॉ नीलम सिंह ने दीप प्रज्ज्वलन कर आयोजन का शुभारम्भ किया। संगोष्ठी में हिन्दू कालेज के अतिरिक्त बाहर के कालेजों से भी अध्यापक और विद्यार्थी उपस्थित थे। इससे पहले फूलों से अतिथियों का स्वागत किया। अंत में वीमेंस डेवलपमेंट सेल की प्रभारी डॉ रचना सिंह ने सभी का आभार माना।

अनुपमा रे

अध्यक्षा, वीमेंस डेवलपमेंट सेल

हिन्दू कालेज, दिल्ली

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सीएनएन-आईबीएन ने इसलिए अपने दर्शकों के साथ किया धोखा…

Vineet Kumar  : सीएनएन-आइबीएन का एक्सिस-एपीएम सर्वे एजेंसी से करार था..वो अपने दर्शकों से धमाकेदार प्रोमो के साथ वादा कर रहा था कि सबसे पहले और चौंकानेवाले एक्जिट पोल के नतीजे पेश करेगा लेकिन.. प्रोमो के बाद उसने एक्जिट पोल पर इस कार्यक्रम के प्रसारण का इरादा बदल दिया..ऐसा मेरी याद में शायद पहली बार हुआ होगा कि किसी चैनल ने जिस प्रोमो पर लाखों रूपये खर्च किए हों वो कार्यक्रम ही न दिखाए अब जबकि बिहार के चुनावी नतीजे की तस्वीर साफ हो गई है, इसकी वजह बेहद साफ दिखाई देती है.

एक्सिस ने महागठबंधन को 169-183 के करीब और भाजपा को 58-70 और सहयोगियों को 3-7 सीट की बात की थी..मतलब एनडीए की बुरी तरह हार.. चुनावी नतीजे के पहले स्वाभाविक था कि रिलांयस इन्डस्ट्रीज का ये चैनल अपनी सरकार की पार्टी को इस कदर शर्मसार नहीं कर सकती थी..नतीजा इस व्यावसायिक करार के बावजूद इसने प्रसारण नहीं किया और एजेंसी ने साइट पर अपनी खबर प्रकाशित कर दी और बाकी के चैनलों के लिए भी इस्तेमाल करने पर कोई दिक्कत नहीं की बात कहीं. हम सब जानते हैं कि जी न्यूज के मुखिया सुभाष चंद्रा खुलेआम रैलियों में बीजेपी के लिए वोट देने की जनता से अपील करते हैं, हमें पता है कि टीवी 18 रिलांयस इन्डस्ट्री समूह का चैनल है( वार्षिक रिपोर्ट भी देखें) लेकिन इस तरह दर्शक के साथ खुलेआम धोखा चैनल की रही सही साख को भी खत्म कर देगा.

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ये जनादेश मेनस्ट्रीम मीडिया के उन तमाम पार्टी कार्यकर्ता टाइप के मीडियाकर्मी के खिलाफ है… ये जनादेश न्यूज 24 और टुडेज चाणक्य की ब्रांड इमेज को डेंट मार गया. कांग्रेसी चैनल होने के बावजूद टुडेज चाणक्य के सहयोग से ये चैनल अच्छे दिन की सरकार के लिए भरोसेमंद बनने की कोशिश कर रहा था, वो भरभराकर गिर गया. न्यूज 24 पहले से भी कबाड़ चैनल रहा है, अब और कबाड़ा हो गया..पार्टी बदलने से राजनीति चमक सकती है लेकिन मीडिया इस फार्मूले पर काम नहीं करता..उसके लिए एक ही पार्टी है- विश्वसनीयता.

ये जनादेश जितना चुनाव को इन्डस्ट्री में तब्दील कर दिए जाने के खिलाफ है, उतना ही मेनस्ट्रीम मीडिया के कार्यकर्ता की शक्ल में पेश आनेवाले के खिलाफ हैं. ये उन एंकरों के खिलाफ है जो न्यूजरूम में होकर भी पार्टी कार्यालय की मानसिकता से बात करते हैं.. बाकी, सोशल मीडिया जिंदाबाद..इसने न्यूज चैनलों से ज्यादा संवादधर्मिता बनाए रखी..जो एक खास पार्टी के समर्थन में लिखते रहे वो भी हमारी बात सुनते रहे..और हमें भी उनसे बात करते रहना जरूरी लगता रहा..हम जैसे लोग बस यही कामना करते हैं कि ये समाज पढ़ने-लिखनेवाले, सोचनेवाले की दुनिया से आबाद रहे..सरकार चाहे जिसकी भी हो वो ये समझे कि हम असल सवालों से मुंह चुराकर किन सवालों की प्राइम टाइम में झोंकते जा रहे हैं.

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सिर्फ एनडीटीवी की ही नहीं, आजतक सहित कई महिला मीडियाकर्मियों के साथ बदसलूकी… एनडीटीवी की मीडियाकर्मी भैरवी सिंह के साथ बदसलूकी की बात की जाने के बाद अब आजतक की मौसमी सिंह सहित दूसरे कई मीडिया संस्थानों की मीडियाकर्मी के साथ संस्कृति रक्षकों और तथाकथित देश में सहिष्णुता का विस्तार करनेवाले प्रदर्शनकारियों की ओर से बदतमीजी करने का मामला सामने आया है. भैरवी सिंह के बारे में संस्कृति रक्षकों ने यहां तक कहा कि उसके मुंह से शराब की बू आ रही थी, खुद लोगों को उकसाने का काम किया, लोगों को गुंडा कहा लेकिन आजतक की मौसमी सिंह सहित कई दूसरे चैनलों की ओर से एक-एक कर शिकायत सामने आने लगी है. हम उम्मीद करते हैं कि रातभर तक इन सभी को नशे में धुत्त, उकसानेवाली और इनके साथ जो कुछ भी हुआ, वो इसी लायक हैं, वीडियो सहित बयान तैयार होंगे.

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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लखनऊ के एक अस्पताल की इमरजेंसी में भर्ती ठुमरी गायिका जरीना बेगम को मदद की सख्त जरूरत

Vineet Kumar : लखनऊ के वाशिंदे, संगीत के कद्रदान, आप कुछ तो कीजिए.. ”अम्मा आपको बहुत दुआएं देतीं हैं भैया, बहुत याद करती हैं..फिर जल्दी आना मिलने लखनऊ…” रुबीना दीदी ने फोन पर जब इतना कहा तो अपने आप आखों में आंसू छलक आए..फफककर रो पड़ा. ज़रीना बेगम, ये नास्तिक आपके लिए प्रार्थना भी नहीं कर सकता. वो पहली मुलाकात में बस आपको एकटक देखता रहा..चेहरे की झुर्रियों में आपकी ठुमरी, रियाज़ और बेगम अख़्तर का अक्स पढ़ता रहा. आप कितना कुछ बोलना चाहती थीं हमसे लेकिन बेबस नज़र आयीं..आपके लड़के ने हमें बताया- अम्मा के आगे अभी तबला-हारमोनियम देय दो तो गाने लग जांगी…फिर कहने लगे,अम्मा ठीके थीं,जब पता पड़ा कि बिजली बिल जमा नहीं करने पर ये घर नीलाम हो जागा तो चिंता में घुलने लगीं.

ज़रीना बेगम, हमें नहीं पता है कि लेखक के, कलाकार के सम्मान में, उसके संघर्ष की आत्मा से गुजरते हुए उनकी कैसे मदद की जाती है… कई बार हम भावुक होकर उलटा उन्हें ठेस पहुंचाकर आ जाते हैं.. उस वक़्त भी मेरे मुंह से अनायास निकल गया- तो आप इनकी नज़र के सामने तबला, हारमोनियम और गायन से जुडी चीजें क्यों नहीं रखते? इन्हें अच्छा लगेगा. बाद में अपने प्रति ही हिकारत हुई. एक बार फिर.. आपके कमरे, दीवारों पर टंगी चीजें और आहाते के एक हिस्से को रसोई की शक्ल देने की कोशिश पर नज़र गयी. अखिलेश यादव ने आपको जिस सम्मान से नवाज़ा है, वो भी उसी थैले में खूंटी पर टंगी है. आप पर की गयी तहलका, ओपन, एक्सप्रेस और तमाम मैगज़ीन-अखबारों की रिपोर्ट, बेगम अख़्तर के साथ की आपकी तस्वीरें, भारतीय संस्कृति परिषद् का सम्मान-पत्र, एक-एक करके दीदी ऐसे निकाल रहीं थीं जैसे मेरी माँ बॉक्स पलंग से आज से पचास साल पहले नाना की तरफ से दिए कांसा-पीतल के बर्तन दिखाती हैं.

आपके हिस्से जो भी है, सब अतीत है..सुख के सारे क्षण उसी में सिमट गए गए हैं. आपके वर्तमान में कितनी वेदना है, तड़प है अजीना बेगम. दुनिया आपके गायन को, ठुमरी को, बेगम अख्तर की आखिरी शिष्या की आवाज़ बताकर करोड़पति बन गए..एकाध को छोड़कर किसी ने पलटकर देखा तक नहीं..फिर भी आपको किसी से कोई शिकायत नहीं है. शिकायत है तो उस जुनूनी हिमांशु (Himamshu Bajpayee) से जो बहुत कम शब्दों में अपना परिचय लखनऊ का आशिक बताकर करता है. आपको लगता है वो आपसे शायद नाराज़ है सो मिलने नहीं आया कई दिनों से. उससे कोई शिकायत नहीं जो आपसे सीखने, इंटरव्यू करने एक कलाकार की हैसियत से, पत्रकार की हैसियत से आए लेकिन आदमी बनकर कभी लौटे नहीं.

