जि‍न हालातों में इस वक्‍त देश भर के भाषाई पत्रकार हैं, अगर वह भ्रष्‍ट नहीं हैं तो वह अधर्मी हैं!

Rohini Gupte : मेरे एक मि‍त्र सहारनपुर में पत्रकार हुए। सहारनपुर के नहीं थे, मगर नौकरी खींच ले गई। तनख्‍वाह तय हुई साढ़े पांच हजार रुपए महीना, साढ़े तीन सौ रुपए मोबाइल और साढ़े छह सौ रुपए पेट्रोल। मित्र महोदय खुश कि चलो फ्रीलांसि‍ंग से तो पांच हजार का भी जुगाड़ नहीं हो पाता था, यहां कम से कम साढ़े छह मिलेंगे। दि‍ल्‍ली से घर बार बीवी लेकर सहारनपुर पहुंचे और ढाई हजार रुपए में एक कमरा कि‍राए पर लि‍या। आठ दस साल पहले की बात है, ‘सस्‍ते’ का जमाना था। साथ में एक साथी पत्रकार काम करते थे, जि‍नका सहारनपुर में ही गांव था। वो गांव से आने वाली आलू प्‍याज में एक हि‍स्‍सा इन्‍हें भी देते, सो बेसि‍क सब्‍जी का भी खर्च कम हो गया। फि‍र भी बचते बचते महीने की बीस तारीख तक वो पैसे खत्‍म हो जाते, जो लाला हर महीने सात दि‍न देर से देता।

इसी बीच बीवी ने एक दि‍न खुशखबरी दी तो पत्रकार महोदय ने मंदि‍र में जुगाड़ लगाकर प्रसाद में चढ़े दो तीन कि‍लो लड्डू हथि‍याए और दफ्तर में सबका मुंह मीठा कराया। साथि‍यों ने जै-जै की, पत्रकार महोदय फूले। मैंने भी देखा, बाइचांस वहीं थी। सबकुछ ठीक चल रहा था कि पांचवे हफ्ते डॉक्‍टर ने कहा कि कुछ भी ठीक नहीं। बीवी को भर्ती कराया, बच्‍चा गंवाया। डॉक्‍टरनी ने तो फीस नहीं ली, मगर साढ़े नौ हजार की दवाइयां लि‍ख दीं। साथी पत्रकारों ने मदद की, फि‍र भी साढ़े चार हजार रुपए की कमी थी। पत्रकार महोदय को वही अधि‍कारी याद आए, जि‍न्‍हें उनके बड़े भाई ने सहारनपुर में उनका लोकल गार्जियन बनाया था। ये पहुंचे उनके पास, लेकि‍न मुश्‍किल ये कि बतौर पत्रकार तो उन्‍होंने उस अधि‍कारी की भी बेजा हरकतें अखबार-ए-आम की हुई थीं। अब बोलें तो बोलें कैसे। बड़ी मुश्‍किल से अटक-अटक कर मुसीबत के बारे में बताया। अंत में मदद की दरख्‍वास्‍त की- यह कहकर कि सात तारीख को पूरी रकम चुका देंगे। अधि‍कारी महोदय ने कहा- सोचेंगे।

पत्रकार महोदय के मुताबि‍क उन्‍हें अंदाजा हो गया था, सो अधि‍कारी के यहां से बाइक लेकर नि‍कले और पहुंचे सीधे मि‍स्‍त्री की दूकान पर। बाइक बेच दी और उसकी जगह ली एक और भी सस्‍ती और तीसरे दि‍न खराब रहने वाली बाइक। बचे हुए पैसों से दवा खरीदी और घर पहुंचे। कुछ समय पहले उनसे बात हो रही थी। बता रहे थे कि लाला ने मजीठि‍या न देने के लि‍ए चार बार साइन कराए हैं। फि‍र उसी अधि‍कारी की याद दि‍लाई। बोले कि दि‍ल्‍ली रोड पर वसूली करते वि‍जलेंस वालों ने पकड़ा। कहने लगे- आप तो वापस चली गई थीं, मगर इस अधि‍कारी ने संपादक के पास लि‍खकर शि‍कायत की थी और मेरी रि‍कॉर्डिंग भी कर ली थी। लेकि‍न रिकॉर्डिंग में भी मैंने कोई गलत बात नहीं की थी, इसलि‍ए संपादक जी ने छोड़ दि‍या। दफ्तर आकर भी उन्‍होंने बहुत हंगामा कि‍या तो संपादक जी ने उनसे कहा कि आप मुकदमा दर्ज कराइए। वो तो पुलि‍स में नहीं गए, मगर अब पुलि‍स उन्‍हें जरूर ले गई।

अब उन्‍हें महीने में साढ़े बारह हजार रुपए तनख्‍वाह, पांच सौ मोबाइल और हजार पेट्रोल के मि‍लने लगे हैं। आलू प्‍याज वैसे ही साथी पत्रकार के गांव से बि‍ला नागा आ जाती है, जैसे आठ दस साल पहले आती थी। पैसे पहले बीस बाइस को खत्‍म होते थे, अब तो 18 तक का भी इंतजार नहीं करते और अगर सात को संडे पड़ गया तो नौ तक ही मि‍लते हैं। हर महीने आधी तनख्‍वाह एडवांस में कटती है। मैंने उनको कई बार कहा कि वि‍चार से जीवन नहीं चलेगा, कुछ कमाई करि‍ए। रि‍पोर्टर हैं तो अधि‍कारि‍यों से या कि‍सी से भी कुछ कमाने की सेटिंग करि‍ए। बोले, एक जगह मैगजीन डि‍जाइन करने का काम मि‍ला है, महीने में दो बार करना है, ढाई दे देंगे। कुल मि‍लाकर वो वैसे कमाने के लि‍ए नहीं मान रहे हैं, जैसे कि मैं कह रही हूं।

बात सहारनपुर के पत्रकार की ही नहीं है, कहानी अकेले एक अखबार की भी नहीं। पहले संपादक भी सबकी सोचते थे, अब तो संपादक वह जीव है जो सबसे ज्‍यादा सैलरी इसलि‍ए लेता है कि पत्रकारों को सबसे कम सैलरी दी जा सके। तुर्रा ये कि पत्रकारि‍ता का ‘त’ भी न पहचानने वाले जब तब उन्‍हें भ्रष्‍ट कहते रहते हैं। जानते हैं, पत्रकार दुनि‍या का अकेला ऐसा जीव होता है जो दुनि‍याभर के लि‍ए आवाज उठाता है, पर खुद के लि‍ए ऐसे खामोश हो जाता है, जैसे कि‍सी ने जबरदस्‍ती उसके मुंह में कपड़ा ठूंसकर बांध दि‍या हो। याद करि‍ए आखि‍री बार शहर में कब पत्रकारों को अपने लि‍ए आवाज उठाते देखा।

पत्रकार अगर भ्रष्‍ट हैं तो मैं कहती हूं कि‍ उन्‍हें और भी भ्रष्‍ट होना चाहि‍ए। तब तक पूरी तरह से भ्रष्‍ट होना चाहि‍ए, जब तक कि उनका और उनके परि‍वार का पेट तीन वक्‍त न भरे। धर्म भी यही कहता है। जि‍न हालातों में इस वक्‍त देश भर के भाषाई पत्रकार हैं, अगर वह भ्रष्‍ट नहीं हैं तो वह अधर्मी हैं। उन्‍हें अपने ही बच्‍चों की भूख भरी आह लगेगी। जि‍स कि‍सी को इस भ्रष्‍टाचार से दि‍क्‍कत है, तो पहले वह पत्रकारों की मदद करना शुरू करें, तभी उनकी भी दि‍क्‍कत खत्‍म होगी, पत्रकारों की भी। कुछ नहीं कर सकते तो कोई पत्रकार मि‍ले तो उसे खाना ही खि‍ला दीजि‍ए। जबरदस्‍ती। पत्रकारि‍ता हमेशा समाज के भरोसे ही आगे बढ़ती आई है, न कि सत्‍ता के। सत्‍ता के भरोसे होती तो सत्‍ता उसे कब की मिटा चुकी होती। चीन में देखि‍ए, मि‍टा ही चुकी है। दि‍ल्‍ली, लखनऊ, पटना, कलकत्‍ता का चश्‍मा उतारकर जरा उन शहरों के पत्रकारों की भी खबर लीजि‍ए, जहां से खबरें आती हैं। जोगेंद्र सिंह और राम चंदेर प्रजापति याद हैं या भूल गए?

