पुण्य प्रसून जी, आप बाज़ार के एक मोहरा भर हैं, मालिक या नियंता नहीं!

Dayanand Pandey : दि वायर में पुण्य प्रसून वाजपेयी का विधवा विलाप पढ़ कर पता लगा कि वह मोदी-मोदी भले बोल रहे हैं, फर्जी शहादत पाने के लिए लेकिन उन नौकरी के असली दुश्मन रामदेव ही हैं। आज तक और ए बी पी दोनों जगह से रामदेव और पतंजलि का विज्ञापन ही उन की विदाई का मुख्य कारण बना है। कम से कम उन के लेख की ध्वनि यही है। रामदेव आज की तारीख़ में सब से बड़े विज्ञापनदाता हैं। विज्ञापनदाता मीडिया का माई-बाप है। किसी मीडिया की हैसियत विज्ञापनदाता से पंगा लेने की नहीं है। Continue reading

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अकेले शराब पीने को हस्त मैथुन मानते थे रवींद्र कालिया

Dayanand Pandey : संस्मरणों में चांदनी खिलाने वाला रवींद्र कालिया नामक वह चांद… आज रवींद्र कालिया का जन्म-दिन है… ‘ग़ालिब छुटी शराब’ और इस के लेखक और नायक रवींद्र कालिया पर मैं बुरी तरह फ़िदा था एक समय। आज भी हूं, रहूंगा। संस्मरण मैं ने बहुत पढ़े हैं और लिखे हैं। लेकिन रवींद्र कालिया ने जैसे दुर्लभ संस्मरण लिखे हैं उन का कोई शानी नहीं। ग़ालिब छुटी शराब जब मैं ने पढ़ कर ख़त्म की तो रवींद्र कालिया को फ़ोन कर उन्हें सैल्यूट किया और उन से कहा कि आप से बहुत रश्क होता है और कहने को जी करता है कि हाय मैं क्यों न रवींद्र कालिया हुआ। काश कि मैं भी रवींद्र कालिया होता। सुन कर वह बहुत भावुक हो गए।

उन दिनों वह इलाहबाद में रहते थे। बाद के दिनों में भी मैं उन से यह बात लगातार कहता रहा हूं । मिलने पर भी , फ़ोन पर भी । हमारे बीच संवाद का यह एक स्थाई वाक्य था जैसे। इस लिए भी कि ग़ालिब छुटी शराब का करंट ही कुछ ऐसा है। उस करंट में अभी भी गिरफ़्तार हूं। इस के आगे उन की सारी रचनाएं मुझे फीकी लगती हैं। ठीक वैसे ही जैसे श्रीलाल शुक्ल के रागदरबारी के आगे उन की सारी रचनाएं फीकी हैं। ग़ालिब छुटी शराब के विवरणों में बेबाकी और ईमानदारी का जो संगम है वह संगम अभी तक मुझे सिर्फ़ एक और जगह ही मिला है। खुशवंत सिंह की आत्म कथा सच प्यार और थोड़ी सी शरारत में। रवींद्र कालिया खुशवंत सिंह की तरह बोल्ड और विराट तो नहीं हैं पर जितना भी वह कहते परोसते हैं उस में पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता झलकती है। जैसे बहते हुए साफ पानी में दिखती है। मयकश दोनों हैं और दीवाने भी। लेकिन खुशवंत सिंह को सिर्फ़ एक मयकशी के लिए दिन-दिन भर प्रूफ़ नहीं पढ़ने पड़ते। तमाम फ़ालतू समझौते नहीं करने पड़ते। इसी लिए रवींद्र कालिया की मयकशी बड़ी बन जाती है।

कितने मयकश होंगे जो अपने अध्यापक के साथ भी बतौर विद्यार्थी पीते होंगे। अपने अध्यापक मोहन राकेश के साथ रवींद्र कालिया तो बीयर पीते थे। बताईए कि पिता का निधन हो गया है। कालिया इलाहबाद से जहाज में बैठ कर दिल्ली पहुंचते हैं, दिल्ली से जालंधर। पिता की अंत्येष्टि के बाद शाम को उन्हें तलब लगती है। पूरा घर लोगों , रिश्तेदारों से भरा है। घर से बाहर पीना भी मुश्किल है कि लोग क्या कहेंगे। घर में रात का खाना नहीं बनना है। सो किचेन ही ख़ाली जगह मिलती है। वह शराब ख़रीद कर किचेन में अंदर से कुंडा लगा कर बैठ जाते हैं। अकेले। गो कि अकेले पीना हस्त मैथुन मानते हैं।

श्वसुर का निधन हो गया है। रात में मयकशी के समय फ़ोन पर सूचना मिलती है। पर सो जाते हैं। सुबह उठ कर याद करते हुए से ममता जी से बुदबुदाते हुए बताते हैं कि शायद ऐसा हो गया है। अब लेकिन यह ख़बर सीधे कैसे कनफ़र्म की जाए। तय होता है कि साढ़ू से फ़ोन कर कनफ़र्म किया जाए। साढ़ू इन से भी आगे की चीज़ हैं। कनफ़र्म तो करते हैं पर यह कहते हुए कि आज ही हमारी मैरिज एनिवर्सरी है। इन को भी अभी जाना था। सारा प्रोग्राम चौपट कर दिया। शराब ही है जो आधी रात मुंबई में धर्मवीर भारती के घर पहुंचा देती है । उन की ऐसी-तैसी कर के लौटते हैं। सुबह धर्मयुग की नौकरी से इस्तीफ़ा भेजते हैं।

शराब ही है जो अपना प्रतिवाद दर्ज करने इलाहबाद में सोटा गुरु भैरव प्रसाद गुप्त के घर एक रात ज्ञानरंजन के साथ पहुंच कर गालियां का वाचन करवा देती है। रात भर। भैरव प्रसाद गुप्त के घर से कोई प्रतिवाद नहीं आता। सारी बत्तियां बुझ जाती हैं। कन्हैयालाल नंदन को जिस आत्मीयता से वह अपनी यादों में बारंबार परोसते हैं वह उन की कृतज्ञता का अविरल पाठ है। परिवार चलाने के लिए ममता कालिया की तपस्या, उनका त्याग रह-रह छलक पड़ता है ग़ालिब छुटी शराब में। हालांकि शराब पीने को वह अपने विद्रोह से जोड़ते हुए लिखते हैं, ‘मुझे क्या हो गया कि मसें भीगते ही मैं सिगरेट फूंकने लगा और बीयर से दोस्ती कर ली। यह शुद्धतावादी वातावरण के प्रति शुद्ध विद्रोह था या वक्ती या उम्र का तकाज़ा। माहौल में कोई न कोई जहर अवश्य घुल गया था कि सपने देखने वाली आंखें अंधी हो गई थीं। योग्यता पर सिफ़ारिश हावी हो चुकी थी।’

वरिष्ठ पत्रकार दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से.

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‘रविवार’ के संपादक एसपी सिंह और रिपोर्टर शैलेश यूं निकल पाए थे दबंग मंत्री के आपराधिक मानहानि के मुकदमे से!

Dayanand Pandey : अमित शाह के बेटे जय शाह पर आरोप सही है या गलत यह तो समय और अदालत को तय करना है। पर इन दिनों बरास्ता द वायर एंड सिद्धार्थ वरदराजन, रोहिणी सिंह सौ करोड़ के मानहानि के मुकदमे के बाबत हर कोई पान कूंच कर थूक रहा है, आग मूत रहा है। लेकिन आज आप को एक आपराधिक मानहानि के मुकदमे का दिलचस्प वाकया बताता हूं। अस्सी के दशक के उत्तरार्द्ध की बात है। अमृत प्रभात, लखनऊ में एक रिपोर्टर थे शैलेश। कोलकाता से प्रकाशित रविवार में उत्तर प्रदेश के ताकतवर और दबंग वन मंत्री अजित प्रताप सिंह के ख़िलाफ़ एक रिपोर्ट लिखी शैलेश ने।

रिपोर्ट के ख़िलाफ़ अजित सिंह ने लखनऊ की एक अदालत में आपराधिक मानहानि का मुकदमा कर दिया। रविवार के संपादक एसपी सिंह उर्फ सुरेंद्र प्रताप सिंह भी उस मुकदमें में नामजद हुए। अब वकील वगैरह लगे। खबर की पुष्टि में कुछ तथ्य गलत मिले। शैलेश के सूत्र ने उन्हें प्रमाण के तौर पर जो फोटोकापी सौंपी थी वह फर्जी निकली। सुरेंद्र प्रताप सिंह ने शैलेश से पूछा, अब? शैलेश से कुछ जवाब देते नहीं बना। अब हर पेशी पर कोलकाता से सुरेंद्र प्रताप सिंह को लखनऊ आना पड़ता था। शैलेश ने आजिज आ कर एक तरकीब निकाली। हर पेशी पर वह अदालत में रहते ही थे। सो हर पेशी की एक रिपोर्ट अमृत प्रभात में लिखने लगे। उस रिपोर्ट में शैलेश लिखते थे कि आज फला मामले की फिर तारीख़ थी। फिर उस रिपोर्ट में पूरी तफ़सील से बताते थे कि कोलकाता से प्रकाशित रविवार ने यह-यह आरोप लगाए हैं।

रविवार की वह रिपोर्ट जिस ने नहीं पढ़ी थी, वह भी महीने में दो बार अमृत प्रभात में हर तारीख़ के बहाने पढ़ लेता था। दैनिक अख़बार अमृत प्रभात की पहुंच भी बहुत ज़्यादा लोगों तक थी। रविवार की अपेक्षा बहुत ज़्यादा। ख़ास कर अजित प्रताप सिंह के प्रतापगढ़ के चुनाव क्षेत्र तक तो थी ही। मंत्री के ख़िलाफ़ ख़बर के नाते अमृत प्रभात की प्रसार संख्या भी वहां बढ़ गई। अब अजित सिंह तबाह हो गए। सारी दबंगई और सत्ता की ताकत बेअसर हो गई। बुलवाया शैलेश को और पूछा कि आख़िर आप चाहते क्या हैं? शैलेश ने दो टूक कहा कि, अपना मुकदमा उठा लीजिए, नहीं यह ख़बर तो छपती रहेगी! हार मान कर अजित सिंह ने रविवार के ख़िलाफ़ आपराधिक मुकदमा चुपचाप वापस ले लिया। बात खत्म हो गई। पर तब वह अमृत प्रभात जैसा अख़बार था, शैलेश जैसा रिपोर्टर था। और अब?

तब के अख़बार भी तोप मुक़ाबिल नहीं थे। लेकिन आज की तरह भाड़ और मिरासी भी नहीं थे। शैलेश बाद के दिनों में नवभारत टाइम्स, लखनऊ गए फिर रविवार के लखनऊ में ही प्रमुख संवाददाता हुए, फिर नवभारत टाइम्स, दिल्ली होते हुए आज तक, ज़ी न्यूज़ होते हुए न्यूज़ नेशन के कर्ताधर्ता बने थे।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से.

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यह संजय, शराब और शेरो शायरी का दौर था…. कह सकते हैं डिप्रेसन की इंतिहा थी…

स्वर्गीय संजय त्रिपाठी


होते हैं कुछ लोग जो सिर्फ़ संघर्ष के लिए ही पैदा होते हैं। हमारे छोटे भाई और फ़ोटोग्राफ़र मित्र संजय त्रिपाठी ऐसे ही लोगों में शुमार रहे हैं। आज जब संजय त्रिपाठी के विदा हो जाने की ख़बर सुनी तो दिल धक से रह गया। फ़रवरी, 1985 से हमारा उन का साथ था। 32 साल पुराना साथ आज सहसा टूट गया। लखनऊ में वह पहले मेरे ऐसे दोस्त बने जिन से आत्मीयता बनी। दुःख सुख का साथ बना। बिना किसी टकराव और अलगाव के कायम रहा। बिना कुछ कहे-सुने भी हम एक दूसरे को समझ लेते थे। साथ खबरें करते थे, घूमते थे, सिनेमा देखते थे। खुद्दारी रास आई सो दलाली, फोर्जरी, चापलूसी, चमचई न मुझे कभी भाई न संजय को जबकि पत्रकारिता में यह आम बात हो चली है। बिना इस के अब गुज़ारा नहीं है।

जो जितना बड़ा दलाल, उतना बड़ा पत्रकार। हम यह नहीं कर सके सो हम ने तो इस की भारी क़ीमत चुकाई है, चुका रहा हूं। कहां होना था और आज कहीं का नहीं रह गया हूं। एक से एक कौवे दलाली, चापलूसी कर के भाग्य विधाता बन गए और हम इन कौवों की बीट देखते-देखते खत्म हो गए। संजय त्रिपाठी भी इस मामले मेरे हमराही थे। वह इस बेरंग जिंदगी को विदा कह गए, मैं जाने क्यों शेष रह गया हूं। वह कोई तीन साल मुझ से छोटे थे। जब मेरे घर आते तो मेरे पैर छूते मेरे बड़े होने के नाते। बाद में मैं ने बहुत मना किया कि हम दोस्त हैं तो वह किसी तरह माने।

जनसत्ता, दिल्ली से स्वतंत्र भारत, लखनऊ में जब मैं रिपोर्टर हो कर आया था तब संजय वहां पहले ही से फ़ोटोग्राफ़र थे। हम भी तब मुटाए नहीं थे लेकिन संजय त्रिपाठी ख़ूब दुबले-पतले थे। सींक सलाई जैसे। उन के चेहरे पर मासूमियत कुलांचे मारती थी, उत्साह जैसे हिलोरें मारता था। संकोच की चादर जैसे उन के पूरी देह पर लिपटी रहती थी। खुद्दारी की खनक उन के हर भाव से मिलती रहती थी। वह साईकिल से चलते थे। गले में कैमरा लटकाए, कैमरा संभालते, साईकिल चलाते उन को देखना मुश्किल में डालता था। लेकिन वह मुश्किल में नहीं रहते थे। पान कूंचते हुए वह अपनी सारी मुश्किलें जैसे साईकिल के टायर से कुचलते चलते थे। स्वतंत्र भारत था तो उस समय लखनऊ का सब से बड़ा अखबार, सवा लाख रोज छपता था लेकिन संजय त्रिपाठी का शोषण तब यह अख़बार बहुत करता था। उस समय सब को पालेकर अवार्ड के हिसाब से तनख्वाह मिलती थी, ठीक ठाक मिलती थी लेकिन संजय त्रिपाठी को प्रति फ़ोटो पांच रुपए मिलते थे। वह भी प्रकाशित फ़ोटो पर।

वह फ़ोटो चाहे जितनी खींचें पर पैसे छपी फ़ोटो पर ही मिलती थी। और कई बार फ़ोटो सेलेक्ट हो कर भी नहीं छपती थी। कभी अचानक विज्ञापन आ जाने के कारण जगह की कमी के चलते। तो कभी किसी फ्रस्ट्रेटेड डेस्क के साथी की मनबढ़ई और सनक के चलते। खैर जैसे-तैसे संजय त्रिपाठी फोटोग्राफरी क्या चाकरी करते रहे थे। इस उम्मीद में कि कभी तो नौकरी पक्की होगी और कि उन्हें भी पालेकर अवार्ड वाली तनख्वाह मिलेगी। वह भी सम्मानजनक जीवन जिएंगे। लेकिन उन दिनों स्वतंत्र भारत में एक विशेष प्रतिनिधि थे शिव सिंह सरोज। निहायत ही मूर्ख, दुष्ट और धूर्त प्रवृत्ति के थे लेकिन चूंकि दलाल टाईप के पत्रकार थे सो उन की अख़बार और अख़बार से बाहर भी ख़ूब चलती थी। संजय को वह भरपूर परेशान और अपमानित करते। नित नए ढंग से। उन को चढ़ाई करने के लिए अपना फ्रस्ट्रेशन निकालने के लिए रोज कोई शिकार चाहिए होता था। संजय त्रिपाठी से कमज़ोर शिकार कोई और नहीं मिलता था।

संजय त्रिपाठी और शिव सिंह सरोज जब कि एक ही क्षेत्र के रहने वाले थे। बाराबंकी के हैदरगढ़ के। बल्कि संजय त्रिपाठी के पिता श्री रामकिशोर त्रिपाठी साठ के दशक में हैदरगढ़ से विधायक रहे थे। लेकिन वह गांधीवादी थे सो पैसा नहीं बनाया, बेईमानी नहीं की। वह  पराग दुग्ध संघ के अध्यक्ष थे। चाहते तो संजय को कहीं अच्छी नौकरी दे सकते थे, किसी जगह सिफ़ारिश कर सकते थे। संजय ने ऐसा कई बार चाहा भी लेकिन पिता ने सख्ती से हर बार इंकार किया। संजय मन मसोस कर रह जाते थे। संजय के पिता जी एक समय भूदान आंदोलन में सक्रिय रहे थे। उत्तर प्रदेश में तमाम भूमिहीनों को भूमि के पट्टे दिए। लेकिन अपने किसी परिजन को एक इंच भूमि नहीं दी। अपने बच्चों को तो खैर क्या देते। आवश्यक वस्तु निगम के भी एक समय प्रशासक रहे। लेकिन उस भ्रष्ट विभाग में भी एक पैसा भी संजय के पिता ने न तो छुआ, न किसी को छूने दिया।

ऐसे ईमानदार पिता के पुत्र संजय त्रिपाठी पांच रुपए प्रति फ़ोटो पर गुज़ारा कर रहे थे। रोज जीते थे, रोज मरते थे। किसी-किसी दिन एक भी फ़ोटो नहीं छपती। वह उदास हो जाते। शिव सिंह सरोज को बर्दाश्त करना उन के लिए दिन पर दिन भारी होता जा रहा था। नौकरों को भी कोई क्या डांटेगा जिस तरह शिव सिंह सरोज उन्हें डांटते, जलील करते। पर संजय करते भी तो क्या करते। उन के पास कोई विकल्प नहीं था। मैं देख रहा था, संजय दब्बू बनते जा रहे थे।  उन की मासूमियत उन से मिस हो रही थी। खैर थोड़े दिन में वह संपादक वीरेंद्र सिंह की कृपा से दैनिक वेतन भोगी फ़ोटोग्राफ़र बन गए। अब थोड़ा ही सही, कम से कम एक निश्चित पैसा प्रति माह उन्हें मिलने लगा था। दबे-दबे से रहने वाले संजय अब फिर से हंसने लगे थे। उभरने लगे। संजय त्रिपाठी की खिंची फ़ोटो में भी निखार आने लगा।

वह जो कहते हैं बाईलाईन, वह भी कभी-कभार संजय त्रिपाठी को फ़ोटो पर मिलने लगी। लेकिन कनवेंस अलाऊंस उन्हें नहीं मिलता था। जो उन दिनों डेढ़ सौ रुपए होता था। क्या तो उन के पास अपना कनवेंस नहीं था। हालां कि वह बहुत गुरुर के साथ कहते कि, ‘ है तो साईकिल मेरे पास! ‘ लोग हंस पड़ते। बहुत लड़े वह इस के लिए। कुछ संघर्ष के बाद उन्हें कनवेंस अलाऊंस भी मिलने लगा। और यह देखिए कि शिव सिंह सरोज के तमाम विरोध के बावजूद संपादक वीरेंद्र सिंह ने संजय त्रिपाठी को स्टाफ़ फ़ोटोग्राफ़र का नियुक्ति पत्र थमा दिया। अब संजय ने लोन ले कर एक मोपेड भी ख़रीद लिया। जिसे उन के साथी फ़ोटोग्राफ़र संजय की बकरी कहते। अभी तक शिव सिंह सरोज के अपमान सहते आ रहे संजय अब थोड़ा दब कर ही सही उन से प्रतिवाद करने लगे थे। लेकिन स्वतंत्र भारत में एक क्राईम रिपोर्टर थे आर डी शुक्ल जो वीरेंद्र सिंह के बड़े मुंहलगे थे, वह भी सताने लगे। लेकिन संजय मेरे साथ बहुत कंफर्ट फील करते।

बहुत से एसाइनमेंट हमारे साथ किए संजय ने। जब साईकिल से चलते थे तब वह हमारे साथ जब चलते तो अपनी साईकिल आफिस में छोड़ कर मेरी स्कूटर पर आ जाते। पीछे बैठे-बैठे ही वह फ़ोटो खींच लेते। ऐसी बहुत सी घटनाएं और यादें हैं। लेकिन कुछ दृश्य भुलाए नहीं भूलते। जैसे एक बार एक प्रदर्शन के समय विधान सभा के सामने लाठी चार्ज हो गया था। संजय बोले, थोड़ा रिश्क लीजिए तो हम बढ़िया फ़ोटो बना लें। हामी भरते ही वह रायल होटल की तरफ से हमारे स्कूटर पर पीछे की सीट पर पीछे मुंह कर के बैठे। बोले, बस खरामा-खरामा चलते चलिए। चौराहे पर आते ही पुलिस ने रोका लेकिन हम झांसा दे कर प्रेस-प्रेस कहते निकल लिए। बीच लाठी चार्ज में हमारी स्कूटर निकली। और संजय का कैमरा चमकने लगा। अचानक ठीक विधान सभा के सामने के आते ही पुलिस की चपेट में हम आ गए।

संजय घबराए और बोले, फुल स्पीड में भाग लीजिए, नहीं पिट जाएंगे। हम कितना भागते। पुलिस की एक लाठी संजय के कैमरे पर आती-आती कि संजय ने कैमरे पर झुक कर अपना सिर लगा दिया। कैमरा बच गया, संजय का सिर फूट गया। चोट गहरी नहीं थी पर थी।  स्कूटर सरपट भगा कर सिविल हास्पिटल आया। संजय को पट्टी वगैरह करवाई। लेकिन संजय को सिर पर चोट की परवाह नहीं थी। ख़ुश थे वह कि कैमरा बच गया और फ़ोटो अच्छी मिल गई थी। इस के पहले एक बार किसी प्रदर्शन में संजय का कैमरा टूट गया था। पांच हज़ार का उन का नुकसान हुआ था तब के दिनों। दफ़्तर से कोई सहयोग नहीं मिला था। वीरेंद्र सिंह ने बाद में मुझे डांटा। कहा कि, वह तो फ़ोटोग्राफ़र है, बैल है, बुद्धि नहीं है पर आप तो रिपोर्टर हैं, तिस पर लेखक भी, अकल से काम लेना था।  कहीं जान पर बन आती तो? एक लाठी चार्ज में एक नेता अक्षयवर मल की ऐसे ही किसी पुलिस लाठी चार्ज में सिर में चोट लगने से उन्हीं दिनों मौत हो चुकी थी। लेकिन दूसरे दिन संजय हीरो थे। अख़बार में आठ कालम की संजय की खींची फ़ोटो संजय की बाईलाईन के साथ छपी थी। ऐसी फ़ोटो किसी और अख़बार के पास नहीं थी। सभी अख़बार पिट गए थे।

एक बार लखनऊ महोत्सव के कवि सम्मेलन में शिव सिंह सरोज ने अपना सम्मान आयोजित करवाया। सम्मान समारोह की गरिमा बनाने के लिए अमृतलाल नागर सहित कुछ और लोगों को भी सम्मान सूची में रखवा लिया। तब के मुख्य मंत्री नारायण दत्त तिवारी को सम्मानित करना था। ठाकुर प्रसाद सिंह कार्यक्रम का संचालन कर रहे थे। वह सम्मान के समय शिव सिंह सरोज का नाम भूल गए और कवि सम्मेलन शुरू कर दिया। शिव सिंह सरोज संजय को ख़ास ताकीद कर के ले गए थे समारोह में कि मेरे सम्मान की बढ़िया फ़ोटो खींचना। पर जब सम्मान समारोह खत्म हो गया, शिव सिंह सरोज का नाम नहीं पुकारा गया तो कवि सम्मेलन शुरू होते ही संजय पेशाब करने पंडाल से बाहर चले गए। लेकिन एक कवि के कविता पाठ के बाद सरोज ने संचालक को याद दिलाया कि उन के सम्मान का क्या हुआ? तो उन्हों ने कवि सम्मेलन रोक कर शिव सिंह सरोज का सम्मान भी करवा दिया। फिर जल्दी ही शिव सिंह सरोज को कविता पाठ के लिए भी बुला लिया।

शिव सिंह सरोज का डबल अपमान हो गया। एक तो क्रम से सम्मान नहीं हुआ दूसरे उन की वरिष्ठता का ख्याल नहीं रखते हुए नए कवियों के साथ पहले ही कविता पाठ करने के लिए बुला लिए गए। गुस्से में आग बबूला वह कविता पाठ करने आए। आग्नेय नेत्रों से ठाकुर प्रसाद सिंह को देखते हुए उन्हों ने बेलीगारद शीर्षक लंबी कविता पढ़नी शुरु की और हूट होने लगे। इतना कि वीर रस की यह कविता करुण रस में तब्दील हो गई। लेकिन लाख हूटिंग के शिव सिंह सरोज ने पूरी कविता पढ़ी। सम्मान में मिली कंधे से गिर गई शाल पीछे मुड़ कर उठाई, कंधे पर रखी और अपनी जगह ऐसे आ कर बैठे सीना तान कर कि हल्दीघाटी जीत कर लौटे हों। लेकिन असली हल्दीघाटी तो दूसरे दिन की रिपोर्टिंग मीटिंग में शेष थी। उन्हों ने संजय से अपने सम्मान समारोह की फ़ोटो मांगी। तो संजय बिदक कर पूछ बैठे कि, ‘आप का सम्मान हुआ भी था?’ और उन्होंने जैसे जोड़ा, ‘हां आप के बेलीगारद कविता पाठ की फ़ोटो ज़रूर खींची है!’; कह कर उन के काव्य पाठ की फ़ोटो सामने रख दी।

शिव सिंह सरोज ऐसे फटे गोया आसमान फट गया हो। फ़ोटो फेकते हुए बोले, ‘बेलीगारद! भाग जाओ यहां से।’ मुख्य मंत्री ने हमको सम्मानित किया, पूरी दुनिया ने देखा और ई बेलीगारद देखि रहे थे!’ संजय उठ कर मीटिंग से बाहर चले गए। फिर घर चले गए। शिव सिंह सरोज ने संजय को बर्खास्त करने के लिए लिख दिया। वीरेंद्र सिंह ने टालते हुए कहा, यह बर्खास्तगी का विषय नहीं है। लेकिन संजय की तबीयत ख़राब हो गई। डिप्रेसन में चले गए। हफ़्ते भर बाद लौटे। संजय की जिंदगी फिर रफ़्तार पर आ गई। लेकिन अकसर बुदबुदाते हुए कहते यह बुड्ढा मेरी नौकरी खा जाएगा किसी दिन। शिव सिंह सरोज के इस बेलीगारद प्रसंग का सविस्तार वर्णन मैं ने अपने उपन्यास अपने-अपने युद्ध में किया है। हुआ यह भी कि मैं संजय को जब-तब बेलीगारद कह कर भी बुलाने लगा। वह कभी मुस्कुरा पड़ता तो कभी ताव खा जाता।

उन दिनों मैं दारुलशफा में रहता था तो मेरे घर अकसर आते संजय। दफ़्तर का दुखड़ा रोते। घर में भी कम दिक्कत नहीं थी। एक दिन वह बहुत ख़ुश होते हुए बोले, मालूम है पांडेय जी, इस दारुलशफा में मैं भी रहा हूं काफी समय। बचपन गुज़रा है मेरा यहां। पूछा कैसे? तो हलके से मुस्कुराते हुए बताया कि पिता जी एम एल थे न! फिर चुप हो गए।

पिता ईमानदारी का बरगद थे पर एक सौतेली माता भी थीं। उन का सौतेलापन भी कम नहीं था। संजय भीतर-बाहर दोनों तरफ टूट रहे थे। संयोग देखिए कि वीरेंद्र सिंह ने स्वतंत्र भारत से इस्तीफ़ा दे दिया तो शिव सिंह सरोज कार्यकारी संपादक बना दिए गए। कुछ दिनों के लिए ही सही। सरोज से मेरी भी नहीं निभती थी। संजय की तो खैर क्या कहूं। वह सरोज को का वा स बोलता। खैर सरोज के बाद पत्रकारिता में एक और दलाली के चैंपियन राजनाथ सिंह सूर्य संपादक की कुर्सी पर शोभायमान हो गए। मेरे लिए और मुश्किल हो गई। स्वतंत्र भारत से छुट्टी हुई और नवभारत टाइम्स आ गया। जल्दी ही राष्ट्रीय सहारा शुरू हुआ तो संजय त्रिपाठी भी स्वतंत्र भारत छोड़ राष्ट्रीय सहारा आ गए।

अब हम उन को संजय के बजाय मज़ा लेते हुए कहते, का हो , बेलीगारद!  राष्ट्रीय सहारा में आ कर संजय की जिंदगी जैसे पटरी पर आ गई। अब वह ख़ुश और मस्त दिखने लगे। लेकिन जल्दी ही वह फिर पटरी से उतर गए। रणविजय सिंह नाम का एक मूर्ख संपादक बन गया। जो पत्रकारिता का क ख ग भी नहीं जानता था। यह रणविजय सिंह शिव सिंह सरोज से भी ज़्यादा मूर्ख और धूर्त निकला। संजय से भी जूनियर था, मुझ से भी। वह संजय जैसे खुद्दार आदमी को निरंतर अपमानित करने लगा। संजय गालियां देते हुए कहता कि यार यह साला किस्मत का पट्टा लिखवा कर लाया है। अल्ला मेहरबान तो गधा पहलवान। फिर जैसे टूटते हुए कहता हम जैसों की किस्मत भगवान ने गधे के लिंग से लिखी है। रणविजय को पेट भर गरियाता और कहता साले को कुछ आता-जाता नहीं लेकिन दिन-ब-दिन मज़बूत हुआ जाता है पैर छू-छू कर। तंत्र-मंत्र कर के। बाद के दिनों में हम भी राष्ट्रीय सहारा पहुंचे। संजय और हम फिर साथ हो गए।

रणविजय सिंह जैसे साक्षर, दलाल और धूर्त से मेरी भी कभी नहीं निभी। अजब अहमक था यह आदमी। बीच मैच में फ़ोटोग्राफ़र से मैन आफ़ द मैच की फ़ोटो मांगता। फ़ोटोग्राफ़र कहता कि अरे मैच खत्म होगा तब तो मैन आफ़ द मैच होगा। वह कहता टेक्निकल्टी मत समझाओ मुझे। मुझे तो बस फ़ोटो चाहिए। एक से एक मूर्खताएं करता रहता वह। समझ से पूरी तरह पैदल। निर्मल वर्मा का निधन हुआ तो तब के दिनों दिल्ली में फ़ीचर देख रहे मित्र से मैं ने फ़ोन कर कहा कि निर्मल जी पर एक विशेष पेज निकलना चाहिए। मेरे पास उन के एक इंटरव्यू सहित कुछ सामग्री है, कहिए तो भेज दूं। वह बोले, पहले संपादक से बात कर लूं फिर बताता हूं।थोड़ी देर में उन का फ़ोन आया। कहने लगे कुछ मत भेजिए। मैं ने कारण पूछा तो वह बताने लगे कि संपादक ने पूछा कि क्या बहुत बड़ा कलाकार था? मैं ने कहा, नहीं लेखक थे। तो मुंह बिचका कर कहने लगा फिर रहने दीजिए।