आपसे मुलाकात के बाद मुझे बेचैनी थी सीधे अपने कमरे में जाने की जिससे कि मैं दरवाजा बंद करके जी भरकर रो सकूँ..मेरा मन था विधान सभा के आगे जाकर जोर से चिल्लाकर कहने की- अखिलेश साहब, आपको याद है आपने कभी बेगम अख्तर के सम्मान में लाखों रूपये खर्च करके कार्यक्रम कराया था, बड़ी मुश्किल से उनकी आखिरी शिष्या आयीं थी सम्मान लेने? कभी पलटकर आपके कारिंदों ने सुध भी ली. मतदाता आप जैसे को मंत्री, विधायक बनाते हैं और कलाकार के जरिए आपकी सरकार खुद को ब्रांड लेकिन इन कलाकारों का,मतदाता का क्या होता है, कभी तो पीछे मुड़कर देखिये…

लखनऊ के वाशिंदे, आपने तीन दिनों में मेरे ऊपर जितना प्यार लुटाया, आपसे बड़ी उम्मीद बंधी है..लिखते हुए लग रहा है- आप निराश नहीं करेंगे. आपकी, हमारी ज़रीना बेगम की हालत बेहद खराब है. वो केके हॉस्पिटल, (नबीउल्लाह रोड, लखनऊ सिटी स्टेशन) की इमरजेंसी वार्ड में भर्ती है. आप एक बार उस परिवार से मिलें, उनके साथ हों, डेढ़ घंटे की मुलाकात के भरोसे मैं कह सकता हूँ, बहुत ही खुद्दार लोग हैं ये. कभी इन्हें शिकायत नहीं रही कि उत्तर प्रदेश के कई मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री रह चुकी शख्सियत से व्यक्तिगत पहचान रही है ज़रीना बेगम की, कभी कुछ करने को नहीं कहा. लेकिन इस वक़्त उन्हें कई स्तर पर ज़रूरत है.. आप आगे आएं.. आप साथ नहीं होंगे तो तो इनकी आवाज़ ताउम्र आपके बीच एक कचोट बनकर मौज़ूद रहेंगी बस…

मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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शुक्र मनाइए सुधीर चौधरी सरकार के मीडिया सलाहकार नहीं हुए अन्यथा पुरस्कार लौटाने वाले तिहाड़ जेल में होते!

Vineet Kumar :  जिस संपादक/एंकर को सलाखों के पीछे होना चाहिए उसे मालिक ने प्राइम टाइम में देश की डीएनए टेस्ट करने के लिए बिठा दिया है. ऐसे में जाहिर है कि वो पत्रकारिता नहीं, शोले के डायलॉग बोलेगा. शुक्र मनाइए कि ऐसा संपादक अभी तक मीडिया सलाहकार नहीं हुआ है..नहीं तो उलटे पुरस्कार लौटानेवाले लेखक तिहाड़ जेल में होते. उनपर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाया जाता.

जी न्यूज के दागदार संपादक/एंकर सुधीर चौधरी हम जैसे की एफबी वॉल या अपने उपर लिखी स्टेटस पर मिली टिप्पणियों से गुजरते होंगे या कोई उन तक ये संदेश प्रेषित करता होगा तो पढ़कर भाव विह्वल( हायपर इमोशनल ) हो जाते होंगे. उनके समर्थन में जिस तरह से लोग टूट पड़ते हैं, उतना तो उऩके जेल जाने पर उनके मातहत काम करनेवाले मीडियाकर्मी तक खुलकर साथ नहीं आए थे.

किसी खास राजनीतिक दल की टीटीएम करने का क्या लाभ होता है, वो देखकर गदगद होते होंगे कि सैंकड़ों टीटीएमकर्मी बिना किसी पीआर एजेंसी की एफर्ट की फ्री ऑफ कॉस्ट मिल जाते हैं जो मातहत मीडियाकर्मी से कहीं ज्यादा बीच-बचाव कर सकते हैं. बाकी स्टेटस लिखनेवाले हम जैसे को बोनस में गालियां मिलती है, वो अकड़ने की अलग वजह बनती होंगी.

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.


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जो व्यक्ति अपने पेशे से गद्दारी करके जेलयात्रा कर चुका है वह साहित्यकारों को उपदेश दे रहा है!

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प्रो. नामवर सिंह की बाडी लैंग्वेज देखते हुए लगा कि ये आदमी अपने पारिवारिक जीवन में भी बहुत डेमोक्रेटिक नहीं है!

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उस लड़की ने इंडिया टुडे टीवी की डिप्टी एडिटर प्रीति चौधरी से पलट कर पूछ लिया- आप जहां से आईं हैं, वो महिलाओं के लिए सुरक्षित है?

Vineet Kumar : इंडिया टुडे टेलीविजन की डिप्टी एडिटर प्रीति चौधरी ने अपनी खास रिपोर्ट हाफ बिहार में सतरह-अठारह साल की एक लड़की से सवाल किया- आपको लगता है कि बिहार लड़कियों के लिए सुरक्षित जगह है? जाहिर है प्रीति चौधरी का सवाल करने का अंदाज ऑथिरिटेरियन था जैसा कि आमतौर पर टीवी के पत्रकार ठसक से पूछते हैं. हालांकि प्रीति चौधरी के इस शो की विजुअल्स और कैमरा वर्क पर गौर करें तो फ्रेम दर फ्रेम रवीश कुमार के शो ये जो हमारा बिहार है से मिलाने की कोशिश है.

जिस तरह रवीश के शो में पीछे से किसी फिल्मी गाना बजता रहता है, उनकी खुद की कैब से शीशे के नीचे ड्राइवर की श्रद्धा-सामग्री के तौर पर देवी-देवता की प्लास्टिक की मूर्ति झूलती रहती है, वो सबकुछ ठीक वैसा ही. प्रीति चौधरी खुद भी रवीश का अंदाज अपनाने की नाकाम कोशिश कर रही थीं. तभी इस सवाल के बाद लड़की ने हां या न में उत्तर देने के बजाय पलटकर सवाल किया- आप जहां से आई हैं, वो महिलाओं के लिए सुरक्षित है? बिहार महिलाओं के लिए दिल्ली से ज्यादा सुरक्षित है.

उस वक्त तो प्रीति चौधरी को कुछ बोलते न बना..बस इतना कहकर आगे बढ़ गईं- थोड़ा तो ज्यादा सुरक्षित है. जब मैं इस शो को देख रहा था बल्कि इन दिनों टेलीविजन एंकर्स,रिपोर्टर्स से जिस अंदाज में लोगों को बात करते स्क्रीन पर देखता हूं, साफ झलक जाता है कि वो अब इन्हें ऑथिरिटी नहीं मानते. आमतौर पर रिपोर्टर्स उनकी समझ को अंडरस्टीमेट करने की कोशिश करते हैं, उन्हें एहसास करा देते हैं कि आप जैसी समझ रखते हैं, मामला वैसा है ही. टीवी के आंतक, फैनडम और दूसरी तरफ दर्शकों का इस आत्मविश्वास से अपनी बात रखना कम से कम जनतांत्रिक प्रक्रिया के लिए सुखद है. मुझे नहीं पता, ये बदलाव कहां से आ रहे हैं.

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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हे टीवी मीडिया के महंतों, अब बताओ साहित्य कौन देख रहा है जो प्राइम टाइम में ताने हुए हो

Vineet Kumar : मुझे फिलहाल मीडिया के उन सारे महंतों का चेहरा याद आ रहा है जो उपहास उड़ाते हुए पूछते थे- अब कौन पढ़ता है साहित्य, कौन देखेगा साहित्य की खबर? अभी कौन देख रहा है जनाब जो प्राइम टाइम में ताने हुए हो..सीधे पैनल डिस्कशन पर उतरने से पहले दो मिनट की पैकेज तो लगा दो..पता तो चले काशीनाथ सिंह कौन हैं, मुन्नवर राणा कौन है, उदय प्रकाश किस पेशे से आते हैं?

टीवी के दर्शक वेवकूफ नहीं थे..तुमने स्ट्रैटजी के तहत साहित्य से, कला से, देश की संस्कृति से काटकर उसे डफर बनाने की कोशिश की..तब भी नाकाम ही रहे. जो कभी न्यूजरूम में पूछा करते थे- अमृता प्रीतम गायिका है, वो साहित्यकारों पर तनातनी कर रहे हैं. साहित्य अकादमी में सरकार के दावे और छवि का तो जो हो रहा है, वो है ही..पोर-पोर कलई खुल रही है कि चैनलों के महंत कितने पढ़े-लिखे हैं?

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ये बात बर्दाश्त नहीं की जा सकती कि हम मेहनत से, बिना किसी से प्रभावित हुए काम करें और आप हमें दलाल बताएं : रवीश कुमार

Vineet Kumar : मैं तो प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को सुझाव देना चाहता हूं कि आप ये बिल्कुल स्पष्ट कर दो कि कौन बीजेपी का पत्रकार है, उसके लिए काम कर रहा है, कौन कांग्रेस के लिए या किसी दूसरी पार्टी के लिए. सारा झंझट ही खत्म हो जाएगा. कम से कम लोगों के सामने चीजें स्पष्ट तो होंगी… लेकिन ये बात बर्दाश्त नहीं की जा सकती कि हम मेहनत से, बिना किसी से प्रभावित हुए काम करें और आप हमें दलाल बताएं.

ये सवाल आप मुझसे या पत्रकार समुदाय से मत कीजिए कि भारत में पत्रकारिता का क्या भविष्य है? ये सवाल समाज से किया जाना चाहिए कि आखिर आप किस तरह का पत्रकार चाहते हैं? इस पेशे में लोग आते हैं, शुरू-शुरू में सवाल करते हैं, असहमति जताते हैं लेकिन आखिर तक आते-आते या तो उनकी रीढ़ तोड़ दी जाती है, इसी सिस्टम के कल-पुर्जे हो जाते हैं और सब कुछ पहले की ही तरह बरकरार रहता है, कुछ भी बदलता नहीं. रही बात राजनीतिक पार्टियों की तो जो सत्ता से बाहर हैं, वो हर बात में सरकार की तरफ सवाल तो जरूर उछाल देते हैं लेकिन लोगों के बीच जाकर काम नहीं करते.. आखिर ड्राइंगरूम से बैठकर बयान जारी करते रहने से कितना-कुछ बदल सकेगा?

पूरा इंटरव्यू इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं: The Ravish Kumar interview: ‘Our lazy liberal class was always opportunistic’

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मैं इन दिनों घोर अंतर्द्वन्द से गुज़र रहा हूँ, भीतर से बेचैन हूँ : रवीश कुमार

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परम आदरणीय जनरल वीके सिंहजी, आप आचमनकर्ता हिन्दी प्रेमियों को आखिर बुलाते ही क्यों हैं?