रोहिणी गुप्ते की एफबी वॉल से.

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पत्रकारों की उम्र 55 साल होने पर सरकारें इन्हें सत्ता में एडजस्ट करें!

वर्तमान में पत्रकारिता की जो दशा है, उस हिसाब से सरकार को एक उम्र के बाद हर पत्रकार को शासन में एडजस्ट करना चाहिए। दरअसल, आज पत्रकारिता की राह में अनेक बाधाएं आ चुकी हैं। काम का बोझ, तनाव, समस्याएं, अपर्याप्त वेतन तो है ही इसके ऊपर हर वक्त सिर पर नौकरी जाने का खतरा मंडराता रहता है। मुख्य धारा का एक पत्रकार अपने जीवन में इतना परिश्रम और तनाव झेल जाता है कि 50-55 की उम्र के बाद वह किसी काम का नहीं रह जाता है। शायद यही कारण है कि इस उम्र के बाद आज अनेक पत्रकार अपनी लाइन बदलने का असफल प्रयास करते हैं।

हाल ही में उत्तराखंड सरकार ने एक सराहनीय फैसला लेकर वरिष्ठ पत्रकार दर्शन सिंह रावत को मीडिया को-आर्डिनेटर बनाया है। इस फैसले का विरोध नहीं हुआ। इसका अर्थ है कि श्री रावत इस पद के लिए बिल्कुल योग्य हैं और उनकी छवि साफ-सुथरी रही है। श्री रावत सीधे-सरल हैं। वे न राजनीति जानते हैं और न ही इसमें रुचि रखते हैं। हां, यह बात दीगर है कि कई बार ऐसा सीधा आदमी राजनीति का मोहरा बन जाता है। जितनी मेरी उम्र है, लगभग उतने वर्ष उन्हें पत्रकारिता में हो चुके होंगे। मैं जब अमर उजाला चंडीगढ़ में ट्रेनी और जूनियर सब एडीटर था, वे तब शिमला में अमर उजाला मंे सीनियर काॅरोस्पोंडेंट थे। अब तक उन्हें कहीं समूह संपादक बन जाना चाहिए था, लेकिन इसलिए नहीं बन पाए कि वे राजनीतिक लल्लो-चप्पोबाजी और चरणवंदना से बहुत दूर रहते हैं। मुझे खुशी है कि उन्हें सरकार ने उनके योग्य पद दिया, लेकिन सुखद आश्चर्य इस बात का भी है कि दर्शन सिंह रावत जैसा सीधा-सरल व्यक्ति इस पद तक कैसे पहुंचा! क्योंकि ऐसे पद प्रायः राजनीतिक सिद्धहस्त लोगों को ही मिलते हैं। अगर श्री रावत जैसे लोगों को यह मिले तो इसे सरकार की ईमानदार नीति का हिस्सा माना जाना चाहिए।

खैर, उत्तराखंड में ही पत्रकारों को सत्ता में एडजस्ट करने की परंपरा नहीं है। मैं यह हरियाणा में भी देख चुका हूं। दैनिक भास्कर में वरिष्ठ पत्रकार रहे बलवंत तक्षक को 14-15 साल पहले ओमप्रकाश चैटाला सरकार में एडजस्ट किया गया था। लबोलुआब यह कि अगर पत्रकार योग्य, ईमानदार है तो उसके अनुभव का लाभ सरकार द्वारा लिया जाना चाहिए। जो काम सरकार की मोटी तनख्वाह वाले सूचना विभाग के अधिकारी नहीं कर पाते हैं, वह काम एक वरिष्ठ पत्रकार आसानी से कर सकता है। वैसे भी उत्तराखंड का सूचना विभाग पत्रकारों और अखबारों में भेदभाव को लेकर अक्सर चर्चाओं में रहता है। पत्रकारों को मान्यता देने को लेकर यहां क्या खेल चलता है, यह पत्रकारों से छिपा नहीं है। छोटे अखबारों और अखबारों को विज्ञापन देने की तो बात ही छोड़ दीजिए।

मेरा सुझाव यह है कि पत्रकारों की उम्र 55 साल होने के बाद सरकार इन्हें योग्यता और क्षमतानुसार सत्ता में एडजस्ट जरूर करे। शर्त यह कि सरकार पत्रकार को एडजस्ट करते समय गुटीय भावना, पार्टी भावना से ग्रस्त न हो। आज कोई यह कहता है कि फलां पत्रकार फलां मुख्यमंत्री का चहेता रहा तो यह बात सरासर गलत है खासकर बड़े अखबारों के मामले में। क्योंकि बड़े अखबारों में सत्ता से संबंध पत्रकार का नहीं, सीधे प्रबंधन और मालिकों का होता है। आज कोई योग्य पत्रकार सत्ता का अंग बनता है तो पत्रकारों को ईर्ष्या के बजाय खुश होना चाहिए। जब आठवीं फेल कोई आदमी अपनी पार्टी की सत्ता आने पर राज्यमंत्री बन सकता है तो एक पत्रकार क्यों न शासन का अंग बने!  जीवनभर लोकतंत्र के चैथे स्तंभ की भूमिका निभाने के बाद अंततः उसे भी सुविधासंपन्न नागरिक का जीवन जीने का हक होना चाहिए। खासकर उसके परिवार को।

डॉ. वीरेंद्र बर्त्वाल
देहरादून
veerendra.bartwal8@gmail.com

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रवीश के इस प्राइम टाइम शो को हम सभी पत्रकारों को देखना चाहिए

एनडीटीवी इंडिया पर कल रात नौ बजे प्राइम टाइम शो के दौरान रवीश कुमार ने पत्रकारों की विश्वसनीयता को लेकर एक परिचर्चा आयोजित की. इस शो में पत्रकार राजेश प्रियदर्शी और प्रकाश के रे के साथ रवीश ने मीडिया और पत्रकार पर जमकर चर्चा की.

आजकल भारत में जब सत्ता परस्त रिपोर्टिंग को ही पत्रकारिता माना जाने लगा है और सरकार पर सवाल करने वालों को संदेह की नजर से देखा जाता है, रवीश का यह शो हम सभी को एक बार फिर से पत्रकारिता की मूल भावना, मूल आत्मा की तरफ ले जाने का काम किया है और अपने भीतर झांकने को प्रेरित किया है. यह चर्चित प्राइम टाइम डिबेट देखने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=eDUADSnA7so

सोशल मीडिया के चर्चित युवा लेखक नितिन ठाकुर क्या कहते हैं, पढ़िए….

Nitin Thakur : रवीश कुमार अकेले हैं जो टीआरपी को ताक पर रख दर्शक और पाठक को भी ऑन एयर और ऑन मंच लताड़ सकते हैं। इसके लिए जो चाहिए उसे ‘ईमान’ कहते हैं। ये सुविधा हर किसी को नहीं मिलती। इसे हासिल करना पड़ता है मेहनत करके।

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पत्रकार बंधु जान लें.. आपकी छुट्टी और ड्यूटी टाइम क्या होनी चाहिए

शशिकांत सिंह

कल एक मराठी दैनिक के पत्रकार भाई का फोन आया। उन्होंने बताया प्रबंधन उनसे 9 घंटे ड्यूटी कराता है। क्या करना चाहिए। ऐसे तमाम सवाल पूछे जाते हैं। कुछ के जवाब तुरंत देता हूँ लेकिन कुछ के लिए डॉटा खोजना पड़ता है। दोस्तों आपको बता दें कि वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट का चैप्टर 3 साफ़ कहता है कि दिन में 6 घंटे से ज्यादा ड्यूटी नहीं ली जा सकती और चार घंटे से ज्यादा लगातार काम नहीं कराया जा सकता। दूसरी चीज, चार घंटे के बाद कर्मचारी को 30 मिनट का रेस्ट मिलना चाहिए।

