गणतंत्र दिवस की पूर्वसंध्या पर लेखक-संगठनों और पत्रिकाओं की ओर से रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या पर एक बयान

गणतंत्र दिवस की पूर्वसंध्या पर हम लेखक और संस्कृतिकर्मी भारतीय गणतंत्र की संकल्पना पर आये उस संकट के प्रति अपनी गहरी चिंता व्यक्त करते हैं जिसे हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के विद्यार्थी रोहित वेमुला की आत्महत्या ने एक बार फिर गहरे अवसादपूर्ण रंगों में रेखांकित कर दिया है. एक-के-बाद-एक जिस तरह के तथ्य सामने आये हैं, उन्हें देखते हुए रोहित की आत्महत्या को हिन्दुत्ववादी गिरोह, शासन में घुसे उसके नुमाइंदों और उनके इशारे पर काम करते मंत्रालयी एवं विश्वविद्यालयी प्रशासन द्वारा अंजाम दी गयी एक सुनियोजित हत्या कहना ही न्यायसंगत लगता है. इस रूप में यह घटना हिंसक और हत्यारी असहिष्णुता के एक चले आते सिलसिले की सबसे ताज़ा कड़ी है, और शायद सबसे खौफ़नाक भी.

डॉ. भीमराव आम्बेडकर के नेतृत्व में हमारे संविधान को आकार देनेवालों ने आज से 66 साल पहले जिस तरह का भारत बनाने का सपना देखा था, उसके हक़ीक़त से लगातार दूर होते जाने का यह पीड़ाप्रद दृश्य हम सबके लिए अत्यंत चिंताजनक है. संविधान की किताब में धर्म, जाति, लिंग, वर्ग और प्रान्त के भेदभाव से परे एक समतामूलक भारतीय समाज के निर्माण की जो दिशा दिखाई गयी है, हिन्दुत्ववादी शक्तियां हमें उससे ठीक उल्टी राह पर ले जाने के लिए कृतसंकल्प हैं. यह कोई दबी-छुपी बात नहीं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारत के संविधान में कभी आस्था नहीं रखी और एक समय तक मनुस्मृति को भारतीय संविधान का आधार बनाने की खुल कर वक़ालत की. आज उनका राजनीतिक धड़ा संविधान दिवस मनाने की नयी परम्परा डाल कर इस सच्चाई को भले ही दबाना चाहता हो, व्यवहार में उसके सारे काम संविधान की भावना और आत्मा के प्रतिकूल हैं, यह बात रोहित वेमुला की हत्या से बेनक़ाब हुई है.

रोहित वेमुला हत्याकांड की असलियत पर पर्दा डालने या उसकी ओर से ध्यान बंटाने के लिए जिस तरह मानव संसाधन विकास मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक ने अवांछित प्रयास किये, हम उसकी कठोर शब्दों में निंदा करते हैं. मानव संसाधन विकास मंत्री ने बाकायदा प्रेस-कांफ्रेंस कर रोहित और उसके साथियों के निष्कासन से जुड़े तथ्यों को तोड़ने-मरोड़ने और प्रेस को बरगलाने की कोशिश की. आज उनके सारे झूठ सार्वजनिक संज्ञान में हैं. दूसरी ओर, प्रधानमंत्री ने भावुकतापूर्ण वक्तव्यों की आड़ में ‘भारत माता के एक लाल’ के खोने के पीछे की उस दुर्भाग्यपूर्ण पृष्ठभूमि को दबाने का प्रयास किया जिसमें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् से लेकर बंडारू दत्तात्रेय और स्मृति ईरानी जैसे मंत्रियों, मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अधिकारियों और हैदराबाद विश्वविद्यालय के कुलपति तक की भागीदारी रही है.

यह भी गौर किया जाना चाहिए कि एक ओर मा.सं.वि. मंत्री और प्रधानमंत्री तो दूसरी ओर आरएसएस और भाजपा के प्रवक्ता, सभी इसे दलित-उत्पीड़न का मामला बनने से रोकने में तत्पर हैं. इसके लिए इन्होंने जो-जो कुतर्क इस्तेमाल किये हैं, वे न सिर्फ़ इनकी वैचारिक दरिद्रता का प्रमाण हैं बल्कि दलित समुदाय के लिए घोर अपमानजनक भी हैं. नमूने के तौर पर, इनका कहना है कि रोहित और आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के उसके साथी चूँकि याकूब मेमन की फांसी और ‘मुज़फ्फ़रनगर बाक़ी है’ की स्क्रीनिंग जैसे मसायल उठाते थे, इसलिए उनके दलित-पक्ष को चर्चा में लाने की ज़रूरत नहीं. यह तर्क इस बात की सिफारिश करता है कि दलित के दलित होने को तभी तक मान्यता दी जाए जब तक वह सख्ती से अपने को पहचान की राजनीति के दायरे में महदूद रखता है और एक बेहतर समाज को बनाने की लड़ाई के किसी और पहलू का साझीदार नहीं बनता. कहने की ज़रूरत नहीं कि इस अपमानजनक तर्क के द्वारा हिन्दुत्ववादियों ने अपने दलितविरोधी रवैये को ढंकने की बजाय और उघाड़ने का काम किया है.