Vineet Kumar : नवरात्र के दौरान विश्व हिन्दी सम्मेलन आयोजित करवाने के संदर्भ में;

परम आदरणीय जनरल वी.के.सिंहजी
जय हिन्दी
जय भारत

विदेश राज्यमंत्री जनरल वी.के.सिंह साहब, आपने दुरुस्त ही फरमाया है कि विश्व हिन्दी सम्मेलन में लोग शराब पीने जाते हैं. हजूर, राष्ट्र और सरकार का अपमान न हो तो बस इतना कहना चाहूंगा कि आप आचमनकर्ता हिन्दी प्रेमियों (जो आपके हिसाब से शराबी लेखक हैं) को आखिर बुलाते ही क्यों हैं? जब मेरे पास दर्जनभर से ज्यादा ऐसे लेखकों की सूची है जो शराब क्या, बोतल की ठेंपी तक को हाथ नहीं लगाते तो आपके पास तो खतियान होगी जिसमे लेखक के पूर्वजों के भी ट्रैक रिकार्ड होंगे..उन्हें ही बुलाएं.

नैतिक-अनैतिक, सहमति-असहमति की बहस में पड़े बिना हजूर, एक राय और देना चाहूंगा..आपलोग विश्व हिन्दी सम्मेलन नवरात्र में आखिर क्यों नहीं करवाते? मेरा आत्मविश्वास कहता है कि मातारानी के प्रकोप से शराब तो शराब, प्याज-लहसन तक हाथ नहीं लगाएगा और गर सिकुलर टाइप के लेखक ने लगा भी दिया तो उन्हें हिन्दीद्रोही करार देना कौन सी मुश्किल बात है..आपने इधर हिन्दीद्रोही घोषित किया नहीं कि फेसबुक पर हिन्दीप्रेमी उन्हें अपने आप राष्ट्रदोही घोषित कर देंगे…और वैसे भी हिन्दी में मुसलमान, इसाई या दूसरे धर्म-संप्रदाय के लोग हैं ही कितने की उनकी अतिरिक्त चिंता या व्यवस्था की जाए.

हजूर, एक बात और..आपने तो सिर्फ मदिरापान का जिक्र किया..कुछ लोग तो राष्ट्रीय संस्कृति एवं परंपरा को ढाहने का काम करते आए हैं. ऐसे-ऐसे हिन्दीप्रेमी विश्व हिन्दी सम्मेलन में बुलाए जाते रहे हैं जो कि जोहन्सबर्ग जाकर हिन्दी परिचर्चा के बजाय शेर-शेरनी के संभोग की तस्वीर खैंचकर फेसबुक पर परोसते रहे. अब आप ही बताइए, हमारी संस्कृति तो इतनी उदार और पर्दानशीं रही है कि सांप-सांपिन को भी तालकि-भेलकि करते दिख जाए तो टोकरी ढंक देते हैं. ऐसे में वन्य-प्राणियों की निजता का हनन कहां तक उचित है ?..और क्या उनकी आंखें वन्य-प्राणियों की निजी पलों के अवलोकन तक सीमित रह जाती होंगी ?

मुझमे तो इतना नैतिक साहस नहीं है कि ये सवाल करुं कि आखिर हिन्दी लेखकों की ऐसी हालत करी किसने है कि शराब के लिए विश्व हिन्दी सम्मेलन का इंतजार करना पड़ता है. क्या पता ऐसी हालत में होते कि कभी भी इच्छानुसार घर बैठकर पी पाते तो आपको ऐसी टिप्पणी करके हिन्दी लेखकों का सामूहिक सम्मान करने की नौबत न आती..वैसे जो घर बैठकर पीते हैं, उन्हें लो प्रोफाइल का माना जाता है लेकिन हिन्दी लेखक के तो पब्लिक प्लेस में पीकर भी प्रोफाइल के परखच्चे उड़ गए.

हजुर, हमारे कुछ हिन्दीसेवी मित्र विश्व हिन्दी सम्मेलन जाने से वंचित रह जाते हैं, वो मलेटरी के अपने दोस्तों की मदद से कैंटीन की राह लेते हैं. देश की सेना जिस भारतमाता की रक्षा करती है, वही सेना हम हिन्दीसेवी मित्रों की इस तलब का संरक्षण करती है..हम आपकी इस समझ और क्षमता के आगे नतमस्तक हूं हजूर कि लोककथाओं की तरह प्रचलित ये बात कि सेना में शरीर में गर्मी पैदा करने के लिए शराब दी जाती है लेकिन आपने नैतिक आग्रह के आगे शरीर की जरुरत को नजरअंदाज किया. हिन्दीसेवी इसमे फिसल गए. वावजूद इसके इनकी इस चूक को वैष्णव की फिसलन मानकर इस सिरे से विचार नहीं किया जा सकता कि मदिरा सेवन की बात को शामिल करके दरअसल हिन्दीसेवियों को हजूर की तरफ से बौना करने का काम किया गया है. हम जैसे कीबोर्डिए हजूर की इस प्रतिभा के शुरु से कायल रहे हैं कि प्रतीक-बिंब विधान योजना में प्रयोगवादी कवियों को भी बाजरे की जूस पिला देते हैं. जूट पत्रकारिता के मुहावरे से आगे प्रेसटीट्यूट रुपक गढ़ लाते हैं.

लेकिन रुपक और बिंब विधान ही प्रतिभा है तो मदिरा के सवाल को पीछे नहीं किया जा सकता..फिर भी आपको लगे तो..

हजूर, अब आखिरी बात. आप जिन हिन्दीसेवियों को विश्व हिन्दी सम्मेलन में बुलाते हैं, उनके साहित्यिक योगदान पर गौर करने( वैसे भी गौर किया कब गया है) से पहले कडकडडूमा, तीस हजारी या ऐसे ही किसी कोर्ट से एफिडेविड बनवाकर लाना अनिवार्य कर दिया जाए जिसमे ये स्पष्ट लिखा हो कि फलां लेखक शराब पीता क्या, छूता तक नहीं है.. रचना करते वक्त भी इसने कभी मदिरा को हाथ तक नहीं लगाया. इनकी लाइब्रेरी में मधुशाला की प्रति या हालावाद पर कोई पुस्तक नहीं है. उसके बाद साहित्य अकादमी एनओसी जारी करे, वही यहां जाने योग्य माना जाए.

इतनी दलील बस इसलिए हजूर कि हम इस योग्यता के रहते भी वंचित रह गए, हमे बुलाइए, हम बस चखना के दम पर सम्मेलन की शोभा बढ़ाएंगे, राष्ट्र निर्माण के सपने को शिरकत करके चमका देंगे.

आपका
चखनालंबी हिन्दी सेवी
विनीत कुमार

इन्द्रप्रस्थ
09.09.2015

मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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कलबुर्गी के हत्यारे से कम नहीं दैनिक भास्कर का जुर्म

Vineet Kumar :  वैसे तो न्यूज वेबसाइट के नाम पर पार्शियल पोर्न वेबसाइट चला रहे भास्कर समूह के लिए हिट्स के खेल में नीचता की हद तक उतर आना आम बात है. इसे हम रूटीन के तौर पर देखते आए हैं. फैशन शो के दौरान मॉडल के कपड़े खिसक जाते हैं तो वो उस हिस्से को ब्लर करने के बजाय लाल रंग का दिल बनाना ज्यादा बेहतर समझता है. लेकिन अब इस हद तक उतर आएगा कि ये अश्लीलता शब्दों को बेधकर घुस आएगी और वो भी उस संदर्भ में जहां असहमति में खड़े होना आसान नहीं है.

दैनिक भास्कर से कोई पूछे तो सही कि कलबुर्गी की मौत पर चुप्पी साधे साहित्य अकादमी (जिसकी चर्चा Abhishek Srivastava ने विस्तार से की है) के प्रतिरोध में उसके पुरस्कार को लौटाना डर का परिचायक है या उस साहस का जो एक से एक दिग्गजों में जीवन की व्यवहारिकता के तर्क के साथ गायब हो गई है? मुझे याद है जिस साल उदय प्रकाश को साहित्य अकादमी सम्मान मिला था, उस वक्त उन पर कई तरह के आरोप लगे थे, सत्ता और उन्हीं महंतों के साथ सेत-मेत कर लेने की अफवाहें फैलायीं गई थी जिनका उदय प्रकाश से रचना और जीवन के स्तर पर लगातार विरोध रहा है. उदय प्रकाश क्या, साहित्यिक जगत में अमूमन किसी भी पुरस्कार के मिलने पर लेखक के सम्मान में इजाफा होने के बजाय उसकी साख पर सवाल उठने शुरू हो जाते हैं..जरूरी नहीं कि इसके लिए स्वयं लेखक ने जुगत भिड़ाई हो लेकिन ये पुरस्कार खुद इतने बदनाम और सवालों के घेरे में आ गए हैं कि इसे स्वीकार करनेवाला लेखक कई बार तमाम योग्यताओं के बावजूद साहित्य-बिरादरी में दुरदुराया जाने लग जाता है.

उस वक्त उदय प्रकाश ने अपने स्तर से ठीक-ठाक तर्क दिए थे लेकिन हमले जारी रहे. माहौल ऐसा बना कि उन्हें साहित्य अकादमी सम्मान नहीं, वाजपेयी सम्मान मिला हो. खैर, वो तमाम लोग यदि तब की अपनी-अपनी पोस्ट पलटकर देखें और उदय प्रकाश के इस फैसले से मिलान करें तो एकबारगी जरूर एहसास होगा कि तब हमने जल्दीबाजी कर दी थी. ये भी है कि ऐसा किए जाने से उदय प्रकाश पर लगते रहे आरोप, होते रहे हमले पर विराम नहीं लग जाएंगे लेकिन इस सवाल के सिरे से सोचकर देखें तो कि क्या अकेले उदय प्रकाश तो जीवित लेखक नहीं हैं जिन्होंने एक साहित्य अकादमी प्राप्त लेखक की सरेआम हत्या कर दिए जाने पर पुरस्कार लौटाकर अपना प्रतिरोध जाहिर करना जरूरी समझा? क्या ये इस हत्या के खिलाफ लिखे गए किसी लेख से कम महत्व रखता है?