इसी तरह नाइट शिफ्ट में साढ़े पांच घंटे से ज्यादा ड्यूटी टाइम नहीं होनी चाहिए। इसमें साढ़े तीन घंटे बाद 30 मिनट का कर्मचारी को रेस्ट मिलना चाहिए। इसी तरह चैप्टर 3 की धारा 10 कहती है अगर किसी कर्मचारी ने जितने घंटे अतिरिक्त काम किया है, उतने घंटे उसे अतिरिक्त अवकाश दिया जायेगा। वर्किंग जर्नलिस्ट के चैप्टर 3 में धारा 11 कहती है किसी भी कर्मचारी से लगातार एक सप्ताह से ज्यादा नाइट शिफ्ट नहीं कराया जा सकता। अगर ऐसा बहुत आवश्यक हुआ तो सम्बंधित श्रम आयुक्त या सम्बंधित प्राधिकरण से लिखित अनुमति लेनी पड़ती है और इसकी ठोस वजह बतानी पड़ती है।

आपको बता दूं कि देश भर के अधिकाँश समाचार पत्र प्रतिष्ठान इसका पालन नहीं करते और अपने कर्मचारियों से कई कई साल तक नाइट ड्यूटी कराते हैं जो पूरी तरह गलत है। वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट के चैप्टर 4 में धारा 16 में बताया गया है कि अगर किसी कर्मचारी को उसके अवकाश के दिन बुलाया जाता है तो उसे उस दिन का वेतन दिया जाएगा। बहुत से समाचार पत्र के प्रबंधन अवकाश के दिन अपने कर्मचारियों को बुलाते हैं तो उन्हें वेतन की जगह एक दिन अतिरिक्त अवकाश देते हैं, जो पूरी तरह गलत है।

चैप्टर 4 की धारा 15 में यह भी लिखा है कि सभी कर्मचारियों को साल में 10 सार्वजानिक अवकाश मिलना चाहिए। सार्वजनिक अवकाश के दिन अगर कर्मचारी ड्यूटी करता है तो उस दिन का वेतन देने का प्रावधान है। बहुत सी कम्पनियाँ अपने कर्मचारियों को सार्वजानिक अवकाश के दिन ड्यूटी पर बुलाती हैं मगर उन्हें वेतन न देकर बदले में किसी दूसरे दिन अवकाश देती हैं।

वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट के चैप्टर 5 में लिखा है अगर आपका अवकाश रद्द होता है तो उसकी वजह प्रबंधन को लिखित रूप से कर्मचारी को बताना पड़ेगा। चैप्टर 5 की धारा 20 कहती है सार्वजानिक अवकाश के दिन लिए गए अवकाश को दूसरे किसी भी अवकाश में शामिल नहीं किया जा सकता है। अगर बहुत जरूरी हुआ तो इसके लिए सम्बंधित प्राधिकरण से लिखित अनुमति लेनी पड़ती है।

चैप्टर 5 की धारा 34 में ये भी लिखा है कि सभी कर्मचारियों को साल में 15 दिन का कैजुअल लीव (सीएल) मिलना चाहिए और एक साथ 5 दिन से ज्यादा सीएल नहीं लिया जा सकता। इसको अगले साल भी कैरी फारवर्ड नहीं किया जा सकता। ये नियम संपादक, संवाददाता और न्यूज़ फोटोग्राफर पर लागू नहीं होता, ऐसा चैप्टर 3 की धारा 7 में लिखा है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
मुंबई
9322411335
shashikantsingh2@gmail.com

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Majithia : Wanted Permanent Wage Fixation Machinery

The National Alliance of Journalists Unions at a meeting in Delhi has called for setting up of a permanent wage fixation machinery for periodic revision of wages. It has further called upon the central and state governments to make non-implementation of the current Majithia wage board award a cognizable offence taking in view large scale non-implementation.

The meeting following a national consultation with lawyers, academics, activists and journalists fighting cases for several years has further expressed solidarity with the September 2, 2015 action call by a wide amalgam of trade unions and resolved to join solidarity rallies.

The National Consultation it may be recalled was a united attempt by various bodies like the Press Club of India, Human Rights Law Network, Mumbai Press Club, Delhi Union of Journalists, Indian Women Press Corps.

The NAJ meeting at the DUJ office has expressed solidarity with the national confederation of newspaper and news agencies employees organizations and its attempts to widen unity further. It has further decided to have joint associate ties with the All India Newspaper Employees Federation, with which the DUJ is already associated.

Another resolution condemned increasing attacks on journalists and called for a risk insurance cover for the entire media fraternity. Furthermore, it felt that pension as a third benefit was the need of the hour.

Serious concern was expressed at the plight of journalists in the TV networks also with the demand for the Working Journalists Act to be extended to the entire media. A doubling of unfair labour practices was taken note of.

The meeting fully endorsed the strong condemnation of the national consultation on the I&B ministry show cause notice to three leading channels viz ABP news, NDTV and Aaj Tak for their coverage of the Yakub Memon hanging. It also noted the prompt reaction of the Editors Guild on the issue.

S. K Pande, General Secretary, DUJ, On Behalf of the National Alliance of Journalists Unions from Delhi

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Joint Statement by Journalists’ Bodies Condemning I&B Ministry Show Cause Notice to TV Channels

The Press Club of India, Indian Women’s Press Corps, Mumbai Press Club, Guwahati Press Club, Brihadmumbai Union of Journalists and Delhi Union of  Journalists condemn the government’s attempt to intimidate the media by issuing show-cause notices to three leading TV channels, ABP News, NDTV 24×7 and Aaj Tak, for their coverage of Yakub Memon’s hanging. 

It is shameful that cable TV rules have been invoked to question the right of the media to air views or do stories that run contrary to the decisions of the government and the Supreme Court on capital punishment in general and Memon’s case in particular.

We are shocked that the Information and Broadcasting Ministry is party to such an assault on free speech. 

The action betrays an insecurity and intolerance on the part of the government. We urge Prime Minister Narendra Modi to intervene and immediately withdraw the notices which had been issued in the context of Yakub’s hanging.

The government should respect the media’s responsibility to reflect diverse opinions, even on sensitive issues such as death penalty, national security and communal harmony.

The fact that Yakub’s funeral went off peacefully nails the suggestion in the show cause notices that the media reports in question had stoked trouble and incited violence.

Issued by Nadeem Kazmi (Press Club of India), T K Rajalakshmi (Indian Women’s Press Club), Jatin Desai (Mumbai Press Club), Nava Thakuria (Guwahati Press Club), Sujata Madhok (Delhi Union of Journalists), Geeta Seshu (Brihatmumbai Union of Journalists).

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पत्रकारों के लिए ipolicy वर्कशॉप, चार से छह सितंबर तक

सेंटर फार सिविल सोसायटी (सीसीएस), एटलस नेटवर्क व फ्रेडरिक न्यूमन फाऊंडेशन (एफएनएफ) के संयुक्त तत्वावधान में आजादी.मी लेकर आए हैं पत्रकारों के लिए ipolicy (लोकनीति में सर्टिफिकेट) कार्यक्रम। 4-6 सितंबर, 2015 तक चलने वाली इस कार्यशाला में प्रस्तुति का माध्यम हिंदी होगी। इस कार्यशाला में आवेदन के लिए सभी भाषाओं (हिंदी, ऊर्दू, अंग्रेजी इत्यादि) के सभी माध्यमों (टीवी, रेडियो, समाचार पत्र, पत्रिकाओं इत्यादि) में कार्यरत श्रमजीवी पत्रकार (स्थायी/अस्थायी) स्वीकार्य हैं। 

कार्यशाला में प्रस्तुतिकरण का माध्यम हिंदी होगी। यह कार्यशाला तीन दिवसीय (दो रात, तीन दिन) की होगी जो आवासीय होगी। अर्थात चयनित आवेदकों को पूरे पाठ्यक्रम के दौरान उपस्थित रहना होगा और अपरिहार्य परिस्थितियों के अतिरिक्त पाठ्यक्रम को बीच में छोड़कर जाने की अनुमति नहीं होगी। कार्यशाला के दौरान सामाजिक समस्याओं के मूल कारणों और सरकारी नीतियों के शिक्षा, गरीबों के लिए रोजगार, सुशासन पर होनेवाले परिणामों का जायजा लिया जाएगा। यह पाठ्यक्रम पत्रकारों को खबर खोजने तथा घटनाओं और प्रवृत्तियों के तीक्ष्ण विश्लेषण के लिए नई दृष्टि प्रदान करेगा।