ऐसी मूर्खताओं के उस के अनेक किस्स्से हैं। लेकिन संजय सही कहता था, अल्ला मेहरबान तो गधा पहलवान। रणविजय तो समूह संपादक हो गया। और यह देखिए कि औरतबाजी, दलाली  करते-करते, ट्रांसफर, पोस्टिंग करते-करवाते सांसद निधि बरसने लगी उस पर, विधायक निधि बरसने लगी उस पर। लाखों, करोड़ों में। वह मैनेजमेंट कालेज खोल बैठा , इंजीनियरिंग कालेज भी। बारात घर भी। कई-कई घर और फार्म हाऊस। इधर संजय नींद की दवा खाने लगा। डिप्रेसन में जाने लगा। बच्चे बड़े हो रहे थे जिम्मेदारियां बढ़ रही थीं। तनाव उस से ज़्यादा। शराब तनाव से भी ज़्यादा। लाठियां खा कर भी फ़ोटो खींचने वाला संजय, कैमरे बचाने में सिर फोड़वा लेने वाला संजय अब एसाइनमेंट से भागने लगा। कभी मासूम सा दिखने वाला संजय अब अड़ने, लड़ने और झगड़ने वाला हो चला था। शिव सिंह सरोज से बड़ा सिरदर्द रणविजय सिंह हो गया संजय के लिए। लेकिन वह जैसे तैसे निभाता रहा। फ़ोटो खींचने में फ़ोटोग्राफ़र अकसर पिटते रहते हैं। कभी पुलिस पीटती है तो कभी गुंडे, कभी भ्रष्ट अफ़सर।

संजय राष्ट्रीय सहारा की नौकरी में भी कई बार पिटा। लेकिन वापस दफ़्तर आ कर भी जलील हुआ तो टूट-टूट गया। परिवार बिखरने लगा। अब यह देखिए कि एक दिन पता चला कि संजय ने आत्महत्या की कोशिश की। ढेर सारी नींद की दवा खा ली थी। परिवारीजनों ने अस्पताल ले जा कर किसी तरह बचा लिया। जल्दी ही संजय ने दूसरी बार आत्म हत्या की कोशिश की। फिर घर वालों ने बचा लिया। पहली बार मैं ने समझाया था, सांत्वना दी थी। दूसरी बार डांटा। कि यह बार-बार की क्या बेवकूफी है। वह लिपट कर रोने लगा। कहने लगा आप बड़े भाई हैं, आप को डांटने का हक़ है! पर मेरी लाचारी समझिए। बच्चों का वास्ता दिया, बेटी का वास्ता दिया। पर एक बहादुर आदमी हर बात पर रोता रहा। अंततः उस ने वायदा किया कि अब यह गलती नहीं करेगा। लेकिन उस की जिंदगी पटरी से उतर गई थी। डिप्रेशन उस का बड़ा भाई बन गया था। अब वह जिस तिस से लड़ पड़ता। इसी बीच वह मुनव्वर राना से उस की मुलाकात हो गई। अब वह उन की शायरी का मुरीद हो गया। बात-बात में वह मुनव्वर राना के शेर कोट करता रहता। अब वह गजलों का शौक़ीन हो चला था। अकसर रात को फ़ोन करता। कहता सो न रहे हों तो बड़े भाई कुछ शेर सुनाऊं। फिर एक से एक शेर सुनाता। कई बार वह यह काम सुबह-सुबह भी करता। फ़ोन करता और कहता, अरे, कब तक सोते रहेंगे, शेर सुनिए। अब वह जब घर आता तो ग़ज़लों की कोई सी डी लिए। कभी पेन ड्राइव लिए हुए।कहता इसे सुनिए।

अब यह संजय,  शराब और शेरो शायरी का दौर था। कह सकते हैं उस के डिप्रेसन की इंतिहा थी।

पिछले दिनों हम दोनों बेटी की शादी खोजने में लगे थे। संजय की बेटी की शादी तय हुई तो वह कार्ड ले कर आया। शादी के दिन ही दिल्ली में मेरा एक कार्यक्रम था। बताया तो कहने लगा कुछ नहीं आना है। अपनी बेटी की शादी में नहीं आएंगे तो कब आएंगे? मैं ने टिकट कैंसिल किया। गया भी शादी में। बेटी की शादी संजय ने ख़ूब धूमधाम से की। इस के पहले संजय के एक छोटे भाई की शादी में अंबेडकर नगर के एक गांव में बारात गई थी। तब संजय का और ही रुप देखने को मिला था। बहुत सी रिपोर्टिंग यात्राओं में भी संजय का साथ रहा है। पर उस के रंग में फर्क नहीं आता था। उस की शेरो शायरी का रंग और ज़िम्मेदारी का रंग कैसे तो सुर्खरू थे। बेटी की शादी कर के वह बहुत निश्चिंत हो गया था। बिलकुल मस्त और मगन। मुझे बेटी के विवाह के लिए परेशान देखता तो कहता कि बेटियां अपना भाग्य ले कर आती हैं सो घबराओ नहीं यार! हो जाएगी बिटिया की शादी भी! वह बेटी की एक से एक फ़ोटो सेशन करता और कहता यह फ़ोटो भेज कर देखिए। अब की तो बात बन जाएगी। जब मेरी बेटी की शादी हुई तो वह आया और ख़ूब ख़ुश। 

ऐसे ही एक दिन मिला तो कहने लगा मालिनी अवस्थी से कभी बात होती है। मैं ने कहा हां, होती है कभी-कभार। मैं ने पूछा कि क्यों क्या हुआ? कहने लगा कि यार अब हमें वह पहचानती ही नहीं। फिर याद दिलाते हुए कहा कि याद है मालिनी अवस्थी के बलरामपुर अस्पताल वाले घर में आप के साथ गया था। आप ने इंटरव्यू किया था, हम ने फ़ोटो खींची थी। वह घर में स्कर्ट पहने बैठी थीं, उन की स्कर्ट में फ़ोटो। स्वतंत्र भारत में छपी थी बड़ी सी। किसी अख़बार में मेरी खींची फ़ोटो ही पहली बार उन की छपी थी, उन्हें याद तो दिलाइए। कि उन को स्टार बनाने में मेरा भी हाथ है। पहचान लिया करें मुझे भी तो अच्छा लगेगा। हम ने कहा, ठीक है। लेकिन मालिनी अवस्थी से यह कभी कह नहीं पाया।

क्या कहता भला। यह भी कोई कहने की बात होती है। रिपोर्टिंग और फ़ोटोग्राफ़ी में ऐसे तमाम मुकाम आते-जाते रहते हैं। बहुत से लोग कंधे पर सिर रख कर निकल गए। जब ज़रुरत हुई सुबह-शाम सलाम किया। ज़रूरत खत्म, पहचान खत्म। कौन किस को याद करता है। लेकिन संजय अकसर याद दिलाता और कहता कि कहा नहीं मालिनी अवस्थी से क्या। मैं हर बार कहता हूं, कह कर टाल जाता। फिर बहुत दिन हो गए इस बात को उस ने यह कहना बंद कर दिया। पर एक दिन फ़ेसबुक पर संजय की वाल पर देखा कि वह मालिनी अवस्थी के साथ एक फ़ोटो में मुस्कुरता हुआ खड़ा था। लेकिन मैं ने उस से कुछ कहा नहीं। जाने कितनी सांस और फांस है संजय के साथ हमारी। जाने कितने लोगों के इंटरव्यू, सेमिनारों, नाटकों, राजनीतिक कार्यक्रमों, धरना, प्रदर्शन, आंदोलन आदि-इत्यादि में उस के साथ की अनेक यादें जैसे दफ़न हैं हमारे सीने में।

कुछ समय पहले इस राष्ट्रीय सहारा की नौकरी से भी इस्तीफ़ा दे दिया था संजय ने। सो जिंदगी जो थोड़ी बहुत पटरी पर थी बिलकुल पटरी से उतर गई थी। आर्थिक समस्याएं जब नौकरी करते हुए नहीं खत्म हुईं तो बिना नौकरी के कैसे खत्म होतीं। उसे अपना फाइनल हिसाब मिलने का इंतज़ार था कि ख़ुद फाइनल हो गया। संजय का एक छोटा भाई विनोद त्रिपाठी भी टाइम्स आफ़ इंडिया में फ़ोटोग्राफ़र था। कुछ साल पहले विनोद भी विदा हो गया था। अब संजय अपने गांव की बात करता रहता था। लेकिन गांव में भी कौन सी जमींदारी थी भला। पुरखे देवरिया से आ कर हैदरगढ़ के पास के गांव पूरे झाम तिवारीपुरवा में बसे थे और पिता विरासत में ईमानदारी और संघर्ष दे गए थे। दुर्भाग्य से संजय भी अपने दोनों बेटों को यही विरासत सौंप गए हैं।

शुरु के दिनों में जब संजय स्वतंत्र भारत में अपने को फ़ोटोग्राफ़र साबित करने के संघर्ष में लगा था, उसे हर कोई फ़ोटोग्राफ़ी सिखाने में लगा था। जिसे कैमरा पकड़ने का शऊर नहीं होता वह भी, जिसे फ़ोटो की समझ नहीं होती वह भी। उन्हीं लोगों में से एक मैं भी था। मैं भी उसे कभी रघु रॉय के फ़ोटो दिखाता तो कभी सत्यजीत रॉय के फ़ोटो। और बताता कि देखो फ़ोटो यह होती है। वह फ़ोटो देखता, मेरी बात सुनता और टाल जाता। यह सब जब कई बार हो गया तो संजय कहने लगा यह दिल्ली नहीं है, बंबई और कलकत्ता नहीं है, लखनऊ है। यहां ऐसी फ़ोटो कौन खींचता है, कौन छापता है। तो मैं उसे अनिल रिसाल सिंह के फ़ोटो दिखाता। सत्यपाल प्रेमी के फ़ोटो दिखाता और कहता यह देखो, यह तो लखनऊ के फ़ोटोग्राफ़र  हैं। वह तड़पता हुआ कहता, इन के कैमरे देखे हैं, इन के लेंस देखे हैं? क्या है मेरा कैमरा? यह कोई कैमरा है?

वह कहने लगा दिला दीजिए ऐसा ही कैमरा, ऐसा ही लेंस और ऐसी ही सुविधा। और फिर धरना, प्रदर्शन, नाटक, नौटंकी की रूटीन फोटुओं से फुर्सत, डाल दीजिए मेरे पेट में भरपेट रोटी। ऐसी ही सुविधा और ऐसी ही निश्चिंतता। इन से अच्छी फ़ोटो खींच कर न दिखाऊं तो कहिएगा। वह कहता, यहां तो रोज जब फ़ोटो खींचता हूं तो शिव सिंह सरोज का अपमानित करने वाला सामंती रवैया दिमाग में सवार रहता है। फ़ोटो क्या खाक खींचूंगा? रोटी दाल चलाने दीजिए परिवार की। व्यवहार में यही है, बाकी सब सिद्धांत है। सच यही है कि अधिकांश रिपोर्टर, फ़ोटोग्राफ़र रोटी दाल में ही स्वाहा हो जाते हैं और अपना बेस्ट नहीं दे पाते हैं। शिव सिंह सरोज और रणविजय सिंह जैसे पत्रकारिता के दलाल गिद्ध जाने कितने संजय त्रिपाठी खा गए हैं, खाते रहेंगे। क्यों कि अब इन्हीं शिव सिंह सरोज और रणविजय सिंह जैसे दलालों और भडुओं का ज़माना है। अख़बारों में यह भडुए दलाल ही भाग्य विधाता हैं। पढ़े-लिखे लोगों की ज़रुरत अब किसी प्रबंधन को नहीं है।

अलविदा मेरे भाई, मेरे दोस्त, मेरे बेलीगारद! बहुत सारी बातें हैं, बहुत सारी यादें हैं। स्मृतियों में तुम सर्वदा उपस्थित रहोगे। अभी इतना ही। शेष फिर कभी। लेकिन तुम ने आज मुझे रुलाया बहुत है। अकसर तुम्हें चुप कराने वाला मैं आज कैसे चुप रह पाता भला। सो रो-रो कर हलका किया ख़ुद को। तुम धू-धू कर जलते रहे, मैं फूट-फूट रोता रहा। यही तो आज हुआ, मेरे बेलीगारद, डियर बेलीगारद! पर अब किसे इतने दुलार से कहूंगा डियर बेलीगारद! तुम तो चले गए!

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है। यह लेख उनके ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लिया गया है।


मूल खबर…

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44 के हुए यशवंत को वरिष्ठ पत्रकार दयानंद पांडेय ने यूं दी बधाई

Dayanand Pandey : आज हमारे जानेमन यारों के यार यशवंत सिंह का शुभ जन्म-दिन है। व्यवस्था से किसी को टकराना सीखना हो तो वह यशवंत सिंह से सीखे। अपनों से भी किसी को टकराना सीखना हो तो वह यशवंत से सीखे। यहां तक कि अपने-आप से भी किसी को टकराना सीखना हो तो भी वह यशवंत से सीखे। अपने आप को गाली सुनाने और सुनने की क्षमता भी किसी को पानी हो तो यशवंत से पाए। पारदर्शिता की इंतिहा भी हैं यशवंत सिंह।

मैं उनको उनकी फकीरी, फ़क्कड़ई और बहादुरी के लिए जानता हूं। मीडिया के थके-हारे, पराजित लोगों को जिस तरह सुस्ताने के लिए, रोने के लिए, साहस और भरोसा देने के लिए अपना अनमोल कंधा वह सर्वदा उपस्थित कर देते हैं वह अन्यत्र दुर्लभ है। मीडिया के असंख्य स्पीचलेस लोगों के लिए जिस तरह वह भड़ास 4 मीडिया के मंच के मार्फत वायस आफ स्पीचलेस बन जाते हैं, वह बहुत ही सैल्यूटिंग है।

आज वह 44 साल के हो गए हैं। अभी कुछ समय पहले वह जेल गए थे, मीडिया घरानों के खिलाफ लड़ते हुए। कई सारे मीडिया हाऊस मिल कर उन के खिलाफ पिल पड़े थे। कि वह जेल से बाहर ही न आ पाएं। पर वह आए और एक दिलचस्प किताब ‘जानेमन जेल’ भी लिखी। लेकिन जब वह जेल में थे तभी मैंने उनकी बहादुरी और संघर्ष को रेखांकित करते हुए एक लेख लिखा था। लेख का लिंक नीचे देते हुए, उनके इस जुझारू जज़्बे को सैल्यूट करते हुए उन्हें जन्म-दिन की बधाई दे रहा हूं।

बीती आधी रात भी मेसेंजर पर उन्हें बधाई दी थी। फ़ौरन उनका वीडियो काल आया। वह लहालोट थे, जश्न में थे, बहू के साथ नृत्यरत! बजते हुए गीत और नृत्य के बीच वह बार बताते रहे, आप की बहू है, बहू! और बहू नृत्य में उनके साथ होते हुए भी गंवई और पारिवारिक लाज, ओढ़े हुए थीं। मर्यादा और यशवंत के मान का निर्वाह करते हुए। ईश्वर से प्रार्थना है कि ऐसे ही सपरिवार स्वस्थ, मस्त और प्रसन्न रहें यशवंत सिंह। लव यू जानेमन यशवंत सिंह, लव यू!

यह समय यशवंत के खिलाफ़ आग में घी डालने का नहीं, यशवंत के साथ खड़े होने का है
http://sarokarnama.blogspot.in/2012/07/blog-post.html 

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से.

इसे भी पढ़ें….

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रवीश कुमार ने बलात्कारी राम रहीम और निकम्मे मनोहर लाल खट्टर की डट कर ख़बर ली

Dayanand Pandey : रवीश कुमार सिर्फ़ लाऊड, जटिल और एकपक्षीय ही नहीं होते, कभी-कभी स्मूथ भी होते हैं और बड़ी सरलता से किसी घटना को तार-तार कर बेतार कर देते हैं। आज उन्होंने एक बार फिर यही किया। एनडीटीवी के प्राइम टाइम में हरियाणा के पंचकुला में बलात्कारी राम रहीम के कुकर्मों और उन पीड़ित दोनों साध्वी की बहादुरी का बखान करते हुए खट्टर सरकार की नपुंसकता की धज्जियां उड़ा कर रख दीं।

योगेंद्र यादव के साथ उनकी शालीन बातचीत ने सारी बात को प्याज की तरह बेतरह बेपर्दा कर दिया। बिना किसी चीख़ पुकार के पूरे घटनाक्रम को शीशे में उतार दिया। इस बाबत पत्रकार छत्रपति की हत्या और सीबीआई के डीएसपी की जांबाजी को भी रेखांकित किया। दोनों साध्वियों को सलाम भेजा और सारी राजनीतिक पार्टियों की सलीके से मज़म्मत की। पंचकुला हिंसा, बलात्कारी राम रहीम और निकम्मे मनोहर लाल खट्टर की डट कर ख़बर ली। योगेंद्र यादव और रवीश कुमार आज बहुत दिनों बाद पूरी निष्पक्षता से थे और फुल फार्म में।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय की मीडिया रिपोर्ट.

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कश्मीर और पाकिस्तान मुद्दे पर नरेंद्र मोदी पूरी तरह फेल हो चुके हैं

कश्मीर और पाकिस्तान मुद्दे पर नरेंद्र मोदी पूरी तरह फेल हो चुके हैं। उनकी नीतियां पानी मांग गई हैं। दरअसल कश्मीर और पाकिस्तान दोनों ही मसले कूटनीति की परिधि से बाहर निकल चुके हैं। इन दोनों का समाधान अब सर्जिकल स्ट्राइक और सैनिक कार्रवाई है, कुछ और नहीं। मोदी कहते रह गए कि पाकिस्तान को अकेला कर दिया, यह कर दिया, वह कर दिया। नतीज़ा यह है कि कुछ नहीं किया। पाकिस्तान आज भी वही कर रहा है जो पहले करता रहा था।

चीन उसका कुंडल और कवच बन कर पूरी ताकत से उपस्थित है। रूस भारत-पाकिस्तान मसले पर तटस्थ है, खामोश है। अमरीकी आर्थिक मदद बदस्तूर जारी है। उस ने सरबजीत को बेमौत मार दिया था, अब कुलभूषण को मारने की तैयारी में है। न दाऊद को पकड़ पाए, न मसूद अजहर आदि को। कश्मीर को और ज़्यादा बरबाद होते और जलते हुए हम देख रहे हैं। नरेंद्र मोदी सरकार के आने पर माना गया था कि अब कश्मीर समस्या सुलझ जाएगी और कि पाकिस्तान सुधर जाएगा।

लेकिन मर्ज बढ़ता गया, ज्यों ज्यों दवा की। डिप्लोमेसी की ऐसी तैसी कर रखी है सो अलग। ऐसे मसले संसद में एकजुट होने और बयान बहादुरी से तय नहीं होते। संसद के हमलावरों का भी क्या कर लिया संसद ने? संसद के शहीदों के परिजनों तक को न्याय नहीं दे सकी यह संसद। संसद में सुषमा स्वराज के पूरे देश का बेटा कह देने भर से बच जाएगा कुलभूषण? हरगिज नहीं। पूरी दुनिया ने कहा था पाकिस्तान से कि जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी मत दो। पाकिस्तान ने भुट्टो को फांसी दे दिया। बामियान में तालिबानों ने बुद्ध की सब से बड़ी मूर्ति दुनिया भर की अपील के बावजूद तोड़ दी। पाकिस्तान से अमरीका मांगता रहा ओसामा बिन लादेन को। पाकिस्तान ने दे दिया था क्या। अमरीका को घुस कर मारना पड़ा था।

पाकिस्तान और कश्मीर की केमेस्ट्री कूटनीति नहीं सैनिक कार्रवाई समझती है, इस बात को अच्छी तरह समझे बिना इन का कोई इलाज नहीं है। आप चिल्लाते रहिए, जिनेवा, शिमला, लाहौर। आदि-इत्यादि। तीन सौ सत्तर फत्तर। शांति वगैरह। इन मूर्खताओं का कोई हासिल नहीं। पाकिस्तान लोकतंत्र से नहीं, सेना और आईएसआई से चलता है। कश्मीर पत्थरबाजी और आतंकवाद से चलता है। सीधी बात है। फ़िलहाल भूल जाईए अब कुलभूषण जाधव को। वह भारत का बेटा है ज़रूर पर भारत उसे अब सलीब से उतार नहीं सकता, वर्तमान कूटनीति से।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से.

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मांस कारोबारियों के असली दुश्मन हैं आजम खान!

Dayanand Pandey : उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार के नगर विकास मंत्री रहे सर्वशक्तिमान आज़म खान ने उत्तर प्रदेश के मांस कारोबारियों और मांस प्रेमियों से जो दुश्मनी निभाई है उस की कोई दूसरी मिसाल नहीं है। बतौर नगर विकास मंत्री न उन्हों ने अवैध बूचड़खानों के बाबत सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की परवाह की, न ग्रीन ट्रिब्यूनल की। न नगर निगम के स्लाटर हाऊसों को आधुनिक बनवाया, न लाइसेंस बनवाए, न पुराने लाइसेंसों का नवीनीकरण करवाया। जब कि बतौर मंत्री यह उन की ज़िम्मेदारी थी। उलटे उन्हों ने सब कुछ यानी अवैध बूचड़खानों को चलने दिया, सारे क़ानून को ठेंगे पर रख कर। लात मारते हुए।

जैसा कि देखा और कहा जा रहा है कि इस अवैध बूचड़खाने की बंदी से ज़्यादातर मुस्लिम समाज के लोग प्रभावित हुए हैं, बेरोजगार हुए हैं। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम समाज से, क़ानून से ऐसी अप्रतिम दुश्मनी किसी और राजनीतिज्ञ ने निभाई हो, जैसे आज़म खान ने निभाई है मुझे नहीं मालूम। किसी को मालूम हो तो बताए भी। तब जब कि मुस्लिम वोट बैंक के एक बड़े ठेकेदार हैं आज़म खान। लेकिन दिलचस्प यह कि मुस्लिम समाज का एक भी व्यक्ति, मांस कारोबार से जुड़ा एक भी व्यक्ति आज़म खान से नाराजगी नहीं जाहिर करता। जानते हैं क्यों?

क्यों कि यह अवैध बूचड़खाने आज़म खान की कृपा से ही चल रहे थे। तो यह अवैध कारोबारी बोलें भी तो किस जुबान से भला। आज़म खान और इन अवैध बूचड़खाना चलाने वालों को लगता था कि आज़म खान और सपा सरकार अमरफल खा कर आए हैं, कभी विदा ही नहीं होंगे। आज़म खान और इन मुस्लिम समाज के लोगों को कोई व्यक्ति बांगला की वह कहावत नहीं सुना पाया कि किसी भूखे को मछली भीख में देने के बजाय उसे मछली मारना सिखाना चाहिए। लेकिन आज़म खान तो अवैध कारोबार की हरामखोरी सिखा रहे थे। नतीज़ा सामने है।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से.

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सारे न्यूज़ चैनल भाजपा के जरखरीद गुलाम बन गए हैं!

Dayanand Pandey : कि पेड न्यूज़ भी शरमा जाए…. आज का दिन न्यूज़ चैनलों के लिए जैसे काला दिन है, कलंक का दिन है। होली के बहाने जिस तरह हर चैनल पर मनोज तिवारी और रवि किशन की गायकी और अभिनय के बहाने मोदियाना माहौल बना रखा है, वह बहुत ही शर्मनाक है। राजू श्रीवास्तव, सुनील पाल आदि की घटिया कामेडी, कुमार विश्वास की स्तरहीन कविताओं के मार्फ़त जिस तरह कांग्रेस आदि पार्टियों पर तंज इतना घटिया रहा कि अब क्या कहें।

रवि किशन जैसा गंभीर अभिनेता भाड़ बन कर उपस्थित हुआ इन प्रहसनों में कि मुश्किल हो गई। रवि किशन गायक नहीं हैं, पर आज वह गायक बन गए। चारण और भाट भी शरमा जाएं मनोज तिवारी और रवि किशन का यह रुप देख कर। लगता ही नहीं कि श्याम बेनेगल के साथ भी कभी रवि किशन ने शानदार काम किया है।

आज नहीं बल्कि कल शाम से ही यह सब सभी चैनलों पर चालू है अभी तक। रवि किशन, मनोज तिवारी लगातार हर जगह चीख चीख कर गा रहे हैं, बम-बम बोल रहा है काशी! लतीफेबाज घटिया कवियों वाले कवि सम्मेलन भी इन न्यूज़ चैनलों पर मोदी राग में ही न्यस्त रहे। सिर्फ़ मोदी का भाषण, मोदी की तारीफ़ के पुल में बंधी कमेंट्री, मोदी पर गाना। ठीक है मोदी ने अप्रत्याशित जीत हासिल की है लेकिन सारे न्यूज़ चैनल भाजपा के स्पीकर बन जाएं, भाड़ बन जाएं, यह न्यूज़ चैनलों का काम नहीं है।

सब जानते हैं कि मनोज तिवारी भाजपा के सांसद हैं और कि दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष भी, रवि किशन भी भाजपा ज्वाईन कर चुके हैं। उनको तो यह करना ही था। पर न्यूज़ चैनलों को? क्या न्यूज़ चैनलों ने भी भाजपा ज्वाइन कर लिया है?

जनता पार्टी की सरकार की विदाई के बाद जब इंदिरा गांधी की वापसी हुई थी तो उन से बंद हो चुके अख़बार नेशनल हेराल्ड के बाबत पूछा गया कि कब खुलेगा? इंदिरा गांधी ने पूरी बेशर्मी से जवाब देते हुए तब कहा था, अब इसकी कोई जरुरत नहीं है क्यों कि जो काम हमारे लिए नेशनल हेराल्ड करता था, अब वह काम सारे अख़बार करने लगे हैं। लेकिन आज जो न्यूज़ चैनलों ने किया है वह नमक में दाल हो गया है। सारे न्यूज़ चैनल भाजपा के जरखरीद गुलाम बन गए। इस कदर कि पेड न्यूज़ भी शरमा जाए। साक्षर और दलाल पत्रकारिता की यह हाईट है।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं….

Ajay Kumar Agrawal मीडिया का ये रूप बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है जब कहीं भी सिर्फ गुणगान होने की उम्मीद हो तो क्या देखना मैंने कोई न्यूज़ नहीं देखी।

Praveen Kumar Mishra क्षमा प्रार्थना के साथ लेकिन मनोज तिवारी कभी गायक हो ही नहीं पाये, गा ज़रूर लेते हैं लेकिन बिना ग्रामर के। लोक गायक भी नहीं हैं क्योंकि तुकबंदी इनके पूरे व्यक्तित्व पर भारी है। अधिक से अधिक चारण परंपरा में रख सकते हैं।

Vijaya Bharti सही कहा है भाई साहब आपने क्योंकि ये सभी चारण हैं क्योंकि चारण गाकर ही ये उपलब्धियाँ पाकर नौटंकी पसारे हुए हैं।

DrParmod Pahwa पत्रकारिता के नाम पर मूर्खो की टोली एकत्रित हो गई है। न्यूज़24 पर प्रह्लाद होलिका की कथा बिहार से जोड़ दी,जबकि ऐतिहासिक साक्ष्य पाकिस्तान के मुल्तान में हजारों सालों से है।  अब तो विश्वास कर सकते है कि सिकन्दर पटना तक आया होगा ।

Shyam Dev Mishra न्यूज़ चैनलों को क्या आप आज भी न्यूज़ चैनल समझते हैं? ज्यादातर लोग तो बहुत पहले से उनकी असलियत समझते हैं, इसलिए न उनसे अपेक्षा है, न कोई शिकायत।

Rajeev Dwivedi प्रणाम, इनकी तो छोड़िये जो लोग पानी पी पी के गाली देते थे वो भी कसीदे पढ़ रहे है lll

Sudhanshu Tak सर आज होली के छुट्टी है । छुट्टी मतलब पूर्ण छुट्टी । सभी एंकर , पत्रकार अपने घर , परिवार , मित्रों के साथ होली मना रहे है । ये प्रि रकोर्डेड प्रोग्राम है जो केवल टाइम पास के लिए चलाये गए हैं । कल से सब ड्यूटी पर हैं । अब ये कोई नजर नही आएगा । आप मौज करो । कल से सब धंधे पानी में लग जाएंगे । अब मोदी जी का भक्त मीडिया क्या पूरे देश की जनता हो रही है । ऐसा पहले कभी नही हुआ इसलिए पचाना मुश्किल है । वैसे कल से आपजो तकलीफ नही होगी । सादर

Dayanand Pandey बिलकुल नहीं , सारे कार्यक्रम आज के हैं । कल ही रिजल्ट आया है और आज कार्यक्रम में उस का यशोगान ।

Sudhanshu Tak सर रिजल्ट परसों आ चुका था 11 तारीख को । वैसे पत्रकारों की छुट्टी थी । कलाकारों का तो आज कमाने का दिन था । होटल में मनाये जा रहे होली के कार्यक्रमों में भी यही कलाकार आज अपनी प्रस्तुति भी दे रहे थे । सादर

Dayanand Pandey नतीजे एक शाम पहले ही सही । पर यह सब आज ही कल में हुआ । सवाल फिर कार्यक्रम पर नहीं न्यूज़ चैनलों के एप्रोच और उन के बिकाऊपन पर है यहां।

Shubham Tiwari रवि किशन, मनोज तिवारी ही नहीं मालिनी अवस्थी भी

Munna Pathak बनले के सार सभे बनेला, बिगड़ले के बहनोई भी बनल केहू ना चाहेला। जब मोदिये राजा बाड़े, त सोनिया के अब के पूछी ? वइसे भी मीडिया पइसा खइला से चाहें हुँकइला से, दुइयेगो तरीका से वश में रहेले। ई त पुरान परिपाटी ह ।
जितेंद्र दीक्षित कल युगपुरुष प्रेस से बात करने वाले हैं।

Bodhi Sattva आज मोदी और भाजपा विरोध देशद्रोह हो गया है । कब तक चलेगा यह मोदी राग । देखते हैं ।

Wahid Ali Wahid हाँ भाई देखा.भाँड भी शरमायें ऐसे तथाकथित कलाकारों कवियो के कृत्य पर.