हम रोहित हत्याकांड को एक मुकम्मल हिन्दुत्ववादी हमला मानते हैं, क्योंकि रोहित और ए.एस.ए. की गतिविधियों से ज़ाहिर है कि उनकी राजनीति हिंदुत्व की पूरी कार्यसूची के ख़िलाफ़ रही है. आरएसएस और उससे जुड़े संगठन एक ऐसा भारत बनाना चाहते हैं जो हिंदुत्व की एकरूपता के सांचे में ढला होगा, जहां अन्य धर्मों को माननेवाले लोग दोयम दर्जे के नागरिक होंगे, जहां सदियों से कायम उत्पीड़नकारी जाति-व्यवस्था को संवैधानिक मान्यता प्राप्त होगी और हर व्यक्ति को वही काम करने होंगे जो सनातन धर्म के अनुरूप उसकी जाति के लिए निर्धारित हैं. ये शक्तियां जितनी इस्लाम और ईसाइयत की विरोधी हैं, उतनी ही दलित विरोधी भी. कोई आश्चर्य नहीं कि हिंदुत्व का आन्दोलन उसी महाराष्ट्र से शुरू हुआ जहां ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले से लेकर बाबा साहेब आम्बेडकर तक, दलित उभार के सबसे मज़बूत स्तम्भ उभर कर आये. इसीलिए हेडगेवार का आधिकारिक जीवन-चरित्र लिखने वाले चं. प. भिशीकर ने संघ की स्थापना के कारण बताते हुए एक तो इस बात का उल्लेख किया कि ‘यवनों का ज़ोर बढ़ रहा था, दंगे हो रहे थे’, दूसरे, पश्चिम भारत में आकार ले रहे ‘ग़ैर-ब्राह्मण आन्दोलन’ का ज़िक्र किया जिससे समाज में ‘विघटन बढ़ रहा था’.

जिन लोगों की आँखों में सामाजिक न्याय और साम्प्रदायिक सौहार्द की ज़मीन तैयार करनेवाला हमारा संविधान खटकता है, उनके बरखिलाफ़ रोहित भारतीय संविधान की मूल भावना का जीता-जागता प्रतीक था. उसकी सुनियोजित हत्या हमारे गणतंत्र की संकल्पना पर मंडराते खतरे की सबसे कर्कश घंटी है. हम शासन और प्रशासन द्वारा इस घटना पर लीपापोती के तमाम प्रयासों की कठोरतम शब्दों में निंदा करते हैं और मांग करते हैं कि केंद्र सरकार के मंत्रियों समेत दोषियों की उस पूरी शृंखला को क़ानूनी जांच के दायरे में लाया जाए जो रोहित वेमुला की खुदकुशी के लिए ज़िम्मेदार है. हम इस ताज़ा घटना-विकास की भी निंदा करते हैं कि हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति श्री अप्पा राव को छुट्टी पर भेजने के बाद उन्हीं विनय श्रीवास्तव को कार्यवाहक कुलपति बनाया गया है जो रोहित वेमुला समेत पांच विद्यार्थियों के निष्कासन की सिफारिश करने वाली समिति के अध्यक्ष थे. यह घटना-विकास अपने-आप में लीपापोती के सरकारी रवैये का पुख्ता सबूत है. हम यह मांग भी करते हैं कि शिक्षा संस्थानों में जातिवाद का ख़ात्मा करने के लिए तत्काल कारगर क़दम उठाये जाएँ और इस मक़सद से थोराट समिति की सिफारिशें अविलम्ब लागू की जाएँ.
 
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सपर्क: ९८१८८५९५४५ (मुरली मनोहर प्रसाद सिंह), ९८६८८५५२९६ (अली जावेद), ९८९९७००७६७ (अनिता भारती), ९९१०५२२४३६ (हीरालाल राजस्थानी), ९८११५७७४२६ (संजय जोशी), ९८६८२६१८९५ (बजरंग बिहारी) ९२१२०२६९९९ (कैलाश चंद चौहान)     

प्रेस विज्ञप्ति

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