लोक नीति के बारे में समझ बढ़ने से पत्रकार तब ज्यादा सजग और जिज्ञासु हो जाता है जब लोक नीतियों के इरादों और उसके गैर इरादतन परिणामों के बीच फर्क करना होता है। अक्सर इस बात की उपेक्षा की जाती है कि नीतियों की विकास की समस्याओं और सामाजिक संघर्ष पैदा करने में सीधी भूमिका होती है। सेंटर फार सिविल सोसायटी का उद्देश्य यह समझ पैदा करना है कि किस तरह सामाजिक समस्याएं वर्तमान नीतियों का परिणाम हैं या वह गैर अच्छी नीतियों के कारण बिगड़ती जा रही हैं। सामाजिक बदलाव को प्रभावित करने के लिए लोक नीति पर ध्यान केंद्रित करके आई पालिसी भारतीय पत्रकारिता की गुणवत्ता और नैतिक आधार को मजबूत बनाना चाहती है।

पत्रकारों के लिए कुछ बुनियादी लाभ

• भारत के प्रमुख जनमत निर्माताओं ,समीक्षकों,ब्लागरों और रिपोर्टरों से संपर्क और उनके अनुभवों के बारे में जानने का अवसर। साथ ही पब्लिसिटी,एडवोकेसी और रिपोर्टिंग तकनीक की नवीनतापूर्ण जानकारी।

• वर्तमान सामाजिक समस्याएं और शासन की स्थिति को सुधारने और सभी गुणवत्तापूर्ण सेवाएँ मुहैया कराने  में सरकार,बाजार और सिविल सोसायटी की भूमिकाओं को परिभाषित करना।

• वस्तुनिष्ठ तथ्यों और आत्मनिष्ठ दृष्टिकोणों के अंतर को स्पष्ट करना।

मीडिया संस्थाओं को बुनियादी लाभ 

रिपोर्टिंग की गुणवत्ता में सुधार, जैसे मुख्य मुद्दों के गहन विश्लेषण के द्वारा तथ्यों और राय के बीच के घालमेंल को कम करना,और पाठकों को वास्तविक और समसामयिक समाधानों से अवगत कराना।लोक नीति और विकास की दिशा को तय करने में लोक नीति की भूमिका के बारे में समझ बढ़ाना। नीति निर्माताओं को सोचने और सवाल करने के तरीके उपलब्ध कराना ।

पिछले कुछ वर्षों के दौरान दिल्ली, जयपुर, पटना, मसूरी, जिम-कॉर्बेट और गुवाहाटी में इस तरह के पाठ्यक्रम आयोजित किए गए। इनमें एसोशिएट प्रेस, पीटीआई, टाइम्स ऑफ इंडिया, लाइव मिंट, हिंदुस्तान टाइम्स, लोकसभा टीवी, लाइव इंडिया, जी न्यूज, सहारा न्यूज, एनडीटीवी, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, प्रभात खबर, संडे इडियन जैसे मीडिया संगठनों के पत्रकारों ने हिस्सा लिया। इन कार्य़क्रमों में भाग लेने वाले पत्रकारों ने अपने संगठनों में लौटकर अपने साथियों को उन बातों से अवगत कराया जो उन्होंने इन पाठ्यक्रमों में सीखीं थीं और जिन मुद्दों में उनकी दिलचस्पी थी उन पर दीर्घकालिक कार्य़ शुरू किया।

कौन भाग ले सकता है ?

जन माध्यमों (टीवी, रेडियो, अखबार, पत्रिका) में कार्यरत वरिष्ठ संवाददाता, फीचर लेखक, उप संपादक, सह संपादक, प्रोड्यूसर और एंकर को आमंत्रित करता है। प्राप्त आवेदनों में से योग्यता के आधार पर चयन किया जाता है।

कृपया ध्यान दें :

• आवेदन व मनोनयन पत्र प्राप्त करने के लिए लिंक http://ccs.in/register-ipolicy-journalists-sep-2015 को कॉपी कर यूआरएल बॉक्स में पेस्ट करें।  

• चुने गए प्रतिभागियों के लिए पाठ्यक्रम की पूरी अवधि के दौरान उपस्थित रहना होगा। तभी उन्हें लोकनीति के बारे में प्रमाण पत्र दिया जाएगा।

• पाठ्यक्रम में रजिस्ट्रेशन के लिए 500 रुपए का शुल्क लिया जाएगा। कार्यशाला स्थल तक आने जाने, दो रात- तीन दिन ठहरने, नाश्ता, दो समय के भोजन और चाय आदि की व्यवस्था सीसीएस द्वारा की जाएगी।

सभी आवेदन और मनोनयन 20 अगस्त 2015 तक मिल जाने चाहिए।

किसी भी अन्य जानकारी के लिए संपर्क करें अविनाश चंद्र – avinash@ccs.in/9999882477,अथवा 26537456 विस्तार 25 पर संपर्क करें अथवा www.azadi.me पर क्लिक करें…

सेंटर फार सिविल सोसायटी के बारे में

सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की स्थापना 15 अगस्त, 1997 को की गई थी। यह एक दिल्ली स्थित एक स्वतंत्र, लाभ न कमाने वाला, अनुसंधान और शैक्षिक थिंक टैंक है। जो नागरिक समाज को पुर्नजीवित करते हुए और राजनीतिक समाज की पुनर्रचना के द्वारा  भारत के समस्त नागरिकों के लिए अवसर और समृद्धि बढ़ाने, जीवन की गुणवता में सुधार लाने के काम में लगा हुआ है। हमारा उद्देश्य है मुख्य नीतिगत मुद्दों विशेषकर  सुशासन, जीविका और शिक्षा के क्षेत्र में बाजार आधारित समाधान और नवीनतापूर्ण सामाजिक समुदायिक संसाधन बनकर लोकनीति के जरिये सुधार लाना। हम अनुसंधान कार्यक्रमों, सेमिनारों और प्रकाशनों के माध्यम से लोगों के विचारों, अभिमतों और विचार पध्दति में परिवर्तन लाने की कोशिश करते हैं। हम सीमित नियंत्रण, विधि सम्मत शासन, मुक्त व्यापार और व्यक्तिगत अधिकारों की हिमायती हैं। सीसीएस अकादमी पत्रकारों, यंग लीडर्स, डेवलपमेंट लीडर्स के लिए शैक्षणिक कार्यक्रमों का आयोजन करती है। जहां प्रतिभागी समाजिक समस्याओं के नीति पर आधारित समाधानों पर मंथन करते हैं।

अविनाश चंद्र के एफबी वाल से

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दगाबाज भास्कर : मीडिया कर्मियों को बनाया ‘एमपी प्रिंटर’ का ‘सीनियर मैनेजमेंट एसोसिएट’

दैनिक भास्कर ने अपने सभी कर्मचारियों को ऐसा धोखा दिया है,जिसे वे अब तक नहीं समझ पाए थे। इन्क्रीमेंट के नाम पर उन्हें जो लेटर दिया गया है, उसके माध्यम से उन्हें ठेकेदारी के तहत ‘एमपी प्रिंटर’ कंपनी का ‘सीनियर मैनेजमेंट एसोसिएट’ कर्मचारी घोषित कर दिया गया है। इस खुली धोखाधड़ी से कर्मचारियों में भारी रोष है।

भास्कर में सैलरी स्लिप निकलने के लिए एक ऑनलाइन सिस्टम है, जिसको पीपल सॉफ्ट बोलते हैं। जब कर्मचारियों ने अपनी सैलरी स्लिप चेक की तो पाया कि कंपनी ने धोखे से उनकी पिछले एक साल की सैलरी स्लिप में कंपनी का नाम चेंज कर दिया है। कई एक कर्मचारी ऐसे हैं, जो हर महीने अपनी सैलरी स्लिप समय से निकालकर चेक कर लिया करते हैं। 

जब उन्होंने पुरानी सैलरी स्लिप को नई सैलरी स्लिप के साथ मिलाया तो पाया कि कंपनी ने पूरा ऑनलाइन डाटा ही बदल दिया है, जो कि गैर क़ानूनी है। इसके अलावा कंपनी ने अबकी बार सभी विभागों की पुरानी सभी पोस्ट ख़त्म कर सभी को ‘सीनियर मैनेजमेंट एसोसिएट’ नाम की पोस्ट दे दी है। 

इसके बारे में गूगल सर्च से भी जानकारी नहीं मिल सकती है कि ये ‘सीनियर मैनेजमेंट एसोसिएट’ होता क्या है। जो लोग ये सोचे बैठे हैं कि वो DBCORP के कर्मचारी हैं, और मजेठिया के हकदार हैं तो वे इसको अपने दिल से निकल दें क्योंकि अब वे प्रिंट मीडिया के कर्मचारी ही नहीं हैं। जब से कर्मचारियों को ये सब पता चला है, उनमें भारी रोष है। 

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मुंबई के बीयर बारों के नाश के लिए लड़ाई में उतरे एकजुट पत्रकार, सीएम फडणवीस ने दिया जांच का आदेश

मुंबई (महाराष्ट्र) : मीरा भाईंदर में पत्रकार राघवेंद्र दूबे की हत्या के प्रकरण को पत्रकारों के मुखपत्र भड़ास4 मीडिया में जगह देने के लिए आभार जताते हुए पत्रकार भरत मिश्रा ने बताया है कि इस मामले में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने अपने अधिनस्थ प्रशासनिक उच्च-अधिकारियों को जांच के लिए सौंप दिया है. अफसोस है की स्थानीय मीरा भाईंदर महानगर पालिकe अब भी अवैध बीयर बार पर कारवाई नहीं कर रही । उल्टे मनपा में बने पत्रकार कक्ष को ही ताला जड़ने की मंगलवार को कोशिश की गई, जिससे पत्रकार की आवाज़ दब जाए. 