Om Nishchal सांसद नाचै ताल दै कहै काढि के खीस टीवी मोदीमय हुए, चैनल माउथपीस। जोगीरा सररर।

Rajeev Bhutani चैनल देखना है तो राज्यसभा चैनल एक बार देखो दुबारा कोई चैनल समझ नही आयेगा …. ये झोलाछाप NCR चैनल दरअसल भांड चैनल हैं इनकी कवरेज दिल्ली और 100 किमी के दायरे तक सिमित है ……फटाफट न्यूज —– कुत्ता पेड़ पर चढ़ गया…  भैस नाले में गिर गई …बस कंजरखाना

Rajneesh Kumar Chaturvedi बस जुलाई तक।।हामिद अंसारी की विदाई के साथ ही राज्यसभा चैनल का भी वही हाल होना है।

Sridhar Sharma ये बाजार है सर… यहां सब बिकते हैं। बहुत सटीक टिप्पणी की है सर आपने।

Shashi Bhooshan एक नाम अवस्थी मैडम का भी जोड़ लीजिये। लिखा तो आपने अपनी इधर की लिखत के बीच विश्वसनीयता बनाये रखने के लिए ही है लेकिन मुझे अच्छा लगा। उम्मीद है लडडू बाँटने का वीडियो भी आप तक पहुँचता ही होगा।

Bharat Shrivastava सभी चैनल्स या तो मोदी विरोधी है या मोदी समर्थक। होली में भी राजनीति की भांग घोल दी इन चैनल्स ने। पहले भी राजनीति पर चुटकियां ली जाती थी होली के अवसर पर किन्तु इस बार तो मीडिया वालो ने चाटुकारिता और विरोध की हदें पार कर दी।

सतीश शर्मा आदर्शवादी निष्पक्ष सन्तुलित पत्रकारिता आजादी के साथ ही लुप्त हो गयी है अब तो यह केवल कमाऊ व्यवसाय है जिसमे हर बात जायज और जरूरी है जिससे पैसा और थोथी लोकप्रियता मिले।फिर 24 घण्टे बकबक करे भी तो क्या?

रजनीकांत याज्ञिक कल चैनल पर कुमार विश्वास भी कविता पाठ कर मोदी पर अपनी भड़ास निकाल रहे थे।उस तरफ आपका ध्यान नहीं गया।स्वाभाविक है आपने जो चश्मा लगाया उससे यह नहीं दिखा होगा।

Puneet Nigam बुरा न मानो होली है। इतना सीरियस होने की जरुरत नहीं है भाई साहब। मौका है मौसम भी है , थोड़ी चुटकी ले ली तो क्या बुराई है।आप भी थोड़ी देर के लिए होली के रंग में रंग जाइये न।

Gambhir Shrivastav इसमें न कोई आश्चर्य है, न अफ़सोस है, और न ही ये पतन की ‘हाइट’ है. देखते रहिये, बहुत कुछ देखना अभी बाकी है. यूँ आपका आक्रोश वाज़िब है.

Vijender Gsp इसमें इन चैनलों का कोई दोष नहीं है । असल में ये न्यूज चैनल है ही नहीं और न ही कभी बन सकते है । वाजपेयी सरकार ने जब न्यूज चैनल खोलने के लिए आवेदन मांगे तब अधिकाँश लोगों ने यह सोचकर आवेदन कर दिया कि अलॉट हो गया तो लाइसेंस बेचकर पैसे कमा लेंगे । लेकिन हुआ यह कि जिसने भी आवेदन किया था उन सबको लाइसेंस दे दिए गए । अब चेनल चलाना मजबूरी हो गया लेकिन न्यूज चैनल चलाना कोई खाला जी का बाड़ा नही है । एक चैनल को चलाने के लिए भी कम से कम दस हजार वर्करों की जरूरत पड़ती जो इनके बुते से बाहर थी लिहाजा इन्होंने वो दृश्य दिखाने शुरू किए जिनका निर्माण नेट की सहायता से स्टूडियो में बैठकर किया जा सके । राशिफल, टोने-टोटको के साथ 4C अर्थात क्राइम, सिनेमा, क्रिकेट और सेलिब्रिटी ही इनके समय बिताने के मुख्य साधन है । अब खबरें तो इनके पास है नही तो चुटकले सुनाकर ही टाइम पास करना पड़ेगा । 24 घंटे बिताना कोई सरल काम तो है नही ।

Raghwendra Pratap Singh पत्रकारिता अब मिशन के रूप में कम कमीशन के रूप में ज्यादे नजर आने लगी है । ये इस क्षेत्र के लिए घातक है।

Rakesh Pandey साहब न्यूज चैनल्स आर कम्पलिटली न्यूड इन द कान्टेक्ट आफ रियल न्यूज और न्यूज चैनल देखना तब हो जब नो यूज आफ न्यूज

Vir Vinod Chhabra आपसे कई बार राजनैतिक पोस्ट को लेकर मतभेद रहा है। कई बार पूर्ण सहमति भी। लेकिन आज कई दिन बात आपसे सौ प्रतिशत से अधिक (यदि ऐसा होता है तो) सहमति है। इस पोस्ट में व्यक्त विचार से सहमति तो है ही, आपने लिखा भी बहुत अच्छा है, वास्तव में।

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अखिलेश यादव संग साइकिल चलाते राहुल कंवल का चमचई भरा इंटरव्यू पेड न्यूज़ ही तो है!

अखिलेश यादव के साथ साईकिल चलाते हुए ‘आज तक’ के राहुल कंवल का आधा घंटे का चमचई भरा इंटरव्यू करना क्या पेड न्यूज़ में नहीं आता? साईकिल पर ही बैठे हुए डिंपल यादव का इंटरव्यू करना भी। गोमती रिवर फ्रंट का भी प्रचार। [वैसे गोमती रिवर फ्रंट बहुत सुंदर बना दिख रहा है।]

याद कीजिए बीते विधान सभा चुनाव में चुनाव आयोग के निर्देश पर मायावती की बसपा के चुनाव निशान हाथी को सभी पार्कों में ढंक दिया गया था, लखनऊ से लगायत नोयडा तक। अलग बात है मायावती की बसपा बहुमत से बहुत दूर रह गई। इस बार भी पेट्रोल पंप पर से मोदी की फ़ोटो चुनाव आयोग ने हटवा दीं। ज़िक्र ज़रुरी है कि साईकिल समाजवादी पार्टी का चुनाव निशान है और कि आज तक की दिल्ली से आई टीम हफ़्ते भर से लखनऊ में डेरा डाले हुई है।

आज तक के मालिक अरुण पुरी और चैनल के पत्रकार राहुल कंवल, अंजना ओम कश्यप, जावेद अंसारी आदि समूची कैमरा टीम सहित सभी उपस्थित हैं। दिलचस्प यह कि अखिलेश यादव का इंटरव्यू खत्म होते ही उन के पिता मुलायम सिंह यादव का गुडी-गुडी वाला इंटरव्यू भी आधा घंटा का शुरू हो गया है जब कि मुलायम परिवार की एकता दौड़ का विश्लेषण अगला कार्यक्रम है। ऐसे ऐलान की एक पट्टी चल रही है। एक पुराना फ़िल्मी गाना है, क्या प्यार इसी को कहते हैं? की तर्ज़ पर पूछा जा सकता है क्या पेड न्यूज़ इसी को कहते हैं?

उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से.

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श्रीलंका से लौटे पत्रकार दयानंद पांडेय का एक अदभुत यात्रा वृत्तांत पढ़िए

दीप्तमान द्वीप में सागर से रोमांस

आज पंद्रह दिन हो गया है श्रीलंका से लौटे हुए लेकिन कोलंबो में सागर की लहरों का सुना हुआ शोर अभी भी मन में शेष है । थमा नहीं है । यह शोर है कि जाता ही नहीं । कान और मन जैसे अभी भी उस शोर में डूबे हुए हैं । उन दूधिया लहरों की उफान भरी उछाल भी लहरों के शोर के साथ आंखों में बसी हुई है । लहरों का चट्टानों से टकराना जैसे मेरे मन से ही टकराना था । दिल से टकराना था । लहरों का यह शोर मेरे मन का ही शोर था । मेरे दिल का शोर था । यह शोर अब संगीत में तब्दील है शायद इसी लिए अभी भी मन में तारी है । स्मृतियों में तैरता हुआ । तो क्या यह वही शोर है , वही दर्प है जो राम को समुद्र पर सेतु बनाने से रोक रहा था ? जिस पर राम  क्रोधित हो गए थे ? तुलसी दास को लिखना पड़ा था :

बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥

खैर , श्रीलंका में सागर की लहरों का शोर , वनस्पतियों का वैभव , वहां की हरियाली का मन में बस जाना और वहां के लोगों की आत्मीयता का सरोवर जैसे सर्वदा के लिए मन में स्थिर हो गया है । सर्वदा-सर्वदा के लिए बस गया है । यह सरोवर अब किसी सूरत सूखने वाला नहीं है । नहीं सूखने वाली हैं वहां की मधुर स्मृतियां । वहां की संस्कृति , खुलापन और टटकापन । वहां के राजनेताओं की सादगी भी कैसे भूल सकता हूं । कभी पढ़ा था कि श्रीलंका हिंद महासागर का मोती है । श्रीलंका जा कर पता चला कि सचमुच वह मोती ही है । अनमोल मोती । कभी सीलोन , फिर लंका और अब श्रीलंका । बीते पांच दशक में इस देश का नाम तीन बार बदल चुका है । बचपन में हम फ़िल्मी गाने सुनते ही थे रेडियो सीलोन से । अब हम उसी सीलोन जा रहे थे जिसे अब श्रीलंका कहते हैं । श्रीलंका का संस्कृत में अर्थ है दीप्तमान द्वीप । तो इस दीप्तमान द्वीप से ख़ुशनुमा यादों की बारात ले कर लौटा हूं । इसी दीप्तमान द्वीप में सागर से गहरा रोमांस कर के लौटा हूं ।

सागर से रोमांस? कृपया मुझे कहने दीजिए कि दुनिया में रोमांस से ज़्यादा रहस्यमय कुछ भी नहीं।

24 अक्टूबर की रात जब मैं भंडारनायके एयरपोर्ट पर उतरा तो वहां की धरती बरसात से भीगी हुई थी । लगा जैसे बरसात अभी-अभी विदा हुई हो । बरसात को हमारे भारत में शुभ ही माना जाता है । मैं भी मानता हूं। मान लिया कि श्रीलंका की धरती ने हमारा स्वागत बरसात से किया है । सारा रनवे बरसात के पानी से तर था । जैसे भीगा-भीगा मन हो । मन भीग गया तब भी वहां जब वहां श्रीलंका प्रेस एसोशिएशन के कुर्लू कार्यकरवन , उन की पत्नी गीतिका ताल्लुकदार और सुभाषिनी डिसेल्वा ने भाव विभोर हो कर सब का स्वागत किया । कोलंबो के होटल रोड पर ब्रिटिश पीरियड के 1806 में बने होटल माऊंट लेविनिया में हमारे ठहरने का बढ़िया बंदोबस्त था । इस विक्टोरियन होटल में सौभाग्य से हमारा कमरा समुद्र से ठीक सटा हुआ था । रात तो हम खाना कर सो गए । समुद्र का सुख नहीं जान पाए । लेकिन जब सुबह उठा और बालकनी का परदा खोला तो दिल जैसे उछल पड़ा । समुद्र की लहरें उछल-उछल कर जैसे हमारे कमरे के बाहरी किनारे को चूम रही थीं । चट्टान से टकराती इन लहरों के हुस्न का अंदाज़ा तब मिला जब हम ने बालकनी में लगे शीशे के दरवाज़े को अचानक खोल दिया । अब उछलती लहरें थीं , उन का शोर था और मैं था । चट्टान से जैसे लहरें नहीं , मैं टकरा रहा था । बारंबार । समुद्र हमने भारत में भी दो जगह देखा था अब तक । एक तो गंगा सागर में दूसरे , कालीकट में । पर समुद्र का यह हुस्न , यह अदा ,  नाज़-अंदाज़ , ऐसा अविरल सौंदर्य और यह औदार्य नहीं देखा था , जो कोलंबो में अब देख रहा था , महसूस रहा था , आत्मसात कर रहा था , जी रहा था । सुबह सर्वदा ही सुहानी होती है लेकिन यह सुबह तो सुनहरी हो गई थी । एक अर्थ में लवली मॉरनिंग हो गई थी । मैं एक साथ सूर्य और सागर दोनों देवताओं को प्रणाम कर रहा था । प्रणाम कर धन्य हो रहा था । सागर की लहरों का शोर जैसे मेरे मन के शोर से क़दमताल कर रहा था । गोया मन मेरा चट्टान था और मैं उस से टकरा रहा था । टकराता जा रहा था । बहुत देर तक बालकनी में बैठा लहरों के साथ रोमांस के सांस लेता रहा । कामतानाथ का एक उपन्यास है समुद्र तट पर खुलने वाली खिड़की । पर यहां तो पूरी बालकनी ही समुद्र तट से सटी हुई थी , खुली हुई थी। नाश्ते का समय हो गया था । नहा-धो कर , पूजा कर नाश्ते के लिया गया । डायनिंग हाल के बाहर स्विमिंग पुल के पार नीले समुद्र के हुस्न का दीदार और दिलकश था । दिलकश और दिलफ़रेब । सागर की लहरों की उछाल तो वैसी ही थी पर लहरों का शोर यहां मद्धम था । हां , आकाश की अनगूंज भी यहां साथ थी । यह दूरी थी , आकाश का खुलापन था या कोई बैरियर । कहना मुश्किल था तब । तो क्या सागर आकाश से भय खाता है , बच्चों की तरह । कि शोर की सदा थम जाती है । मद्धम पड़ जाती है ।

क्या पता!

कि जैसे समुद्र सेतु बनाते समय राम से उलझा और फिर डर गया।

लेकिन सागर का सौंदर्य जैसे यहां और निखर गया था । उस के हुस्न में जैसे नमक बढ़ गया था । स्विमिंग पुल में टू पीस में नहाती गौरांग स्त्रियों को देखें या सागर के सौंदर्य को देखें , यह तय करना भी उस वक्त मेरे लिए एक परीक्षा थी । अंतत: मैं ने सागर को देखना तय किया । इस लिए भी कि सागर के सौंदर्य में जो कशिश थी , जो बुलावा , मनुहार , निमंत्रण और मस्ती थी , वह स्विमिंग पुल में नहाती स्त्रियों में नदारद थी । हालां कि एक साथी बार-बार कह क्या उकसा ही रहे थे कि स्विमिंग पुल में नहाया जाए । लेकिन इस सब के लिए मेरे पास अवकाश नहीं था । समुद्र का निर्वस्त्र सौंदर्य मेरे लिए ज़्यादा महत्वपूर्ण था । इतना मनोहारी और इतना रोमांचकारी । और फिर जल्दी ही श्रीलंका प्रेस एसोशिएशन की इकसठवीं वर्षगांठ के कार्यक्रम में शरीक होने के लिए भी हमें जाना था ।

इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट के बीस पत्रकारों का प्रतिनिधिमंडल जब जनरल सेक्रेटरी परमानंद पांडेय के नेतृत्व में कोलंबो के भंडारनायके मेमोरियल हाल में पहुंचा तो वहां भारतीय प्रतिनिधिमंडल का जिस पारंपरिक ढंग से सब को पान दे कर नृत्य और संगीत के साथ स्वागत किया गया वह बहुत ही आत्मीय और भावभीना था । मन हर लेने वाला । श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरीसेन ने कार्यक्रम का उद्घाटन किया । भारतीय पत्रकारों के प्रतिनिधिमंडल का भी उन्हों ने स्वागत किया और भारतीय पत्रकारों ने उन का अभिनंदन । इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट के महासचिव परमानंद पांडेय ने अपने भाषण में श्रीलंका प्रेस एसोशिएशन को उस की वर्षगांठ पर भावभीनी बधाई दी और राष्ट्रपति का भारत की तरफ से अभिनंदन किया । इस मौके पर श्रीलंका के कई बुजुर्ग पत्रकारों को सम्मानित भी किया गया । कार्यक्रम में श्रीलंका के कई सारे राजनीतिज्ञ , मंत्री , मुख्य मंत्री और नेता प्रतिपक्ष भी उपस्थित थे । किसी भी राजनीतिज्ञ के साथ कोई फौज फाटा नहीं । कोई दिखावा नहीं । सब के साथ सारे राजनीतिज्ञ साधारण जन की तरह मिल रहे थे । सिर्फ़  एक राष्ट्रपति के साथ थोड़ा सा प्रोटोकाल और गिनती के चार-छह सुरक्षाकर्मी दिखे । बाक़ी किसी के साथ नहीं । रास्ते में भी कहीं कोई रोक-टोक नहीं हुई । कि राष्ट्रपति आ रहे हैं । कहीं कोई पेनिक नहीं । सारी जनता आसानी से आ जा रही थी । हमारे लिए यह आश्चर्य का विषय था । आश्चर्य का विषय यह भी था हमारे लिए कि मय राष्ट्रपति के किसी भी को मंच पर नहीं बिठाया गया । मंच पर न कोई कुर्सी , न कोई मेज । बस माइक और उदघोषक । बारी-बारी लोग बुलाए जाते रहे और अपनी-अपनी बात कह कर मंच से उतर कर अपनी-अपनी जगह बैठ जाते रहे । न कोई  वी आई पी , न कोई ख़ुदा । सभी के साथ एक जैसा सुलूक । राष्ट्रपति हों या नेता प्रतिपक्ष , कोई मुख्य मंत्री या मंत्री । या कोई पत्रकार । सब के लिए एक सुलूक ।  बाद के दिनों में भी , श्रीलंका के बाक़ी शहरों में भी सरकारी और ग़ैर सरकारी कार्यक्रमों में भी यही परंपरा तारी थी । कि स्टेज हर किसी आम और ख़ास का था । किसी खुदाई के लिए नहीं । श्रीलंका में प्रोटोकाल की सरलता का अंदाज़ा आप इस एक बात से भी लगा सकते हैं कि जिस भंडारनायके मेमोरियल हाल में श्रीलंका प्रेस एसोशिएशन की इकसठवीं वर्षगांठ का समारोह मनाया गया और राष्ट्रपति की गरिमामयी उपस्थिति थी उसी भंडारनायके मेमोरियल हाल में उसी समय किसी कालेज या विश्वविद्यालय का भी कार्यक्रम था । और साथ-साथ । हम लोग जब भंडारनायके मेमोरियल हाल से विदा ले रहे थे , तब बच्चे जैसे अपनी डिग्री का जश्न मना रहे थे । श्रीलंका के राष्ट्रपति का उदबोधन भी सरल था । वह भारत के राजनीतिज्ञों की तरह किसी खुदाई में डूब कर नहीं बोल रहे थे । उन के बोलने और मिलने में सदाशयता और विनम्रता दोनों ही दिख रही थी । पत्रकारों को भौतिक चीजों के पीछे बहुत ज़्यादा न भागने की उन की सलाह थी । समाज कल्याण और अध्यात्म पर ज़ोर ज़्यादा था । वैसे भी राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरीसेन एक समय खुद पत्रकार रहे थे ।

कार्यक्रम के बाद शाम को ही सबरगमुवा प्रांत की राजधानी रतनपुर के लिए हम लोग रवाना हो गए । रास्ते भर जगमगाती सड़कें बता रही थीं कि यहां बिजली की स्थिति क्या है । गड्ढामुक्त सड़कें बता रही थीं कि वहां भ्रष्टाचार की स्थिति क्या है । लगभग ढाई-तीन सौ किलोमीटर का रास्ता किसी सुहाने सफ़र की तरह कटा । हिंदी फ़िल्मी गाने सुनते हुए । कोलंबो  से रतनपुर तक न आबादी ख़त्म हुई न रौशनी । न सड़क पर कहीं कोई गड्ढा , न हचका , न ट्रैफिक जाम । अविसावेल , बलांगुड़ और वेलीहललायर जैसे शहर-दर-शहर हम ऐसे पार करते गए गोया हम सड़क से नहीं नदी से गुज़र रहे हों । रतनपुर में रत्नालोक होटल में हम सभी ठहरे । सुबह दस बजे सबरगमुवा प्रांत के मुख्य मंत्री महिपाल हेरा से मिलने का कार्यक्रम था । सबरगमुवा प्रांत के सचिवालय में भी पान भेंट कर संगीतमय स्वागत किया गया । मुख्य मंत्री ने भारतीय पत्रकारों का औपचारिक भी स्वागत किया । कुछ रत्न भेंट किए । स्कूली बच्चों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश किए । बाद में सबरगमुवा प्रांत के मुख्य मंत्री अपने कार्यालय में भी भारतीय पत्रकारों से मिले । जहां जनता भी अपने काम के लिए बैठी हुई थी । जल्दी ही हम लोग वहां से विदा हुए ।

हम लोग अब शमन मंदिर के लिए चले । बताया गया कि अशोक वाटिका जाने के पहले इस मंदिर में आना ज़रुरी है । ऐसे जैसे इजाजत लेनी हो वहां जाने के लिए । शमन का मतलब पूछा तो श्रीलंका प्रेस एसोशियेशन के उपुल जनक जयसिंघे ने बताया कि लक्ष्मण , लक्ष्मण , लक्ष्मण , लक्समन , लक्समन  होते-होते शमन , शमन हो गया । यानी एक तरह से लक्ष्मण का ही रुप । शमन भगवान का वाहन हाथी है । वहां हाथी भी उपस्थित था । वैसे भी दुनिया में सब से ज़्यादा हाथी अगर अभी कहीं हैं तो वह श्रीलंका हैं । बताते हैं कि श्रीलंका में हाथी की लीद से कागज़ भी बनाया जाता है । मंदिर में भगवान शमन की मूर्ति तो थी ही , बड़े-बड़े असली हाथी दांत भी थे ।

कुछ देवियों और बुद्ध की बड़ी सी मूर्ति भी थी । यह मंदिर एक ट्रस्ट के तहत चलता है । इस का परिसर बहुत बड़ा है । बाक़ी सब कुछ भारत जैसा ही है । जैसे भारत में मंदिर के आस-पास फूल , प्रसाद , बच्चों के खिलौने , गृहस्ती के छोटे-मोटे सामान आदि की दुकानें होती हैं , खाने-पीने की दुकानें होती हैं , यहां भी थीं । ढेर सारी । ऐसे ही भारत और श्रीलंका में निन्यानवे प्रतिशत समानताएं मिलीं । हर चीज़ में । यहां तक कि  नाम भी भारतीयों के नाम जैसे । एक सरनेम हटा दीजिए , सारे नाम यही हैं । भाषा और कुछ विधियों का ही फ़र्क है । वहां की भाषा पर भी संस्कृत का बहुत प्रभाव है । वहां बोली जाने वाली , लिखी जाने वाली सिंहली और तमिल की भी संस्कृत जैसे मां है । बहुत सारे शब्द इसी लिए हिंदी जैसे लगते हैं । जैसे जन्मादि शब्द कई बार सुना तो मैं ने पता किया कि इस का अर्थ क्या है । पता चला कि मीडिया । इसी तरह वहां एक शब्द है स्तुति । हर कोई वक्ता अपने संबोधन के बाद स्तुति ज़रुर कहता । हमारे यहां स्तुति प्रार्थना के अर्थ में है । लेकिन वहां स्तुति का अर्थ है धन्यवाद , शुक्रिया । लेकिन सभापति , उप सभापति जैसे शब्दों के अर्थ जो भारत में हैं , वही श्रीलंका में भी । हम लोग सुविधा के तौर पर भले श्रीलंका प्रेस एसोशिएशन कहते रहे और वह लोग भी लेकिन वह आपसी संबोधन में इसे श्रीलंका पत्र कला परिषद संबोधित करते रहे । करते ही हैं । संबोधन में भी । ऐसे ही तमाम सारे शब्द , वाक्य , वाक्य विन्यास भी हिंदी के बहुत क़रीब दीखते हैं । हिंदी क्या सच कहिए तो संस्कृत । संस्कृत ही उन की भाषाओं की जननी है । वैसे कहा जाता है कि सिंहली भाषा पर गुजराती और सिंधी भाषा का भी बहुत प्रभाव है । तो भारतीय भाषा ही नहीं , भारतीय भोजन , फूल , फल आदि भी । बस उन के भोजन की थाली में रोटी न के बराबर है । चावल बहुत है । वह भी मोटा चावल । पांच सितारा , सात सितारा होटलों में भी इसी मोटे चावल की धमक थी । उस में भी भुजिया चावल ज़्यादा । बस कोलंबो के होटल माउंट लेविनिया में खीर में एक दिन अपेक्षाकृत थोड़ा महीन चावल ज़रुर मिला ।

सबरगमुवा प्रांत की वनस्पतियों के वैभव के क्या कहने । रास्ते भर वहां की वनस्पतियों और उन की हरियाली को हम आंखों ही आंखों बीनते रहे , मन में भरते रहे । वहां के पर्वत जिस तरह हरे-भरे हैं, अपने भारत के पर्वतों से वह हरियाली लगभग ग़ायब हो चली है । बस एक शिमला की ग्रीन वैली में ऐसी हरियाली , ऐसी प्रकृति देखी है मैं ने या फिर शिलांग से चेरापूंजी के रास्ते में । चाय बागान वाले पर्वतों को छोड़ दीजिए तो बाक़ी पर्वत अपनी हरियाली गंवा चुके हैं । ख़ास कर अपने उत्तराखंड के पर्वत तो हरियाली से , वनस्पतियों के वैभव से पूरी तरह विपन्न हो चुके हैं , दरिद्र हो चुके हैं । रास्ते में एक रेस्टोरेंट में लंच के बाद वहां विभिन्न रत्नों की खदानें और एक चाय फैक्ट्री भी हमने देखी । कुछ साथियों ने रत्न और चाय भी ख़रीदे । इस के पहले रतनपुर में रत्नों का संग्रहालय भी हमने देखा ।

26 अक्टूबर की रात हम लोगों को एक गांव सीलगम में रुकना था । इस गांव को सबरगमुवा प्रांत की सरकार ने विलेज टूरिज्म के तौर पर विकसित किया है । इस गांव में पहुंचते-पहुंचते रात घिर आई थी । पहाड़ियों के बीच बसे इस गांव में हम लोग जब पहुंचे तो यहां भी सभी को पान भेंट कर नृत्य और संगीत के साथ स्वागत किया गया । सबरगमुवा प्रांत के पर्यटन मंत्री अतुल कुमार भी उपस्थित थे । लेकिन स्वागत किया गांव के लोगों ने ही । सबरगमुवा यूनिवर्सिटी में टूरिज्म डिपार्टमेंट के सीनियर लेक्चरर डॉक्टर एम एस असलम ने वहां के टूरिज्म के बाबत एक प्रजेंटेशन भी पेश किया । पर्यटन मंत्री ने भी भारतीय पत्रकारों का अभिनंदन किया । अपना पर्यटन साहित्य भेंट किया । और सब से सरलता से मिलते रहे । बाद में गांव के बच्चों और लोगों ने लोक नृत्य और पारंपरिक गीत प्रस्तुत किए । डिनर के बाद गांव के अलग-अलग घरों में भारतीय पत्रकारों को ठहराया गया । किसी घर में एक , किसी घर में दो । सभी पत्रकारों ने अपने घर की तरह इन घरों को समझा । और घर का पूरा आनंद लिया । गांव के लोगों ने भी हर किसी को मेहमान की तरह सिर-माथे पर बिठाया । इस गांव का भोजन और आतिथ्य सत्कार श्रीलंका के किसी सात सितारा होटल से भी ज़्यादा अनन्य था , अतुल्य था । आत्मीयता , सरलता और निजता में भिगो कर भावुक कर देने वाला । देसीपन में ऊभ-चूभ ।

माटी की महक , गमक और सुगंध में डूबा किसी आरती में कपूर की तरह महकता और इतराता हुआ । आत्मीयता और नेह के सागर में छलकता हुआ । सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बाद बिलकुल सामान्य और साधारणजन की तरह दिखने वाले पर्यटन मंत्री अतुल कुमार से मैं ने पूछा कि आप की इतनी सरलता का राज क्या है ? तो वह शरमाते और सकुचाते हुए बोले , ‘ मैं तो ऐसे ही हूं !’ इस धुर देहात में भी मंत्री के साथ कोई सुरक्षाकर्मी और फौज-फाटा न देख कर उन से पूछा कि आप की सिक्योरिटी के लोग कहां हैं ? आप के स्टाफ़  के लोग कहां हैं ? तो वह फिर सकुचाए और बोले , ‘ सिक्योरिटी हमारे साथ कभी होती नहीं । उस की ज़रुरत भी नहीं । स्टाफ़  के लोगों की यहां ज़रुरत नहीं ।’

तो क्या फिर अकेले ही आए हैं यहां ? वह सकुचाते हुए फिर शरमाए और बोले , ‘ नहीं अकेले नहीं आया हूं । एक सरकारी ड्राइवर है  न ! ‘ अद्भुत था यह भी । यहां भारत में तो एक ग्राम प्रधान या सभासद भी अकेले नहीं चलता । कोई  विधायक भी बिना गनर और फ़ौज फाटे के नहीं चलता । और मंत्री ? वह तो धरती हिलाते हुए , धूम-धड़ाका करते हुए , पूरी ब्रिगेड लिए चलता है । पूरा इलाक़ा जान जाता है कि मंत्री जी आने वाले हैं । सारा सिस्टम नतमस्तक रहता है । थाना , डी एम  , यह और वह कौन नहीं होता ? प्रोटोकाल की जैसे बारिश होती रहती है । पर यहां बरसे कंबल भीजे पानी वाला आलम था ।