ये सही है कि ऐसा करने से न तो साहित्य अकादमी की क्षुद्रता कम होगी और न ही वो इस प्रतिरोध का सम्मान करेगा लेकिन इतना तो जरूर है कि हमारा उस लिखे के प्रति और यकीन बढ़ेगा जिसे कभी इसी अकादमी ने सम्मानित किया था. कुछ नहीं तो इतना तो जरूर है कि साहित्य अकादमी मिलने और स्वीकार कर लेने से उदय प्रकाश का जितना सम्मान नहीं हुआ( आरोप लगनेवाली बात को नत्थी करके देखें तो) उससे कई गुना ज्यादा कद इसके लौटा देने से बढ़ा है. बहुतेरे लेखकों, बुद्धिजीवियों के लिए मौके पर चुप रह जाना जितना व्यावहारिक फैसला हुआ करता है, उदय प्रकाश का ऐसा किया जाना भी उतना ही व्यावहारिक है..आखिर व्यावहारिकता का एक ही पक्ष क्यों हो ?

लेकिन दैनिक भास्कर या दूसरा कोई भी मीडिया मंच प्रतिरोध की इस भाषा को समझने में नाकाम है या फिर वो काबिलियत हासिल ही नहीं कि तो कम से उसे इस बात का दावा तो छोड़ ही देना चाहिए कि वो हिन्दी पत्रकारिता कर रहे हैं. हिन्दी दिवस के सटे दिन में उसका ऐसा किया जाना १४ सितंबर के मौके पर तैयार किए जानेवाले विशेष पन्ने के उपर एक अश्लील चुटकुला ही होगा.

उदय प्रकाश की इन पंक्तियों में डर का जो अर्थ खुलता है ये वो डर नहीं है जिसे भास्कर ने सपाट अर्थ में लिया- ”साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कन्नड़ साहित्यकार श्री कलबुर्गी की मतांध हिंदुत्ववादी अपराधियों द्वारा की गई कायराना और दहशतनाक हत्या है, उसने मेरे जैसे अकेले लेखक को भीतर से हिला दिया है। अब यह चुप रहने का और मुंह सिल कर सुरक्षित कहीं छुप जाने का पल नहीं है।”

आप ही सोचिए कि इन पंक्तियों में डर शामिल है या कुंवर नारायण की पंक्ति “या तो अ ब स की तरह जीना है या अरस्तू की तरह जहर पीना है” से गुजरकर फैसले तक पहुंचा एक लेखक लेकिन दक्षिणपंथी हत्यारों ने तो कलबुर्गी की हत्या की जबकि दैनिक भास्कर ने एक लेखक के जिंदा रहने के सबूत को मरा घोषित कर दिया.

ये जुर्म कुछ कम बड़ा नहीं है.

मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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कृष्णदत्त पालीवाल का जाना…

Vineet Kumar : नहीं रहे हमारे कृष्णदत्त पालीवाल सर… एमए का आखिरी पेपर उन बच्चों के लिए प्रोजेक्ट हुआ करता था जो ऑप्शन में मीडिया लिया करते थे..और इस प्रोजेक्ट के लिए विभाग से एक गाइड तय किए जाते थे. जब हमने एमए हिन्दी साहित्य में दाखिला लिया तो के डी सर की धूम थी. वो जापान से लौटे ही थे और सीनियर्स को देखता था कि हर दूसरे उन्हीं के साथ पीएचडी करना चाहते थे. एमए की क्लास में गोविंद दर्शन जैसी भीड़ होती. सच पूछिए तो केडी सर और नित्यानंद तिवारी सर के लिए ही हम बच्चे आर्ट्स फैकल्टी जाते..वैसे मैं बैल की तरह पूरी क्लास में मौजूद होता. खैर. एमए की इस प्रोजेक्ट के लिए वो स्वाभाविक रुप से मिल गए. लिस्ट में नाम आने के बाद मैं वहां गया. अपना विषय बताया और कहां सर बताइए- कैसे लिखना है.

उन्होंने बडी ही विनम्रता औऱ साफगोई से कहा- देखो, इस विषय में मेरी कोई खास गति नहीं है, मैं आपको कुछ विद्वानों के नाम बताता हूं, आप उनसे बात कर लियो. हां ये जरूर है कि किसी भी शोध की कुछ अनिवार्यता होती है, वो विषय बदलने के बावजूद एक सी होती है..मैं आपको शोध प्रविधि को लेकर जरूर मार्गदर्शन करूंगा. उसके बाद उन्होंने मुझे जाकिर हुसैन कॉलेज जाकर सुधीश पचौरी और आइआइएमसी जाकर आनंद प्रधान से मिलने कहा..मैं इन दोनों से मिलता रहा और प्रोजेक्ट का काम करता रहा.

बीच में इन्होंने तीन बार मेरा काम देखा और कहा- अच्छा जा रहे हो..बस अब समय पर कर दो. मैं इस काम में इतना उलझ गया था और इमोशनली जुड़ भी गया था कि देर होने लगी. उन्होंने फिर बुलाकर कहा-आप बस अब कर डालो..मुझे अब भी याद है..आखिरी दिन लगा कि बग्गा इस प्रोजेक्ट को लेंगे भी या नहीं तो खुद चलकर उन तक गए और कहा- बच्चे ने मेहनत करी है, जमा ले लो. मैने उनका शुक्रिया अदा किया और फिर पेपर की तैयारी में लग गया. फिर बस जब-तब दुआ सलाम.

एम.फिल् की आधुनिक कविता ऑप्शन में फिर उनकी क्लास में जाना हुआ. वो हमें पुनर्जागरण औऱ आधुनिक हिन्दी कविता पढ़ाते थे..क्लास में इतने कम बच्चे होते कि अपनी केबिन में ही बुलाकर घंटों, देर शाम तक पढ़ाते रहते. एमए में हमें निराला और काव्यशास्त्र का कुछ हिस्सा पढ़ाया था..सो कुछ बातें पहले से पता थी. क्लासरूम के अलावा केडी सर का अलग से मैंने कभी कुछ नहीं पढ़ा. उनका लिखा मुझे बहुत अपील ही नहीं करता. क्लास में जो लय होती वो छपे शब्दों में जाकर टूट जाती..दरअसल हम उनकी बोलने की शैली के मुरीद रहे, लिखे के कभी नहीं. कभी दूरदर्शन, लोकसभा टीवी पर दिख जाते तो जरूर देखता रहा लेकिन जनसत्ता और बाकी मंचों के लेख स्किप कर जाता.

एमए, एम फिल् के अपने इस मास्टर से दो चीजें सीखी..अकादमिक दुनिया में भी और जिंदगी में भी. एक तो ये कि ये मुझे हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय के अकेले ऐसे टीचर लगे जिन्हें पूरा का पूरा पाठ याद होता, पूरी की पूरी राम की शक्ति पूजा, सरोज-स्मृति याद हुआ करती, पाठ पर उनका जोर होता और दूसका कि वो अपने विरोधी विचारवालों को भी बर्दाश्त करते..अपने निजी जीवन में कैसे थे, नहीं पता लेकिन मैंने कुल तीन साल में महसूस किया कि उन लेखकों, विद्वानों को पढ़ने कहते जिनसे वो कभी खुद सहमत नहीं हुए. पढ़ाने-सिखाने की दुनिया में विश्वविद्यालय और विभाग की खेमेबाजी को आने नहीं दिया.

के डी सर अक्सर बात करते हुए, खासकर अकेले में हाथ पकड़ लेते, जोर से दबाते और कहते- बेटा, मैं कह रहा हूं न कि हिन्दी नवजागरण पर डॉ. रामविलास शर्मा को पढ़े बिना बात कर ही नहीं सकते, तू पढ़ लियो. मैं उनके हाथ पकड़े जाने के अंदाज और पैदा हुई गर्माहट को अब भी महसूस कर पा रहा हूं. साहित्य और ज्ञान के प्रति इतना यकीन बहुत कम शिक्षकों में देखा..अपनी तमाम वैचारिक असहमतियों और उखड़ी हुई लेखन शैली के बावजूद पढ़ने-लिखने के प्रति दिलचस्पी पैदा करने में ये मेरा टीचर मेरे भीतर अब भी किसी न किसी रूप में शामिल है, रहेंगे.

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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रायपुर से लेकर लखनऊ वाया बनारस तक कौन-कौन ‘फासीवाद’ का आपसदार बन गया है, अब आप आसानी से गिन सकते हैं

Abhishek Srivastava : मुझे इस बात की खुशी है कि रायपुर साहित्‍य महोत्‍सव के विरोध से शुरू हुई फेसबुकिया बहस, बनारस के ‘संस्‍कृति’ नामक आयोजन के विरोध से होते हुए आज Vineet Kumar के सौजन्‍य से Samvadi- A Festival of Expressions in Lucknow तक पहुंच गई, जो दैनिक जागरण का आयोजन था। आज ‘जनसत्‍ता’ में ‘खूब परदा है’ शीर्षक से विनीत ने Virendra Yadav के 21 दिसंबर को यहीं छपे लेख को काउंटर किया है जो सवाल के जवाब में दरअसल खुद एक सवाल है। विनीत दैनिक जागरण के बारे में ठीक कहते हैं, ”… यह दरअसल उसी फासीवादी सरकार का मुखपत्र है जिससे हमारा विरोध रहा है और जिसके कार्यक्रम में वीरेंद्र यादव जैसे पवित्र पूंजी से संचालित मंच की तलाश में निकले लोगों ने शिरकत की।”

