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प्रेस फ्रीडम डे पर इन दो पत्रकारों की चीख क्या सुनी आप ने !

छह सौ दिन से जेल में कैद शौकन ने चिट्ठी में लिखा – मैं एक पत्रकार हूं, अपराधी नहीं. महमूद अबु जैद “शौकन” टाइम पत्रिका, डी त्साइट, बिल्ड, मीडिया ग्रुप और ऑनलाइन फोटो एजेंसी डेमोटिक्स जैसे कई प्रकाशकों के लिए सेवाएं दे चुके हैं. 2013 में शौकन मिस्र की राजधानी काहिरा के रबा स्क्वायर में हुई हिंसक झड़पों की रिपोर्टिंग कर रहे थे, जहां अपदस्थ राष्ट्रपति मुर्सी के समर्थकों और सुरक्षा बलों के बीच चल रही मुठभेड़ के दौरान वह गिरफ्तार कर लिए गए. उन पर अब तक आधिकारिक रूप से कोई आरोप तय नहीं हुआ है. लेकिन मामले की सुनवाई से पहले उनकी हिरासत की अवधि को लगातार आगे बढ़ाया जाता रहा है और मुक्त किए जाने की उनकी अपील को खारिज किया जाता रहा है.

छह सौ दिन से जेल में कैद शौकन ने चिट्ठी में लिखा – मैं एक पत्रकार हूं, अपराधी नहीं. महमूद अबु जैद “शौकन” टाइम पत्रिका, डी त्साइट, बिल्ड, मीडिया ग्रुप और ऑनलाइन फोटो एजेंसी डेमोटिक्स जैसे कई प्रकाशकों के लिए सेवाएं दे चुके हैं. 2013 में शौकन मिस्र की राजधानी काहिरा के रबा स्क्वायर में हुई हिंसक झड़पों की रिपोर्टिंग कर रहे थे, जहां अपदस्थ राष्ट्रपति मुर्सी के समर्थकों और सुरक्षा बलों के बीच चल रही मुठभेड़ के दौरान वह गिरफ्तार कर लिए गए. उन पर अब तक आधिकारिक रूप से कोई आरोप तय नहीं हुआ है. लेकिन मामले की सुनवाई से पहले उनकी हिरासत की अवधि को लगातार आगे बढ़ाया जाता रहा है और मुक्त किए जाने की उनकी अपील को खारिज किया जाता रहा है.

वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे के मौके पर “शौकन” ने जेल से ‘डीडब्ल्यू’ को यह पत्र लिखा है –

“वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे के मौके पर, मैं मिस्र के उन पत्रकारों की दुर्दशा की बात आप तक पहुंचा रहा हूं, जो इस दिन को जेल की अंधेरी चारदीवारी में मना रहे हैं. प्रेस की आजादी के मायने हमसे कितने दूर मालूम पड़ते हैं, जब मैं खुद 600 दिन से भी अधिक जेल में बिता चुका हूं और मुझे नहीं पता की ये भयावह अनुभव कब खत्म होगा. और यह सब इसलिये हुआ क्योंकि मैं रबा अल-अदाविया प्रोटेस्ट कैंप को तितर बितर किए जाने की घटना को एक फोटो पत्रकार के तौर पर कवर कर रहा था. किसी वजह से मुझे “अपदस्थ राष्ट्रपति मुर्सी का समर्थक” समझ लिया गया.

”मेरे देश में पत्रकारिता करना एक अपराध बन गया है, हर तरह से एक अपराध. मुस्लिम ब्रदरहुड के साथ सहानुभूति रखने वाले 13 पत्रकारों को आजीवन कारावास की सजा मिली है और एक दूसरे पत्रकार को मौत की सजा सुनाई गई. आखिर विश्व के वे सभी नेता कहां हैं जिन्होंने शार्ली ऐब्दॉ के कार्टूनिस्टों की हत्या के विरूद्ध पेरिस में प्रदर्शन किया था, और लगातार यह मांग की थी कि अभिव्यक्ति एवं प्रेस की स्वतंत्रता को हर हाल में बचाया जाए??

”मैं बेहद कठिन परिस्थितियों में जेल की एक छोटी सी कोठरी में ऐसे रह रहा हूं जिसे कोई जानवर भी ना सहेगा. मुझ पर तमाम बेबुनियाद झूठे आरोप लग रहे हैं और मुझे गिरफ्तार हुए बाकी विरोध प्रदर्शनकारियों के साथ मिला के देखा जा रहा है. दुनिया भर के सभी मीडिया और पत्रकारों से मेरी यही मांग और अनुरोध है कि कृपया मेरी मदद कीजिए, मेरे साथ आइए और मिस्र की सरकार पर मुझे आजाद करने का दबाव बनाइए. मैं एक पत्रकार हूं कोई अपराधी नहीं…मेरी मदद कीजिए!!”