ख़ैर भोजन के बाद के वी जयसेकर और श्रीमती बद्रा के घर गया रहने और सोने के लिए । थोड़ी पहाड़ी चढ़ कर । साधारण सा घर । एक छोटे से कमरे में एक डबल बेड और दो सिंगिल बेड । बिलकुल ठसाठस । गृह स्वामी को उम्मीद थी कि चार लोग भी आ सकते हैं । लेकिन पहुंचे हम दो लोग ही । एक मैं और दूसरे चमोली , उत्तराखंड के देवेंद्र सिंह रावत । कमरा तो साधारण था ही , कमरे से थोड़ी  दूर पर बाथरुम और साधारण । बल्कि जुगाड़ तकनीक पर आधारित । ख़ास कर कमोड का फ़्लश । देख कर पहले तो मैं उकताया लेकिन फिर हंस पड़ा । ढक्कन ग़ायब । और फ़्लश के नॉब की जगह एक तार रस्सी जैसा बंधा था । खींचते ही फ़्लश का पानी निकल पड़ता था । खिड़की पर शेविंग वाले रिजेक्टेड ब्लेड से जगह-जगह पैबंद की तरह लटका कर खिड़की को कवर करने का जुगाड़ बनाया गया था । स्पष्ट है कि इस सुदूर देहात में प्लम्बर और बाथरुम से जुड़े सामान का मिलना सुलभ नहीं होगा तो यह जुगाड़ तकनीक खोज ली गई होगी । शावर भी जुगाड़ के दम पर था । ऐसे ही और भी कई सारे जुगाड़ । लेकिन कमरा , बाथरुम भले साधारण था , जुगाड़ तकनीक पर आधारित था लेकिन के वी जयसेकर और श्रीमती बद्रा साधारण लोग नहीं थे । शबरी भाव से भरे हुए थे । आतिथ्य सत्कार में नत । रात का भोजन हम लोग कर चुके थे सो अब सोना ही था । भाषा की समस्या भी थी । वह सिंघली बोलने वाले लोग थे । हम हिंदी और भोजपुरी भाषी । लेकिन गांव वाले हम भी हैं । गांव की संवेदना , गांव का अनुराग और उस का वैभव , उस की संलिप्तता और शुरुर हमारे भीतर भी था ।  उन के भीतर भी । इस दंपति की सत्कार की आतुरता देख कर मुझे अपना बचपन याद आ गया । जब शहर से गांव जाता था तो अम्मा को लगता था कि  क्या बना दे , क्या खिला दे , क्या दे दे । जब टीन एज हुआ तो जब कभी नानी के गांव यानी अपने ननिहाल जाता था और अचानक थोड़ी देर बाद चलने लगता तो वापसी के समय नानी बेचैन हो जातीं । कोई ताख , कोई  बक्सा उलटने-पलटने लगतीं । और कहतीं , नाती बस तनी  एक रुकि जा ! वह बेचैन हो कर रुपया , दो रुपया खोज रही होतीं थीं , कि मिल जाए तो नाती के हाथ में रख दें । मैं कहता भी कि  इस की कोई  ज़रुरत नहीं । लेकिन नानी हाथ पकड़ कर , माथा चूम कर रोक लेतीं । कहतीं , अइसे कइसे छूछे हाथ जाए देईं ? बिना सोलह-बत्तीस आना हाथ पर धरे ? और वह कैसे भी कुछ न कुछ खोज कर दो रुपया , पांच रुपया दे ज़रुर देतीं । साथ में चिवड़ा , मीठा भी बांध देतीं । भर अंकवार भेंट कर , माथा चूम कर , आशीष से लाद  देतीं । अम्मा और नानी का यही भाव इस दंपति के चेहरे पर भी मैं पढ़ रहा था । आत्मीयता में विभोर छटपटाहट की वही रेखाएं देख रहा था । कि हम लोगों को कोई असुविधा न हो । सो असुविधा की सारी इबारतें इस शबरी भाव में बह गईं । और हम उस खुरदुरे बिस्तर पर सो गए । नींद भी अच्छी आई ।

अमूमन मेरी सुबह थोड़ी देर से होती है । मतलब देर तक सोता हूं । लेकिन सबरगमुवा प्रांत के इस सीलगम गांव में मेरी सुबह अपेक्षाकृत ज़रा जल्दी हो गई । खुली खिड़की से आती रौशनी ने जगा दिया ।  श्री के वी जयसेकर और श्रीमती बद्रा पहले ही से जगे हुए थे । ऐसे जैसे हमारे जागने की प्रतीक्षा में ही थे । चाय के लिए पूछा । अपनी टूटी फूटी अंगरेजी में । मैं ने हाथ जोड़ कर उन्हें बताया कि सारी , मैं चाय नहीं पीता । सुन कर वह लोग उदास हो गए । हम उन के घर का छोटा सा बग़ीचा घूमने लगे । किसिम-किसिम के फूल , फल दिखाने लगे दोनों जन । कटहल , केला , आंवला , आम आदि । अजब था किसी पेड़ पर आम के बौर , किसी पेड़ पर टिकोरा तो किसी पेड़ पर पका हुआ या कच्चा आम भी । यह कैसे संभव बन पा रहा है , एक ही मौसम में । यह दंपति हमें भाषा की दिक्कत के चलते समझा नहीं पाए और हम नहीं समझ पाए । जैसे टूटी-फूटी अंगरेजी उन की थी , कुछ वैसी ही टूटी-फूटी अंगरेजी हमारी भी तो थी । और उस घर में ठहरे हमारे साथी देवेंद्र सिंह रावत तो हम सब से आगे की चीज़ थे । अंगरेजी में हेलो , यस-नो और ओ के से आगे उन की कोई दुनिया ही नहीं थी । कोई ज़मीन ही नहीं थी । फिर वह बेधड़क हिंदी पर आ जाते । आप को समझ आए तो समझिए , नहीं आता तो मत समझिए । और आगे बढ़िए । न सिर्फ़ रावत बल्कि कुछ और भारतीय साथियों के साथ भी यह मुसीबत तारी थी । जैसे एक साथी डायनिंग टेबिल पर थे । उन्हें नैपकिन की ज़रुरत थी । हेलो कह कर एक वेटर को उन्हों ने बुलाया । वेटर के आते ही उन्हों ने हाथ के इशारे से हाथ पोंछने का अभिनय किया । वेटर ने फ़ौरन उन्हें नैपकिन ला कर दे दिया । यह और ऐसे तमाम काम कई सारे साथी इशारों से भी संपन्न कर लेते थे बाख़ुशी। इतना कि कई बार नरेश सक्सेना की कविता याद आ जाती थी :

शिशु लोरी के शब्द नहीं
संगीत समझता है
बाद में सीखेगा भाषा
अभी वह अर्थ समझता है

यह कविता और इस की ध्वनि श्रीलंका में बारंबार मिली । मिलती ही रही । दोनों ही तरफ से । भाषाई तोतलापन कैसे तो अच्छे खासे आदमी को शिशु बना देता है , लाचार बना देता है । यह देखना भी एक निर्मल अनुभव था । जैसे कि एक बार कोलंबो के माउंट लेविनिया होटल में मेरे साथ भी हुआ । इडली के साथ सांभर में अचानक मिर्च इतनी ज़्यादा मिली कि मैं जैसे छटपटा पड़ा । सिर हिलाने के साथ ही पैर पटकने लगा । कि तभी एक वेटर पानी लिए दौड़ आया । पानी दे कर वह पलटा । अब की उस के हाथ में रसमलाई की प्लेट थी । पानी पी कर , रसमलाई खा कर जान में जान आई । उस ने शब्दों में मुझ से कुछ नहीं कहा । न ही मैं ने कुछ कहा । लेकिन मेरी आंखों में उस के लिए कृतज्ञता थी । और मैं ने प्लेट मेज़ पर रखा फिर उस से हाथ मिलाया । वह सिर झुका कर कृतज्ञ भाव में हंसते हुए चला गया । ऐसे जैसे मैं ने उसे क्या दे दिया था । ऐसे ही साझा कृतज्ञ भाव में डूबे हुए थे हम और के वी जयसेकर और श्रीमती बद्रा दंपति । वह चाय के लिए फिर-फिर पूछ रहे थे । और मैं उन्हें हाथ जोड़ कर विनय पूर्वक मना करता रहा । वह चाहते थे कि कुछ तो मैं ले लूं । मैं ने उन्हें बताया कि बिना नहाए-धोए , पूजा किए मैं कुछ भी नहीं खाता-पीता । वह मान गए । नहा कर मैं ने पूजा के लिए पूछा कि  कोई ऐतराज तो नहीं । वह मुझे अपने घर में रखी कुछ फोटुओं के पास ले गए । वहां बुद्ध की छोटी सी मूर्ति के साथ-साथ दुर्गा और अन्य देवियों की फोटो भी लगी थी । उन्हों ने मुझे अगरबत्ती का पैकेट और दियासलाई भी दी । मेरे साथ उन्हों ने भी हाथ जोड़ कर शीश नवाया ।  वह अपने पूजा स्थल पर दो मिनट मेरे पूजा कर लेने से हर्ष विभोर थे । मैं कमरे में आ कर बैठा ही था कि वह मेरे लिए आंवला का जूस ले कर आए । रावत जी ने चाय पी और मैं ने आंवला का जूस । हम ने एक दूसरे के परिवार के बारे में , काम धाम के बारे में बात की । बच्चों के बारे में बात की । इस दंपति के चार बच्चे हैं । दो बेटा , दो बेटी । सब की शादी हो गई । सब बच्चे शहरों में सेटिल्ड हो गए हैं । अच्छी नौकरियों में हैं । कोई कैंडी में है , कोई कोलंबो में । अब गांव में यह दंपति अकेले रह गए हैं । कभी-कभी बच्चे आ जाते हैं गांव । तो कभी यह लोग बच्चों के पास चले जाते हैं । फ़ोन पर बात होती रहती है । हालचाल मिलता रहता है । मुझे अपने अम्मा , पिता जी की याद आ गई । वह लोग भी गोरखपुर के अपने गांव में रहते हैं । कभी हम चले जाते हैं , कभी वह लोग आ जाते हैं । फ़ोन पर बातचीत होती रहती है । हालचाल मिलता रहता है । स्थितियां लगभग एक सी हैं । अम्मा-पिता जी गांव किसी क़ीमत छोड़ना नहीं चाहते , इस दंपति का भी यही क़िस्सा है । अपनी माटी से मोह का मोल यही है । अनमोल रिश्ता यही है । जिसे कोई सुविधा , कोई सौगात समूची दुनिया में छीन नहीं सकती । हां , हमारे अम्मा-पिता जी के साथ एक सौभाग्य यह है कि वह अकेले नहीं रहते । एक छोटे भाई की पत्नी और छोटे बच्चे उन के साथ रहते हैं । ताकि उन्हें भोजन बनाने आदि अन्य काम में दिक्कत न हो । अकेलेपन का भान न हो । इस दंपति के साथ यह सौभाग्य नहीं है । बात अब बच्चों से हारी-बीमारी और सुख-दुःख पर आ गई है । श्रीमान के वी जयसेकर तो इकसठ-बासठ वर्ष के हो कर भी स्वस्थ हैं । ठीक मेरे बयासी वर्षीय पिता जी की तरह । लेकिन श्रीमती बद्रा के साथ बीमारियों का डेरा है । शुगर तो है ही , उन के घुटने की कटोरी घिस गई है । यह बात उन्हें मुझे समझाने और मुझे इसे समझने में बहुत समय लग गया । और अंततः नरेश सक्सेना की कविता की शरण में जा कर यानी इशारों-इशारों में समझना पड़ा । और जब मैं समझ गया तो श्री जयसेकर के चेहरे पर किसी बच्चे की सी चमक आ गई । मैं ने कहा कि इस का ऑपरेशन करवा कर कटोरी रिप्लेस करवा लें । उन्हों ने माना तो कि यही एक उपाय है । भारत के पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के घुटने के रिप्लेस के बारे में भी उन्हों ने पढ़ रखा है लेकिन सब कुछ के बावजूद श्रीमती बद्रा इस के लिए मानसिक रुप से तैयार नहीं हैं । जाने पैसे की दिक़्क़त है या कुछ और जानना मुश्किल था । बहरहाल एक नोटबुक ला कर श्री जयसेकर ने हमारे सामने रख दी । कि उस पर कोई कमेंट अंगरेजी में लिख दूं । ताकि सनद रहे और वक़्त ज़रुरत काम आए ।  उन्हों ने यह भी बताया कि आप लोग पहले टूरिस्ट हैं जो हमारे घर ठहरने आए । गांव में और लोगों के घर तो टूरिस्ट आते रहे हैं पर उन के घर हम पहले टूरिस्ट थे । हमने तो काम चलाऊ अंगरेजी में एक छोटा सा नोट लिख दिया । पर अपने रावत जी को जब लिखने को कहा गया तो उन्हों ने बेधड़क पन्ना पलटा और हिंदी में चार लाइन लिख कर नोट बुक फट से बंद कर के खड़े हो गए । अब  के वी जयसेकर और श्रीमती बद्रा के घर से विदा लेने का समय आ गया था । यह दंपति अनुनय-विनय कर रहे थे , कह रहे थे कि आप फिर कभी सपरिवार आइए न यहां और हमारे ही घर ठहरिए । हम यस-यस और श्योर-श्योर कहते रहे । शायद झूठ ही । अपने झूठ पर शर्म भी आ रही थी । लेकिन कहते भी तो उन से क्या कहते भला ? एक घर में प्रतिनिधिमंडल के सभी लोगों के एक साथ ब्रेक फास्ट की व्यवस्था थी । वहीं जहां हम लोगों  ने रात में डिनर लिया था । हम लोगों ने विदा के पूर्व अपने-अपने मोबाइल से एक दूसरे के साथ फ़ोटो  खिंचवाई । गले मिले । चलते समय श्रीमती बद्रा अचानक झुकीं और मेरे पांव पर अपना माथा रख कर प्रणाम की मुद्रा में आ गईं । पीछे हटते हुए मैं लज्जित हो गया । मैं ने उन्हें ऐसा करने से मना किया और हाथ जोड़ लिया । वह फिर गले लग गईं ।

हम लोग ब्रेकफास्ट की जगह पहुंचे । इस बहाने गांव और उस की प्रकृति भी देखी । रात आए थे तब अंधेरा था । जहां-जहां बिजली की रौशनी थी वही जगह दिखी । पर कोई गांव भी भला बिजली की रौशनी में देखा जाता है ? या दीखता है भला ? अब चटक सुबह थी और चलते-फिरते हम लोग थे । पहाड़ी के बीच बसा यह गांव था । चढ़ाई-उतराई थी । नहर में बहता पानी था , धान के खेत थे । बींस और तमाम सब्जियों से भरे खेत थे । फलों से लदे वृक्ष और तमाम वनस्पतियां थीं । आम , कटहल , केला आदि के वृक्ष फलों से लदे पड़े थे। बस नहीं था तो गांव में तरुणाई नहीं थी । जैसे वृद्धों का गांव था यह । हमारे भारतीय गांवों की तरह । तरुणाई यहां भी शहरों की तरफ कूच कर गई थी । जैसे पूरी दुनिया का यही हाल है । ग्लोबलाईजेशन की कीमत है यह । इक्का-दुक्का युवा । मुंह तंबाकू से लाल और हरे-भरे । पर्यटन विभाग इन परिवारों को प्रति व्यक्ति , प्रति दिन के हिसाब से साढ़े सात सौ रुपए रहने के लिए देता है । यह वृद्धों का गांव इस को भी अपना रोजगार और सौभाग्य मान लेता है ।

ब्रेकफास्ट की जगह जैसे सारा गांव हम लोगों को विदा करने के लिए इकट्ठा हो गया है । स्त्री-पुरुष , छिटपुट बच्चे भी । ब्रेकफास्ट के बाद हम लोग चले । चले क्या विदा हुए । जैसे कोई मेहमान विदा हो । जैसे घर से कोई बेटी विदा हो । रात आए थे हम लोग तो अंधेरा मिश्रित बिजली की रौशनी में भी गांव चहक रहा था । स्वागत में चहक रहा था । अब चटक सुबह में भी उदास था । कोई नृत्य , कोई गायन , कोई संगीत , कोई पान नहीं था । विदा की थकन और गहरी उदासी तारी थी सभी ग्रामवासियों के चेहरे पर । बच्चन जी की मधुशाला की एक रुबाई याद आ रही थी :

छोटे-से जीवन में कितना प्यार करूं, पी लूं हाला,
आने के ही साथ जगत में कहलाया ‘जानेवाला’,
स्वागत के ही साथ विदा की होती देखी तैयारी,
बंद लगी होने खुलते ही मेरी जीवन-मधुशाला।।

तो अब इस गांव की यात्रा अब समाप्ति पर थी । हमारे क्षणिक लेकिन अनमोल संबंधों की मधुशाला बंद हो रही थी । हम फिर गले मिल रहे थे , विदा हो रहे थे । अब हमें सेंट्रल प्राविंस के नुवारा एलिया ज़िले के लिए प्रस्थान करना था । वहां जहां कहा जाता है कि सीता के अपहरण के बाद रावण ने सीता को रखा था । यह मंदोदरी के मायके का इलाक़ा था । यानी रावण की ससुराल थी । हम लोग जिसे अशोक वाटिका के रुप में रामायण में पढ़ते हैं । नुवारा एलिया को श्रीलंका के स्वीटजरलैंड के रुप में भी जाना जाता है । श्रीलंका के पहाड़ी रास्ते भी बहुत मनमोहक हैं । ख़ूबसूरत मोड़ और हरियाली से संपन्न। नुवारा एलिया हम लोग पहुंचे । रास्ते में अशोक वाटिका भी पड़ी । श्रीरामजयम नाम से मंदिर है । जिसे प्रणाम करते हुए हम गुज़रे । तय हुआ कि लंच कर के यहां लौटेंगे । फिर आराम से मंदिर देखेंगे । नुवारा एलिया के स्थानीय पत्रकारों ने एक कार्यक्रम भी रखा था । हम लंच कर और उस कार्यक्रम को अटेंड कर लौटे भी । श्रीरामजयम मंदिर । शहर से थोड़ी दूरी पर बना यह मंदिर है हालां कि प्रतीकात्मक ही । यह तथ्य वहां स्पष्ट रुप से लिखा भी है एक पत्थर पर । फिर भी आस्था , विश्वास और मन का भाव ही असल होता है । इस छोटे से मंदिर में पहुंच कर हम ने शीश नवाया और सीता के दुःख में डूब गए । उन की यातना और तकलीफ की खोह में समा गए । कि कैसे एक अकेली स्त्री , अपहरित स्त्री इस वियाबान में , पर्वतीय वन में रही होगी । अब तो यहां कोई अशोक का वृक्ष भी नहीं है जो मेरे शोक को हरता । पर हमारे मन में सीता हरण के वह त्रासद क्षण और कष्ट दर्ज थे । मंदिर में भीतर तो राम , लक्ष्मण और सीता की मूर्तियां हैं । अलग से हनुमान का मंदिर भी है । लेकिन बाहर पहाड़ी नदी किनारे खुले में सीता से भेंट करते हुए हनुमान की मूर्ति है । साथ में एक हिरन है । हनुमान के पद-चिन्ह हैं । मूर्ति का यह खंड विचलित करता है । पास ही एक ऊंची पर्वत माला है । जहां कहा जाता है कि सीता को अशोक वाटिका में क़ैद करने के बाद अपना महल छोड़ कर अस्थाई रुप से रावण यहीं ऊंची पहाड़ी पर रहने लगा था । भारत को श्रीलंका का बड़ा भाई मानने वाले यहां के लोग सीता , राम या हनुमान का निरादर तो नहीं करते , आदर के साथ ही उन का नाम लेते हैं लेकिन इस सब के बावजूद रावण को वह अपना हीरो मानते हैं । रावण के खिलाफ कुछ सुनना नहीं चाहते । इस तरह की बहुत सारी बातें हैं , बहुत सारी कथाएं हैं । वाचिक भी , लिखित भी । बहरहाल जैसा कि तुलसीदास ने सुंदर कांड में लिखा है कि जब अशोक वाटिका में हनुमान ने सीता को देखा तो :

देखि मनहि महुं कीन्ह प्रनामा।
बैठेहिं बीति जात निसि जामा॥
कृस तनु सीस जटा एक बेनी।
जपति हृदय रघुपति गुन श्रेनी॥

मैं ने भी सीता जी को , उन की व्यथा को मन ही मन ही नहीं हाथ जोड़ कर भी प्रणाम किया । और उन की उन की मूर्ति के पास जा कर बैठ गया । उन के दुःख को भीतर से महसूस किया । तुलसीदास लिख ही गए हैं :

निज पद नयन दिए मन राम पद कमल लीन।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन ॥

अब यह कथा , कथा का दुःख सभी को मालूम है । हम ने भी तुलसीदास के लिखे के भाव में शीश नवाए , रस्सी से बंधा घंटा बजाया , फ़ोटो खिंचवाया और चले आए :

बार बार नाएसि पद सीसा।
बोला बचन जोरि कर कीसा॥
अब कृतकृत्य भयउ मैं माता।
आसिष तव अमोघ बिख्याता॥

नुवारा एलिया में एक सुंदर झील है । झील किनारे मादक हरियाली है । अपने भारतीय झीलों की तरह उन के किनारे होटलों और दुकानों की भीड़ नहीं है । हां , रेसकोर्स है । झील में बोट हैं , बोटिंग के लिए । तैरता हुआ बड़ा सा हाऊस बोट भी है । इसी हाऊस बोट पर नुवारा एलिया के स्थानीय पत्रकारों ने रात में कॉकटेल पार्टी आयोजित की थी भारतीय पत्रकारों के लिए । शाम को ठंड बढ़ गई थी । शिमला की तरह । हम सब ने हलके गरम कपड़े पहने । इस पार्टी में हिंदी गानों की बहार थी । वहां के स्थानीय लोगों ने आर्केस्ट्रा का भी बंदोबस्त भी किया था । इस सुरमई शाम को और दिलकश किया गीतांजलि ताल्लुकदार और उत्कर्ष सिनहा ने अपने गाए हिंदी फ़िल्मी डुवेट गानों से । गीतांजलि भारत में गौहाटी की हैं , भारत की बेटी हैं लेकिन अब श्रीलंका की बहू हैं । उत्कर्ष सिनहा गोरखपुर के हैं , अब लखनऊ में रहते हैं । पर बिना किसी रिहर्सल के गीतांजलि और उत्कर्ष ने डुएट गीतों की जो दरिया बहाई वह अनन्य थी । कॉकटेल की बहार थी ही , इस बहार की बयार में हम जैसे लोग झूम कर नाचने भी लगे । इस के एक दिन पहले भी रास्ते में गीतांजलि ने अपने मधुर कंठ से रास्ते में हिंदी फ़िल्मी गाने सुनाए थे । ये शमां , शमां है सुहाना और अजीब दास्तां है ये , न तुम समझ सके न हम ! जैसे गाने सुनाए थे । उत्कर्ष भी लगातार रास्ते में अपने मोबाइल से एक से एक सजीले और दुर्लभ गीत – ग़ज़ल सुनवाते रहे थे पर वह ख़ुद भी इतने सुरीले हैं , अच्छा गाते हैं यह इस कॉकटेल पार्टी में ही पता चला । इस मौके पर मैं ने उन के चेहरे को अपनी हथेली में भर कर उन्हें विश भी किया ।

दूसरी सुबह हम लोगों को कैंडी के लिए निकलना था । कैंडी होते हुए कोलंबो पहुंचना था । सुबह चले भी हम कैंडी के लिए । लेकिन शाम को फेयरवेल पार्टी भी थी । लगा कि कोलंबो पहुंचने में बहुत देर हो जाएगी । सो बीच रास्ते में कैंडी जाना कैंसिल हो गया और हम कोलंबो के रास्ते पर चल पड़े । भारत में ही दोस्तों ने कहा था कि कैंडी ज़रुर जाइएगा । श्रीलंका की सब से खूबसूरत जगह है । अफ़सोस बहुत हुआ कैंडी न जा पाने पर । पर करते भी तो क्या करते । खैर , केजल्ल  मावलेन , रामबड़  , वेलिमा ,  , पुसलेवान , गाम पोवर , पेरादेनिया और खड़गन्नाव जैसे शहरों से गुज़रते हुए रास्ते भर चाय बागानों का हुस्न , उन की मादक हरियाली मन में उफान भरती रही । हम ने दार्जिलिंग , गैंगटोक और गौहाटी के चाय बागान भी देखे हैं , उन का हुस्न और अंदाज़ भी जाना है लेकिन श्रीलंका के चाय बागानों के हुस्न के क्या कहने । रास्ते भर हम हरियाली पीते रहे और मन जुड़ाता रहा । इतना कि अपनी ही एक ग़ज़ल के मतले का शेर याद आ गया :

कभी जीप तो कभी हाथी पर बैठ कर जंगल-जंगल फ़ोटो खींच रहा हूं
अपने भीतर तुम को चीन्ह रहा हूं मैं तो हर पल हरियाली बीन रहा हूं

हम ने इस रास्ते में सिर्फ़ चाय बागान ही नहीं देखे बल्कि चाय के कुछ पेड़ भी देखे । हमारी दुभाषिया सुभाषिनी जी इन सारे विवरणों से हमें निरंतर परिचित और समृद्ध करवाती रहीं । सुभाषिनी श्रीलंका की ही हैं । लेकिन सिंहली , और हिंदी पर पूरा अधिकार रखती हैं । इस भाषा से उस भाषा में बात को चुटकी बजाते ही बता देना , रख देना सुभाषिनी के लिए जैसे बच्चों का खेल था । एक राष्ट्रपति वाले कार्यक्रम में हमें एक हियर रिंग दिया गया था जिस से सिंहली का अनुवाद फौरन हिंदी में मिल जाता था । चाहे जिस भी किसी का संबोधन हो । लेकिन बाक़ी जगहों पर सुभाषिनी ही हम लोगों को हिंदी और स्थानीय लोगों को सिंहली में हमारी बात बताती रहीं । चाहे भाषण हो या बातचीत । सुभाषिनी हर कहीं किसी पुष्प की सुगंध की तरह अपनी पूरी सरलता के साथ उपस्थित रहतीं । कोई रास्ता हो , कार्यक्रम हो हर कहीं सुभाषिनी अपने सुभाषित के साथ उपस्थित । सुभाषिनी श्रीलंका रेडियो में तो काम कर ही चुकी हैं , लखनऊ के भातखंडे संगीत विश्वविद्यालय में संगीत की शिक्षा भी ले चुकी हैं । लखनऊ आ कर ही उन्हों ने हिंदी सीखी थी । इस हरे-भरे मदमाते रास्ते में अंबे पुस रेस्टोरेंट में हम लोगों ने लंच लिया । इस रेस्टोरेंट में भी हिंदी फ़िल्मी गाने सुनाने वाले लोग मिले । एक से एक गाने । परदेस में संगीतमय लंच की ऐसी यादें मन की अलमारी में सर्वदा अपने टटकेपन के साथ उपस्थित रहती हैं । इस बात को शायद इस रेस्टोरेंट के प्रबंधन के लोग बेहतर जानते हैं । श्रीलंका के शहर दर शहर घूमते हुए , वहां की समृद्धि को देखते हुए यह विश्वास नहीं होता कि कोई बारह बरस पहले 2004 में आई सुनामी से यह देश बुरी तरह बरबाद हो गया था । विनाश का एक भी निशान नहीं । यह आसान नहीं है । बहुत बड़ी बात है ।

हम लोग सांझ घिरते-घिरते कोलंबो आ गए । उसी पुराने होटल माउंट लेवेनिया में ठहरे जहां भारत से आ कर पहली रात ठहरे थे । हम तो चाहते थे कि हमें फिर से वही हमारा पुराना कमरा मिल जाए । सागर के सौंदर्य और उस के शोर का वही नज़ारा मिल जाए । लेकिन नहीं  मिला । कमरा दूसरा मिला पर यह कमरा भी समुद्र की लहरों की लज्ज़त लिए हुए था । तासीर वह  नहीं थी , नज़दीकी भी वह नहीं थी पर लहरों की सरग़ोशी और सौंदर्य तो वही था । लहरों का शोर और उस की उछाल वही थी । लेकिन वह पहले सी मुहब्बत नहीं थी । फैज़ ने लिखा ही है:

मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग

मैने समझा था कि तू है तो दरख़्शां है हयात
तेरा ग़म है तो ग़मे-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया मे रक्खा क्या है
तू जो मिल जाये तो तक़दीर निगूँ हो जाये
यूँ न था, मैने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाये

और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

यही हुआ मेरे साथ भी । पर जो भी होता है , अच्छा ही होता है । यह कमरा भी अच्छा था । उस कमरे का हुस्न जुदा था तो इस कमरे का अपना हुस्न था । मुझे तो बस सागर और उस के सौंदर्य से आशिक़ी करनी थी , उसी से मतलब था । और आशिक़ी जैसे भी हो निभा लेने में ही सुख है । आकाश और धरती उस में आड़े नहीं आते । मैं ने निभाया । सागर की लहरों का शोर और दूधिया लहरों की उछाल ऐसी थी गोया आप की माशूक़ा आप के ऊपर अनायास ही , अचानक ही सवार हो जाए । और आप हकबक रह जाएं । मारे प्यार के । प्यार का बुखार होता ही ऐसा है । रोमांस का ज्वार जैसे मुझ पर ही नहीं सागर पर भी सवार था । दोनों ही सुर्खुरु थे । रात में हम लोग फेयरवेल पार्टी में पहुंचे । आत्मीयता और मेहमाननवाज़ी की नदी यहां भी बहती मिली ।  आज इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट की 67 वीं वर्षगांठ भी थी । जिसे केक काट कर उपाध्यक्ष हेमंत तिवारी के नेतृत्व में मनाई गई । जनरल सेक्रेटरी परमानंद पांडेय दो दिन पहले ही भारत जा चुके थे । हेमंत  तिवारी ने अध्यक्ष मल्लिकार्जुनैया की उपस्थिति में बहुत भावुक कर देने वाला भाषण भी इस मौक़े पर दिया । श्रीलंका प्रेस एसोशिएशन के साथियों ने भी भाव-विभोर किया अपने उदबोधन में । हम लोगों की पूरी यात्रा पहले 30 अक्टूबर तक की तय थी । पर 30 अक्टूबर को दीपावली पड़ जाने के कारण कार्यक्रम तितर-बितर हुआ । दो दिन पहले ही सब कुछ समेटना पड़ा । 29 अक्टूबर को दिन में कुछ साथी भारत के लिए चले गए । लेकिन हमारी फ्लाइट 30 अक्टूबर की सुबह की थी । हम 29 अक्टूबर को भी रहे । कुछ और साथी भी । कर्नाटक , उड़ीसा और उत्तराखंड के साथी भी रहे ।

29 अक्टूबर की सुबह जब डाइनिंग हाल में हम ब्रेकफास्ट के लिए पहुंचे तो दीपावली का सा नज़ारा था । रंगोली सजी हुई थी । दिये जल रहे थे । भारतीय मिठाइयां सजी हुई थीं । जलेबी , रसमलाई , चावल की खीर , बादाम की खीर । होटल स्टाफ़ हैपी दीपावली बोल रहा था । हम चकित थे । शाम को भी इंडियन कल्चर सेंटर में दीपावली का आयोजन था । सुश्री शिरीन कुरेशी ने मुझे इस दीपावली कार्यक्रम में पहले ही से आमंत्रित कर रखा था । सुश्री शिरीन कुरेशी भारत की ही हैं । इंदौर की रहने वाली हैं । कोलंबो में दो साल से हैं । उन के पिता मोहम्मद नवाब हसन कुरेशी भी साथ रहते हैं । शेरो शायरी और फ़िल्मी गानों के बेहद शौक़ीन ।