अच्‍छा होता यदि विनीत अपनी बात को वीरेंद्र यादव (और कहानीकार अखिलेश भी) तक सीमित न रखकर उन सब ”लोगों” के नाम गिनवाते जो ‘फासीवादी सरकार के मुखपत्र’ के आयोजन में होकर आए हैं। हो सकता है विनीत को सारे नाम न पता हों या वे भूल गए हों, लेकिन इस छोटी सी भूल के चलते उनके लेख का मंतव्‍य बहुत ”निजी” हो जा रहा है और ऐसा आभास दे रहा है मानो वे बाकी लोगों को बचा ले जाना चाह रहे हों। बहरहाल, उनकी बात बिलकुल दुरुस्‍त है और आज का उनका लेख ‘फासीवादी सरकार के मुखपत्र’ के आयोजन के क्रिएटिव कंसल्‍टेंट Satyanand Nirupam को तो सीधे कठघरे में खड़ा करता ही है। उसके अलावा Piyush Mishra, Swara Bhaskar, Prakash K Ray, Rahat Indori, Waseem Bareillvy, Munawwar Rana, malini awasthi, बजरंग बिहारी तिवारी, शिवमूर्ति समेत ढेर सारे लोगों को विनीत कुमार फासीवाद का साझीदार करार देते हैं जो लखनऊ के ‘संवादी’ में गए थे या जिन्‍होंने जाने की सहमति दी थी।

अब आप आसानी से गिन सकते हैं कि रायपुर से लेकर लखनऊ वाया बनारस तक कौन-कौन ‘फासीवाद’ का आपसदार बन गया है। सबसे दिलचस्‍प बात यह है कि इस आपसदारी में कहीं कोई खेद नहीं है, क्षमा नहीं है, अपराधबोध नहीं है और छटांक भर शर्म भी नहीं है। ‘हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे’ की तर्ज पर जवाब दिए जा रहे हैं। अपनी-अपनी सुविधा से खुद को और अपने-अपने लोगों को बख्‍श दिया जा रहा है। समझ में नहीं आ रहा कि कौन किसके हाथ में खेल रहा है। सच कहूं, मुझे तो कांग्रेस फॉर कल्‍चरल फ्रीडम के पढ़े-सुने किस्‍से अब याद आने शुरू हो गए हैं। इस नाम को गूगल पर खोजिएगा, मज़ा आएगा।

मीडिया विश्लेषक और सरोकारी पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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दूसरों को नैतिकता सिखाने वाला विनीत कुमार लिफाफा और एयर टिकट पाकर ‘हत्यारी’ रमन सिंह सरकार के पीआर कंपेन का हिस्सा बन गया

Yashwant Singh : दलालों रंडियों से क्या बहस करना. जो एयर टिकट और लिफाफा देखकर कहीं भी मुंह मारने पहुंच जाते हैं. वैसे तो ये रोना रोते हैं कि वो देखो सहारा जैसा चोर स्पांसर कर रहा है स्पोर्ट्स टीम को… और फलाने जगह कितना बड़ा अनैतिक काम हो गया…लेकिन पच्चीस हजार रुपये के पैकेट और एयर टिकट ने इनकी आंखों कानों को रमन सिंह सरकार और उनके संरक्षित प्रशासन द्वारा चूहा मार दवा खिलाकर मारी गईं सैकड़ों महिलाओं की चीखों को सुनने से मना कर दिया..

ये चिरकुट लोग कभी किसी जमाने में दूसरों के अपराधी और निर्दोष होने का सर्टिफिकेट जारी करते थे. मैं भी भुक्तभोगी रहा हूं. अब हरामखोर जब खुद फंसे हैं तो दार्शनिक दर्शन पेल रहे हैं. अबे इसमें वामपंथ कहां घुस गया. ये तो सामान्य अकल की बात है यार. छत्तीसगढ़ सरकार ने अपने द्वारा किए जा रहे बड़े बड़े अपराधों को छिपाने के लिए एक प्रोग्राम बनाया और उन्हीं लिक्खाड़ों को बुलाया जो उनकी छवि खराब कर रहे थे. बस, सब लार पटकाते पहुंच गए और उसके बाद नसबंदी चूहामार दवा महिला उत्थान आदि सब चले गए तेल लेने…. बेशर्मों को तो शर्म भी नहीं माती. मैंने तो इगनोर करने की सोच रखा था लेकिन इस थेथर को थेथरई देखकर खुद लिखने से नहीं रोक सका. लगता है इसे नंगा करना ही पड़ेगा अब. अपन तो पूरे नंगे हैं. इसकी भी चड्ढी खोलकर अपने समकक्ष ले आएंगे. जय. जय.

यशवंत का उपरोक्त कमेंट युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के इस एफबी स्टेटस पर आया है…

Vineet Kumar : रायपुर साहित्य उत्सव को व्यक्तिगत तौर पर मैं स्वच्छ भारत अभियान का ही हिस्सा मानता हूं और कुछ नहीं तो इसके लिए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री माननीय रमन सिंह को एक बार बधाई देनी तो बनती है. उनने इस कार्यक्रम के जरिए फर्जी-पायरेटेड वामपंथी और प्रतिबद्ध-कटिबद्ध वामपंथी का स्पष्ट विभाजन करके वामपंथी आंदोलन की जमीन मजबूत कर दी. ऐसा करके उन्होंने सालों से चली आ रही उस दुविधा और पेंचीदगी को खत्म कर दिया कि किसे प्रतिबद्ध कहा जाए और किसे नहीं ? अब बिल्कुल दूध और पानी की तरह साफ है..जो रायपुर साहित्य महोत्सव गए वो फर्जी-पायरेटेड और जो नहीं गए वो प्रतिबद्ध-कटिबद्ध और आजीवन सरोकारी और इन दोनों के बीच जो बुलावे को ठुकरा दिया, वो अवतारवाद की अवधारणा से मुठभेड़ करते हुए भी साक्षात महामानव. विशुद्ध वामपंथियों के हाथों मैं जिस दुनिया की कल्पना कर रहा हूं, वो यूटोपिया नहीं..वो यथार्थ है जिसके खिलाफ हम-आप बीए-एमए में दस नंबर के सवाल का जवाब लिखते रहे.

विनीत कुमार के उपरोक्त एफबी स्टेटस पर आए कुछ कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Abhishek Srivastava मैं वाकई समझना चाहता हूं कि वामपंथ पर खींचकर बार-बार इस मसले को क्‍यों लाया जा रहा है? बहुत से ऐसे लोग भी विरोध में हैं जो खुद को वामपंथी नहीं कहते। उसी तरह बहुत से ऐसे लोग वहां गए हैं जो वामपंथी कहे जाते रहे हैं। मामला लोगों की ताज़ा मौतों और स्‍टेट की पॉलिसी का है।

Vineet Kumar अभिषेकजी, बस इसलिए कि हमें जो टिप्पणियां मिल रही है और जो तंज कसे जा रहे हैं, उसके इर्द-गिर्द ये शब्द का सुर सबसे उंचा है..आखिर हम भी तो भूतपूर्व ही सही, रहे थे.

Abhishek Srivastava यह बहस 24 कैरट का वामपंथी तय करने के लिए नहीं हो रही। जो कर रहा है वो मूरख है। सामान्‍य मानवीयता के नाते कुछ बातें हो रही हैं। स्‍टेट के चरित्र को लेकर सवाल हैं। सलवा जुडुम है। आदिवासी हैं। वामपंथ कहां से आ गया जबरिया?

Vineet Kumar ठीक है..वैसे इन सबके बीच जो कहा है मैंने रायपुर में, आज सुबह उसे मोबाईल से सुनकर ट्रांसक्रिप्ट किया है..मौका मिलेगा तो सुनिएगा..ये जानते हुए कि क्या कहा गया के बदले बाकी लोगों के लिए क्यों गए की बहस भारी है..फिर भी. आपसे तो अपील की ही जा सकती है…

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मोदी सरकार पर अपने पहले ऑपरेशन से आजतक ने किया खुलासा- सारी तरक्की सिर्फ कागजों पर

Vineet Kumar : कल मध्यप्रदेश सरकार ने देश के प्रमुख राष्ट्रीय अखबार में करोड़ों रुपये के विज्ञापन देकर घोषित किया कि जन-धन योजना के तहत मध्यप्रदेश के सारे लोगों के खाते खुल गये..एक भी नहीं बचा है. विज्ञापन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की बड़ी-बड़ी तस्वीरें छपी है. ऐसे विज्ञापन छपवाने के लिये एक की कीमत 8 से 80 लाख तक होती है..यानी करोड़ों रुपये के विज्ञापन..

लेकिन आजतक की स्क्रीन पर एक के बाद एक मध्यप्रदेश के लोग अपनी बात कह रहे हैं, जिनके अनुसार खाते क्या, उन्हें इस बात तक की जानकारी तक नहीं है कि देश में उनके लिये जन-धन जैसी कोई योजना भी चल रही है. खाते खुले या नहीं, मध्यप्रदेश के दावे कितने सही हैं या गलत, इस पर बहस जारी है लेकिन मौजूं सवाल है कि विज्ञापनों पर करोड़ों रुपये खर्च किये जाने के बावज़ूद देश के नागरिकों को बुनियादी सूचना तक नहीं पहुँच रही है तो उसके प्रसारित किये जाने का तर्क क्या होगा ?

ये नरेंद्र मोदी की सरकार पर पहला ऑपरेशन है और ऐसे चैनल का जिसे आप मोदी विरोधी चैनल कहेंगे तो ये चैनल खुद आपको झुठला देगा… ऐसे में चैनल का ये ऑपरेशन और अधिक विश्वसनीय हो जाता है जब वो विजुअल्स के जरिये बता रहा है- सारी तरक्की कागजों पर हो रही है..अच्छे दिन मीडिया के आये हैं, नागरिक के नहीं.

प्रधानमंत्री जन-धन योजना को लेकर करोड़ों रुपए सिर्फ विज्ञापन पर खर्च किये गये और जारी है लेकिन नागरिक को इस बात तक की जानकारी नहीं है कि ऐसी कोई योजना है. जिन्हें पता है और बैंक जाते हैं तो उन्हें बैंक के लोग कहते हैं- इस योजना से आपको कोई लाभ नहीं होगा. ऐसे में योजना की तो छोड़िये, विज्ञापन के खर्च को किस तर्क पर सही ठहराया जायेगा.