मीरा- भाईन्दर में पत्रकार राघवेंद्र दूबे की हत्या के बाद भी प्रशासनिक तौर पर जो कारवाई होनी चाहिए, वह अभी पूरी तरह से नहीं हुई है. जिस बीयर बार की संलिप्तता इस मामले में है, वह अवैध है, जिसे महानगर पालिका के आयुक्त ने भी मानते हुए कारवाई का वादा किया था।

जर्नलिस्ट एक्शन कमिटी – मीरा भाईन्दर के मुताबिक वादे सिर्फ वादे ही रहे, कारवाई से कोसों दूर हैं. मंगलवार को मीरा भाईन्दर महानगर पालिका में कारवाई की मांग करने गए पत्रकारों को आयुक्त महोदय ने कोई जवाब तो नहीं दिया, लेकिन मनपा भवन के पत्रकार कक्ष को जरूर ताला जड़वाने की कोशिश की.

पत्रकार की जघन्य हत्या और उसके बाद प्रशासनिक लाल फीताशाही के खिलाफ अंत में मीरा भाईन्दर के पत्रकार बुधवार 22-07-2015 की सुबह 10-00 बजे मीरा भाईन्दर महानगर पालिका के समक्ष मूक धरना आंदोलन कर रहे हैं. इस आंदोलन का एक मात्र उद्देश्य व्हाईट हाऊस बीयर बार पर मनपा की तोड़क कारवाई है. हमारा मानना है कि अब यह अवैध बीयर बार हमारे शहर के लिए एक गंदी गाली बन गए हैं. जिसका सच हमें मीरा-भाईन्दर से बाहर जाने के बाद तब पता चलता है, जब लोग हमें बीयर बार के शहर वाला कहकर बुलाते हैं. हम इस गंदगी का पूरी तरह से नाश चाहते हैं.इ सीलिये हमने यह कदम उठाया है.

यह आंदोलन एक पत्रकार की जघन्य हत्या और राज्य में पत्रकारों पर हो रहे हमलों के विरोध में ही है, क्योंकि अन्याय की मुखालफत गलत को पूरी तरह से नष्ट करने से ही होगी. आंदोलन को मुंबई, ठाणे, नई मुंबई, विरार, पालघर के पत्रकार संगठनों का पूरा सहयोग प्राप्त है. 

जुझाऊ पत्रकार भरत मिश्रा से संपर्क – 9870109566, mishrabharat8@gmail.com

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मान्यताप्राप्त संवाददाता समिति का चुनाव टालने पर राजधानी के पत्रकारों का गुस्सा फूटा, शासन और सरकार को नोटिस देंगे

लखनऊ : सिर्फ एक साल के गठित उत्तर प्रदेश मान्यताप्राप्त संवाददाता समिति का चुनाव पिछले तीन सालों से मनमाना तरीके से संगठन के पदाधिकारियों द्वारा ही लगातार टाले से राजधानी के वरिष्ठ पत्रकारों में भारी रोष है। एनेक्सी मीडिया सेंटर में इस संबंध में हुई एक बैठक पत्रकारों ने तय किया कि इसके खिलाफ मुख्यमंत्री, राज्यपाल, प्रमुख सचिव सूचना, प्रमुख सचिव विधानसभा आदि को लिखित नोटिस देकर पूछा जाएगा कि क्या किसी कार्यकारिणी को स्वतः अपना कार्यकाल बढ़ाने का अधिकार है। यदि नहीं तो क्यों न कार्यकारिणी को निष्क्रिय मानते हुए उनके पदाधिकारियों को किसी भी सरकारी कांफ्रेस अथवा प्रोग्राम में अधिकृत तरीके से न बुलाया जाए। गौरतलब है कि हेमंत तिवारी समिति के प्रदेश अध्यक्ष एवं सिद्धार्थ कलहंस सचिव हैं।

   

एनेक्सी मीडिया सेंटर में सोमवार अपराह्न चार बजे राजधानी के वरिष्ठ पत्रकारों की महत्वपूर्ण बैठक के दौरान उत्तर प्रदेश मान्यताप्राप्त संवाददाता समिति की कार्यकारिणी के सदस्य शरद प्रधान और मुदित माथुर ने कहा कि हम ने लिखित रूप में कार्यकारिणी के पदाधिकारियों के इस मनमानेपन का विरोध किया है। बताया है कि कार्यकाल समाप्त हो जाने के बावजूद कार्यकारिणी अब वैध कैसे हो सकती है। यदि कार्यकारिणी के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव आदि पदाधिकारी एवं सदस्य ही ऐसा अवैध कार्य करेंगे, मनमाना कार्यकाल बढ़ा लेने की कोशिश करेंगे तो इसका प्रदेश के बाकी पत्रकारों में क्या संदेश जाएगा। 

आक्रोशित पत्रकारों की इस महत्वपूर्ण बैठक के दौरान कार्यकारिणी के कोषाध्यक्ष नीरज श्रीवास्तव भी खामोशी साधकर बैठे रहे। बैठक में वरिष्ठ पत्रकार प्रांशु मिश्रा, जीसान सिद्दीकी, कुमार सौवीर, सुरेश बहादुर सिंह, मुकुल मिश्रा, अमिता वर्मा आदि के अलावा बड़ी संख्या में पत्रकार उपस्थित रहे। समिति की प्रदेश कार्यकारिणी के हेमंत तिवारी अध्यक्ष, सत्यवीर सिंह और नरेंद्र श्रीवास्तव उपाध्यक्ष, सिद्धार्थ कलहंस सचिव, देवकीनंदन मिश्रा और राजेश शुक्ला संयुक्त सचिव, नीरज श्रीवास्तव कोषाध्यक्ष एवं दस वरिष्ठ पत्रकार सदस्य हैं।  

बैठक में वरिष्ठ पत्रकारों ने कहा कि अब इस मनमानेपन को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उ.प्र. मान्यताप्राप्त संवाददाता समिति का जब वर्ष 2012 में गठन हुआ था, तो लिखित तौर पर पहले से तय था कि कार्यकारिणी का कार्यकाल सिर्फ एक वर्ष होगा। अध्यक्ष समेत अन्य पदाधिकारियों की मनमानी से एक-एक साल कर इसका कार्यकाल अवैध तरीके से बढ़ाते हुए संगठन पर कब्जा जमाने रखने का दुष्प्रयास किया जा रहा है। पिछले तीन वर्षों से वही पुरानी कार्यकारिणी सक्रिय है। कई बार एनेक्सी तक में नोटिस लगाकर इसका लिखित विरोध किया गया मगर उसे भी पदाधिकारियों ने फड़वा दिया। लंबे समय कमेटी के चुनाव की मांग करते हुए लगातार विरोध जताया जा रहा है। कार्यकारिणी ही ऐसा करेगी तो प्रदेश के पत्रकारों में इसका क्या संदेश जाएगा। कार्यकारिणी के पदाधिकारी स्वतः मीटिंग कर कार्यकाल बढ़ा ले रहे हैं। ये कत्तई अवैध है। क्या कोई कार्यकारिणी स्वतः अपना कार्यकाल बढ़ा सकती है। 