होटल माऊंट लेवेनिया जहां हम ठहरे हुए थे इंडियन कल्चर सेंटर के अब्दुल गफूर मुझे लेने आए । साथ में चमोली के देवेंद्र सिंह रावत ने भी चलने की इच्छा जताई तो मैं ने कहा चलिए । हम लोग जब इंडियन कल्चर सेंटर पहुंचे तो वहां तो भारी भीड़ थी । मुझे लगा था कि कोई औपचारिक सा सरकारी कार्यक्रम होगा । संक्षिप्त सा । लेकिन शिरीन जी ने तो न सिर्फ़ लोगों को इकट्ठा कर रखा था बल्कि दीपावली की पूजा , दिया , संगीत , मिठाई और पटाखे का दिलकश बंदोबस्त भी कर रखा था । इस में भारतीय लोग भी थे और श्रीलंका के स्थानीय लोग भी । बल्कि स्थानीय लोग ज़्यादा थे । और अच्छी – खासी हिंदी बोलते और फ़िल्मी गाने गाते हुए ।  मैं ने वहां दीप जलाया , पूजन किया । श्रीमती अंजली मिश्रा ने इस में मेरी मदद की । आरती गाई। श्रीमती अंजलि मिश्र हैं तो मध्य प्रदेश की लेकिन उन का ननिहाल बनारस में है । सो वह भोजपुरी भी बढ़िया जानती थीं । उन से भोजपुरी में भी बात हुई । भारत की बेटी अंजलि मिश्र भी अब श्रीलंका की बहू हैं । लेकिन अपनी परंपराओं को जीती हुई । यहां वह यूनिवर्सिटी में पढ़ाती हैं । इस दीपावली के मौके पर अपनी एक ग़ज़ल यह मन के दीप जलने का समय है तुम कहां हो भी सुनाई मैं ने । जिसे भाव-विभोर हो कर सुना भी लोगों ने ।

यह मन के दीप जलने का समय है तुम कहां हो
प्राण में पुलकित नदी की धार मेरी तुम कहां हो

रंगोली के रंगों में बैठी हो तुम , दिये करते हैं इंकार जलने से
लौट आओ वर्जना के द्वार सारे तोड़ कर परवाज़ मेरी तुम कहां हो

लौट आओ कि दीप सारे पुकारते हैं तुम्हें साथ मेरे
रौशनी की इस प्रीति सभा में प्राण मेरी तुम कहां हो

देहरी के दीप नवाते हैं बारंबार शीश तुम को
सांझ की इस मनुहार में आवाज़ मेरी तुम कहां हो

न आज चांद दिखेगा , न तारे , तुम तो दिख जाओ
सांझ की सिहरन सुलगती है , जान मेरी तुम कहां हो

हर कहीं तेरी महक है , तेल में , दिये में और बाती में
माटी की खुशबू में तुम चहकती,  शान मेरी तुम कहां हो

घर का हर हिस्सा धड़कता है तुम्हारी निरुपम मुस्कान में
दिल की बाती जल गई दिये के तेल में , आग मेरी तुम कहां हो

सांस क्षण-क्षण दहकती है तुम्हारी याद में , विरह की आग में तेरी
अंधेरे भी उजाला मांगते हैं तुम से  , अरमान मेरी तुम कहां हो

यह घर के दीप हैं , दीवार और खिड़की , रंगोली है , मन के पुष्प भी
तुम्हारे इस्तकबाल ख़ातिर सब खड़े हैं , सौभाग्य मेरी तुम कहां हो

फिर हिंदी फ़िल्मों के गाने गाए गए । मिठाई खाई गई और पटाखे छोड़े गए । इस कार्यक्रम में भारतीय मूल के लोग भी थे लेकिन श्रीलंका मूल के लोग ज़्यादा थे । ख़ास कर हिंदी बोलते और हिंदी गाने गाते बच्चे । भारत में हिंदी भले उपेक्षित हो रही हो लेकिन श्रीलंका में हिंदी गर्व का विषय है। हिंदी गाने गाने वाले लोग श्रीलंका मूल के ही लोग थे । श्रीलंका मूल की स्नेहा मिलीं । धाराप्रवाह हिंदी बोलती हुई । अभी पढ़ती हैं । पांच मिनट की बातचीत में स्नेहा  मेरी बेटी बन गईं । मैं ने उन्हें बताया कि बेटियां तो साझी होती हैं । चाहे वह कहीं की भी हों । तो वह और खुश हो गईं । इंडियन कल्चर सेंटर से अब्दुल गफूर फिर हमें होटल तक छोड़ गए । अब्दुल गफूर भी इंडियन कल्चर सेंटर में हैं और भारत में गुजरात के रहने वाले हैं । सपरिवार रहते हैं श्रीलंका में बीते कई बरस से । बच्चे बड़े हो गए हैं । बच्चे कारोबारी हैं । अपना-अपना व्यवसाय करते हैं । कोलंबो में ही । कोलंबो की सड़कों पर जैसे भारतीय बाज़ार ही सजा दीखता है । हच और एयरटेल  की मोबाईल सर्विस एयरपोर्ट से ही दिखने लगती है । पूरे श्रीलंका में दिखती है । नैनो की टैक्सियां भी बहुतेरी । अशोक लेलैंड की बसें । बजाज की थ्री ह्वीलर । एशियन पेंट्स और बाटा की दुकानें वहां आम हैं । चाइनीज सामानों से यहां के बाज़ार भी अटे पड़े हैं । वैसे ही बढ़ते हुए माल , वैसे ही दुकानें । मोल-तोल करते लोग । वैसे ही रेस्टोरेंट , वैसे ही लोग । जैसे भारतीय । खैर , हम लौटे इंडियन कल्चर सेंटर से । पैराडाइज बीच पर गए । अंधेरे में भी समुद्र की लहरों का रोमांस जिया । लहरों के साथ टहले । बीच पर ही एक रेस्टोरेंट में कैंडिल लाईट डिनर किया । समुद्र की लहरों को चूमते हुए टहलते रहे । फिर समुद्र देवता को प्रणाम किया और होटल लौटे ।

अब हम फिर भंडारनायके एयरपोर्ट पर थे । ऊंघते हुए एयरपोर्ट पर भी हिंदी फ़िल्मी गाने बज रहे थे । इंस्ट्रूमेंटल म्यूजिक में । बहुत प्यार करते हैं तुम को सनम । सुन कर हम भी गाना चाहते हैं बहुत प्यार करते हैं श्रीलंका को हम ।  पासपोर्ट पर वापसी के लिए इमिग्रेशन की मुहर लग चुकी है । हम जहाज में हैं और जहाज रनवे पर ।  एयरपोर्ट भी समुद्र किनारे ही है । उड़ान भरते ही नीचे समुद्र दीखता है । लहराता हुआ । कोलंबो शहर छूट रहा है । श्रीलंका छूट रहा है । एक ही द्वीप में बसा हिंद महासागर का यह मोती छूट रहा है । अपनी ख़ूबसूरत पहाड़ियों में धड़कते हुए , कुछ सोए , कुछ जगे समुद्र किनारे बसे इस देश को छोड़ आया हूं। फिर-फिर जाने की ललक और कशिश लिए हुए ।  नीचे छलकता समुद्र है ऊपर आकाश में लालिमा छाई हुई है । आसमान में छाई लालिमा जैसे दिया बन कर जल रही है और दीवाली मना रही है । जगर-मगर दीवाली । यह तीस अक्टूबर , 2016 की अल्लसुबह है । प्रणाम इस सुबह को । प्रणाम श्रीलंका की धरती को । श्रीलंका के राष्ट्र गान में श्रीलंका को आनंद और विजय की भूमि कहा गया है । इस आनंद और विजय की भूमि को हम राम के विजयधाम के रुप में भी जानते हैं । इस लिए भी प्रणाम । प्रणाम अभी , बस अभी आने वाली अपनी धरती को । स्तुति श्रीलंका !

श्रीलंका के कोलंबो में स्थित इंडियन कल्चरल सेंटर में ग़ज़ल गायन करते पत्रकार दयानंद पांडेय.

इस यात्रा वृत्तांत के लेखक दयानंद पांडेय लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं. विविध विषयों और भावों पर दयानंद के लेखन / रचना को पढ़ने के लिए उनके ब्लाग सरोकारनामा पर जा सकते हैं.

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अलविदा अज्ञात जी, आप तो अशोक थे लेकिन हम अब भारी शोक में हैं

(स्व. अशोक अज्ञात जी)

कभी माफ़ मत कीजिएगा अशोक अज्ञात जी, मेरे इस अपराध के लिए … हमारे विद्यार्थी जीवन के मित्र अशोक अज्ञात कल नहीं रहे। यह ख़बर अभी जब सुनी तो धक् से रह गया । सुन कर इस ख़बर पर सहसा विश्वास नहीं हुआ । लेकिन विश्वास करने न करने से किसी के जीवन और मृत्यु की डोर भला कहां रुकती है। कहां थमती है भला ? अशोक अज्ञात के जीवन की डोर भी नहीं रुकी , न उन का जीवन । अशोक अज्ञात हमारे बहुत ही आत्मीय मित्र थे । विद्यार्थी जीवन के मित्र । हम लोग कविताएं लिखते थे। एक दूसरे को सुनते-सुनाते हुए हम लोग अकसर अपनी सांझ साझा किया करते थे उन दिनों।

गोरखपुर की सड़कें , गलियां पैदल धांगते-बतियाते घूमते रहते थे। क्रांति के फूल खिलाते , खिलखिलाते रहते थे। वह हमारी मस्ती और फाकाकशी के भी दिन थे । हमारी आन-बान-शान और स्वाभिमान से जीने के दिन थे । ज़रा-ज़रा सी बात पर हम लोग किसी भी ख़्वाब या किसी भी प्रलोभन को क्षण भर में लात मार देने में अपनी शान समझते थे । इसी गुरुर में जीते और मरते थे । अठारह-बीस बरस की उम्र में हम लोग दुनिया बदलने निकले थे । दुनिया तो खैर क्या बदली, हम लोग ही बदलते गए , हारते और टूटते गए । लेकिन यह तो बाद की बात है । अब की बात है । पर उस समय , उस दौर की बात और थी । और अशोक अज्ञात तो अशोक ही थे। अशोक मतलब बिना शोक के। कुछ भी बन बिगड़ जाए उन को बहुत फर्क नहीं पड़ता था । अज्ञात का गुरुर उन्हें शुरु ही से और सर्वदा ही रहा।

हम लोग विद्यार्थी ज़रुर थे पर साहित्य में स्थानीय राजनीति की ज़मीन को तोड़ने के लिए जागृति नाम से एक संगठन भी बनाया था । जिस का मुख्य काम उन दिनों कवि गोष्ठियां आयोजित करना था । अशोक अज्ञात उन दिनों संकेत नाम से एक अनियतकालीन पत्रिका भी निकालते थे । और कि उस में वह किसी की सलाह या दखल नहीं लेते थे । वह उन का व्यक्तिगत शौक और नशा था । पान खाते-चबाते वह एक से एक गंभीर बात कर लेते थे । वह जल्दी किसी विवाद में नहीं पड़ते थे लेकिन चुप भी नहीं रहते थे। स्वार्थ उन में नहीं था , भावुकता लेकिन बहुत थी । उन के एक मामा जिन्हें हम लोग ओझा जी कहते थे, हम लोगों को पढ़ने के लिए अकसर सोवियत साहित्य उपलब्ध करवाते रहते थे।

अशोक अज्ञात का गांव टांड़ा हमारे गांव बैदौली से थोड़ी दूरी पर ही था । वह बाहुबली और कई बार काबीना मंत्री रहे हरिशंकर तिवारी के ख़ास पट्टीदार थे । लेकिन तमाम मुश्किलों और निर्धनता के बावजूद कभी भी उन से कोई मदद नहीं मांगी । न ही उन के हुजूर में गए । बचपन में ही उन के पिता नहीं रहे थे । उन की मां ने ही उन्हें पाला-पोसा और पढ़ाया-लिखाया । टीन एज तक आते-आते अज्ञात जी ने परिवार की ज़िम्मेदारियां उठा लीं । उन्हीं दिनों अपनी एक बहन की शादी उस कच्ची उम्र में तय की थी । मैं भी गया था तब उन की बहन की शादी में उन के गांव। संयोग से विद्यार्थी जीवन में कुछ समय मैं गोरखपुर के रायगंज मुहल्ले में भी रहा था । वहां अज्ञात जी हमारे पड़ोसी रहे थे । अपनी बड़ी बहन के साथ रहते थे । वह हमारी कविताओं के , हमारे संघर्ष और हमारी उड़ान के दिन थे । पत्रकारपुरम , राप्ती नगर , गोरखपुर में भी वह मेरे पड़ोसी रहे थे । इस नाते जब भी गोरखपुर जाता था तो नियमित मुलाकात होती थी उन से । वह जब कभी लखनऊ आते तब भी हमसे मिलते ज़रुर थे । हमारे कथा साहित्य के वह अनन्य पाठक थे । खोज कर , मांग कर जैसे भी हो वह पढ़ते ज़रुर थे । न सिर्फ़ पढ़ते थे बल्कि पात्रों और कथाओं पर विस्तार से चर्चा भी करते थे । प्रश्न करते थे । किसिम किसिम के सवाल होते उन के पास । कई बार वह फ़ोन कर के बात करते । मिलने का इंतज़ार नहीं कर पाते थे।

मेरी कहानी मैत्रेयी की मुश्किलें और उपन्यास वे जो हारे हुए उन को बहुत प्रिय थे । इस लिए भी कि वह ख़ुद हारे हुए थे और कि इस उपन्यास के बहुत से चरित्र उन के जाने और पहचाने हुए लोग थे । हरिशंकर तिवारी भी इस उपन्यास में खल पात्र के रुप में उपस्थित थे इस लिए भी वह इसे बहुत पसंद करते थे । इतना ही नहीं , यह उपन्यास भी उन्हों ने उन तक पहुंचवा दिया यह कह कर कि आप अपने को चाहे जितना सफल मानिए , नायक मानिए लेकिन देखिए समय और साहित्य आप को किस तरह दर्ज कर रहा है । यह बात उन्हों ने मुझे फ़ोन कर बताई । मैं ने चिंतित हो कर कहा , यह क्या किया आप ने ? वह बोले , घबराईए नहीं आप । वह लोग बहुत बेशर्म और घाघ लोग हैं । उन को इन सब चीजों से कोई फ़र्क नहीं पड़ता । और सचमुच अशोक अज्ञात ने सही ही कहा था । उन या उन जैसों को कोई फ़र्क नहीं पड़ा था । फ़र्क तो छोड़िए , नोटिस भी नहीं ली उन या उन जैसे लोगों ने । लेकिन मैं चिंतित इस लिए हुआ था क्यों कि एक बार एक ख़बर के सिलसिले में महीनों धमकी आदि झेलना पड़ा था , इन्हीं तिवारी जी के चमचों से । अज्ञात जी बोले थे , ख़बर की बात और है।

अशोक अज्ञात अपनी कविताओं में जो चुभन बोते थे , अपने जीवन में भी वह चुभन महसूस करते रहे । निरंतर । इतना कि बाद के दिनों में वह सिर्फ़ पाठक बन कर रह गए । रचना छूट गई। उन के जीवन में आर्थिक संघर्ष इतना ज़्यादा था कि बाक़ी सारे संघर्ष और रचनात्मकता खेत हो गई थी । आज अख़बार की नौकरी ने उन्हें निचोड़ लिया था । पांच हज़ार , सात हज़ार या दस हज़ार रुपए की नौकरी में आज अख़बार की नौकरी में आज की तारीख में किसी स्वाभिमानी व्यक्ति और उस के परिवार का बसर कैसे होता रहा होगा , समझा जा सकता है । गोरखपुर प्रेस क्लब के अध्यक्ष भी रहे हैं वह । आज अख़बार में वह संपादक भी रहे कुछ समय तक । लेकिन संपादक और प्रेस क्लब के अध्यक्ष हो कर भी अज्ञात ही रहे । क्षुद्र समझौते कभी नहीं किए । दलाली आदि उन से कोसों दूर भागती थी । भूखे रह लेना वह जानते थे लेकिन हाथ पसारना नहीं । अशोक तो वह खैर थे ही । अशोक मतलब बिना शोक के । लेकिन अशोक अज्ञात भी हो जाए तो मुश्किल हो जाती है । अज्ञात नाम तो उन्हों ने कविता लिखने के लिए ख़ुद रखा था । पर क्या पता था कि अज्ञात नाम से कविता लिखने वाला , संकेत नाम की पत्रिका निकालने वाला यह व्यक्ति इतना भी अज्ञात हो जाएगा कि कैंसर की बीमारी का इलाज भी अपने पिछड़े गांव में करते हुए अपने गांव में ही आंख मूंद लेगा ! अपनी जन्म-भूमि में ही प्राण छोड़ेगा । और कि इस बीमारी की सूचना भी हम जैसों मित्रों को देने की ज़रुरत नहीं समझेगा।

अशोक अज्ञात फ़ेसबुक पर भी उपस्थित रहे हैं । और इस दौर में जब लोग अपनी फुंसी , खांसी , बुखार की भी सूचना परोस कर भी अपनी आत्म मुग्धता में फ़ोटो डाल-डाल कर धन्य-धन्य होते रहते हैं , वहीं हमारे अशोक अज्ञात ने अपने कैंसर की भनक भी नहीं होने दी किसी को । आप उन के अशोक और अज्ञात होने का अंदाज़ा इस एक बात से भी लगा सकते हैं । अब हम भी अपने को सिर्फ़ और सिर्फ़ कोस ही सकते हैं कि एक अभिन्न आत्मीय और स्वाभिमानी मित्र को क्यों इस तरह निर्वासित हो कर अज्ञात मृत्यु के कुएं में धकेल दिया । क्यों नहीं , खोज ख़बर रखी । माथा ठनका तो तभी था जब कुछ समय पहले गोरखपुर जाने पर उन के घर गया तो पता चला कि वह तो अपना घर बेच कर कहीं और जा चुके हैं । उन का फ़ोन मिलाया । फ़ोन बंद मिला । दूसरे पड़ोसी गिरिजेश राय ने बताया कि वह कर्ज में डूब गए थे , मकान की किश्तें बहुत हो गई थीं, पारिवारिक जिम्मेदारियां भी थीं सो घर बेचना ही रास्ता रह गया था।

अब तो गिरिजेश राय भी नहीं रहे । फिर बाद में भी कई बार फोन किया , कभी फ़ोन नहीं मिला उन का । न ही कोई मित्र उन का बदला हुआ उन का कोई दूसरा नंबर दे पाया । फिर मैं भी अपनी पारिवारिक ज़िम्मेदारियों में उलझ गया । अज्ञात जी की खोज-ख़बर लेना बिसर गया । ख़बर मिली भी तो यह शोक भरी ख़बर। जाने गोरखपुर के पत्रकार लोग गोरखपुर से कोई सत्तर किलोमीटर दूर उन के गांव टांड़ा भी पहुंचे होंगे या नहीं , मैं नहीं जानता। यह ज़रुर जानता हूं अज्ञात जी के इस तरह अज्ञात चले जाने में एक अपराधी मैं भी हूं। कभी माफ़ मत कीजिएगा अज्ञात जी , मेरे इस अपराध के लिए । इस लिए कि मैं कभी इस अपने अक्षम्य अपराध के लिए ख़ुद को माफ़ करने वाला नहीं हूं। अलविदा अज्ञात जी। आप तो अशोक थे लेकिन हम अब भारी शोक में हैं, अशोक नहीं हैं। दल्लों भड़ुओं के इस दौर में , कुत्ता और चूहा दौड़ में इस तरह बेनाम और बेपता मौत ही हम सब की अब तकदीर है। करें भी तो क्या करें अशोक अज्ञात जी । ख़ुद्दारी की खता की भी आख़िर कुछ तो सज़ा भी होती ही है।

मुश्किल यह भी है कि जैसे उन के पिता उन्हें भंवर में छोड़ कर चले गए थे , वैसे ही अज्ञात जी भी अपने बच्चों को भंवर में ही छोड़ कर गए हैं। दो बेटे हैं, बेरोजगार हैं। एक बेटी है, विवाह बाकी है। पत्नी भी बीमार रहती हैं। उनका इलाज भी वह नहीं करवा पाते थे। मुश्किलें और भी बहुत हैं। ईश्वर उन के परिवार को उन के विछोह की शक्ति दे और उन की आत्मा को शांति। एक अभागा मित्र और कर भी क्या सकता है भला?

लेखक दयानंद पांडेय लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं.

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एक अनाम और निरपराध औरत की जेल डायरी

करे कोई, भरे कोई। एक पुरानी कहावत है। एक बात यह भी है कि कई बार आंखों देखा और कानों सुना सच भी , सच नहीं होता। होता तो यह जेल डायरी लिखने की नौबत नहीं आती। लेकिन हमारे जीवन में भी कई बार यह बात और वह कहावत लौट-लौट आती है। एक वाकया याद आता है। एक गांव में एक पंडित जी थे। पूरी तरह विपन्न और दरिद्र। लेकिन नियम क़ानून और शुचिता से कभी डिगते नहीं थे। किसी भी सूरत। लोग बाग़ जब गन्ने के खेत में आग लगा कर कचरा , पत्ता आदि जला देते थे , पंडित जी अपने खेत में ऐसा नहीं करते थे। यह कह कर कि अगर आग लगाएंगे तो जीव हत्या हो जाएगी। पत्तों के साथ बहुत से कीड़े-मकोड़े भी मर जाएंगे। पर्यावरण नष्ट हो जाएगा।

लेकिन पंडित जी के इस सत्य और संवेदना से उन के कुछ पट्टीदार जलते थे। एक बार गांव में एक हत्या हो गई। उस हत्या में पंडित जी को भी साजिशन नामजद कर दिया उन के पट्टीदारों ने। पुलिस आई तफ्तीश में तो पंडित जी बुरी तरह भड़क गए पुलिस वालों पर। जो जो नहीं कहना था , नाराजगी में फुल वॉल्यूम में कहा। पुलिस भी खफा हो गई। उन्हें दबोच ले गई और मुख्य मुल्जिम बना कर जेल भेज दिया। सब जानते थे कि इस हत्या में पंडित जी का एक पैसे का हाथ नहीं। पर उन्हें सज़ा हो गई। जो व्यक्ति गन्ने के खेत में पत्ते भी इस लिए नहीं जलाता था कि जीव हत्या हो जाएगी , कीड़े-मकोड़े जल कर साथ मर जाएंगे। उसी व्यक्ति को हत्या में सज़ा काटनी पड़ी। ऐसा होता है बहुतों के जीवन में। सब जानते हैं कि फला निर्दोष है लेकिन क़ानून तो क़ानून , अंधा सो अंधा। यही उस का धंधा।

तो यहां इस डायरी की नायिका भी निरपराध होते हुए भी एक दुष्चक्र में फंसा दी गई। न सिर्फ़ फंसा दी गई , फंसती ही गई। कोई अपना भरोसे में ले कर जब पीठ में छुरा घोंपता है तो ऐसे ही होता है। इस कदर छुरा घोंपा कि एक निरपराध औरत सी बी आई के फंदे में आ गई।  फ्राड किसी और ने किया , घोटाला किसी और ने किया और मत्थे डाल दिया इस औरत के। इस औरत के पति को भी इस घेरे में ले लिया। शुभ चिंतक बन कर डस लिया।

विश्वनाथ प्रताप सिंह की एक कविता का शीर्षक है लिफ़ाफ़ा :

पैग़ाम तुम्हारा
और पता उन का
दोनों के बीच
फाड़ा मैं ही जाऊंगा

तो इस डायरी की नायिका लिफ़ाफ़ा बनने को अभिशप्त हो गई। एक निरपराध औरत की जेल डायरी की नायिका का सब से त्रासद पक्ष यही है। मेरी त्रासदी यह है कि इस लिफ़ाफ़ा का डाकिया हूं। डायरी मेरी नहीं है। बस मैं परोस रहा हूं। जैसे कोई डाकिया चिट्ठी बांटता है , ठीक वैसे ही मैं यह डायरी बांट रहा हूं। एक अनाम और निरपराध औरत की जेल डायरी परोसते हुए उस औरत की यातना , दुःख और संत्रास से गुज़र रहा हूं। उस के छोटे-छोटे सुख भी हैं इस डायरी की सांस में। सांस-सांस में। पति और दो बच्चों की याद में डूबी इस औरत और इस औरत के साथ जेल में सहयात्री स्त्रियों की गाथा को बांचना सिर्फ़ उन के बड़े-बड़े दुःख और छोटे-छोटे सुख को ही बांचना ही नहीं है। एक निर्मम समय को भी बांचना है। सिस्टम की सनक और उस की सांकल को खटखटाते हुए प्रारब्ध को भी बांचना है।

यह दुनिया भी एक जेल है। लेकिन सचमुच की जेल ? और वह भी निरपराध। एक यातना है। यातना शिविर है। मैं ने सब से पहले जेल जीवन से जुड़ी एक किताब पढ़ी थी भारतीय जेलों में पांच साल। जो मेरी टाइलर ने लिखी थी। फाइव इयर्स इन इंडियन जेल। इस का हिंदी अनुवाद आनंद स्वरूप वर्मा ने किया था। मेरी टाइलर अमरीका से भारत घूमने आई थीं। पेशे से पत्रकार थीं। लेकिन अचानक इमरजेंसी लग गई और वह सी आई ए एजेंट होने की शक में गिरफ्तार कर ली गईं। कई सारी जेलों में उन्हें रखा गया। यातना दी गई। इस सब का रोंगटे खड़े कर देने वाला विवरण दर्ज किया है मेरी टाइलर ने। दूसरी किताब पढ़ी मैं ने जो मोहन लाल भास्कर ने लिखी थी , मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था। पाकिस्तानी जेलों में दी गई यातनाओं को इस निर्ममता से दर्ज किया है मोहनलाल भास्कर ने कि आंखें भर-भर आती हैं। पॉलिन कोलर की ‘आई वाज़ हिटलर्स मेड’  तीसरी किताब है जो मैं ने जेल जीवन पर पढ़ी है। मूल जर्मन में लिखी इस किताब के हिंदी अनुवाद का संपादन भी मैं ने किया है। मैं  हिटलर की दासी थी  नाम से हिंदी में यह प्रकाशित है। हिटलर के समय में जर्मन की जेलों में तरह तरह की यातनाएं और नरक भुगतते हुए  पॉलिन कोलर ने ‘आई वाज़ हिटलर्स मेड’ में ऐसे-ऐसे वर्णन दर्ज किए हैं कि कलेजा मुंह को आता है। कई सारे रोमांचक और हैरतंगेज विवरण पढ़ कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।  पॉलिन कोलर का पति भी जाने किस जेल में है। जाने कितने पुरुषों की बाहों और उन की सेक्स की ज़रूरत पूरी करती , अत्याचार सहती पॉलिन कोलर का जीवन नरक बन जाता है। फिर भी वह हिम्मत नहीं हारती। संघर्ष करते-करते हिटलर की सेवा में रहते हुए भी जेल जीवन से वह न सिर्फ़ भाग लेती है बल्कि अपने पति को भी खोज कर छुड़ा लेती है और देश छोड़ कर भाग लेती है।

कई सारे उपन्यासों में भी मैं ने जेल जीवन पढ़ा है। हार्वर्ड फास्ट की आदि विद्रोही जिस का हिंदी अनुवाद अमृत राय ने किया है उस के विवरण भी पढ़ कर मन हिल जाता है। एलेक्स हेली  की द रूट्स का हिंदी अनुवाद ग़ुलाम नाम से छपा है। इस के भी हिंदी अनुवाद का संपादन एक समय मैं ने किया था। इसे पढ़ कर यहूदियों की गुलामी और उन की कैद  के विवरण जहन्नुम के जीवन से लथपथ हैं। जानवरों की तरह खरीदे और बेचे जाने वाले यहूदी जानवरों की ही तरह गले में पट्टा बांध कर रखे भी जाते हैं। अनगिन अत्याचार जैसे नियमित हैं। लेकिन यह ग़ुलाम अपनी लड़ाई नहीं छोड़ते। निरंतर जारी रखते हैं। मुझे इस उपन्यास का वह एक दृश्य कभी नहीं भूलता। कि  नायक जेल में है। उस की गर्भवती पत्नी उसे जेल में मिलती है और पूछती है कि तुम्हारे होने वाले बच्चे से तुम्हारी ओर से मैं क्या कहूंगी ? वह ख़ुश  हो कर कहता है , सुनो ,  मैं ने अपनी मातृभाषा के बारे में पता किया है। मुझे पता चल गया है कि  मेरी मातृभाषा क्या है ? लो यह सुनो और पैदा होते ही मेरे बेटे के कान में मेरी ओर से मेरी मातृभाषा के यह शब्द कहना। मोहनलाल भास्कर भी विवाह के कुछ महीने बाद ही अपनी गर्भवती पत्नी को छोड़ कर पाकिस्तान गए हुए हैं। जासूसी के लिए। एक गद्दार की गद्दारी से वह गिरफ़्तार हो जाते हैं। पर पाकिस्तान की विभिन्न जेलों में रहते हुए उन की चिंता में भी पत्नी और पैदा हो गया बेटा ही समाया रहता है। ‘आई वाज़ हिटलर्स मेड’ की पॉलिन कोलर का भी जेल में रहते हुए पहला और आख़िरी सपना पति और परिवार ही है।

इस डायरी की हमारी नायिका भी जेल में रहते हुए पति और बच्चों की फ़िक्र में ही हैरान और परेशान मिलती है। अपने दुःख और अपनी मुश्किलें भी वह बच्चों और पति की याद में ही जैसे विगलित करती रहती है। सोचिए कि वह जिस डासना जेल में है, उस जेल के पास से ही लखनऊ जाने वाली ट्रेन गुज़रती रहती है। जिस ट्रेन से उस का बेटा गुज़रता है, उस ट्रेन के गुज़रने के शोर में वह अपने बेटे की धड़कन को सहेजती मिलती है। कि बेटा लखनऊ जा रहा है। मेरे बगल से गुज़र रहा है। मां की संवेदना में भीग कर , उस के कलपने में डूब कर उस के मन का यह शोर ट्रेन के शोर से उस की गड़गड़ाहट से अचानक बड़ा हो जाता है, बहुत तेज़ हो जाता है। खो जाती है ट्रेन, उस का शोर, उस की गड़गड़ाहट। 

एक मां की इस आकुलता में डूब जाती हैं डासना जेल की दीवारें। मां-बेटे के इस मिलन को कोई भला किन शब्दों में बांच पाएगा ? बच्चों का कैरियर पति की मुश्किलें उसे मथती रहती हैं। बेटी के कॅरियर और विवाह को ले कर डायरी की इस नायिका की चिंताएं अथाह हैं। वहअपनी चिंताओं को विगलित करने के लिए अपने बच्चों को चिट्ठी लिखती है। चिट्ठी लिखते-लिखते वह जैसे डायरी लिखने लगती है। रोजनामचा लिखने लगती है। अपने आस-पास की दुनिया लिखने लगती है। लिखी थीं कभी पंडित नेहरु ने अपनी बेटी इंदु को जेल से चिट्ठियां। बहुत भावुक चिट्ठियां। महात्मा गांधी भी विभिन्न लोगों को जेल से चिट्ठियां लिखते थे। कमलापति त्रिपाठी की भी जेल से लिखी चिट्ठियां भी मन को बांध-बांध लेती हैं। लेकिन वह बड़े लोग थे। महापुरुष लोग थे। उन की चिंताओं का फलक बड़ा था , उन की लड़ाई बड़ी और व्यापक थी। लेकिन इस डायरी की नायिका एक जन सामान्य स्त्री है। निरपराध है। साजिशन फंसा दी गई है। उस की चिंता में सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने रोजमर्रा के छोटे-छोटे दुःख हैं। पति और बच्चे हैं। उन की चिंता है। दिखने में यह सब बातें बहुत छोटी और सामान्य दिखती हैं , लेकिन जिस पर गुज़रती है , उस के दिल से पूछिए। उस का यह दुःख उसे हिमालय लगता है। हिमालय से भी बड़ा।

और जेल की सहयात्री स्त्रियां? जेल बदल गई है , समय और यातनाएं बदल गई हैं लेकिन स्त्रियों का जीवन नहीं बदला है। जेल से बाहर भी वह कैद ही रहती हैं। कैदी जीवन उन का बाहर भी होता है। पर वह घर परिवार के बीच रह कर इस सच को भूल जाती हैं। तो महिला बैरक की स्त्रियों की कथा , उन की मनोदशा और दुर्दशा भी साझा करती रहती है हमारी डायरी की यह नायिका। जितनी सारी स्त्रियां , उतने सारे दुःख। जैसे दुःख न हो साझा चूल्हा हो। तमाम सारी स्त्रियों का टुकड़ा-टुकड़ा , भारी-भारी दुःख और ज़रा-ज़रा सा सुख , उस का कंट्रास्ट और कोलाज एक डाकिया बन कर , पोस्टमैन बन कर बांट रहा हूं मैं। स्नेहलता स्नेह का एक गीत याद आ रहा है , थोड़ी धूप , तनिक सी छाया , जीवन सारा का सारा। माया गोविंद ने लिखा है , जीना आया जब तलक तो ज़िंदगी फिसल गई। नीरज ने लिखा है , कारवां गुज़र गया , ग़ुबार देखते रहे। हमारी डायरी की यह नायिका भी जेल जीवन में गाती रहती थी और अब बताती रहती है कि यह डायरी लिख कर ही मैं ज़िंदा रह पाई थी जेल में। नहीं ज़िंदा कहां थी , मैं तो मर-मर गई थी। विश्वनाथ प्रताप सिंह की ही एक कविता है झाड़न :

पड़ा रहने दो मुझे
झटको मत
धूल बटोर रखी है
वह भी उड़ जाएगी।

लेकिन इस डायरी ने झाड़न चला दी है। जेल जीवन जी रही औरतों पर पड़ी धूल की मोटी परत उड़ गई है। इस धूल से हो सके तो बचिए। क्यों कि औरतों की दुनिया तो बदल रही है। यह डायरी उसे और बदलेगी। सरला माहेश्वरी की यह कविता ऐसे ही पढ़ी और लिखी जाती रहेंगी :

8150 दिन !