आजतक ने बिना ज़्यादा हो-हल्ला किये, बूफर बजाये ऑपरेशन सरकार किया कि खुद बीजेपी के स्पीकर्स को इस ऑपरेशन को महत्व देना पडा. संवित महापात्र ने तो बल्कि चैनल का शुक्रिया भी अदा किया कि ऐसे काम होते रहने चाहिये. संसद में विपक्ष के बेहद कमजोर होने के बावज़ूद अगर मीडिया न लौटने लगे तो बहुमत की सरकार बर्बर सरकार होने से एक हद तक बची रहेगी..लेकिन हो तब तो…

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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दैनिक भास्कर ने कुछ संस्करणों में ‘जेड प्लस’ फिल्म के लेखक रामकुमार सिंह का नाम रिव्यू से हटाया

Ajay Brahmatmaj : जयप्रकाश चौकसे के कॉलम ‘पर्दे के पीछे’ से दैनिक भास्‍कर के जयपुर समेत कुछ संस्‍करणों में फिल्म के लेखक Ramkumar Singh का नाम हटा दिया गया। पत्रकार बिरादरी की तुच्‍छता है यह। यह शर्मनाक और दुखद है। फिलहाल जयप्रकास चौकसे को पढ़ें और कल फिल्‍म देखने का फैसला करें। शेयर करें और दूसरों को पढ़ाएं।

मुंबई के वरिष्ठ फिल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज के फेसबुक वॉल से.

Vineet Kumar : दैनिक भास्कर ने अपने कुछ संस्करण में जेड प्लस के लेखक रामकुमार सिंह का नाम इसलिये हटा दिया क्योंकि वो उस अखबार के लिये काम करते हैं जो भास्कर का कॉम्पिटिटर है… मतलब भास्कर के पाठक को जानने का अधिकार ही नहीं है कि जेड प्लस फ़िल्म के लेखक कौन हैं? तो ऐसे चलता है आपके लोकतंत्र के चौथे खम्भे का धंधा. अब सोचिये बड़े खेलों में क्या-क्या हटाया जाता होगा?

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हमने जेड प्लस फ़िल्म देख ली लेकिन आप हम जैसों के लिखे के चक्कर में मत पड़िए.. जिस तरह हर के हिस्से का सच अलग होता है,वैसे ही स्वाद का भी. और मेरे उस स्वाद में दोस्ती से लेकर फ़ोकट की प्रेस शो में फ़िल्म का देखना भी शामिल है.आपके देख लेने के बाद इसके मीडिया एंगल को लेकर अलग से लिखूंगा..बस इतना समझ लीजिये कि इस देश के किसी भी लफंदर टीवी रिपोर्टर का नाम दीपक होगा..फ़िल्म चाहे पीपली लाइव हो या फिर जेड प्लस..मतलब दीपक अब नाम नहीं एक सिंड्रोम है, मीडिया का चुत्स्पा…और न्यूज़ चैनल मतलब आजतक के आसपास का कोई भी अंडू-झंडू

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अच्छे दिन की पंचांग- फिल्म जेड प्लस… आम आदमी जब अपने हालातों के बीच जीते हुए अचानक से सरकार की रहमोकरम पर खास हो जाता है, उसकी किस्मत सांड जैसी हो जाती है तो वो प्रशासन की नजर में बहनचो..हो जाता है, वो अपनी जिंदगी न जीकर सरकार की जिंदगी जीने लग जाता है, वो अकेले में पर-पेसाब तक नहीं कर सकता, उसकी जिंदगी में सिक्यूरिटी और सियासत इस कदर घुस आती है कि वो समाज में बलून बनकर उड़ने लग जाता है..कितना कुछ हो जाता है एक आम आदमी के साथ जिसका खास होना उसकी खुद की कोशिश का हिस्सा न होकर सत्ता और सरकार के उस बेहूदे फैसले से तय होता है जिसका किसी भी हाल में गलत करार दिए जाने का सवाल ही नहीं उठता.

वैसे तो आम आदमी की कोई कहानी नहीं होती, बस हालात होते हैं..वो जिंदगी नहीं, हालातों को जीता है लेकिन सरकार उसके बीच अचानक से एक कहानी ढूंढ लेती है जिसमे वो टू इन वन हीरो पैदा करती है. एक हीरो वो खुद और दूसरा वो आम आदमी. सरकार का हीरो होना रोजमर्रा की घटना है, उसके रोज अच्छे दिन आते हैं लेकिन आम आदमी का हीरो होना एक्सक्लूसिव है और अच्छे दिन भी सीजनल होते हैं.

फिल्म जेड प्लस जिसे मिजाज से बेहद ही स्वीट लेकिन व्यंग्य के अंदाज में बेहद ही तीखे अपने ही दोस्त रामकुमार( Ramkumar Singh) ने लिखी है, की प्रोमो पिछले कई दिनों से वर्चुअल स्पेस पर तैर रही है..आपको इन प्रोमो को देखकर हंसी आएगी, लेकिन रिप्ले करेंगे तो गुस्सा, फिर से देखना चाहेंगे तो अफसोस और अगर उसी वीडियो को एक बार और देख लिया तो लगेगा हम दरअसल किसी नाम के काल में नहीं बल्कि उस बिडंबना काल में जीने जा रहे हैं, जिसकी अभी कुछ ही किस्त चुकाई है, पहाड़ जैसी किस्त बाकी ही है की वृतांत है..इस पूरे वृतांत से तो कल ही गुजरना हो सकेगा लेकिन प्रोमो को साक्ष्य मानते हुए इतना तो कहा ही जा सकता है कि एक तो अच्छे दिन आए नहीं है, विज्ञापन की चौखट से लांघने में पता नहीं कितना वक्त लग जाए और गर ये “अच्छे दिन” सचमुच में आ गए तो फिर यातना के लिए आम आदमी कौन सा शब्द ढूंढेगा. आम आदमी के जातिवाचक संज्ञा और हालात से एक्सक्लूसिव कहानी में तब्दील होने की पूरी घटना के कई छोर, कई पेंच हैं जिन्हें कि हम अपनी-अपनी हैसियत की समझदारी की स्क्रू डाइवर से कल फिल्म देखने के बाद खोलने की कोशिश करेंगे..

युवा मीडिया और फिल्म विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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‘ओपन’ मैग्जीन का ये अंक खरीदकर रख लीजिए

Vineet Kumar : ओपन मैगजीन का नेहरू पर ये अंक कई मायने में खास है. एक तो इसलिए भी कि नेहरू पर एक साथ जितनी सामग्री आपको चालीस रूपये में मिल जाएगी, उतनी किसी किताब में कम से कम तीन से चार सौ रूपये में मिलेंगे.

दूसरा कि इसमे एम जे अकबर जैसे पत्रकार के विशेष लेख हैं जिन्होंने कभी नेहरू पर बेहद संतुलित किताब लिखी थी और अब प्रधानसेवक के उत्प्रेरक मटीरियल की हैसियत से सक्रिय हैं. पटेल के बरक्स नेहरू को खड़ी करने और मिथकों का साम्राज्य कायम करने की जो कवायदें चल रही है, ऐसे दौर में इस अंक को पढ़ने, खरीदकर रख लेने की जरूरत इसलिए भी है कि हम आगे देख सकेंगे कि प्रधानसेवक के जमाने के देश के पहले प्रधानमंत्री कैसे नजर आते थे?

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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जो चैनल सबसे ज्यादा लोटता है, उसी के पत्रकार की मौत…

Vineet Kumar :  ये कम बड़ी बिडंबना है कि जी न्यूज देश का ऐसा चैनल है जो भाजपा, केन्द्र सहित भाजपा शासित राज्यों के आगे लोटता आया है, उसी चैनल का पत्रकार शिवम भट्ट हरियाणा में पत्रकारों पर हुए हमले और अफरातफरी के बीच मारे गए..

कहने को आप कह सकते हैं कि इस सड़क दुर्घटना का संबंध सीधे तौर पर हिसार की इस हमले की घटना और रामपाल की गिरफ्तारी के नाम पर ड्रामेबाजी से नहीं है लेकिन थोड़ा ठहरकर सोचें तो आप सहजता से समझ पाएंगे कि शिवम की मौत नहीं, एक तरह से हत्या हुई..हालातों के हाथों मारे गए शिवम. यहां एक बात बहुत स्पष्ट है कि चैनल के मालिक तो उपर-उपर मैनेज हो जाते हैं, बिजनेस डील के तहत मैनेज भी हो जाते हैं..जी न्यूज के मालिक डॉ. सुभाष चंन्द्रा तो बाकायदा रैलियों में शामिल होकर वोट मांगते हैं लेकिन सत्ता की क्रूपता का शिकार होता है फील्ड में लगा हुआ रिपोर्टर..शिवम की मौत जनतंत्र की हत्या के भीतर की हत्या है..

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

मूल खबर…

जी न्यूज संवाददाता शिवम भट्ट की हरियाणा में सड़क हादसे में मौत

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और मीडियाकर्मियों ने अपने हिस्से की स्क्रीन पर कब्जा जमा लिया….

Vineet Kumar : p7 न्यूज चैनल बंद हो गया. ये वही न्यूज चैनल है जिसने लांचिंग में अपने एंकरों से रैम्प पर नुमाईश करवायी, शोपीस एंकरिंग को बढ़ावा दिया. पिछले दिनों इसी ग्रुप की पत्रिका बिंदिया और शुक्रवार के बंद हो जाने पर बेहद जरूर सरोकारी मंच के खत्म होने का स्यापा आपने देखा था. पत्रिका सहित ये चैनल क्यों बंद हो गया, ये बार-बार बताने की जरूरत इसलिए पड़ती है कि एक वेंचर बंद होने के वाबजूद दूसरे के बने रहने के दावे मैनेजमेंट की तरफ से ताल ठोंककर दिए जाते हैं..लेकिन सच आपसे और हमसे छिपा नहीं है.

दरअसल ये पूरी कंपनी ही फर्जीवाड़े मामले में बुरी तरह फंसी हुई है. लेकिन इन सबके बीच सबसे दिलचस्प और सराहनीय पहलू है कि इसी चैनल के मीडियाकर्मी ने अंदरखाने की वो खबर चला दी जो आप और हम सिर्फ टेक्सट की शक्ल में जान पाते, स्क्रीन की खबर की शक्ल में नहीं..अभी हम हरियाणा में मीडियाकर्मियों पर हुए हमले को लेकर उसकी हालत पर बात कर ही रहे हैं कि ये खबर थोड़ी राहत देती है कि कुछ नहीं तो उन मीडियाकर्मियों ने एक रास्ता तो निकाल ही लिया है कि जब नौकरी जानी ही है तो जाए लेकिन अपने हिस्से की स्क्रीन लेकर जाएंगे, खुद से जुड़ी खबर तो चलाएंगे ही..बेहद जरूरी है ऐसा करना.