बैठक में तय हुआ कि लिखित रूप से इस संबंध में प्रदेश के मुख्यमंत्री, राज्यपाल आदि के अलावा प्रमुख सचिव सूचना नवनीत सहगल, प्रमुख सचिव विधानसभा प्रदीप दुबे आदि को लिखित नोटिस देकर पूछा जाएगा कि क्या किसी कार्यकारिणी को स्वतः अपना कार्यकाल बढ़ाने का अधिकार है। यदि नहीं तो क्यों न कार्यकारिणी को निष्क्रिय मानते हुए उनके पदाधिकारियों को किसी भी सरकारी कांफ्रेस अथवा प्रोग्राम में अधिकृत तरीके से न बुलाया जाए। साथ ही चुनाव होने तक कार्यकारिणी को निष्क्रिय घोषित कर दिया जाए। 

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पत्रकार राघवेंद्र दुबे की हत्या से गुस्से की लहर, पुलिस के सामने मरवा दिया बार माफिया ने

मुंबई : देश के दुख के साथ महाराष्ट्र के मीरा-भाईंदर के पत्रकारों का दुख भी जुड़ गया है. उनका मन क्षुब्ध है, आक्रोशित हैं और शब्द बिखरे से हैं. एक पत्रकार की जघन्य हत्या कर दी गई है जबकि दो पत्रकार अस्पताल में गंभीर घायलावस्था में हैं. शेष मुख्यमंत्री को लिखा पत्र सब कुछ बयान कर देता है। 

मीरा भाईंदर में पत्रकारों पर जानलेवा हमले और हत्या के संबंध में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस लिखे ताजा पत्र में इस आपराधिक मामले का सच इस तरह पता चलता है। मीरा-भाईंदर रोड पर गत गुरूवार की रात ह्वाईट हाऊस बीयर बार पर रात बारह बजे के आसपास पुलिस छापे के दौरान घटना को कवर करते हुए तीन पत्रकारों पर जानलेवा हमला किया गया. सुबह होते होते युवा पत्रकार राघवेंद्र दुबे की हत्या हो गई. यह मामला पुलिस और बीयर बार माफिया की साठगांठ से जुड़ा है, क्योंकि बीयर बार और लॉजों के शहर मीरा-भाईंदर में पुलिस और बार मालिकों की दोस्ती से लोकतंत्र का चौथा खंभा टूट रहा है. 

मीरा रोड में गुरूवार को पत्रकारों के साथ बार के गुंडों की दबंगई पांच घंटे तक चलती रही. राघवेंद्र दुबे को हमले के बाद डेढ़ बजे रात के करीब डीवाईएसपी सुहास बावचे ने बुलाया था. रेड कवर करने गए संतोष मिश्रा, शशि शर्मा और अनिल नौटियाल पर जानलेवा हमला डेढ़ बजे के आस पास हुआ, जबकि राघवेंद्र दुबे की हत्या छह बजे सवेरे हुई. इस दौरान साढ़े पांच घंटे तक मीरा रोड पुलिस लीपापोती करती रही और पत्रकार पिटते रहे. पुलिस की नींद आखिर छह बजे खुली, जब राघवेंद्र की लाश एसए रेसिडेन्सी के बाहर एसके स्टोन पुलिस चौकी के सामने पड़ी मिली। 

इस घटना से हड़बड़ाए प्रशासन ने आनन फानन में कुछ लोगों को हिरासत में भी ले लिया। हमलावर वही लोग हैं जिनका नाम संत़ोष मिश्रा और शशि शर्मा ने अपने बयान में लिया है. इस मामले में खास बात है कि पत्रकार संतोष ने अपने बयान में पीएसआई दिवाकर और दो पुलिस कॉस्न्टेबल का जिक्र किया है जिनकी उपस्थिति में संतोष मिश्रा को पीटा जा रहा था और दिवाकर सलाह दे रहा था कि इसको अंदर ले जाकर मारो। इसके बाद न सिर्फ संतोष मिश्रा की पिटाई की गई बल्कि उन्हें जान से मारने की नीयत से मीरा रोड से करीब एक सौ दस किलोमीटर दूर अपहरण करके ले जाया गया. घटना की सूचना पाकर जब कुछ पत्रकार मौके पर पहुंचे और उन्होंने संतोष मिश्रा को ढूंढना शुरू किया, तब जाकर बड़ी मुश्किल से अपहरणकर्ताओं से संपर्क हो पाया और रिहाई संभव हुई. इस मामले में पुलिस ख़ामोश ही रही. 

राघवेंद्र की हत्या और तीन पत्रकारों पर जानलेवा हमले को लेकर पत्रकारों और स्थानीय नागरिकों में भारी गुस्सा है. मीरा रोड के सुरभि हाल में राघवेंद्र दुबे की आत्मा की शांति के लिए श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया जिसमें मुंबई, नई मुंबई, ठाणे और मीरा-भाईन्दर के करीब दो सौ पत्रकार शामिल हुए. इस सभा में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित करके सरकार से कड़ी कारवाई करने की मांग की गई. प्रस्ताव में पास की गई मांगें निन्मलिखित हैं-

1. मीरा-भाईन्दर क्षेत्र के पुलिस उपाधिक्षक की इस मामले में संलिप्तता की जांच और मीरा रोड पुलिस थाने से संबद्ध वरिष्ठ पुलिस निरिक्षक, पुलिस उप निरिक्षक दिवाकर और सिपाहियों का निलंबन और जांच समिति का गठन कर मामला दर्ज किया जाए.

2. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस घटना में मारे गए राघवेंद्र दुबे के परिवार से मिलें और शांत्वना के तौर पर आश्रितों को पच्चीस लाख रूपए की आर्थिक सहायता दें.     

3. मृत राघवेंद्र दुबे की पत्नी को सरकारी नौकरी दी जाए.

4. इस हमले में घायल पत्रकार संतोष मिश्रा, शशि शर्मा और चश्मदीद अनिल नौटियाल की सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम किया जाए.

5. इस मामले के आरोपियों पर मकोका के तहत कारवाई की जाए.

6. राज्य में पत्रकारों पर हो रहे हमलों के खिलाफ पत्रकार हमला विरोधी कानून शीघ्र बनाया जाए.  

लेखक एवं पत्रकार भरत मिश्रा से संपर्क : 9870109566, mishrabharat8@gmail.com

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मजीठिया : अखबार मालिकों से अपना हक मांगें, झारखंड में भी पत्रकारों के लिए विज्ञापन प्रकाशित

झारखंड : इस समय देश के विभिन्न राज्यों में मजीठिया वेतनमान के संबंध में जारी सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के तहत श्रम विभाग अखबारों की वैतनिक हकीकत खंगालने में जुटा हुआ है। इसके लिए सीधे कोर्ट ने राज्य सरकारों को कड़े निर्देश जारी कर रखे हैं। इसके तहत झारखंड में भी अखबार के जिन साथियों का मजीठिया वेज बोर्ड के तहत पैसा बकाया है, अखबार मालिकों से उसकी वसूली के लिए वे झारखंड सरकार के पास आवेदन कर सकते हैं। सरकार की ओर से इसका विज्ञापन प्रकाशित करा दिया गया है।

पत्रकारों की सुविधा के लिए सरकार की ओर से जारी विज्ञापन और आवेदन फार्म का फार्मेट यहां प्रस्तुत हैं- 

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‘पत्रकार सुरक्षा कानून’ बनाने पर विचार करेगी महाराष्ट्र सरकार, सीएम का आश्वासन

महाराष्ट्र में मिडिया पर बढ़ते हमले से  संतप्त प्रत्रकारों ने समूचे राज्य में  घंटानाद आंदोलन किया और महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फडणवीस, विपक्ष के नेता राधाकृष्ण विखे पाटील तथा धनजंय मुंडे को 15, 000 एसएमएस भेजकर अपना आक्रोश प्रकट किया. भेजे गये सभी एसएमएस में ‘वुई वाँन्ट प्रेस प्रोटेक्शन ऍक्ट’ की मांग की गई . दिनभर आने वाले एसएमएस से मोबाईल जॅाम हो गये थे, यह जानकरी सीएम तथा विपक्ष के नेताओं ने मंत्रालया वार्ताहर संग के एक कार्यक्रम में दी.