-सरला माहेश्वरी

जेल में
8150 दिन !
23 वर्ष !
प्रतीक्षा के तेइस वर्ष !
बेगुनाह साबित होने की प्रतीक्षा के तेइस वर्ष !
जेल के अंदर
एक बीस वर्ष के छात्र के तैंतालीस वर्ष में बदलने के तेइस वर्ष…!!
एक ज़िंदगी के ज़िंदा लाश में बदलने के तेइस वर्ष…!!!
दो बेगुनाह बेटों की
प्रतीक्षा में रोज़ मरते परिवार के तेइस वर्ष !!!
भाषा, शक्ति, बल, छल के तेइस वर्ष !
बोलने के नहीं
बोलने को थोपने के तेइस वर्ष !
बोलने की ग़ुलामी के तेइस वर्ष !
आज़ादी के पाखंड के तेइस वर्ष !
निर्बल और निर्दोष को
बलि का बकरा बनाये जाने के
सत्ता के सनातन समय के
सनातन सत्य के सनातन तेइस वर्ष !
ओह निसार ! ओह ज़हीर ! ओह सरबजीत !
प्रतीक्षा और प्रतीक्षा !
नहीं छूटती…
ज़िंदगी की प्रतीक्षा !
प्रेम की प्रतीक्षा !!
मुक्ति की प्रतीक्षा !!!
नई सुबह की प्रतीक्षा !!!!
प्रतीक्षा को चाहिये कई ज़िंदगियाँ….!!!!!

– दयानंद पांडेय

[जनवाणी प्रकाशन, दिल्ली से शीघ्र प्रकाश्य ‘एक अनाम और निरपराध औरत की जेल डायरी’ की भूमिका]

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अरसे बाद कोई पढ़ा-लिखा और समझदार पत्रकार केंद्रीय मंत्रिमंडल में आया है

Dayanand Pandey : अरसे बाद कोई पढ़ा-लिखा और समझदार पत्रकार केंद्रीय मंत्रिमंडल में आया है। नाम है एम जे अकबर। इस के पहले मेरी याद में पढ़े-लिखे पत्रकारों में से केंद्रीय मंत्रिमंडल में कमलापति त्रिपाठी थे। अटल बिहारी वाजपेयी थे। लालकृष्ण आडवाणी थे। अरुण शौरी थे। अटल बिहारी वाजपेयी तो प्रधान मंत्री भी रहे। बीच-बीच में कुछ दलाल पत्रकार भी मंत्री बने हैं। लेकिन उन दलालों का यहां ज़िक्र कर काहे को ज़ायका ख़राब किया जाए।

अपने समय के सब से युवा संपादक रहे एम जे अकबर का भारतीय पत्रकारिता में बहुत बड़ा रोल है। कभी इलस्ट्रेटेड वीकली में खुशवंत सिंह की टीम में रहे अकबर पैतीस साल की उम्र में संडे के संपादक बने थे। तब संडे का सिक्का चलता था। जल्दी ही उन्होंने हिंदी में रविवार भी निकाला और हिंदी पत्रकारिता की धारा, रुख और तेवर बदल दिया। टेलीग्राफ़ निकाला और अंगरेजी अख़बारों की रंगत बदल दी। एशियन एज और इंडिया टुडे में भी रहे।

वह बिहार से चुनाव लड़ कर कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा में भी रहे हैं। अब भाजपा के मार्फ़त राज्यसभा में हैं। अकबर एक समय खालिश सेक्यूलर पत्रकार थे, भाजपा को बाक़ायदा कंडम करते हुए। पर अब खांटी भाजपाई हैं। भाजपा के प्रवक्ता भी रहे हैं। अपनी आत्मकथा के लिए भी चर्चित रहे अकबर अपने पुरखों को हिंदू बता चुके हैं। इनकी पत्नी भी हिंदू हैं। अकबर विदेश राज्य मंत्री बन गए हैं। काश कि कैबिनेट मंत्री बनाए गए होते। फिर भी बहुत बधाई एम जे अकबर, हार्दिक बधाई!

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से.

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मीडिया मालिकों ने मुख्यमंत्री से लगायत अदालत तक को ख़रीद रखा है, सुप्रीम कोर्ट तक इससे बरी नहीं है

Dayanand Pandey : आज की तारीख़ में लगभग सभी मीडिया संस्थानों में ज़्यादातर पत्रकार या तो अनुबंध पर हैं या बाऊचर पेमेंट पर। कोई दस लाख, बीस लाख महीना पा रहा है तो कोई तीन हज़ार, पांच हज़ार, बीस हज़ार, पचास हज़ार भी। जैसा जो बार्गेन कर ले। बिना किसी पारिश्रमिक के भी काम करने वालों की लंबी कतार है। लेकिन बाकायदा नियुक्ति पत्र अब लगभग नदारद है, जिस पर मजीठिया सिफ़ारिश की वैधानिक दावेदारी बने। फिर भी कुछ भाई लोग सोशल साईट से लगायत सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया की लड़ाई लड़ रहे हैं। जाने किसके लिए।

देश में श्रम क़ानून का कहीं अता पता नहीं है। मीडिया हाऊसों में भी नहीं। वैसे भी श्रम विभाग अब नियोक्ताओं के पेरोल पर होते हैं। ट्रेड युनियन पहले दलाल बनीं फिर समाप्त हो गईं। अब उनका कोई नामलेवा नहीं है। इंकलाब जिंदाबाद अब सपना है। मीडिया मालिकों ने मुख्यमंत्री से लगायत अदालत तक को ख़रीद रखा है। सुप्रीम कोर्ट तक इस से बरी नहीं है। मंहगे वकील और तारीख़ देने की नौटंकी अलग है। दुनिया भर को ज्ञान बांटने वाले पत्रकार ख़ुद को ज्ञान देना भूल गए हैं। सच देखना भूल गए हैं। वैसे भी अब तकरीबन नब्बे प्रतिशत पत्रकार दलाली में अभ्यस्त हैं। अजीठिया मजीठिया की उन को कोई परवाह नहीं। मजीठिया पर लड़ाई फिर भी जारी है। हंसी आती है यह लड़ाई देख कर और नीरज के दो शेर याद आते हैं…

हम को उस वैद्य की विद्या पर तरस आता है
जो भूखे नंगों को सेहत की दवा देता है

चील कौवों की अदालत में है मुजरिम कोयल
देखिए वक्त भला क्या फ़ैसला देता है

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार दयानंद पांडेय के फेसबुक वॉल से.

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अब सेक्यूलरिज़्म के दूसरे सूरमा प्रणव राय पर भी बन आई है…

: भारतीय पत्रकारिता में सेक्यूलरिज्म का तड़का और उस का यह हश्र : विजय माल्या और प्रणव राय की गलबहियां : भारतीय पत्रकारिता में सेक्यूलरिज्म का तड़का भी अजीबोगरीब स्थितियां पेश कर देता है। क़िस्से तो बहुतेरे हैं पर अभी दो लोगों को याद कीजिए। एक तुर्रम खां हैं तहलका के तरुण तेजपाल जो अर्जुन सिंह द्वारा दिए गए सरकारी अनुदान से वाया तहलका सेक्यूलर चैम्पियन बने। फिर जल्दी ही वह कुख्यात माफ़िया पोंटी चड्ढा की गोदी में जा गिरे और देखते-देखते अरबों में खेलने लगे।

बीते दिनों अपनी बेटी की उम्र की अपनी एक कर्मचारी के साथ गोवा में सरेआम दुराचार पर आमादा हो गए। वह भागती रही और यह उसे पूरे होटल में दौड़ाते रहे। मदिरा में धुत्त हो कर। जेल गए और सेक्यूलरिज्म के सीन से फरार हो गए। कांग्रेस ने कहा कि भाजपा ने जान-बूझ कर फंसाया है। एनडीटीवी पर तब रवीश कुमार ने भी तरुण तेजपाल की ख़ूब पैरोकारी की थी, प्रणव राय के नेतृत्व में। लेकिन अब सेक्यूलरिज़्म के इन्हीं दूसरे सूरमा प्रणव राय पर भी बन आई है । कई सारे मामलों में फंसते जा रहे हैं।

टटका मामला विजय माल्या की गीदड़ भभकी का है। भारत से भागने के बाद विजय माल्या ने लंदन से ट्विट कर के भारतीय पत्रकारिता के संपादकों को धमकाया है कि मेरे बारे में उलटा सीधा लिखा तो सब को एक्सपोज कर दूंगा। तो क्या यह धमकी प्रणव राय के लिए थी? विजय माल्या और प्रणय राय की दो फ़ोटो वायरल हुई है। प्रणव राय के और भी कई मामले सामने आ रहे हैं। मनी लांड्रिंग, फेरा सहित और भी आरोप लग गए हैं। दिलचस्प यह कि एक राजनीतिक सेक्यूलर सूरमा और पूर्व प्रधान मंत्री एच डी देवगौड़ा ने भी माल्या की तरफदारी करते हुए लगभग माल्या के ट्वीट को दुहराया है कि माल्या भगोड़ा नहीं हैं, भागे नहीं हैं। और कि वह कर्नाटक की माटी के लाल हैं।

तो क्या माल्या के पैसे ने पत्रकारों सहित देवगौड़ा को भी ख़रीद लिया है? हमें तो माल्या के उस ट्वीट का इंतज़ार है जिस में वह देश की संसद को धमकाएगा कि मेरे मामले में संसद में बहुत मत बोलो, चुप रहो, नहीं तो एक-एक की पोल खोल दूंगा। माल्या ऐसी धमकी बैंक के चेयरमैनों और जजों को भी सकता है कि चुप रहो नहीं तो तुम्हारी पोल खोल दूंगा। सबके डॉक्यूमेंट्री प्रूफ़ हैं मेरे पास। क्यों कि सच यह है कि मनी में पावर बहुत है। मनी पावर मसल पावर से बड़ा है। पूरे सिस्टम को वह ख़रीद चुका है। संसद, मीडिया, अदालत, अफ़सर सबको।

लेखक दयानंद पांडेय लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं.

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कन्हैया कुमार की तरह नरेंद्र मोदी पर ऐसा बड़ा हमला अभी तक कोई भी नहीं कर पाया था

कामरेड कन्हैया में लेकिन आग बहुत है। और लासा भी। ललक और लोच भी बहुत है। लेकिन कुतर्क की तलवार भी तेज़ हो गई है। वह जेल से जे एन यू लौट आए हैं। जैसे आग में लोहा तप कर आया हो। जैसे सोना कुंदन बन कर आया हो। जे एन यू में बोल गए हैं धारा प्रवाह। कोई पचास मिनट। आधी रात में। तेवर तल्ख़ हैं। उम्मीद बहुत दिखती है इस कामरेड में। लोकसभा में बस पहुंचना ही चाहता है। वक्ता भी ग़ज़ब का है। बस हार्दिक पटेल याद आता है। उस का हश्र याद आता है। फिसलना मत कामरेड।

डगर कठिन ही नहीं, चिकनी भी बहुत है। नेक्स्ट लालू प्रसाद यादव की भी गंध आती है बोलने के लबो लहजे में। हंसगुल्ले वाली बात भी बहुत है। हरिशंकर परसाई के व्यंग्य की ताप और धार भी। तोड़ने ही होंगे मठ और गढ़ जैसी मुक्तिबोध की कविता की आंच और कालिदास की कविता की करुणा भी। नरेंद्र मोदी की तरह का स्टोरी टेलर भी है कन्हैया के भीतर। अबकी बार हमले में भावनात्मक सादगी भी है। मां की याद है, ममत्व है, मां की बात है। मुक़ाबला तगड़ा ही नहीं, बहुत महीन भी है। सिपाही है, सिपाही की लाचारी है। और सबसे ऊपर जेएनयू का मान और स्वाभिमान है। लहराता तिरंगा है। तिरंगे के नीचे हुंकार भरी ललकार है।

देशद्रोह का कार्ड डिस्कार्ड हो गया है। जे एन यू में भारी भीड़ के बीच आज कन्हैया के भाषण के दौरान तिरंगा हमला लहराया। कामरेड ही नहीं, जेएनयू भी बहुत बदल गया है। लाल सलाम की यह आग नरेंद्र मोदी, भाजपा और संघ के लिए तेजाबी हमला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अभी तक का यह सब से बड़ा हमलावर भाषण है कामरेड कन्हैया का। राहुल गांधी तो लतीफ़ा हैं लेकिन अरविंद केजरीवाल, सोनिया गांधी, नीतीश कुमार जैसे लोग भी कन्हैया कुमार के आगे मोदी विरोध और मोदी विरोधी भाषण में बहुत पीछे हो गए हैं। कन्हैया कुमार की तरह नरेंद्र मोदी पर ऐसा बड़ा हमला अभी तक कोई भी नहीं कर पाया था। नरेंद्र मोदी को आज नींद नहीं आएगी, यह पक्का है। कोई ज़मीनी आदमी पहली बार उन पर चढ़ाई कर गया है। अब उनके सामने कोई राहुल गांधी नाम का पप्पू टाईप लतीफ़ा नहीं, कामरेड कन्हैया कुमार जैसा शेर है।

लेखक दयानंद पांडेय लखनऊ के वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं.

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बिना प्रणव राय की मर्जी के रवीश कुमार एनडीटीवी में सांस भी ले सकते हैं?

: सच यह है कि रवीश कुमार भी दलाल पथ के यात्री हैं : ब्लैक स्क्रीन प्रोग्राम कर के रवीश कुमार कुछ मित्रों की राय में हीरो बन गए हैं। लेकिन क्या सचमुच? एक मशहूर कविता के रंग में जो डूब कर कहूं तो क्या थे रवीश और क्या हो गए हैं, क्या होंगे अभी! बाक़ी तो सब ठीक है लेकिन रवीश ने जो गंवाया है, उसका भी कोई हिसाब है क्या? रवीश कुमार के कार्यक्रम के स्लोगन को ही जो उधार ले कर कहूं कि सच यह है कि ये अंधेरा ही आज के टीवी की तस्वीर है! कि देश और देशभक्ति को मज़ाक में तब्दील कर दिया गया है। बहस का विषय बना दिया गया है। जैसे कोई चुराया हुआ बच्चा हो देशभक्ति कि पूछा जाए असली मां कौन?  रवीश कुमार एंड कंपनी को शर्म आनी चाहिए।

आपको क्या लगता है कि बिना प्रणव राय की मर्जी के रवीश कुमार एनडीटीवी में सांस भी ले सकते हैं?  एक समय था कि इंडियन एक्सप्रेस में अरुण शौरी का बड़ा बोलबाला था। उनकी न्यूज़ स्टोरी बड़ा हंगामा काटती रहती थीं। बाद के दिनों में वह जब इंडियन एक्सप्रेस से कुछ विवाद के बाद अलग हुए तो एक इंटरव्यू में डींग मारते हुए कह गए कि मैं अपनी स्टोरी के लिए कहीं जाता नहीं था, स्टोरी मेरी मेज़ पर चल कर आ जाती थी। रामनाथ गोयनका से पूछा गया अरुण शौरी की इस डींग के बारे में तो गोयनका ने जवाब दिया कि अरुण शौरी यह बात तो सच बोल रहा है क्योंकि उसे सारी स्टोरी तो मैं ही भेजता था, बस वह अपने नाम से छाप लेता था। अब अरुण शौरी चुप थे।

लगभग हर मीडिया संस्थान में कोई कितना बड़ा तोप क्यों न हो उस की हैसियत रामनाथ गोयनका के आगे अरुण शौरी जैसी ही होती है। बड़े-बड़े मीडिया मालिकान ख़बरों के मामले में एडीटर और एंकर को डांट कर डिक्टेट करते हैं। हालत यह है कि कोई कितना बड़ा तोप एडीटर भी नगर निगम के एक मामूली बाबू के ख़िलाफ़ ख़बर छापने की हिमाकत नहीं कर सकता अगर मालिकान के हित वहां टकरा गए हैं। विनोद मेहता जब पायनियर के चीफ़ एडीटर थे तब उन्हें एलएम थापर ने दिल्ली नगर निगम के एक बाबू के ख़िलाफ़ ख़बर छापने के लिए रोक दिया था। सोचिए कि कहां थापर, कहां नगर निगम का बाबू और कहां विनोद मेहता जैसा एडीटर! लेकिन यह बात विनोद मेहता ने मुझे ख़ुद बताई थी। तब मैं भी पायनियर के सहयोगी प्रकाशन स्वतंत्र भारत में था। मैं इंडियन एक्सप्रेस के सहयोगी प्रकाशन जनसत्ता में भी प्रभाष जोशी के समय में रहा हूं। इंडियन एक्सप्रेस, जनसत्ता के भी तमाम सारे ऐसे वाकये हैं मेरे पास। पायनियर आदि के भी। पर यहां बात अभी क्रांतिकारी बाबू रवीश कुमार की हो रही है तो यह सब फिर कभी और।

अभी तो रवीश कुमार पर। वह भी बहुत थोड़ा सा। विस्तार से फिर कभी। रवीश कुमार प्रणव राय के पिंजरे के वह तोता हैं जो उन के ही एजेंडे पर बोलते और चलते हैं। इस बात को इस तरह से भी कह सकते हैं कि प्रणव राय निर्देशक हैं और रवीश कुमार उनके अभिनेता। प्रणव राय इन दिनों फेरा और मनी लांड्रिंग जैसे देशद्रोही आरोपों से दो चार हैं। आप यह भी भूल रहे हैं कि प्रणव राय ने नीरा राडिया के राडार पर सवार रहने वाली बरखा दत्त जैसे दलाल पत्रकारों का रोल माडल तैयार कर उन्हें पद्मश्री से भी सुशोभित करवाया है। अब वह दो साल से रवीश कुमार नाम का एक अभिनेता तैयार कर उपस्थित किए हुए हैं। ताकि मनी लांड्रिंग और फेरा से निपटने में यह हथियार कुछ काम कर जाए।

रवीश कुमार ब्राह्मण हैं पर उनकी दलित छवि पेंट करना भी प्रणव राय की स्कीम है। रवीश दलित और मुस्लिम कांस्टिच्वेन्सी को जिस तरह बीते कुछ समय से एकतरफा ढंग से एड्रेस कर रहे हैं उससे रवीश कुमार पर ही नहीं मीडिया पर भी सवाल उठ गए हैं। रवीश ही क्यों रजत शर्मा, राजदीप सरदेसाई, सुधीर चौधरी, दीपक चौरसिया आदि ने अब कैमरे पर रहने का, मीडिया में रहने का अधिकार खो दिया है, अगर मीडिया शब्द थोड़ा बहुत शेष रह गया हो तो। सच यह है कि यह सारे लोग मीडिया के नाम पर राजनीतिक दलाली की दुकान खोल कर बैठे हैं। इन सबकी राजनीतिक और व्यावसायिक प्रतिबद्धताएं अब किसी से छुपी नहीं रह गई हैं। यह लोग अब गिरोहबंद अपराधियों की तरह काम कर रहे हैं। कब किस को उठाना है, किस को गिराना है मदारी की तरह यह लोग लगे हुए हैं। ख़ास कर प्रणव राय जितना साफ सुथरे दीखते हैं, उतना हैं नहीं।

अव्वल तो यह सारे न्यूज चैनल लाइसेंस न्यूज चैनल का लिए हुए हैं लेकिन न्यूज के अलावा सारा काम कर रहे हैं। चौबीस घंटे न्यूज दिखाना एक खर्चीला और श्रम साध्य काम है। इस लिए यह चैनल भडुआगिरी पर आमादा हैं।  दिन के चार-चार घंटे मनोरंजन दिखाते हैं। रात में भूत प्रेत, अपराध कथाएं दिखाते हैं। धारावाहिकों और सिनेमा के प्रायोजित कार्यक्रम , धर्म ज्योतिष के पाखंडी बाबाओं की दुकानें सजाते हैं। और प्राइम टाइम में अंध भक्ति से लबालब  विचार और बहस दिखाते हैं। देश का माहौल बनाते-बिगाड़ते हैं। और यहीं प्रणव राय जैसे शातिर, रजत शर्मा जैसे साइलेंट आपरेटर अपना आपरेशन शुरू कर देते हैं। फिर रवीश कुमार जैसे जहर में डूबे अभिनेता, राजदीप सरदेसाई जैसे अतिवादी, सुधीर चौधरी जैसे ब्लैकमेलर, अभिज्ञान प्रकाश जैसे डफर, दीपक चौरसिया जैसे दलाल, चीख़-चीख़ कर बोलने वाले अहंकारी अर्नब गोस्वामी जैसे बेअदब लोग सब के ड्राईंग रूम, बेड रूम में घुस कर मीठा और धीमा जहर परोसने लगते हैं।

लेकिन सरकार इतनी निकम्मी और डरपोक है कि मीडिया के नाम पर इस कमीनगी के बारे में पूछ भी नहीं सकती। कि अगर आप ने साईकिल बनाने का लाईसेंस लिया है तो जहाज कैसे बना रहे हैं?  ट्यूब बनाने का लाईसेंस लिया है तो टायर कैसे बना रहे हैं। दूसरे, अब यह स्टैब्लिश फैक्ट है कि सिनेमा और मीडिया खुले आम नंबर दो का पैसा नंबर एक का बनाने के धंधे में लगे हुए हैं । तीसरे ज़्यादातर मीडिया मालिक या उनके पार्टनर या तो बिल्डर हैं या चिट फंड के कारोबारी हैं। इनकी रीढ़ कमज़ोर है। लेकिन सरकार तो बेरीढ़ है । जो इन से एक फार्मल सवाल भी कर पाने की हैसियत नहीं रखती।  सरकार की इसी कमज़ोरी का लाभ ले कर यह मीडिया पैसा कमाने के लिए देशद्रोह और समाजद्रोह पर आमादा है। रवीश कुमार जैसे लोग इस समाजद्रोह के खलनायक और वाहक हैं । लेकिन उन की तसवीर नायक की तरह पेश की जा रही है। रवीश कुमार इमरजेंसी जैसा माहौल बता रहे हैं। पहले असहिष्णुता बताते रहे थे। असहिष्णुता और इमरजेंसी उन्होंने देखी नहीं है। देखे होते तो मीडिया में थूक नहीं निकलता, बोलना तो बहुत दूर की बात है। हमने देखा है इमरजेंसी का वह काला चेहरा। वह दिन भी देखा है जब खुशवंत सिंह जैसा बड़ा लेखक और उतना ही बड़ा संजय गांधी का पिट्ठू पत्रकार इलस्ट्रटेटेड वीकली में कैसे तो विरोध के बिगुल बजा बैठा था। अपनी सुविधा, अपना पॉलिटिकल कमिटमेंट नहीं, मीडिया की आत्मा को देखा था। रवीश जैसे लोग क्या देखेंगे अब? इंडियन एक्सप्रेस ने संपादकीय पेज को ख़ाली छोड़ दिया था। खैर वह सब और उस का विस्तार भी अभी यहां मौजू नहीं है।

बैंक लोन के रूप में आठ लाख करोड़ रुपए कार्पोरेट कंपनियां पी गई हैं। सरकार कान में तेल डाले सो रही है। किसानों की आत्म हत्या, मंहगाई, बेरोजगारी, कार्पोरेट की बेतहाशा लूट पर रवीश जैसे लोगों की, मीडिया की आंख बंद क्यों है। मीडिया इंडस्ट्री में लोगों से पांच हज़ार दो हज़ार रुपए महीने पर भी कैसे काम लिया जा रहा है? नीरा राडिया के राडार पर इसी एनडीटीवी की बरखा दत्त ने टू जी स्पेक्ट्रम में कितना घी पिया, है रवीश कुमार के पास हिसाब? कोयला घोटाला भी वह इतनी जल्दी क्यों भूल गए हैं। रवीश किस के कहे पर कांग्रेस और आप की मिली जुली सरकार बनाने की दलाली भरी मीटिंग अपने घर पर निरंतर करवाते रहे? बताएंगे वह? रवीश के बड़े भाई को बिहार विधान सभा में कांग्रेस का टिकट क्या उनकी सिफ़ारिश पर ही नहीं दिया गया था? अब वह इस भाजपा विरोधी लहर में भी हार गए यह अलग बात है। लेकिन इन सवालों पर रवीश कुमार ख़ामोश हैं। उन के सवाल चुप हैं।

अब ताज़ा-ताज़ा गरमा-गरम जलेबी वह जे एन यू में लगे देशद्रोही नारों पर छान रहे हैं। जनमत का मजाक उड़ा रहे हैं। देश को मूर्ख बना रहे हैं। हां, रवीश के सवाल जातीय और मज़हबी घृणा फैलाने में ज़रूर सुलगते रहते हैं। कौन जाति हो? उन का यह सवाल अब बदबू मारते हुए उनकी पहचान में शुमार हैं। जैसे वह अभी तक पूछते रहे हैं कि कौन जाति हो? इन दिनों पूछ रहे हैं, देशभक्त हो? गोया पूछ रहे हों तुम भी चोर हो? दोहरे मापदंड अपनाने वाले पत्रकार नहीं, दलाल होते हैं। माफ़ कीजिए रवीश कुमार आप अब अपनी पहचान दलाल पत्रकार के रूप में बना चुके हैं। दलाली सिर्फ़ पैसे की ही नहीं होती, दलाली राजनीतिक प्रतिबद्धता की भी होती है। सुधीर चौधरी और दीपक चौरसिया जैसे लोग पैसे की दलाली के साथ राजनीतिक दलाली भी कर रहे हैं। आप राजनीतिक दलाली के साथ-साथ अपने एनडीटीवी के मालिक प्रणव राय की चंपूगिरी भी कर रहे हैं। और जो नहीं कर रहे हैं तो बता दीजिए न अपनी विष बुझी हंसी के साथ किसी दिन कि प्रणव राय और प्रकाश करात रिश्ते में साढ़ू  लगते हैं। हैS हैS ऊ अपनी राधिका भाभी हैं न, ऊ वृंदा करात बहन जी की बहन हैं। हैS हैS, हम भी क्या करें?

सच यह है कि जो काम, जो राजनीतिक दलाली बड़ी संजीदगी और सहजता से बिना लाऊड हुए रजत शर्मा इंडिया टीवी में कर रहे हैं, जो काम आज तक पर राजदीप सरदेसाई कर रहे हैं, जो काम ज़ी न्यूज़ में सुधीर चौधरी, इण्डिया न्यूज़ में दीपक चौरसिया आदि-आदि कर रहे हैं, ठीक वही काम, वही राजनीतिक दलाली प्रणव राय की निगहबानी में रवीश कुमार जहरीले ढंग से बहुत लाऊड ढंग से एनडीटीवी में कर रहे हैं। हैं यह सभी ही राजीव शुक्ला वाले दलाल पथ पर। किसी में कोई फर्क नहीं है। है तो बस डिग्री का ही।

निर्मम सच यह है कि रवीश कुमार भी दलाल पथ के यात्री हैं। अंतिम सत्य यही है। आप बना लीजिए उन्हें अपना हीरो, हम तो अब हरगिज़ नहीं मानते। अलग बात है कि हमारे भी कभी बहुत प्रिय थे रवीश कुमार तब जब वह रवीश की रिपोर्ट पेश करते थे। सच हिट तो सिस्टम को वह तब करते थे। क्या तो डार्लिंग रिपोर्टर थे तब वह। अफ़सोस कि अब क्या हो गए हैं! कि अपनी नौकरी की अय्यासी में, अपनी राजनीतिक दलाली में वह देशभक्त शब्द की तौहीन करते हुए पूछते हैं देशभक्ति होती क्या है? आप तय करेंगे? आदि-आदि। जैसे कुछ राजनीतिज्ञ बड़ी हिकारत से पूछते फिर रहे हैं कि यह देशभक्ति का सर्टिफिकेट क्या होता है?

लेखक दयानंद पांडेय लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं.