प्रेस फ्रीडम डे पर इसी तरह बांग्लादेशी फोटोग्राफर शाहिदुल आलम बता रहे हैं कि बिना आजादी के काम करने वाली प्रेस केवल अभिप्रचार है. दुर्भाग्य से बांग्लादेशी प्रेस कई तरह के राजनीतिक दबावों और आर्थिक नियंत्रणों में है.

जो प्रेस खुद को बंधनों में जकड़ा पाती है, वह जनमानस का भरोसा जीतने और जनाधार बनाने के सर्वोपरि लक्ष्य को हासिल करने से चूक जाती है. जाहिर है कि एक जिम्मेदार पत्रकारिता में कई तरह के नैतिक बंधनों का तो वैसे भी ध्यान रखना होता है. आजकल जनता समाचार पाने के लिए किसी एक संस्था या स्रोत तक सीमित नहीं रह गई है. सुनी सुनाई बातों से लेकर, दुनिया में घट रही तमाम गलत बातों पर लिखे जा रहे ब्लॉग्स तक, कई ऐसी चीजें हो रही हैं जो बड़े, रसूखदार लोगों को भी जिम्मेदारी के दायरे में रखने का काम करती हैं.

हो सकता है कि प्रेस की आजादी से कुछ चीजें और उलझती दिखें और ऐसे कई लोग भी हैं जो प्रेस को उत्पाती समझते हैं. लेकिन प्रेस को सिर्फ उसी स्थिति में नियंश्रित करने की जरूरत है जब वह नैतिकता की सीमाएं पार करे या उसकी किसी हरकत से जनहानि पहुंचने का खतरा हो. यह अपने आप में एक जटिल मुद्दा है कि असल में प्रेस इन सीमाओं को कब पार कर रही है यह कौन तय करे. ज्यादातर विवाद तो इतने दूर तक पहुंचते भी नहीं है. प्रेस और जनता दोनों ही के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक ऐसा विषय है जिसे सरकारों, कॉर्पोरेशनों, राजनैतिक एवं धार्मिक समूहों जैसी शक्तिशाली ईकाइयों के तमाम प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष खतरों का सामना करना पड़ता है. ऐसा पूरी दुनिया में होता है, लेकिन बांग्लादेश जैसे राष्ट्र में जहां धोखाधड़ी के साये में हुए चुनावों से बनी सरकार की खुद की वैधानिकता पर सवालिया निशान लगा है, वहां विचारों की आजादी का शमन करना न्यायोचित असहमति का गला घोंटने और कट्टरपंथी कार्रवाई को सही ठहराने का एक बड़ा ही सुविधाजनक तरीका लगता है.

जाहिर है, बांग्लादेशी मीडिया में हमेशा से ही कई तरह की वर्जनाएं रही हैं. सेना तो सीमा से बाहर रही ही है, सबसे बड़े विज्ञापनदाता होने के कारण बड़े बड़े टेलीकॉम कॉर्पोरेशनों को मीडिया छेड़ती नहीं है. इसके अलावा भी कई दानदाता समुदाय हैं जिनका ध्यान रखा जाता है. हाल कि दिनों में तो सरकारी मीडिया चैनल भी ढाका सरकार के लिए प्रचार का साधन बन गए लगते हैं. कड़े आलोचकों को टॉक शो में आमंत्रित नहीं किया जाता. एंकरों का इस तरह घुमाकर सवाल पूछना आम है जिससे शासन की बेहतर छवि दिखे.

यह सारे मुद्दे काफी चिंताजनक हैं. मगर, मीडिया कंपनियों, ‘संदिग्ध संपादकों’ को सीधी धमकी मिलना और पत्रकारों, ब्लॉगरों पर हमले करवाना कहीं ज्यादा बड़ी परेशानी है. प्रशासन ने हाल के दिनों में असाधारण तौर पर बहुत बड़ी तादाद में ‘कोर्ट की अवहेलना’ के आरोप लगाए हैं जिससे भी भय का माहौल बन गया है. असहिष्णुता की इस संस्कृति के कारण ही स्वतंत्र विचारों वाले कई लोगों का बेहद हिंसक अंत हुआ है. विवेचनात्मक सोच रखने वालों की सबसे ज्यादा जरूरत आज से ज्यादा कभी महसूस नहीं हुई. और ऐसी सोच रखने वालों के लिए अब से ज्यादा खतरनाक समय भी कभी नहीं रहा.

1955 में बांग्लादेश के ढाका में जन्मे शाहिदुल आलम एक फोटोग्राफर और सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जो अपनी कला का इस्तेमाल गरीबी और आपदाओं से घिरे देश के तमाम सामाजिक और कलात्मक संघर्षों को दर्ज करने के लिए करते हैं.

डीडब्ल्यू से साभार

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