मांगपत्र सौंपते महाराष्ट्र के आंदोलनकारी पत्रकार

महाराष्ट्र 2015 के पहले सात माह मे 43 पत्रकार पीटे जा चुके हैं. पत्रकारों पर झूठे केस दाखिल कर मिडिया की आवाज बंद करने की कोशिश राज्य में खुलेआम हो रही है. इससे मिडियाकर्मी काफी मुश्कील का सामना कर रहे हैं. मिडिया पर हो रहे हमले रोकने के लिए पत्रकार सुरक्षा कानून बनाने की मांग को लेकर कृति समिति महाराष्ट्र में पिछले आठ साल से आंदोलन चला रहे हैं, लेकिन इससे पहले की सरकार ने भी पत्रकारों की इस मांग की अनदेखी की.

बताया गया है कि अब फडणवीस सरकार भी पत्रकारों की मांग को गंभीरता से नहीं ले रही है. अब विपक्ष के नेता पाटील और मुंडे ने पत्रकार सुरक्षा कानून बनाने की मांग सरकार से की है. इस पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस विषय पर सरकार की तरफ से सकारात्मक निर्णय किए जाने का आश्‍वासन दिया है. पत्रकार हमला विरोधी कृति समिति के एक प्रतिनिधि मंडल ने एस एम देशमुख के नेतृत्व में  फडणवीस और विपक्ष के दोनों नेताओं से मुलाकात कर राज्य में पत्रकार सुरक्षा कानून बनाने की मांग की है.

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मान्यता प्राप्त पत्रकार समिति की मीटिंग में खूब लंबी-लंबी छोड़ गए वक्ता-प्रशासक

 अलीगढ़ : पिछले दिनो यहां जिलाधिकारी ने मान्यता प्राप्त पत्रकार स्थायी समिति की मीटिंग ली, जिसमें केवल न्यूज चैनलों के कुछ पत्रकार और जागरण के नवीन सिंह (उर्फ नवीन पटेल) पहुंचे। अमर उजाला, हिंदुस्तान से कोई पत्रकार शामिल नहीं हुआ। ऐसी स्थायी पत्रकार समिति की मीटिंग का क्या औचित्य रहा होगा, ये तो वही जानें, जो बैठक में लंबी लंबी छोड़ रहे थे और वे भी, जो उन्हें टुकर-टुकर ताक-सुन रहे थे।  

नव गठित जिलास्तरीय पत्रकार स्थायी समिति की पहली बैठक में प्रशासकों ने खूब लंबी-चौड़ी हांकी। डीएम डॉ. बलकार सिंह ने कहा कि पत्रकारों का उत्पीड़न नहीं होने दिया जाएगा। समिति के पदेन सदस्य वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक जे. रविंद्र गौड़ ने कहा कि पुलिस पत्रकारों के उत्पीड़न की शिकायतें प्राप्त होने पर तत्परता से कार्रवाई करेगी। उप निदेशक सूचना/संयोजक सदस्य जिला पत्रकार स्थायी समिति जहांगीर अहमद ने बताया कि समिति के गठन का उद्देश्य पत्रकारों से संबंधित समस्याओं के निस्तारण है। दो जुलाई को ही समिति का गठन किया गया। डीएम ने मान्यता प्राप्त व श्रमजीवी पत्रकारों को समुचित चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराने के लिए मुख्य चिकित्सा अधिकारी व सीएमएस को पत्र भेजने के निर्देश दिए। प्रेस क्लब के लिए भी जगह तलाशने के निर्देश दिए। बैठक में अशोक कुमार नवरतन, आलोक कुमार सिंह, आरपी शर्मा, शंकरदास शर्मा आदि मौजूद रहे।

एक तरफ तो प्रशासनिक अधिकारी और कुछ गिने चुने पत्रकारों ने मीटिंग की खानापूरी निभाई, दूसरी तरफ शहर से प्रकाशित होने वाले अखबारों में कार्यरत लोगों के हितों की अनदेखी करते हुए मजीठिया वेतनमान लागू कराने के मसले पर सब-के-सब चुप्पी साधे हुए हैं। आए दिन यहां के अखबारों में कार्यरत मीडिया कर्मियों का उत्पीड़न हो रहा है, वह सब प्रशासन को दिखाई दे रहा है, न श्रम विभाग को। ऐसी स्थायी पत्रकार समिति की मीटिंग का क्या औचित्य रहा होगा, ये तो वही जानें, जो बैठक में लंबी लंबी छोड़ रहे थे और वे भी, जो उन्हें टुकर-टुकर ताक-सुन रहे थे। 

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित

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होश में आओ मीडिया घरानो, आग लग चुकी है!

लगता है, जिस वक्त की पिछले ढाई दशक से ईमानदार पत्रकारों, जुझारू मीडिया कर्मियों, जनपक्षधर संगठनों को बेसब्री से प्रतीक्षा थी, वह करीब आ रहा है। बात राष्ट्रीय सहारा की हो या दैनिक जागरण की, अब पेड न्यूज के पापियों, लाल कारपेट पर वारांगनाओं के डांस करा रहे सफेदपोश मीडिया धंधेबाजों से हिसाब-किताब बराबर करने का दौर धीरे-धीरे अंगड़ाई ले रहा है। 

मुद्दत बाद सूजे-पेट अजगरों के खोह में भारी खलबली है। हैरत है कि ऐसे वक्त में आजिज आ चुके मीडिया कर्मी फक्र से सर उठा रहे हैं, बेगैरत खबरफरोशों के गिरेबां ऐंठने के लिए आगे बढ़ चुके हैं, जबकि देश में ट्रेड यूनियनों का जमाना लद-सा चुका हो, श्रम कानून अपाहिज हो चुके हों। दैनिक जागरण और सहारा के बहादुर मीडिया कर्मियों के ताजा उभार पर कुछ जानने से पहले आइए, इस लहर के आने की नब्ज टटोल लें। 

निठल्लों, लंपट तत्वों और अपराधियों के बूते शहंशाह बन बैठे ‘सरकार’ नामक हुक्मरानों के साये में पल कर दैत्याकार हो चुका धन-मीडिया जबकि बाजारू पाखंड के चरम से गुजर रहा है, पत्रकारों की आए दिन हत्याएं हो रही हैं, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद बेशर्म मीडिया घराने श्रमजीवी पत्रकारों को उनका हक-हिसाब देने से साफ-साफ मुकर रहे हैं, सोशल मीडिया पर उनकी करतूतों का रोजाना भंडाफोड़ हो रहा है, लाइजनर चेहरे ‘संपादक’ बन बैठे हैं, धूर्ततापूर्ण तरीके से मालदार मालिकान खुद ‘महासंपादक’ के वेश में अट्हास कर रहे हैं, ऐसे में स्वतंत्रता संग्राम जैसा ये वक्त साफ इशारे कर रहा है कि अब आग लग चुकी है, जो बुझाए नहीं बुझने वाली। ये आग मजीठिया वेतनमान न देने के विरोध की, ये आग पत्रकार-हत्याकांडों की मुखालफत की, जुझारू और ईमानदार पत्रकारों के स्वतःस्फूर्त उठ खड़े होने की।         

बड़े संकट के ऐसे वक्त में कुछ गंभीर चिंताएं भी हैं। चाटुकारिता, चालबाजी और नाटकीयता के बूते मालिकान के माल-मत्ते से सहबाई अंदाज में ऐशो-आराम भोग रहे शीर्ष मीडिया कर्मियों, ईमानदार लेखकों, संगठनकर्ताओं की बेशर्म खामोशियां खल रही हैं। लेखकों और संगठनकर्ताओं को छोड़ दें तो ताजा अंगड़ाई पर घुग्घू बने हुए ‘कार्यरत या अवकाश प्राप्त’ संपादकों को अच्छी तरह से पता है कि यह प्रवाह अब कुछ-न-कुछ कर गुजरने वाला है, फिर भी उनके मुर्दा जमीर में रत्ती भर हरकत नजर नहीं आ रही है।   

मजीठिया वेतनमान न देने का हठ कितना भारी पड़ेगा, उससे कितना अंदर तक पत्रकार समुदाय गोलबंद हुआ है, आने वाला वक्त उसे दिनोदिन स्पष्ट करता जाएगा। मीडिया घरानों में जो शीर्ष पदों पर पत्रकारनुमा प्राणी बैठे हैं, और मालिकान के चप्पू चलाते हुए जिस मजाकिया टोन में इस ताजा हवा को ले रहे हैं, याद रखना होगा उन्हें कि जब उनके दौलतबाज पर कोई खलल टूटेगा तो उनकी भी निर्लज्ज तंद्रा सलामत नहीं रह पाएगी। वक्त रहते उनके भी होश में आने की जरूरत है। अपने ही संस्थान के पत्रकार की हत्या की घटना तक की मार्केटिंग कर डालना कैसी घिनौनी हरकत है। ऐसी तमाम लंपट करतूतें वे पत्रकार खुली आंखों देख रहे हैं, जो मजीठिया वेतनमान जैसे मुद्दे पर जूझ रहे हैं। न्यूज रूम के दरवाजे खिड़कियों पर शीशे चढ़ा लेने से उनके शब्द महान नहीं हो जाते हैं। महान शब्द वे ही हैं, जो अपने वक्त के सच से आंखें नहीं चुराते हैं।  