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

मूल खबर…

‘पी7 न्यूज’ के निदेशक केसर सिंह को हड़ताली कर्मियों ने बंधक बनाया, चैनल पर चला दी सेलरी संकट की खबर

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मैनेज आपके मालिक होते हैं और आपको सैलरी उनके हिसाब से मैनेज होने के लिए मिलती है, जर्नलिज्म करने के लिए नहीं

Vineet Kumar : तमाम न्यूज चैनल और मीडिया संस्थान प्रधानसेवक के आगे बिछे हैं..उन्हें देश का प्रधानमंत्री कम, अवतारी पुरुष बताने में ज्यादा रमे हुए हैं लेकिन उनकी ही पार्टी की सरकार की शह पर मीडियाकर्मियों की जमकर पिटाई की जाती है. पुलिस उन पर डंडे बरसाती है..हमने तो जनतंत्र की उम्मीद कभी की ही नहीं लेकिन आपने जो चारण करके जनतंत्र के स्पेस को खत्म किया है, अब आपके लिए भी ऑक्सीजन नहीं बची है..

अफसोस कि आपके लाख घाव दिखाए जाने के बावजूद वो संवेदना पैदा नहीं हो पा रही, जो मानवीय स्तर पर पनपनी चाहिए..पता नहीं क्यों, लग रहा है इसके लिए आप ज्यादा जिम्मेदार हैं जिसका सबसे शर्मनाक पहलू है कि मैनेज आपके मालिक होते हैं और आपको सैलरी उनके हिसाब से मैनेज होने के लिए मिलती है, जर्नलिज्म करने के लिए नहीं.

हमारा मीडिया जबकि राजनीतिक पार्टियों, तथाकथित बाबाओं और कॉर्पोरेट से इतना अधिक मैनेज है तो भी मीडियाकर्मी पर सरकार की शह पर पुलिस लाठियां बरसाती है..मीडिया का चरित्र इन तीनों की की ही तरह है..जितना भ्रष्टाचार और लोकतंत्र की जड़ें राजनीतिक पार्टियां कर रही है, उतना ही मीडिया भी, जितना पाखंड़ और अंधविश्वास ये बाबा-महंत फैला रहे हैं, उतनी मीडिया भी और जितना कॉर्पोरेट इस देश को लूट रहा है, लोगों की जुबान बंद कर रहा है, उतना ही मीडिया भी..फिर भी मीडियाकर्मी इनके हाथों पिट जाता है…अब सोचिए कि जिस दिन मीडिया इन सबसे मुक्त अपने चरित्र के हिसाब से जीने की कोशिश करे तब क्या होगा ? मीडियाकर्मियों की देश में लाश बिछ जाएगी.

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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पोर्न वेबसाइट बंद करना है तो दैनिक भास्कर, नवभारत टाइम्स जैसी तथाकथित समाचार वेबसाइट को भी इसके दायरे में लाएं

Vineet Kumar : अगर सरकार सचमुच पोर्न वेबसाइट बंद करना चाहती है तो दैनिक भास्कर, नवभारत टाइम्स जैसी तथाकथित समाचार वेबसाइट को भी इसके दायरे में लाए. लगभग सारे मीडिया संस्थानों की दूकानदारी इसी के बूते चलती है..त्वचा से जुड़ी समस्या से लेकर सौन्दर्य तक की अंडरटोन वही होती है जिससे सरकार के अनुसार हमारे संस्कार खत्म हो रहे हैं..पोर्न वेबसाइट को रेखांकित करने के साथ-साथ ऐसी वेबसाइट के भीतर की पोर्नोग्राफी एफेक्ट कंटेंट को बहस के दायरे में शामिल करना बेहद जरूरी है.

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.  उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ चुनिंदा यूं हैं….

Mithlesh Sharan Choubey अनेक अखबारों में यौन वर्धक और यौन बीमारियों के नीम हकीमी विज्ञापन इस कदर अश्लील होते हैं कि पोर्न साइट्स का जैसे लघु संस्करण ही हो।

Ram N Kumar Just to give you a persective out of every 1 million page views about 40 percent content consumption online are related to women and/or sex/beauty/lifesytyle related stuffs. On an average these media sites have 200-400 million plus page views per month.

Umesh Kumar हिन्दुस्तान के खेल पन्ने पर विदेशी खिलाडियों की माशूकाओं की लघु वस्त्र विन्यास वाली फोटो नियमित रुप से देना भी सोफ्ट पोर्न नीति का ही एक हिस्सा है…जो यौनिक भावनाओं की तुष्टि का ही प्रयास है…जिस पंजाब केसरी से ऐसे फोटो छपने की शुरूआत हुई थी, आज वह दौड में बहुत पीछे रह गया है और कभी साहित्य और विचारों को स्थान देने वाले अखबार आज चटपटी थाली परोस रहे हैं…

Ram N Kumar Bollywood contributes another major chunk for content contribution. I can give actual data if Vineet Kumar bhai promises me a meal.

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अपनी जाति बताने के लिये शुक्रिया राजदीप सरदेसाई

Vineet Kumar : राजदीप की इस ट्वीट से पहले मुझे इनकी जाति पता नहीं थी..इनकी ही तरह उन दर्जनों प्रोग्रेसिव मीडियाकर्मी, लेखक और अकादमिक जगत के सूरमाओं की जाति को लेकर कोई आईडिया नहीं है..इनमे से कुछ वक्त-वेवक्त मुझसे जाति पूछकर अपनी जाति का परिचय दे जाते हैं..और तब हम उनकी जाति भी जान लेते हैं.

वैसे तो इस देश में जहाँ अधिकाँश चीजें जाति से ही तय होती है,ऐसे में अपने परिचित क्या,राह चलते किसी भी व्यक्ति की जाति जान लेना बेहद आसान काम है लेकिन उतना ही मुश्किल है किसी प्रोग्रेसिव की जान लेना..वो बताते तो हैं और बरतते भी हैं,बस अपने को उस नॉक पॉइंट को पकड़ना आना चाहिये..और तब आप जो उनकी जाति जानेंगे वो सामाजिक रूप से तो आपके किसी काम का नहीं होगा लेकिन आपकी समझदारी बढ़ाने के बहुत काम आयेगा..आपको क्या लगता है, राजदीप का शुक्रिया अपनी जाति सारस्वत ब्राह्मण बताने पर अदा किया है?

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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मौलाना आजाद की जयंती पर मेनस्ट्रीम मीडिया द्वारा पुरानी स्टोरी गरम करके परोसने के मायने

Vineet Kumar : आज यानी 11 नवम्बर को मौलादा अबुल कलाम आजाद की जयंती है. इस मौके पर मेनस्ट्रीम मीडिया ने तो कोई स्टोरी की और न ही इसे खास महत्व दिया. इसके ठीक उलट अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उनके ना से जो लाइब्रेरी है, उससे जुड़ी दो साल पुरानी बासी स्टोरी गरम करके हम दर्शकों के आगे न्यूज चैनलों ने परोस दिया. विश्वविद्यालय के दो साल पहले के एक समारोह में दिए गए बयान को शामिल करते हुए ये बताया गया कि इस लाइब्रेरी में लड़कियों की सदस्यता दिए जाने की मनाही है. हालांकि वीसी साहब ने जिस अंदाज में इसके पीछे वाहियात तर्क दिए हैं, उसे सुनकर कोई भी अपना सिर पीट लेगा. लेकिन क्या ठीक मौलाना आजाद की जयंती के मौके पर इस स्टोरी को गरम करके परोसना मेनस्ट्रीम मीडिया की रोचमर्रा की रिपोर्टिंग और कार्यक्रम का हिस्सा है या फिर अच्छे दिनवाली सरकार की उस रणनीति की ही एक्सटेंशन है जिसमे बरक्स की राजनीति अपने चरम पर है. देश को एक ऐसा प्रधानसेवक मिल गया है जो कपड़ों का नहीं, इतिहास का दर्जी है. उसकी कलाकारी उस दर्जी के रूप में है कि वो भले ही पाजामी तक सिलने न जानता हो लेकिन दुनियाभर के ब्रांड की ट्राउजर की आल्टरेशन कर सकता है. वो एक को दूसरे के बरक्स खड़ी करके उसे अपनी सुविधानुसार छोटा कर सकता है. मेनस्ट्रीम मीडिया की ट्रेंनिंग कहीं इस कलाकारी से प्रेरित तो नहीं है?

मीडिया के पास इस बात का तर्क हो सकता है कि ऐसे मौके पर अगर मौलादा आजाद के नाम की लाइब्रेरी का सूरत-ए-हाल लिया जाता है तो इसमें बुराई क्या है ? तब तो उन्हें सरदार वल्लभ भाई पटेल के नाम पर पिछले दिनों जब देश ने एकता दिवस मनाया तो मेनस्ट्रीम मीडिया को ये बात प्रमुखता से शामिल की जानी चाहिए थी कि जो शख्स आकाशवाणी से मिराशियों को इस बिना पर गाने से रोक दिए जाने के आदेश देता है कि इससे समाज पर बुरा असर पड़ेगा, आखिर उसके नाम पर एकता दिवस कैसे मनाया जा सकता है ? मीडिया इतिहास और वर्तमान के तार जोड़ने में अगर इतना ही माहिर है तो फिर उसके तार एक के लिए जुड़कर राग मालकोश क्यों फूटते हैं और दूसरे के लिए कर्कश क्या पूरी तरह तार ही टूट जाते हैं.

मेरी ही एफबी स्टेटस पर टिप्पणी करते हुए( Animesh Mukharje) ने हमें ध्यान दिलाया है कि एएमयू के वीसी के बयान और लाइब्रेरी में लड़की-छात्र के साथ भेदभाव मामले को लेकर हंगामा मचा हुआ है, इस पर निधि कुलपति ने बहुत पहले स्टोरी की थी लेकिन किसी ने इसे सीरियली नहीं लिया.. अनिमेश एक तरह से बता रहे हैं कि हम दर्शकों की यादाश्त कई बार चैनलों से ज्यादा होती है.