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अख़बारों-मैग्जीनों में छपने वाला साल का साहित्यिक आकलन मालिश पुराण के सिवा कुछ भी नहीं

Dayanand Pandey : अख़बारों और पत्रिकाओं में छपने वाला साल का साहित्यिक आकलन के नाम पर मालिश पुराण चार सौ बीसी के सिवा कुछ भी नहीं है। जैसे न्यूज चैनल न्यूज दिखाने की जगह चार ठो पैनलिस्ट बैठा कर चीखते -चिल्लाते आप का समय नष्ट करते हैं, अपना धंधा चोखा करते हैं। वैसे ही यह साहित्य के रैकेटियर कुछ लोगों की चरण वंदना करते हैं। यह किताबों की चर्चा नहीं करते, चेहरे की चर्चा करते हैं। नाम जानते हैं यह, काम नहीं।

साहित्य का भी कहीं कोई बही खाता होता है भला जो आप शुभ लाभ ले कर बैठ जाते हैं। नंबर एक और नंबर दो की बहियां ले कर। यह कोई रेस है कि फर्स्ट कौन आया और सेकेंड कौन? बताने आप बैठ जाते हैं। इन बेईमानों की, इन चोरों की दस साल की बही जांच लीजिए, इन की उन सूचियों पर नज़र डाल लीजिए जिनको इन्होंने महान घोषित किया था, उन सूचियों में शामिल लेखकों और किताबों की क्या दुर्गति हुई है, वह लोग कहां और कौन सा तेल बेच रहे हैं, आप जान जाएंगे।

इन चोरों से यह भी पूछा जाना चाहिए कि प्रकाशक जब किताबों की दुकानों पर ज़्यादातर किताब रखते ही नहीं तो तुम को यह किताबें मिलती कहां से हैं? और साल में कितने हज़ार की किताब ख़रीदते हो? और फिर इनमें से पढ़ते कितनी हो? यह साल का आकलन बहुत बड़ा फ्राड है।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय के फेसबुक वॉल से.

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जिन सब्जियों का यह पीक सीज़न है, उनका भी दाम आसमान पर, जियो रजा हुक्मरानों… खूब लूटो!

Dayanand Pandey :  हरी मटर पचास रुपए किलो, टमाटर चालीस रुपए किलो, गोभी तीस रुपए पीस, पत्ता गोभी बीस रुपए, पालक चालीस रुपए किलो, बथुआ चालीस रुपए किलो, चना साग अस्सी रुपए किलो। इन सब्जियों का यह पीक सीज़न है। फिर लहसुन दो सौ रुपए किलो। फल और दाल तेल तो अय्यासी थी ही, अब लौकी, पालक आदि भी खाना अय्यासी हो गई है। जियो रजा हुक्मरानों! ख़ूब जियो और ख़ूब लूटो! दूधो नहाओ, पूतो फलो! यहां तो किसी संयुक्त परिवार में रोज के शाम के नाश्ते में मटर की घुघरी और भोजन में निमोना नोहर हो गया है। हम लखनऊ में रहते हैं। यहीं का भाव बता रहे हैं। अब कोई मुफ़्त में ही खा रहा है या कम भाव में, तो खाए। अपनी बला से। हमें क्या?

अब इन मूर्ख शिरोमणियों का भी क्या करें जो समझते हैं कि फल, सब्जी और अनाज मंहगा होता है तो बढ़ा पैसा किसान की जेब में जाता है। मूर्खों, नासमझो यह किसान तो सर्वदा कंगाल रहता है। अनाज या सब्जी एक हज़ार रुपए किलो भी बिके तो भी उसे उस की लागत मिलनी मुहाल है। यह सारी मंहगाई और उस का मज़ा बिचौलिए, अफ़सर और सत्तानशीं उठाते हैं। शरद पावर जैसे कृषि माफ़िया उठाते हैं। वायदा कारोबार के कारोबारी उठाते हैं।

आप की समझ में यह सीधी सी बात क्यों नहीं आती कि आलू हो, टमाटर हो या गेहूं, चावल पूरे देश में एक भाव कैसे बिकने लगा है? क्या यह बाटा का जूता है कि वुडलैंड का जैकेट कि रेमंड का कपड़ा कि कोई दवा या फ्रिज टी वी या कार, स्कूटर कि पूरे देश में एक एमआरपी लागू है? मूर्खों किसान और नागरिक सभी बेभाव लुट रहे हैं। लूटने वाले लुटेरे मुट्ठी भर ही हैं। दिमाग का जाला साफ करो मूर्खों। किसान तो ख़ुद मंहगाई की आग में झुलसता रहता है, वह भला क्या किसी को मंहगाई में झुलसाएगा।

वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय के फेसबुक वॉल से.

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हिंदी की फ़ासिस्ट और तानाशाह आलोचना ने जाने कितने रामदरश मिश्र मारे हैं

हिंदी की फ़ासिस्ट और तानाशाह आलोचना ने जाने कितने रामदरश मिश्र मारे हैं ।  लेकिन रचना और रचनाकार नहीं मरते हैं । मर जाती है फ़ासिस्ट आलोचना । मर जाते हैं फ़ासिस्ट लेखक ।  बच जाते हैं रामदरश मिश्र । रचा ही बचा रह जाता है । रामदरश मिश्र ने यह ख़ूब साबित किया है । बार-बार किया है । इसी लिए रामदरश मिश्र को आज साहित्य अकादमी मिलने पर मैं गर्व और हर्ष से भर गया हूं। इस लिए भी कि वह हिंदी के तो हैं ही , हमारे गोरखपुर के हैं । हमारे गांव के पास ही उन का गांव है डुमरी। पैतीस साल से अधिक समय से उन के स्नेह का भागीदार हूं। गोरखपुर के दूसरे लेखक हैं रामदरश मिश्र जिन्हें साहित्य अकादमी सम्मान मिला है । इस के पहले रघुपति सहाय फिराक़ को यह सम्मान मिला था । फिराक़ गोरखपुरी का गांव भी मेरे गांव के पास है।

फ़िराक़ साहब तो अपने गांव आना-जाना एक समय छोड़ बैठे थे पर रामदरश जी , अब भी अपने गांव आते-जाते रहते हैं । उन की आत्मकथा में , उन की  रचनाओं में उन का गांव और जवार सर्वदा उपस्थित मिलता रहता है । साहित्य अकादमी सम्मान भले उन को आज देर से मिला है पर डुमरी गांव भी यह ख़बर सुन कर ज़रूर झूम गया होगा । हालां कि अब साहित्य अकादमी के वह मुहताज नहीं रह गए थे तो भी सम्मान , सम्मान होता है । इस लिए भी मन सुरूर से भर जाता है । उन का ही एक शेर है , जो आज की तारीख़ में उन पर बहुत मौजू है :

जहां आप पहुंचे छलांगें  लगा कर 
वहां मैं भी पहुंचा  मगर धीरे-धीरे

मेरी जानकारी में रामदरश मिश्र पहले ऐसे लेखक हैं जिन को बानबे वर्ष की उम्र में साहित्य अकादमी मिला है । इतनी उम्र तक तो लोग जीवित भी नहीं रहते । बहुत कम लोगों को यह उम्र नसीब होती है । लेकिन उन की उम्र की तरह उन की उपेक्षा का जाल भी बहुत बड़ा है । विपुल और समृद्ध रचना संसार के बावजूद इतनी लंबी उपेक्षा भी एक यातना है । लेकिन रामदरश मिश्र ने अपनी जुबान पर कभी यह दर्द नहीं रखा । यातना की यह दास्तां नहीं कही । किसी भी से । न मौखिक , न लिख कर । अपनी आत्मकथा में भी नहीं ।  लगभग सभी विधाओं में उन्हों ने लिखा है । और श्रेष्ठ लिखा है । नामवर सिंह और रामदरश मिश्र बनारस हिंदू विश्विद्यालय में सहपाठी भी रहे हैं और सहकर्मी भी । साथ-साथ पढ़े और पढ़ाया। दोनों ही आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शिष्य हैं । लेकिन नामवर सिंह ने भी कभी रामदरश मिश्र के नाम पर सांस नहीं ली । और जब नामवर ने सांस नहीं ली तो बाक़ी लोग भी कैसे और क्यों लेते ? कहा न कि हिंदी की फ़ासिस्ट आलोचना ने जाने कितने रामदरश मिश्र मारे हैं । इतनी कि अब हिंदी आलोचना ही मर मर गई है । आलोचना नाम की संस्था ही समाप्त हो गई है । रैकेटियर लेखकों और रैकेटियर आलोचकों की खेमेबाज़ी ने रचना और रचनाकार का ही नहीं , हिंदी साहित्य का भी बहुत नुकसान किया है । पाठकों को दीमक की तरह खा लिया है । अपनी सनक , ज़िद और तानाशाही में लेखक-पाठक संबंध समाप्त कर दिया है । अब तो आलम यह है कि ख़ुद ही लिखते हैं , ख़ुद ही पढ़ते हैं । इस दुखद मंज़र पर मृणाल पांडे ने लिखा ही है ; ‘खुद ही लिख्या था, खुदै छपाये, खुदै उसी पर बोल्ये थे।’ लेकिन रामदरश मिश्र इस ज़मीन को तोड़ते हैं । तोड़ते ही रहते हैं । जैसे उन का रचना संसार समृद्ध है , पाठक परिवार भी उन का उतना ही समृद्ध और पुष्ट है ।

जानना यह भी दिलचस्प होगा कि 2010-2011 में ही रामदरश मिश्र को साहित्य अकादमी मिलना था । लेकिन अशोक वाजपेयी की मनमानी ने उदय प्रकाश को साहित्य अकादमी दे दिया । तब जब कि किसी कहानी पर साहित्य अकादमी देने की परंपरा  नहीं रही है । मोहनदास कहानी है , जो हंस में लंबी  कहानी रूप में छपी हुई है । लेकिन लामबंदी के तहत बड़े फांट  में उपन्यास  कह कर मोहनदास छाप कर उदय प्रकाश को साहित्य अकादमी दिया गया । तब जब कि आधार-पत्र में उदय प्रकाश का या मोहन दास का कोई ज़िक्र नहीं था । अनैतिकता और लंठई की यह पराकाष्ठा है । पर ज्यूरी में उपस्थित अशोक वाजपेयी ने आधार पत्र को किनारे कर दिया । उदय प्रकाश का नाम प्रस्तावित कर दिया । चित्रा मुदगल  ने समर्थन कर दिया । मैनेजर पांडेय की असहमति को अशोक वाजपेयी और चित्रा मुदगल ने सुना भी नहीं । मैनेजर पांडेय रामदरश मिश्र का नाम लेते रह गए । तो अब की बार की ज्यूरी में साहित्य अकादमी ने विवादित और बवाली  लोगों से दूरी बना कर रखी । अब की हिंदी की ज्यूरी में मुंबई से राम जी तिवारी , मुज़फ्फरपुर से महेंद्र मधुकर , और चंडीगढ़ से माधव कौशिक थे । रामदरश मिश्र को बहुतायत लोग कथा के लिए जानते हैं । पर रामदरश मिश्र को अब की बार साहित्य अकादमी मिली है कविता के लिए । ऐसा पहले भी हो चुका है साहित्य अकादमी के साथ । और कई बार । जैसे कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को लोग जानते तो हैं आलोचना के लिए पर उन्हें साहित्य अकादमी मिला उपन्यास के लिए । वह भी वाण भट्ट की आत्म कथा के लिए नहीं अनामदास का पोथा के लिए । और तो और नामवर को साहित्य अकादमी मिलने के दो साल बाद आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को साहित्य अकादमी मिला । नामवर शिष्य है आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के , यह बताने की भी ज़रूरत है क्या? हां  , नामवर को आलोचना के लिए ही मिला था साहित्य अकादमी । साहित्य अकादमी के विवाद और भी बहुतेरे हैं । फिर भी बहुत कुछ शेष है साहित्य अकादमी में अभी भी । इस लिए भी कि साहित्य अकादमी के अध्यक्ष अभी विश्वनाथ प्रसाद तिवारी हैं । संत स्वभाव और विवादों से दूर रहने वाले तिवारी जी हैं तो बहुत कुछ बचा है , साहित्य अकादमी में । बावजूद तमाम विवाद और अपनी तमाम सुनामी के । बचा ही रहेगा । रामदरश जी की ही एक कविता में कहूं :

यहीं कहीं रात के पिछले पहर में
पिता के दर्दीले कंठ से फूटता था लोक रस से भीगा गीत
वह गली-गली भटकता हुआ पूरे गाँव को भिगो देता था
यहीं कहीं रुनझुन-रुनझुन गति से चलती हुई भाभी अपने
नन्हे देवर को छेड़ती थीं
और उनकी हँसी आँगन में बहने लगती थी
स्वच्छ हवा की तरह
यहीं कहीं एक कमरा था
जिसमें जाड़ों में पुवाल बिछा होता था
यहीं गुदड़ी के नीचे दुबकी मेरी आँखों में
कितने महकते हुए सपने जन्में थे
और अंकित हो गए थे दीवारों पर, छत पर, यहाँ वहाँ

बावला मन उदास हो गया
मैंने देखा-
एक ताख में
रामचरित मानस की पोथी-अभी भी रखी हुई थी
मैं खुश होकर चिल्लाया-
ओ बावले मन
उदास मत हो
देख
यह पोथी बची है
तो अभी बहुत कुछ बचा हुआ है !

 

बचा हुआ तो है । बहुत कुछ बचा हुआ है । फासिस्टों का वह खिसियाया हुआ आरोप भी आना अभी बचा हुआ है कि साहित्य अकादमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी चूंकि ब्राह्मण हैं , गोरखपुर के हैं , इस लिए गोरखपुर के एक ब्राह्मण को साहित्य अकादमी दे दिया । ख़ास कर वह रैकेटियर लेखक , वह फ़ासिस्ट आलोचक जो तमाम क्रांतिकारिता के बावजूद , तमाम असहिष्णुता के बावजूद साहित्य अकादमी का यह अमृत पीने को बेकरार थे । फ़िलहाल तो रामदरश मिश्र की यह ग़ज़ल यहां बांचिए और रामदरश मिश्र को बधाई ज़रूर दीजिए । वह दिल्ली के उत्तम नगर के वाणी विहार में रहते हैं । उन का नंबर 09211387210 है।

फ़िलहाल तो रामदरश मिश्र की यह पूरी ग़ज़ल पढ़िए । जो आज के दिन बहुत मौजू है :

बनाया है मैं ने ये घर धीरे-धीरे,
खुले मेरे ख़्वाबों के पर धीरे-धीरे।

किसी को गिराया न ख़ुद को उछाला,
कटा ज़िंदगी का सफ़्रर धीरे-धीरे।

जहां आप पहुंचे छलांगें  लगा कर 
वहां मैं भी पहुंचा  मगर धीरे-धीरे।

पहाड़ों की कोई चुनौती नहीं थी,
उठाता गया यूँ ही सर धीरे-धीरे।

न हँस कर न रो कर किसी में उडे़ला,
पिया खुद ही अपना ज़हर धीरे-धीरे।

गिरा मैं कहीं तो अकेले में रोया,
गया दर्द से घाव भर धीरे-धीरे।

ज़मीं खेत की साथ ले कर चला था,
उगा उस में कोई शहर धीरे-धीरे।

मिला क्या न मुझ को ए दुनिया तुम्हारी,
मोहब्बत मिली, मगर धीरे-धीरे।

रामदरश मिश्र की प्रमुख रचनाएं

उपन्यास : पानी के प्राचीर, जल टूटता हुआ, बीच का समय, सूखता हुआ तालाब, अपने लोग, रात का सफर, आकाश की छत, आदिम राग, बिना दरवाजे का मकान, दूसरा घर, थकी हुई सुबह, बीस बरस, परिवार

कहानी संग्रह : खाली घर, एक वह, दिनचर्या, सर्पदंश, वसंत का एक दिन, अपने लिए, आज का दिन भी,  फिर कब आएँगे?, एक कहानी लगातार, विदूषक, दिन के साथ, विरासत 

कविता संग्रह : पथ के गीत, बैरंग-बेनाम चिट्ठियाँ, पक गई है धूप, कंधे पर सूरज, जुलूस कहाँ जा रहा है, रामदरश मिश्र की प्रतिनिधि कविताएँ, आग कुछ नहीं बोलती, शब्द सेतु, बारिश में भीगते बच्चे

गजल संग्रह : हँसी ओठ पर आँखें नम हैं, बाजार को निकलते हैं लोग, तू ही बता ऐ जिंदगी 

संस्मरण : स्मृतियों के छंद, अपने अपने रास्ते, एक दुनिया अपनी और चुनी हुई रचनाएँ, बूँद-बूँद नदी, दर्द की हँसी, नदी बहती है, कच्चे रास्तों का सफर

निबंध : कितने बजे हैं, बबूल और कैक्टस, घर-परिवेश, छोटे-छोटे सुख

आत्मकथा : सहचर है समय, फुरसत के दिन

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं.

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रंगनाथ मिश्र सत्य ने तो अपनी ऐसी तैसी करवा ली है!

Dayanand Pandey : हिंदी दिवस पर उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के पुरस्कार कार्यक्रम में मुख्य मंत्री अखिलेश यादव की चरण वंदना करती रंगनाथ मिश्र सत्य की यह एक फ़ोटो फ़ेसबुक पर वायरल हो कर उपस्थित है। रंगनाथ मिश्र सत्य ने तो अपना साहित्य भूषण पुरस्कार इस चरण वंदना में धो दिया है। अपनी ऐसी तैसी करवा ली है। लेकिन उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के निदेशक और मम अरण्य, शाने तारीख़ और रंग राची जैसे कालजयी उपन्यासों के तपस्वी रचनाकार सुधाकर अदीब इस अपमानजनक घटना के अनिवार्य साक्षी रहे हैं। यह अपमानजनक दृश्य देख कर उन की आंखें वहीँ तुरंत छलक पड़ीं। निरंतर बहती रहीं।

यह समाज और साहित्य का कृष्ण पक्ष भर नहीं है। साहित्य और समाज का बिखरा हुआ, पतित हुआ एक अनिवार्य व्याकरण भी है। जो अनायास खुल गया है। कालीन के नीचे छुपा हुआ कूड़ा अचानक दिख गया है। पर यह सब कोई पहली बार नहीं हुआ है। हमने तो और भी कई स्वनाम धन्य लोगों को पुरस्कार ले कर चरण वंदना करते बार-बार देखा है। अबकी बार भी कई सारे लेखकों ने मुख्यमंत्री और अन्य उपस्थित लोगों की चरण वंदना की।

फ़र्क बस यह है कि रंगनाथ मिश्र सत्य का यह सत्य एक अखबार ने उद्घाटित कर दिया यह फ़ोटो छाप कर। नहीं तो फिसल गए तो हर गंगे, वाली इस चरण वंदना की गंगा में डुबकी तो सर्वदा की तरह औरों ने भी मारी है। किस-किस का नाम लूं और किस-किस का न लूं? इस हमाम में बहुतेरे नंगे हैं। कोई परदे में है तो कोई परदे से बाहर। पर लेखकों के इस जुगाड़, प्रणाम और चरण वंदना में लिपटे पुरस्कार समारोह और तिकड़म की कथा अनंत है। बहुत सारी प्याज की परतें हैं, अपमान की अनंत कथाएं है, दारुण और शौर्य में भीगी और रोती हुई, सिसकती हुई और चहकती हुई भी। साजिश, राजनीति और घिन की गलियां बहुत हैं। इनकी दास्तान फिर कभी।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय के फेसबुक वॉल से.


पुरस्कार के बदले चरण वंदना
साहित्य जो लोकप्रियता और पैसा अपने लेखकों को नहीं दे पाता, उसकी भरपाई वह पुरस्कारों, पदों से करने की कोशिश करता है। इसके बदले वह सत्ता के खेल को इंधन देता है। पुरस्कार पहले प्रतिभाओं को मिलत़ा था। बाद में इसका स्थान जुगाड़ ने ले लिया और अब जुगाड़ के साथ प्रणयाम भी जुड़ गया। अब यह इतना आम हो गया है कि अगर आपको अपने काम से भी मिले तब भी लोग उसी  नजर से देखेंगे।

हाल ही में लखनऊ में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जब साहित्यकारों को सम्मानित कर रहे थे तो डाक्टर रंग नाथ मिश्र ने उनके पैरों पर गिर पड़े। वहां मौजूद नवागत साहित्यकार या अन्य लोग चौक पड़े, लेकिन साहित्य के सामंत खामोस थे। उनके चेहरे पर कोई शिकन तक नहीं। आज इतने दिनों बाद भी कोई प्रतिक्रिया भी नहीं आई। शायद इस लिए कि इनके लिए कोई नई बात नहीं। यही बताता है कि स्थितियाँ कैसी हैं। जब आप इंसानियत को बचाने की कवायद में अपनी पूरी कहानी में मरे जाते हैं और उसी कहानी पर पुरस्कार के लिए भरी सभा में पाँव पकड़ कर इंसानियत के साथ उस कहानी का भी गला घोंट देते हैं। हे साहित्य के सामंत ऐसे गिर-गिरकर खुद के साथ साहित्य और हिंदी को तो न गिराओ।
अजय पाण्डेय
सुहवल
गाजीपुर

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मुलायम का अंत भी अब करीब आ गया है, वह भी अमिताभ ठाकुर के हाथों : दयानंद पांडेय

Dayanand Pandey : एक समय कंस और रावण जैसों को भी लगता था कि उन का कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता। और वह अत्याचार पर अत्याचार करते जाते थे। लेकिन एक दिन उन का अंत हुआ। गोरी, गजनवी, चंगेज खां, बाबर, औरंगज़ेब आदि के हश्र भी हमारे सामने हैं। ब्रिटिश राज में तो एक समय सूरज भी नहीं डूबता था, पर एक दिन आया कि डूब गया। तो मुलायम सिंह यादव कौन सी चीज़ हैं? मुलायम सिंह यादव के पाप और कुकर्म का घड़ा भी अब भर जाने की राह पर है।

बिहार में महागठबंधन में छेद करने के बाद भी उन को राहत मिलती नज़र नहीं आती। रही सही कसर आईएएस अफसर सूर्य प्रताप सिंह और आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर ने पूरी कर दी है। यादववाद और अत्याचार की पराकाष्ठा पार कर कर चुके मुलायम सिंह यादव के ख़िलाफ़ आज लखनऊ की एक निचली अदालत ने अमिताभ ठाकुर को मुलायम द्वारा धमकी दिए जाने के बाबत एफ़आईआर दर्ज करने के आदेश जारी कर उन्हें उनकी औकात बता दी है। हालांकि इस एफ़आईआर से मुलायम का तुरंत कोई बाल बांका नहीं होने वाला। लेकिन वह कहते हैं न कि बूंद-बूंद से सागर बनता है। तो अमिताभ ठाकुर की लड़ाई का यह भी एक बूंद है। अमिताभ ठाकुर आपको बहुत बधाई! आप के संघर्ष को सैल्यूट! आप की जिजीविषा को प्रणाम! आप निरंतर युद्धरत रहिए। विजय आप की प्रतीक्षा में है। दुष्यंत कुमार का वह एक शेर है न :

कैसे आकाश में सुराख़ नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो ।

तो अमिताभ ठाकुर आपने एक पत्थर तो तबीयत से उछाल ही दिया है। सुराख़ भी होगा ही और अत्याचार की यह व्यवस्था टूटेगी भी। किसी फर्जी बलात्कार का आरोप लगा देने और बेबुनियाद आरोपों की जांच में आप की यह लड़ाई नहीं झुलसने वाली यह बात तो सारी दुनिया जानती है मेरे मित्र! आप तो खैर अच्छी तरह यह बात जानते हैं। मुलायम का अंत भी अब करीब आ गया है। वह भी अमिताभ ठाकुर के हाथों।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय के फेसबुक वॉल से.

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अमृता-दिग्विजय ने कर ली शादी, फेसबुक पर शेयर की दिल की बात

Dayanand Pandey : अमृता राय और दिग्विजय सिंह आप दोनों को बधाई तो बनती है। बहुत-बहुत बधाई! गौरतलब है कि मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री 68 वर्षीय दिग्विजय सिंह और राज्यसभा टी वी की पत्रकार 44 वर्षीय अमृता राय ने विवाह कर लिया है। अमृता राय ने फ़ेसबुक पर अपनी वाल पर अंगरेजी में यह बात साझा करते हुए जो कुछ लिखा है, उसे हिंदी में पढ़िए :

मैंने और दिग्विजय सिंह ने हिंदू रीति रिवाज से शादी कर ली है। इस अवसर पर मैं उन सभी का शुक्रिया अदा करना चाहती हूं, जो हाल के कठिन समय में मेरे साथ खड़े रहे हैं। मेरे लिए पिछला डेढ़ साल काफी तनावपूर्ण और दर्दनाक रहा है। मैं खुद एक साइबर अपराध की शिकार थी, लेकिन मेरे साथ एक अपराधी की तरह व्यवहार किया गया। बिना किसी गलती के मुझे सोशल मीडिया पर टारगेट किया गया और मेरे लिए अपमानजनक भाषा का जमकर प्रयोग किया गया। जो लोग खुद प्यार और सम्मान में किसी तरह का भरोसा नहीं करते उन लोगों ने सोशल मीडिया पर मुझे शर्मिंदा करने की कोशिश की, लेकिन इस दौरान मैंने चुप्पी बनाए रखी। मैं अपने और अपने प्यार (दिग्विजय) के लिए काम के साथ आगे बढ़ती गई।

अमृता ने आगे लिखा है कि मैं जानती हूं कि हम दोनों के बीच उम्र के अंतर पर सवाल उठाया गया है और उठाया भी जाएगा, लेकिन मैं अपने फैसले लेने के लिए स्वतंत्र हूं और मुझे पता है कि मेरे लिए क्या अच्छा है। हम एक आधुनिक, प्रगतिशील भारत में रहते हैं और संविधान हमें यह इजाजत देता है कि हम अपने जिंदगी के फैसले खुद ले सकें। मैं यह भी जानती हूं कि मेरे इस निर्णय के लिए मेरी मंशा को जिम्मेदार ठहराए जाने की कोशिश की जाएगी। मैं एक पेशेवर महिला हूं और मैंने अपने करियर में बहुत मेहनत की है और खुद के लिए प्रतिष्ठा बनाई है। मैं अपने पेशेवर क्षमताओं में विश्वास रखती हूं। किसी भी अन्य महिला की तरह मैं भी अपने दम पर अपनी व्यक्तिगत और पारिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ अपने कंधे पर उठाती रही हूं और आगे भी उठाती रहूंगी।

मैं दिग्विजय सिंह से प्यार के लिए शादी की है। इसलिए, मैंने पहले से ही उनसे सारी संपत्ति और पूंजी अपने बेटे और बेटियों के लिए के नाम ट्रांसफर करने का आग्रह किया है। मैं उनके साथ केवल एक सम्मानजनक और पेशेवर करियर की दिशा में आगे बढ़ना चाहती हूं। और आखिरी में एक बार फिर, हर चीज के लिए आप सभी दोस्तों, मेरे कार्यालय के सहयोगियों और शुभचिंतकों को धन्यवाद।

वरिष्ठ पत्रकार दयानंद पांडेय के फेसबुक वॉल से.

अमृता राय ने अंग्रेजी में ओरीजनली क्या लिखा है, उसे पढ़ने के लिए नीचे लिखे आ रहे Next पर क्लिक करें>>

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चंचल जी, आपके समाजवादी नेता ने जुझारू अमिताभ ठाकुर को सस्पेंड करवा दिया!

Dayanand Pandey : उत्तर प्रदेश की फासिस्ट सरकार ने आख़िर हमारे जुझारू और संघर्षशील मित्र अमिताभ ठाकुर को सस्पेंड कर दिया है। अब अमिताभ ठाकुर के विरोधियों की ईद अच्छी मनेगी। जातिवादी समाजवादी नेता ने सारा लोकतांत्रिक लोक लाज भस्म कर अमिताभ को सस्पेंड करवा दिया है अपने मुख्य मंत्री बेटे से रो गा कर। ईद मनाईये, दीवाली और होली मनाईये सरकार की इस फासिस्ट कार्रवाई पर और सेक्यूलरिज्म के खोखले गीत गाईए, और मस्त हो जाईए!

घबराईये नहीं मित्र अमिताभ ठाकुर, आप का यह संघर्ष अकारथ नहीं जाने वाला। यह लड़ाई दिये और तूफ़ान की भले है पर आप की लड़ाई का यह दिया हरगिज़ नहीं बुझेगा। हम और हमारे जैसे असंख्य लोग आप के साथ हैं। सैल्यूट यू अमिताभ जी! आप की जीत पक्की है। यह फासिस्ट सरकार ही नहीं है, लोकतंत्र के तमाम और दरवाज़े भी खुले हुए हैं। जग अभी जीता नहीं है, मैं अभी हारा नहीं हूं!

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कुछ ‘अति विद्वान’ हैं फ़ेसबुक पर जो निहायत ही नकचढ़े हैं। अपने कुतर्क की चाशनी में वह ऐसी वह ऐसी-ऐसी तथ्यहीन बातें करते हैं, एक से एक कुतर्क करते हैं कि पूछिए मत। करते ही रहते हैं। इनमें से ही एक हैं चंचल बीएचयू। आज वह अमिताभ ठाकुर के बारे में दो अद्भुत जानकारियां लेकर उपस्थित हुए हैं। एक यह कि अमिताभ कर्पूरी ठाकुर के नाती हैं। दूसरे, अमिताभ ठाकुर सीबीआई में रहे हैं। गुजरात मामलों की जांच की है और अमित शाह और मोदी के नजदीकी हैं। क्या चंचल जी, आप की ख्याति वैसे भी लंतरानी झोंकने की बहुत है, पर ऐसी ‘विद्वता’ भरी सूचनाएं कहां और किस कौवे के पीछे पड़ कर बटोरते फिरते हैं, बाग़ में पत्ते की तरह?

कभी तो नकचढ़ी की तरंग से उतर कर लिया कीजिए। लफ्फाजी की हद तक ही रहिए। जार्ज फर्नांडीज और राजेश खन्ना क्या कम पड़ जाते हैं आप की लंतरानी खातिर? उसी फैंटेसी में फंसे रहिए। क्योंकि तथ्य और तर्क सर्वदा आप के हाथ से फिसल जाते रहे हैं। काहे कुतर्क के नाबदान में उतर कर अपनी बुजुर्गियत हवन कर लेते हैं? करते ही रहते हैं। कर्पूरी ठाकुर जाति के नाऊ हैं और बिहार के सम्मानित मुख्यमंत्री रहे हैं। अमिताभ ठाकुर जाति से भूमिहार हैं और समानित आईपीएस हैं। और कि कभी भी सीबीआई या गुजरात में पोस्टिंग नहीं पाई है। वैसे आप के ईद मनाने के लिए यह खबर क्या कम है कि हमारे सम्मानित और जुझारू मित्र अमिताभ ठाकुर को आपके समाजवादी नेता ने सारी लोकतांत्रिक लोक लाज भस्म कर सस्पेंड करवा दिया है अपने मुख्य मंत्री बेटे से रो गा कर। ईद मनाईये, दीवाली और होली मनाईये सरकार की इस फासिस्ट कार्रवाई पर और सेक्यूलरिज्म के खोखले गीत गाईए, और मस्त हो जाईए!

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय के फेसबुक वॉल से.


