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सियासत

संपादक बिक गए, टिकैत टिक गए!

रंगनाथ सिंह-

कल मेरा यह यकीन और पक्का हो गया कि कोई भी निर्णायक राजनीतिक लड़ाई वही नेता लड़ सकता है जिसके पास अपनी जनता हो। किसान आंदोलन को सबवर्ट और सबोटॉज करने के कॉपी-बुक तरीके आजमाने के बाद सरकार आश्वस्त हो गयी होगी कि अब यह मामला निपट गया। तभी पासा पलट गया। देर शाम यह लगभग तय माना जा रहा था कि आज पुलिस गाजीपुर सीमा खाली करायेगी। उसी दौरान एक पत्रकार राकेश टिकैत से गाजीपुर सीमा पर बात कर रहे थे। बातचीत का एक अंश देखिए-

पत्रकार- ये लोग (प्रशासन) जो कह रहे हैं आप को खाली करने के लिए..
टिकैत- खाली करवाना है करवा लो खाली, मैं कहाँ मना कर रहा हूँ।
पत्रकार- आप गिरफ्तारी देंगे
टिकैत- करवा लो ना खाली..पुलिस है, प्रशासन है, ताकत है करवा लो खाली
पत्रकार- यूपी में कई जगहों से किसान वापस चले गये धरने से, एक आप बचे हैं तो आपको क्या लगता है उन लोगों ने आपका साथ छोड़ दिया।
टिकैत- चले गये होंगे, मैं क्या करूँ।
पत्रकार- लेकिन राकेश टिकैत बने रहेंगे?
टिकैत- हम रहेंगे, मैं देश के किसानोें के साथ हूँ। जिन इशू के लिए आया था उसके बिना गाँव नहीं जाऊँगा।
पत्रकार- अगर यूपी पुलिस ने उठाया
टिकैत- उठा लो। उठा ले जाओ।

जहाँ तक मैंने महसूस किया टिकैत सबसे ज्यादा इस बात से आहत थे कि कथित तौर पर बीजेपी के विधायक अपने दो-चार सौ समर्थकों के साथ धरनास्थल पर पहुँचकर मारपीट का माहौल बनाने लगे। टिकैत का ईगो इससे बहुत ज्यादा हर्ट हुआ- वो भावुक होकर कह रहे थे- हमारे बुजुर्गों को मारोगे!

टिकैत के आत्मविश्वास की बड़ी वजह उनका यह यकीन भी है कि गाँव से लोग आएँगे। टिकैत को मालूम है कि उनके लिए हजारों लोग गाँव से गाजीपुर तक आ सकते हैं। लाल किले के प्रहसन के बाद एक चीज यह भी हुई कि पहले से ही संदिग्ध माने जा रहे कई किसान नेता और संगठन आंदोलन से अलग हो चुके हैं। अब जो बचेंगे वो ज्यादा ठोस इरादे के साथ यहाँ मौजूद होंगे। आज दिन भर में जो कुछ होगा उससे तय हो जाएगा कि यह आंदोलन किस दिशा में जाएगा। आज सरकार के क्राइसिस मैनेजमेंट की कड़ी परीक्षा है।

वैसे कल एक अंग्रेजी पत्रकार ने अच्छी पंचलाइन दी- संपादक बिक गये, टिकैत टिक गये।

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