Vineet Kumar : दो साल बाद मीडिया ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के वीसी के बयान को जिस तरह यूट्यूब से खोदकर निकाला है, ये उस बयान को ऐसे दौर में इस्तेमाल करने की कोशिश है जिससे पूरे देश को ये संदेश दिया जा सके कि देखो मुसलमानों के नाम का ये मशहूर विश्वविद्यालय जिस पर खामखां आप गर्व करते रहे, लड़कियों को लेकर क्या रवैया रखता है ? नहीं तो वीसी साहब के इस बयान पर आज से दो साल पहले जब सभागार में तालियां पिटी थी, उस वक्त मीडिया क्या सुंदरकांड का पाठ कर रहा था ? तब यूपीए की सरकार थी और इस पर ज्यादा बात करने का मतलब था- सेकुलर राजनीति पर चोट करना लेकिन अब ? बाकी ऐसी बातें क्या मुस्लिम क्या हिन्दू संस्थान, कुढ़मगजी क्या जाति और संप्रदाय देखकर पनपती है?

Vineet Kumar : देश के हिन्दू शैक्षणिक संस्थानों में सब मामला ठीक है न ? मतलब वहां तो लड़कियों को लेकर कोई भेदभाव नहीं है कि हवन-पूजन स्थल पर रजस्वला( पीरियड्स) के दौरान यहां गमन करना मना है..इसे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के वीसी के अंग्रेजी में दिए गए बयान की बायनरी मत समझ लीजिएगा, बस ये है कि हमें इन संस्थानों को लिंग-भेद रहित संस्थान करार देने की बेचैनी है.

Vineet Kumar : आपको निजी संस्थान स्वर्ण मुकुट से नवाजेंगे एमयू के वीसी साहब… आप देश के किसी भी निजी शिक्षण संस्थान चाहे वो मेडिकल, इंजीनियरिंग, मीडिया, एमबीए,बीएड या सामान्य कोर्स के कॉलेज, यूनिवर्सिटी हों, के विज्ञापन, होर्डिंग्स, पोस्टर पर एक नजर मार लें.. आप पाएंगे कि लैब में मेंढ़क का चीरा लड़की लगा रही है, ताम्रपत्र की तरह एक्सेल सीट लड़की फैलाकर आंख गड़ाए हुई है, स्केल-फीते से वो नाप-जोख का काम कर रही है.वही कैमरे से शूट कर रही है, उसी के हाथ में चैनल की माइक है. कुछ संस्थानों में तो कोएड होने के बावजूद सिरे से लड़के ऐसे गायब होते हैं कि एकबारगी तो आपको “सिर्फ लड़कियों के लिए” होने का भ्रम पैदा हो जाए…सवाल है, ये सब किसलिए और किसके लिए ? स्वाभाविक है संस्थान की ब्रांड पोजिशनिंग इस तरह से करने के लिए कि लड़के एडमिशन लेकर चट न जाएं. अंडरटोन यही होती है कि यहां वो खुलापन है, उस दोस्ती की गुंजाईश है जिसकी उम्मीद में आप कॉलेज-संस्थान जाते हो..फर्क सिर्फ इतना है कि सलून और जिम अलग से यूनिसेक्स लिख देते हैं और ये इसके लिए कोएड या सहशिक्षा शब्द का प्रयोग करते हैं.. ग्लैमरस बनाने के लिए और दूसरी तरफ लगे हाथ लड़कियों को भी ये भी बताने के लिए जहां पहले से आपकी इतनी सीनियर्स और दीदीयां पढ़ती आयीं हैं, वहां आप बिल्कुल सुरक्षित हो. गार्जियन को ये कन्विंस करने के लिए कि जो संस्थान लड़कियों को ये सब करने की छूट दे रहा है वो भला ऐेंवे टाइप का संस्थान कैसे हो सकता है ? कुल मिलाकर इन निजी संस्थान को बाजार की गहरी समझ है. उन्हें पता है कि छात्रनुमा ग्राहक सार्वजनिक शिक्षण संस्थानों से किस बात का मारा है, किस बात से चट चुका है और किस चीज पर लट्टू होता है ? लड़कियों की तस्वीरें थोक में लगाने के पीछे उनकी ये बिजनेस स्ट्रैटजी काम करती है. वो ऐसा करके एक ही साथ बाजार को भी साध लेता है, उस तथाकथित प्रोग्रेसिव समाज को भी जिसे और बंदिशें नहीं चाहिए और सार्वजनिक संस्थानों का बाप बनकर भी खड़ा हो जाता है. नहीं तो इन तस्वीरों के पीछे जाकर देखिए, क्या आप दावा कर सकते हैं कि इन निजी संस्थानों में लड़कियों के साथ किसी तरह के भेदभाव नहीं किए जाते, शोषण नहीं होता. इधर सार्वजनिक संस्थान, ताजा मामला अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति के उस बेहूदा बयान और रवैये को ही लें जिसे पिछले दो साल से मीडिया अंडे की तरह सेवता रहा और अब यूटीवी की खान से खोदकर लाया है- लड़कियों को लेकर बिल्कुल उलट रवैया..उसके लिए कम से कम जगह..एक तरह से अघोषित रुप से ये कहने की कोशिश-यहां लड़कियां न ही आएं तो अच्छा..अब देखिए इसकी मीडिया में आलोचना..जमकर, धुंआधार..और हो भी क्यों न..एक तो महावाहियात बात और दूसरा कि हर तीसरे चैनल का प्रायोजक अमेटी इन्टरनेशनल, मानव रचना, गलगोटिया जैसे निजी संस्थान हों..ऐसे कुलपति तो उनके सपूत बनकर काम कर रहे हैं. लेकिन गंभीरता से सोचें तो क्या ये अपने आप में सवाल नहीं है कि जब निजी संस्थान अपने बाजार से रग-रग वाकिफ है तो क्या सार्वजनिक संस्थानों को अपने समाज को इसका आधा भी वाकिफ नहीं होना चाहिए ? कुलपति का ये बयान ये बताने के लिए काफी है कि वो न तो अपने इस बदलते समाज को समझ रहे हैं, न समाज की जरूरत को और लड़कियों के शिक्षित होने के महत्व..खैर, इसे तो रहने ही दीजिए..लाइब्रेरी में वैसे ही पहले से जानेवालों की संख्या तेजी से घटी है, वो जल्द ही किताबों की कब्रगाह बनकर रह जाए, आप जैसे महाशय देते रहिए ऐसे बयान.

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

Samar Anarya : कई तथ्य गड़बड़ हो गए हैं विनीत. जैसे कि यह 2 साल पुराना बयान नहीं बल्कि परसों का है. बाकी यह रहे.

1. यह मामला मीडिया ने किसी साजिश में नहीं उछाला है. वीसी साहब का एएमयू छात्रसंघ के उद्घाटन के वक्त अपना बयान है. यह बयान उन्होंने वीमेंस कॉलेज छात्रसंघ की माँग के जवाब में दिया है, और कॉलेज की प्रिंसिपल बयान/फैसले के समर्थन में हैं.

2. वीसी साहब ने कहा है कि लड़कियाँ आयीं तो लाइब्रेरी में चार गुना ज्यादा लड़के आएंगे, जगह नहीं बचेगी। यह वह नुक्ता है जिसको सारे ‘सेकुलर’ भूले बैठे हैं. इस बयान की अपनी मिसाजाइनी, औरतों से नफ़रत, पर उनका कोई ध्यान नहीं है.

3. तीसरा तर्क कि मौलाना आज़ाद लाइब्रेरी में पोस्टग्रेजुएट (परास्नातक) लडकियों को पढ़ने की इजाजत है इसीलिए यह मीडिया साजिश है. इस बयान का नुक्ता यह है कि इसी लाइब्रेरी में अंडरग्रेजुएट लड़कों को भी पढ़ने की इजाजत है. जगह नहीं है तो किसी के लिए न होगी, लड़कों के लिए है लड़कियों के लिए नहीं? इस पर सोचने का वक़्त कट्टर सेकुलरों के पास नहीं है. (यह बात पता न हो यह मानना जरा मुश्किल है).

4. वीमेंस कॉलेज छात्रसंघ की सदर गुलफिज़ां खान ने कहा था कि जगह की दिक्कत हो तो किताबें इश्यू की जायें वह इस पर भी तैयार हैं, यह मसला भी बहस से खारिज है. तमाम लोग दूरी का तर्क दे रहे हैं, वीमेंस कैम्पस लाइब्रेरी से 3 किलोमीटर दूर है, वहाँ तक आने में लड़कियों को दिक्कत होगी। पर फिर केवल अंडरग्रेजुएट लड़कियों को? पोस्टग्रेजुएट लड़कियाँ कैसे पँहुच जाती हैं?

5. एक और तर्क है कि यह कैम्पस के भीतर के एक तबके की साजिश है. दिक्कत यह कि यह तर्क बहुत पुराना है. एक लड़की का दुपट्टा खींचने के आरोपों के बीच जेएनयू तक में हुई तीखी लड़ाइयों के दौर से दिया जा रहा तर्क। तब के जनरल सेक्रेटरी ने बाकायदा बयान दिया था कि दुपट्टा खींचा भी गया हो तो दुपट्टा खींचना कोई सेक्सुअल हरैसमेंट नहीं है. उस दौर में जिन कुछ एएमयू वालों से हाथापाई तक की नौबत आ गयी थी, लोगों ने बड़ी मुश्किल से अलग किया था वह अब अच्छे दोस्त हैं. जैसे Shadan Khan, Khalid Sharfuddin… इनसे भी इस नुक्ते की दरयाफ़्त की जा सकती है. इसकी भी कि एएमयू को बदनाम करने की साजिश वाला तर्क भी तभी से चला आ रहा है.
6. अंत में यह कि जनाब दुनिया के किसी ठीक ठीक शहर में अलीग बोल देने पर तमाम आँखों में चमक भर देने वाला एएमयू किसी इमाम बुखारी का इस्लाम या किसी तोगड़िया का हिन्दू धर्म नहीं है जो किसी वीसी की मर्दवादी सोच के विरोध से, उसकी मुखालफत से खतरे में पड़ जाए.

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी समर अनार्या के फेसबुक वॉल से.

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