Yashwant Singh : नेताजी यानि मुलायम सिंह यादव का क्यों कर रहे कांग्रेसी बड़े-बुजुर्ग बचाव… कई बड़े बुजुर्ग कांग्रेसी नेताओं विद्वानों को आपने देखा होगा कि अमिताभ ठाकुर मुलायम सिंह यादव टेप रेप प्रकरण में येन केन प्रकारेण तर्क वितर्क गढ़कर मुलायम सिंह यादव का बचाव कर रहे हैं और उन्हें भले मानुस साबित करने पर तुले हुए हैं. असल में मुलायम सिंह यादव उर्फ नेताजी ने उत्तर प्रदेश में सरकार चलाते हुए राजनीतिक लोगों को जमकर ओबलाइज किया हुआ है. बसपा को छोड़ दें तो बाकी सभी पार्टियों के नेताओं से नेताजी के नजदीकी व नितांत निजी किस्म के संबंध हैं. ये लोग मुश्किल वक्त में एक दूसरे के साथ खड़े होते रहते हैं. यही कारण है प्रमोद तिवारी से लेकर चंचल जी तक माननीय मुलायम सिंह यादव का बचाव कर रहे हैं और उलटे Amitabh Thakur पर ही कई किस्म के आरोप लगा रहे हैं.

अरे भाई, जब आप लोगों से कोई एक घोटाला खुलता नहीं, जब आप लोग विपक्ष की भूमिका निभाना जमाने से भूल चुके हैं तो काहें दूसरे पार्टी के नेता के पापों पर पैबंद लगाकर तुड़पन का काम कर रहे हैं. मुलायम सिंह ने सिर्फ नेताओं ही नहीं बल्कि पत्रकारों को भी खूब ओबलाइज किया हुआ है. विवेकाधीन कोष से जमकर पैसे लुटाने का मामला हो या आजकल प्लाट से लेकर लैपटाप, मकान तक गिफ्ट देने का मामला, पत्रकारों की तो बल्ले बल्ले है. कई पत्रकारों व मीडिया हाउसों की तो अंडरटेबल डील है. अच्छा अच्छा दिखाओ लिखो, तगड़ा तगड़ा अटैची बंडल ले जाओ. ऐसे महाभ्रष्ट दौर में अगर एक शख्स अपने व अपने परिवार के जीवन को दांव पर लगाकर सच बोल रहा है, लड़ रहा है, जूझ रहा है तो बजाय उसका सपोर्ट करने के, हम सत्ता में बैठे व ढेर सारे आरोपों कदाचारों से घिरे शख्सियतों का बचाव कर रहे हैं, यह शर्म से डूब मरने के लिए काफी है.

लेकिन क्या कहा जाए, कांग्रेसियों को शर्म मगर आती कहां है… आईबीएन7 पर अमिताभ-मुलायम टेप रेप मामले को लेकर हुई डिबेट में कांग्रेसी नेता प्रमोद तिवारी के सदवचन सुनिए नेताजी के बारे में.. आपको लगेगा ही नहीं कि वो कांग्रेस पार्टी के नेता हैं… आखिर याराना जो पुराना है.. पुराने एहसान चुकाने के लिए एक दूसरे के मुश्किल वक्त में एक दूजे को बचाने के लिए आगे आना ही पड़ता है. और हां, ये गिरोह भाजपा संघ का डर भूत दिखाना बंद करिए. आप लोगों की इसी करनी के कारण गिरोह केंद्र में काबिज है और आप लोगों की इसी थेथरई नंगई के कारण राज्य दर राज्य फतह किए जा रहा है. असल अपराधी आप लोग हैं गिरोह को लाने का मौका-माहौल देने के लिए. कुशासन भ्रष्टाचार अराजकता के चरम से आजिज जनता आंख मूंद कर किसी को भी चुन लिया करती है, यह कई बार साबित हुआ है. डिबेट का लिंक ये है: https://www.youtube.com/watch?v=-OxIt-rqCGY

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अमिताभ-मुलायम प्रकरण को लेकर टाइम्स नाऊ चैनल पर हुई आधे घंटे की डिबेट में समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता की हालत देख अगर आप हंस न दिए तो पैसे वापस. सपा को चाहिए कि वह फेसबुक पर सक्रिय अपने ऐसे युवा पेड एजेंटों को चैनलों पर पक्ष रखने का मौका दे जो पूर्व में क्रांतिकारी रहे हैं और आजकल पूरे के पूरे भ्रांतिकारी हो चुके हैं ताकि कम से कम वे पक्ष तो पूरी थेथरई व दबंगई से रख सकेंगे जिससे गलत होते हुए भी सपा सरकार के पक्ष में सही टाइप का माहौल निर्मित किया जा सके. सपा की तरफ से वकार साहब बिलकुले सच्चे किस्म के इंसान साबित होते रहे जो उतना ही बोलते रहे जितना उन्हें सिखा पढ़ा कर भेजा गया था.

हालांकि उन्हें जितना लाइन लेंथ देकर भेजा गया था, उसके चैनल पर प्रकटीकरण के बाद लोग मुंह दबाकर हंसने को ज्यादा मजबूर हुए, सोचने को कम. एक जगह वो कहते हैं- ”ये उत्तर प्रदेश है… ये उत्तर प्रदेश है… ये उत्तर प्रदेश है… यहां हर पुलिस जांच बिलकुल सही होती है, यहां सबको इंसाफ मिलता है, यहां कोई निराश नहीं होता.” माई गॉड, ऐसा झूठ तो भजपइये भी नहीं बोलते. दरअसल सही में फासीवाद और झूठ का राज्य देखना हो तो उत्तर प्रदेश सरकार एक टेस्ट केस से कम नहीं. अगर आपको अंग्रेजी समझने में दिक्कत नहीं तो टाइम्स नाऊ पर डिबेट के इस यूट्यूब वीडियो को जरूर देखें. इस डिबेट में Amitabh Thakur ने बहुत शानदार तरीके से और बेहद अनुशासित तरीके से अपनी टू द प्वाइंट बात रखी. लिंक ये है: https://www.youtube.com/watch?v=GeC7T21PsFQ

भ़ड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


मूल खबर…

यूपी सरकार ने आईजी अमिताभ ठाकुर को सस्पेंड किया, पढ़ें सस्पेंसन लेटर

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मुझे इस चोर और बेईमान न्यायपालिका पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं है : दयानंद पांडेय

Dayanand Pandey : इन सारे कमीनों, इन सारे चोरों और बेईमानों को इस न्यायपालिका में इतना यकीन होना आम आदमी को बार-बार डरा देता है। ख़ास कर तब और जब यह सब के सब एक सुर में कहते हैं कि न्यायपालिका में उन्हें पूरा यकीन है, पूरा भरोसा है! याद कीजिए कि अभी दो दिन पहले इस अपराधी सलमान खान ने बड़े गुरुर से कहा था कि मुझे न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है! लालू प्रसाद यादव भी यही बोलता है, मायावती, मुलायम, जयललिता आदि-आदि सारे बेईमान और अपराधी यह संवाद सर्वदा बोलते रहते हैं।

अरे कमीनों, यह भरोसा इस चोर न्यायपालिका पर तुम्हें नहीं होगा तो क्या हमें या हमारे जैसों को होगा? मैं तो चीख-चीख कर, चिल्ला-चिल्ला कर कर कह रहा हूं कि मुझे इस चोर और बेईमान न्यायपालिका पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं है, नहीं है, नहीं है! यह न्यायपालिका नहीं, बेल पालिका है। बेईमानों और अपराधियों की सैरगाह है यह! अगर मेरे इस लिखे पर अवमानना का मुकदमा चलाना हो तो चलाइए। स्वागत है। न्यायपालिका में अब इतना दम नहीं रहा। हांफ-हांफ जाएगी, आप की यह न्यायपालिका। अब उसकी ऐसी हैसियत नहीं रही, न साहस! होती तो मेरे जैसा सामान्य व्यक्ति यह कहने की हिमाकत नहीं करता। और आप को बता दूं कि, ऐसा मुकदमा अवमानना का मैं भुगत भी चुका हूं अपने उपन्यास ‘अपने-अपने युद्ध’ को लेकर। वर्ष दो हज़ार में प्रकाशित इस उपन्यास में मैंने न्यायपालिका में उग आए कोढ़ की बखिया कस कर उधेड़ी है।

देश के क़ानून के साथ यह सामूहिक बलात्कार का मामला बनता है. मेरी एक दोस्त हैं Ritu Soni जी। मेरी एक टिप्पणी पर उन्हों ने ऐतराज जताते हुए अपने कमेंट में लिखा है कि : ”Sab Kuch thik hai… Lekin PoorI judiciary ko Ek saath galia Kar aap session court ke judge JiNhone convict Kiya Unka apman Kar rahe hai.”  ऋतु जी, यह आप क्या कह रही हैं? किस जज का अपमान? वह जज जो दस साल की जगह पांच साल की सज़ा तजवीज करता है? वह जज जो अपने आदेश में छेद ही छेद छोड़ देता है ताकि यह अपराधी फटाक से जमानत पा जाए? वह जज जो तीन घंटे तक हाईकोर्ट की जमानत के कागजात आने का इंतज़ार करता रहा? सात बजे शाम तक ताकि सलमान को एक क्षण भी जेल की हवा न खानी पड़े। कोई जज किसी मुलजिम की जमानत का कागज़ का इंतज़ार करता शाम सात बजे तक बैठा रहा हो, मेरी जानकारी में यह पहला मामला है। सच यह है कि सलमान खान के मामले में क़ानून के साथ पहला बलात्कार करने वाला यह जज देशपांडे ही है। हाईकोर्ट के जज थिप्से का नंबर दूसरे नंबर पर आता है। और फिर दोनों ही पक्ष के सारे वकील तीसरे नंबर पर। चौथे नंबर पर मुम्बई पुलिस। और इन सब से भी ऊपर यह मीडिया! देश के क़ानून के साथ यह सामूहिक बलात्कार का मामला बनता है। इन सब को एक लाइन में खड़ा कर सामूहिक रूप से गोली मार दी जानी चाहिए! इन सब के साथ इस्लामिक क़ानून का उपयोग किया जाना चाहिए।

प्रेमचंद ने एक जगह सच लिखा है: ”न्याय भी लक्ष्मी की दासी है।”

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय के फेसबुक वॉल से.


सलमान को जेल की जगह बेल मिलने से दुखी कुछ अन्य पत्रकारों / छात्रों / सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों के कमेंट इस प्रकार हैं…

Sheetal P Singh : मीडिया चैनलों ने मुम्बई हाईकोर्ट से ज़मानत दिलाई. जेल नहीं जायेंगे सलमान! फत्ते रहिमन चिखुरी गनेस समेत ढाई लाख से ज़्यादा under trials जेहल में ही रहेंगे. मोकदमे ज़्यादा / अदालतें कम होने और चैनलों के बिजी रहने से “देस” का फ़ैसला!

Anwesha :  Totally disgusting ….salman khan got bail…..lost faith on indian judiciary system…..

Sushant Sareen : That the Indian criminal justice system is broken is well known. Its more criminal and very little justice. My issue isn’t that salman khan got undeserved relief from this dysfunctional system. If you are rich, can hire the big shot lawyers who pontificate on TV, know how to work the system, the law which is an ass will take its logical and natural course and you will get away.  My problem is with the pervasive sickness of a society that instead of shunning the wrongdoer, celebrates him. My problem is with the shitty Bollywood fraternity that is so steeped in chamchagiri and ass licking that it sees nothing wrong in what salman did. India has no future because its a sick society. Its a society with no moral fiber, a society with no moral compass and a society with no conscience. But what do you expect from a people who fete their murderers by lighting candles at wagah?

Kumar Sauvir : चुलबुल पांडे ने किसी के पीछे कितने छेद बनाये हैं, हमें इसका तो कोई पता नहीं है। पर इस पांडे ने इतना तो साबित कर ही दिया कि अगर जेब भारी हो तो चंद मिनट में क़ानून का भी पाँव भारी किया जा सकता है। जी हाँ, इतने छेद किये जा सकते हैं कि फिर पता भी न चले कि हवा कहाँ से आ रही है और कहाँ जा रही है…

Zafar Irshad : सलमान खान का “पतंग उड़ाना और पेंच लड़ाना” और उनके अब्बा सलीम का “उर्दू वेबसाइट” चलाने का सुखद फल उन्हें आज मिल गया.. और अब वो आज़ाद पंछी की तरह घूमेंगे…

Omendra Bharat : आज भारतीय कानून व न्यायप्रणाली का एक काला दिन है। सलमान खान जैसे अपराधी को सिर्फ इसलिए जमानत मिल गई कि वो एक रसूख वाले इंसान हैं। शर्म आनी चाहिए उस पुलिस सिस्टम को जो अपने एक कर्मचारी.. “रविंद्र पाटिल” की ईमानदारी की कद्र न कर सका और उसे मरने के लिए छोड़ दिया। वो अपनी अंतिम साँस तक सलमान के खिलाफ गवाही देता रहा… पर न पुलिस सुन सकी और न ही जज… उल्टा उसे जेल भेज के प्रताड़ित किया। काश कि आज अपराधी सलमान खान को जज ने 5 साल के कठोर सश्रम जेल भेज दिया होता…. तो पूरे देश का… देश की न्याय प्रणाली पर विश्वास बढ़ गया होता। सबको विश्वास हो जाता कि… हिंदुस्तान में अमीर-गरीब, आम-ख़ास सबके लिए क़ानून बराबर है। पर दुर्भाग्य… ऐसा न हो सका…!! जहाँ भी होगी उन सभी ग़रीबों की आत्माएं… जो उस दुर्घटना के शिकार हुए थे… वो आज कोस रहे होंगे जजों को… और बेचारे वो रविन्द्र पाटिल की आत्मा तो सोच रही होगी कि… यार मैं फोकट में ही मर गया। और शायद कोई भी रविन्द्र पाटिल की तरह किसी रसूखदार इंसान के खिलाफ कभी भी गवाही देने की हिम्मत न उठा सके। शर्म करो… देश में कानून के ठेकेदारों… शर्म करो।

Nitin Thakur : मी लॉर्ड भी टीवी देखते हैं और उनको भी पता होता है कि जमानत की सुनवाई से एक रात पहले पीएम का करीबी जफर सरेशवाला किसके घर गया था..

Daya Sagar :  हिट एंड रन का केस उस वक्त नहीं था जब सलमान की कार की रफ्तार 90-100 किमी प्रति घंटा थी। असली हिट एंड रन का केस ये है। यहां कानून को हिट कर सलमान ने अपनी सजा सस्पेंड करा ली। जमानत की रफ्तार देखिए जबकि देश में 4 लाख लोग बरसों से जेल में बेल का इंतजार कर रहे हैं।

Mukesh Kumar Singh : सलमान ने शुरुआत से ही इस मामले से जुड़े गवाहों और तथ्यों को गुमराह करने की कोशिश की लेकिन कोर्ट ने चश्मदीद गवाह को ही सुनवाई का आधार माना। वह गवाह जो 4 अक्टूबर, 2007 को मर चुका है। सिपाही रविंद्र पाटिल इस केस के मुख्य गवाह थे। वही रविंद्र पाटिल जिनकी गवाही इस केस के फाइनल फैसले पर असर डाल गई। रविंद्र पाटिल के करीबी इस फैसले से बेहद सुकून में हैं। उनके मुताबिक मौत से पहले रविंद्र पर इस मामले में अपना बयान बदल लेने के लिए बेहद दबाव था। इसका जिक्र कई फ्रीलांस ब्लॉगर्स ने अपने ब्लॉग में भी किया था, जिन्हें बाद में हटा लिया गया। कुछ लोगों ने शक जताया कि ब्लॉगर्स ने ऐसा सलमान के दबाव में आकर किया, क्योंकि सभी ने अपने पोस्ट के लिए लिखित माफी मांगी थी। पाटिल ही एकमात्र ऐसे गवाह थे, जिनका कहना था कि कार ऐक्सिडेंट सलमान के नशे की हालत में तेज रफ्तार पर कार चलाने से हुआ। वह कोई टेक्निकल एरर नहीं था। पाटिल ने अपना यह बयान मरते दम तक नहीं बदला। इन ब्लॉग्स की मानें तो पाटिल सिपाही रैंक पर थे। फोर्स में सबसे छोटी और कमजोर रैंक पर। वह अकेले इस मामले में कुछ भी कर पाने में अक्षम थे। 2006 में जब सलमान ने मुंबई के बेस्ट डिफेंस लॉयर को हायर किया, तो पहला टारगेट पाटिल को ही बनाया गया। क्रॉस एग्जामिनेशन में उसे घेर लिया गया। उसी से परेशान होकर पाटिल एक दिन घर से भाग गया, जिसकी कंप्लेंट पाटिल के भाई ने पुलिस में करवाई थी। यह बात हैरान करने वाली थी कि मामले की एफआईआर करने वाला पुलिसिया सिपाही ही मामले में फंसा दिया गया था। पाटिल के खिलाफ अरेस्ट वॉरंट जारी किए गए, तो डर के मारे पाटिल ने तारीख पर जाना बंद कर दिया। बाद में उसे पकड़कर आर्थर रोड जेल भेज दिया गया। पाटिल ने क्राइम ब्रांच में अपनी दुहाई भेजी, जिसे अनसुना कर दिया गया। बहरहाल, जब पाटिल जेल से छूटा तो उसे पुलिस में वापस नौकरी नहीं मिली। तकरीबन एक साल के शोषण के बाद 2007 में मुंबई के एक सरकारी हॉस्पिटल में पाटिल भर्ती पाए गए, जिन्हें मुंबई की रेड लाइट्स पर भीख मांगते वक्त बेहोश होने पर हॉस्पिटल लाया गया था। पाटिल के परिवार वालों के पास उनकी कोई सूचना नहीं थी। सरकारी वॉर्ड के बेड नंबर 189 पर दवाइयों के अभाव में पाटिल लंबे वक्त तक तड़पते रहे और उनकी टीबी विकराल रूप लेती गई। कुछ ही दिन बाद उनकी मौत हो गई। उनके भाई ने उनका अंतिम संस्कार किया। जिस दोस्त ने पाटिल से आखिरी बार मुलाकात की थी, उसने कहा कि मरते दम तक पाटिल की दो इच्छाएं थीं। एक थी दोबारा पुलिस में भर्ती होना और दूसरी थी सलमान को सजा दिलवाने की कोशिश करना।

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केजरीवाल पर संपादक ओम थानवी और नरेंद्र मोदी पर पत्रकार दयानंद पांडेय भड़के

Om Thanvi : लोकपाल को वह क्या नाम दिया था अरविन्द केजरीवाल ने? जी, जी – जोकपाल! और जोकपाल पैदा नहीं होते, अपने ही हाथों बना दिए जाते हैं। मुबारक बंधु, आपके सबसे बड़े अभियान की यह सबसे टुच्ची सफलता। अगर आपसी अविश्वास इतने भीतर मैल की तरह जम गया है तो मेल-जोल की कोई राह निकल आएगी यह सोचना मुझ जैसे सठियाते खैरख्वाहों की अब खुशफहमी भर रह गई है। ‘साले’, ‘कमीने’ और पिछवाड़े की ‘लात’ के पात्र पार्टी के संस्थापक लोग ही? प्रो आनंद कुमार तक? षड्यंत्र के आरोपों में सच्चाई कितनी है, मुझे नहीं पता – पर यह रवैया केजरीवाल को धैर्यहीन और आत्मकेंद्रित जाहिर करता है, कुछ कान का कच्चा भी।

अगर षड्यंत्र या भीतर-घात के प्रमाण हैं तो उन प्रमाणों को एक सुलझे हुए राजनेता की तरह संजीदगी से सामने रख दोषियों को पार्टी से निकाल बाहर करना चाहिए। अलग होकर फिर ‘अपने’ विधायकों के साथ नई पार्टी खड़ी कर लेने का विचार भी सामूहिकता की नहीं, एकछत्र राजनीति का संकेत देता है। केजरीवाल शायद भूल गए कि नई किस्म की राजनीति में उनके पराक्रम से लोगों ने गांधीजी, जेपी और क्रांति जैसे प्रतीक जोड़ लिए थे। सरकार या पार्टी आए या जाए, वे सर्वोच्च नेता बने रहें, तब भी उनके मुंह से यह भाषा और अहंकार उन्हें वहां से लुढ़का लाएगा, जहाँ वे शान से – अपने कौशल और उद्यम से सबको साथ रखते हुए – जा पहुंचे थे। यह भाषा, यह तेवर, यह अहंकार तो उसी पुरानी राजनीति के उपादान हैं, अरविन्द भाई। इनसे बचो, अब भी कहने को मन करता है! और हाँ, जिसने यह वार्तालाप टेप किया है, वह भी कम कारीगर नहीं। वह योगेंद्र-प्रशांत खेमे का प्यादा जान पड़ता है। ऐसे लोग भी ‘आप’ में चले आए, कैसा मजा है!

Dayanand Pandey : तमाम चुनावी वायदों में नरेंद्र मोदी ने एक यह भी वायदा किया था कि चुन कर आए अपराधी सांसदों की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच कर उन के मुकदमों की निष्पक्ष सुनवाई कर तीन महीने में ही दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया जाएगा । चाहे वह सांसद भाजपा का ही क्यों न हो ! इस वायदे का क्या हुआ ? लोक सभा भूल गई । तो यह मीडिया भी क्यों भूल गई है ? बिकाऊ है इस लिए ? एक भी वायदा इस आदमी ने पूरा किया हो तो कोई मुझे बताए भी !

वरिष्ठ पत्रकार द्वय ओम थानवी और दयानंद पांडेय के फेसबुक वॉल से.

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बीते एक-डेढ़ दशक से यही लोग पत्रकारिता के अगुआ भी हो गए हैं….

Dayanand Pandey : पत्रकारिता और ख़बर की समझ तो हमें पहले भी थी, आज भी है। लिखने-पढ़ने का सलीक़ा भी। लिखने-पढ़ने और समझ का फख्र भी। हां, लेकिन दलाली, भड़ुवई, लाइजनिंग, चापलूसी, चमचई, बेजमीरी, चरण-चुंबन आदि-इत्यादि का शऊर न पहले था, न अब है, न आगे कभी होगा। दुर्भाग्य से यह दूसरी तरह के लोग पहले भी काबिज थे पत्रकारिता पर लेकिन अब बीते एक-डेढ़ दशक से यही लोग पत्रकारिता के अगुआ भी हो गए हैं।

समूचा नेतृत्व जैसे इन्हीं के हाथ में चला गया है। हम या हमारे जैसे लोग अफ़सोस की नदी में डूबे नेपथ्य में खड़े अपना माथा पीटने के लिए जैसे अभिशप्त हैं। और आप लोग चाहते हैं कि समाज और राजनीति फिर भी साफ-सुथरी रहे? कितने मासूम हैं आप लोग भी! कुर्बान जाऊं आप सब की इस अदा पर भी! गंदा और प्रदूषित पानी पी कर भी स्वस्थ रहने का सपना कुछ अटपटा नहीं लगता? ख़ुमार बाराबंकवी का एक शेर याद आता है :

चरागों के बदले मकां जल रहे हैं
नया है ज़माना, नई रौशनी है

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय के फेसबुक वॉल से.

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दिल्ली विस चुनाव में न्यूज चैनल खुल्लमखुल्ला ‘आप’ और ‘भाजपा’ के बीच बंट गए हैं

Dayanand Pandey : दिल्ली विधानसभा चुनाव में इस बार टीवी चैनल खुल्लमखुल्ला अरविंद केजरीवाल की आप और भाजपा के बीच बंट गए हैं। एनडीटीवी पूरी ताकत से भाजपा की जड़ खोदने और नरेंद्र मोदी का विजय रथ रोकने में लग गया है। न्यूज 24 है ही कांग्रेसी। उसका कहना ही क्या! इंडिया टीवी तो है ही भगवा चैनल सो वह पूरी ताकत से भाजपा के नरेंद्र मोदी का विजय रथ आगे बढ़ा रहा है। ज़ी न्यूज, आईबीएन सेवेन, एबीपी न्यूज वगैरह दिखा तो रहे हैं निष्पक्ष अपने को लेकिन मोदी के लिए अपनी प्रतिबद्धता दिखाने में एक दूसरे से आगे हुए जाते हैं। सो दिल्ली चुनाव की सही तस्वीर इन के सहारे जानना टेढ़ी खीर है। जाने दिल्ली की जनता क्या रुख अख्तियार करती है।

Sheetal P Singh : नरेन्द्र मोदी सचमुच में एक क़ाबिल राजनेता हैं बड़ी सफ़ाई से उन्होंने दिल्ली चुनाव को केजरीवाल बनाम मोदी को नेपथ्य में डाल केजरीवाल बनाम किरन बेदी कर दिया ! बीते कुछ दिनों की मीडिया कवरेज इसकी गवाह है ! किरन बेदी कोई बीस दिन पहले तक इंडिया टुडे ग्रुप के टी वी चैनलों पर चुनाव के दौरान होने वाली बहसों में panelist का contract डिस्कस कर रहीं थीं यानि कहीं से लूप में नहीं थीं और आज दिल्ली BJP की पूरी लीडरशिप परेड में है। केजरीवाल की जीत का माहौल बनते ही तलवारें म्यान से बाहर निकल आंईं हैं । शांतिभूषण ने किरन बेदी को उस समय ईमानदारी की सनद देना तय किया जब तीस हज़ारी में दिल्ली के वक़ील उनका पुतला फूँकने के लिये इकट्ठा हो रहे थे । कल जस्टिस हेगड़े ने बीजेपी/राजनीति में आने की अफ़वाहों पर पूर्णविराम लगाकर ऐसी ही एक कोशिश धराशायी की थी । अन्ना से किरन बेदी का समर्थन कराने की कोशिशें फलीभूत न होने से भी आप” का भूषण कैम्प समय से पहले किरन बेदी की सुरक्षा में उतर पड़ा। आश्चर्यजनक रूप से कवि कुमार विश्वास भले ही केजरीवाल के साथ न दिखे हों पर मनीष और दूसरे दोस्तों के लिये वे लगातार संभायें कर रहे हैं, मीडिया बहुत समय से उन्हे मोदी कैम्प में भेज रहा है। इस नये विकास से लगता है कि जितने लोग विरोध में होने की वजह से केजरीवाल को दिल्ली जीतते नहीं देखना चाहते उससे कुछ ही कम “आप” की ऊपरी लेयर में हैं जो मुख्यमंत्री बनने के बाद केजरीवाल की सामर्थ्य/राजनैतिक क़द बढ़ने के स्वप्न से घबराये हुए हैं!

Deepak Sharma : ये राजनीति है. दंगल नही. दंगल में आखिरी वक़्त पर चन्दगी राम के खिलाफ दारा सिंह को उतारकर कुश्ती जमाई जा सकती है. पर राजनीति में आखिरी वक़्त पर प्रत्याशी बदलना भारी पड़ सकता है. वैसे भी किरण बेदी प्रत्याशी है दारा सिंह नही. सवाल अब बस इतना है कि अगर किरण बेदी की कप्तानी में बीजेपी हार गयी तो क्या होगा ? इस हार का ठीकरा किस पर फूटेगा ? इस हार से हारेगा कौन ? 15 दिन की किरण बेदी को दोष दिया नही जा सकता. हर्षवर्धन पहले से ही हाशिये पर हैं. सतीश उपाध्याय का अध्याय ही समाप्त है. मुखी सुखी को जानता कौन है . तो क्या बारी अब वजीर की है? वजीर जिसने आखिरी वक़्त पर कजरी के खिलाफ किरण को उतारा. वजीर जिसने 48 घंटे में किरण को पार्टी में शामिल करवाया और 72 घंटो में मुख्यमंत्री की उमीद्वारी दे डाली. वजीर जिसने राजा से कजरी को कचरने की सुपारी ली है. मित्रों, अगर बीजेपी दिल्ली में हारी तो ये सच है कि केजरीवाल वजीर को मात देंगे और राजा को पहली बार शह. इस शह से बचने का अब एक ही रास्ता है. बाजी अब खुद राजा को लड़नी होगी. मोदीजी अब मिस बेदी का मुखौटा उतार दीजिये. आर पार खुद लड़िये केजरीवाल से. रोज़ रैली करिए गली गली. छोडिये ओबामा को. पहले इस टोपी से बचिए. आपने कभी टोपी नही पहनी .पर कहीं अब पहनने की नौबत न आ जाय. तो मोर्चा खुद संभालिये.क्यूंकि आपका वजीर फेल हो रहा है. इसलिए खुद ही कुछ करिए. जल्दी करिए . कहीं बनारस का स्कोर 1-1 न हो जाए.

वरिष्ठ पत्रकार त्रयी दयानंद पांडेय, शीतल पी. सिंह और दीपक शर्मा के फेसबुक वॉल से.

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तब पंकज श्रीवास्तव की तनी हुई मुट्ठियां लाखों के पैकेज में विश्राम कर रही थीं!

(दयानंद पांडेय)


Dayanand Pandey : पत्रकारिता में गीदड़ों और रंगे सियारों की जैसे भरमार है। एक ढूंढो हज़ार मिलते हैं। जब लोगों की नौकरियां जाती हैं या ये खा जाते हैं तब तक तो ठीक रहता है। लोगों के पेट पर लात पड़ती रहती है और इन की कामरेडशिप जैसे रजाई में सो रही होती है। लेकिन प्रबंधन जब इन की ही पिछाड़ी पर जूता मारता है तो इन का राणा प्रताप जैसे जाग जाता है।

देखिए कि आईबीएन सेवेन के पंकज श्रीवास्तव कैसे तो अपनी मुट्ठी तानने का सुखद एहसास घोल रहे हैं। लेकिन जब अभी बीते साल ही जब सैकड़ो लोग आईबीएन सेवेन से एक साथ निकाल दिए गए थे तब इनकी यह तनी हुई मुट्ठियां इन के लाखों के पैकेज में विश्राम कर रही थीं। कमाल है! ऐसे हिप्पोक्रेसी के मार पर कौन न कुर्बान हो जाए! पढ़िए ये क्या लिख रहे हैं अपने फेसबुक वॉल पर…

”बहरहाल मेरे सामने इस्तीफा देकर चुपचाप निकल जाने का विकल्प भी रखा गया था। यह भी कहा गया कि दूसरी जगह नौकरी दिलाने में मदद की जाएगी। लेकिन मैंने कानूनी लड़ाई का मन बनाया ताकि तय हो जाये कि मीडिया कंपनियाँ मनमाने तरीके से पत्रकारों को नहीं निकाल सकतीं। इस लड़ाई में मुझे आप सबका साथ चाहिये। नैतिक भी और भौतिक भी। बहुत दिनों बाद ‘मुक्ति’ को महसूस कर रहा हूं। लग रहा है कि इलाहाबाद विश्वविदयालय की युनिवर्सिटी रोड पर फिर मुठ्ठी ताने खड़ा हूँ।”

भड़ास पर भी इनकी असलियत पढिए… यहां क्लिक करिए…

https://bhadas4media.com/edhar-udhar/3407-kachra-pankaj

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय के फेसबुक वॉल से.


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