अख़बारों-मैग्जीनों में छपने वाला साल का साहित्यिक आकलन मालिश पुराण के सिवा कुछ भी नहीं

Dayanand Pandey : अख़बारों और पत्रिकाओं में छपने वाला साल का साहित्यिक आकलन के नाम पर मालिश पुराण चार सौ बीसी के सिवा कुछ भी नहीं है। जैसे न्यूज चैनल न्यूज दिखाने की जगह चार ठो पैनलिस्ट बैठा कर चीखते -चिल्लाते आप का समय नष्ट करते हैं, अपना धंधा चोखा करते हैं। वैसे ही यह साहित्य के रैकेटियर कुछ लोगों की चरण वंदना करते हैं। यह किताबों की चर्चा नहीं करते, चेहरे की चर्चा करते हैं। नाम जानते हैं यह, काम नहीं।

साहित्य का भी कहीं कोई बही खाता होता है भला जो आप शुभ लाभ ले कर बैठ जाते हैं। नंबर एक और नंबर दो की बहियां ले कर। यह कोई रेस है कि फर्स्ट कौन आया और सेकेंड कौन? बताने आप बैठ जाते हैं। इन बेईमानों की, इन चोरों की दस साल की बही जांच लीजिए, इन की उन सूचियों पर नज़र डाल लीजिए जिनको इन्होंने महान घोषित किया था, उन सूचियों में शामिल लेखकों और किताबों की क्या दुर्गति हुई है, वह लोग कहां और कौन सा तेल बेच रहे हैं, आप जान जाएंगे।

इन चोरों से यह भी पूछा जाना चाहिए कि प्रकाशक जब किताबों की दुकानों पर ज़्यादातर किताब रखते ही नहीं तो तुम को यह किताबें मिलती कहां से हैं? और साल में कितने हज़ार की किताब ख़रीदते हो? और फिर इनमें से पढ़ते कितनी हो? यह साल का आकलन बहुत बड़ा फ्राड है।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय के फेसबुक वॉल से.

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