हमें भी इस गलतफहमी में नहीं रहना है कि मजीठिया वेतनमान का संघर्ष बाजारवादी पत्रकारिता को पराजित कर देगा, ये संघर्ष आजादी के आंदोलन की तरह पत्रकारिता को उसके सही अंजाम तक पहुंचा देगा अथवा न्याय पालिका लड़ रहे पत्रकारों की रोटियों का साफ साफ हिसाब करा ही देगी। श्रम विभाग के दफ्तरों तक भ्रष्टाचार का कैसा बोलबाला है, मालिकानों की ताकत कहां-कहां तक है, रोज-रोज पूंजी कितने तरह के खलनायक उगा रही है, अपनी अपनी नौकरी बचाने के प्रति घनघोर आग्रही वेतनजीवी मीडिया कर्मी इस संघर्ष का समवेत स्वर कभी नहीं बन सकेंगे। फिर भी इतना तो तय है कि आने वाले वक्त में अब जो कुछ होगा, इस लहर से आगे होगा। यदि कहीं सचमुच न्याय पालिका से आंदोलनकारियों को अपेक्षित इंसाफ मिल जाता है, फिर तो बात ही कुछ और होगी। इस दौर में सबसे शर्मनाक है उन संगठनों का पत्रकारों की लामबंदी से दूर रहना, जो अपने घोषणापत्रों में अदभुत मानवीयता का गायन करते रहते हैं। और ये भी कुछ कम शर्मनाक नहीं, जो छपास रोग के मारे हुए होने के नाते चारण बाना ओढ़ कर इस पूरे परिदृश्य पर चुप हैं, जैसे उन्हें सांप सूंघ लिया हो। आने वाले वक्त में उनकी भी औकात शब्दों के मदारी से ज्यादा न होगी। 

जयप्रकाश त्रिपाठी

 

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दिल्ली में पत्रकारों ने बिगुल बजाया, पैदल मार्च, पुलिस बल प्रयोग, केंद्र को 15 दिन का अल्टीमेटम

 देश भर में हो रहे पत्रकार उत्पीड़न और पत्रकारों की हत्याओं के विरोध में एनसीआर पत्रकार संघर्ष समिति ने बुधवार को नोएडा से दिल्ली तक पैदल मार्च निकाल कर विरोध जताया। नोएडा से पैदल दिल्ली पहुंचे सैकड़ों की संख्या में पत्रकारों को दिल्ली पुलिस ने तिलक ब्रिज के पास रोक लिया और बल प्रयोग करते हुए उन्हें हिरासत में ले लिया। बाद में जंतर मंतर पर ले जाकर मुक्त किया। वहीं पर दिल्ली पुलिस के माध्यम से केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह को पांच सूत्री मांगों का ज्ञापन सौंपा गया। 

नोएडा से दिल्ली पैदल मार्च पर निकले पत्रकार

 

पत्रकारों के साथ बल प्रयोग करती दिल्ली पुलिस

गौरतलब है कि भड़ास4मीडिया के संस्थापक संपादक यशवंत सिंह, वरिष्ठ पत्रकार राजीव शर्मा, एनसीआर पत्रकार संघर्ष समिति के संयोजक शीशपाल सिंह के नेतृत्व में सैकड़ों की संख्या में पत्रकार सुबह 11 बजे नोएडा स्थित वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक कार्यालय से पैदल यात्रा करते हुए दिल्ली के लिए रवाना हुए। पूर्व सूचना के आधार पर सतर्क रही दिल्ली पुलिस और खुफिया विभाग के अधिकारी नोएडा से ही काफिले के साथ हो लिए। पद यात्रा नोएडा से शुरू होकर अक्षरधाम, यमुना बैंक, आईटीइओ होते हुए तिलक ब्रिज तक पहुंची, जहां दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन कर रहे पत्रकारों को रोक लिया। 

सड़क पर ही धरना देने बैठ गए पत्रकार

दिल्ली पुलिस का कहना था कि प्रदर्शन कर रहे पत्रकार यहीं से वापस हो जाएं मगर प्रर्दशन कर रहे पत्रकार गृह मंत्री राजनाथ सिंह से मिल कर ज्ञापन सौंपने की जिद पर अड़ गए। तीखी नोक झोंक के बाद दिल्ली पुलिस ने बल प्रयोग करते हुए पत्रकारों को हिरासत में ले लिया। जंतर मंतर ले जाया गया। वहां काफी देर तक बहसमुबाहसे के बाद आखिरकार दिल्ली पुलिस के माध्यम से केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह के नाम से ज्ञापन सौंपा गया। 

ज्ञापन में मांग की गई है कि पत्रकारों से संबंधित मुकदमों के तत्काल निस्तारण एवं कार्रवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना की जाए। पत्रकारों की शिकायत पर तत्काल कार्रवाई के लिए पत्रकार आयोग का गठन किया जाए। सभी राज्यों के पुलिस प्रमुखों को तत्काल निर्देशित किया जाए कि स्थानीय पुलिस पत्रकारों के साथ किसी प्रकार का दुर्व्यवहार न करे, साथ ही उनकी शिकायत को तत्काल दर्ज कर उचित कार्रवाई की जाए। किसी भी पत्रकार की हत्या होने पर हत्याकांड की सीबीआई जांच कराई जाए, साथ उसके परिजनों को 50 लाख का मुआवजा और सरकारी नौकरी दी जाए। दुर्घटना में घायल पत्रकारों को मुफ्त चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जाए। 

वरिष्ठ पत्रकार और भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार, मध्य प्रदेश सरकार और केंद्र में बैठी बीजेपी की सरकार पूरी तरह से संवेदनहीन हो चुकी हैं। उन्हें अब कुंभकर्णी नींद से जगाना होगा। हम आने वाले दिनों में सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों को उचित कार्रवाई करने पर विवश कर देंगे। प्रदर्शन के दौरान संघर्ष समिति के संयोजक शीशपाल सिंह ने कहा कि हमने सरकार के सामने अपनी मांग रखी है और उन्हें 15 दिन का अल्टीमेटम दिया है। अगर इन 15 दिनों में सरकार कोई उचित कार्रवाई नहीं करती है तो फिर देश भर के पत्रकार दिल्ली पहुंच कर संसद भवन का घेराव करेंगे। 

वरिष्ठ पत्रकार इकबाल चौधरी ने सरकार को चेतवानी देते हुए कहा कि अगर 15 दिनों में सरकार पत्रकारों के हित में कोई कदम नहीं उठाती है तो आगे इससे भी बड़ा देशव्यापी आंदोलन होगा जिसकी पूर्ण जिम्मेदारी सरकार की होगी। आंदोलन में प्रमुख रूप से संजय शर्मा, अजब सिंह यादव, निरंकार सिंह, जगदीश शर्मा, राकेश पंडित, अंशुमान यादव, नरेंद्र भाटी, ताहिर सैफी, तरूड़ भड़ाना, आदेश भाटी, मनोज वत्स, रविंद्र जयंत, कुमार साहिल, रिंकू यादव, अभिमन्यु पाण्डेय, अम्बरीश गौतम, संजीव शर्मा, राजीव शर्मा, नंदगोपाल वर्मा, उमेश शर्मा, पीके शर्मा, अवनीश शर्मा, धर्मेंद्र वर्मा, ऋषिपाल अरोड़ा, शशांक शेखर पाण्डेय सहित सैकड़ों की संख्या में पत्रकार उपस्थित रहे।  

पत्रकार इक़बाल चौधरी से संपर्क करें : 9999397715

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पत्रकारों की हत्या और उत्पीड़न के विरोध में नोएडा से दिल्ली तक पैदल मार्च, पुलिस ने रोका, सड़क पर धरना

देश भर में पत्रकारों की जघन्य हत्याओं और उत्पीड़न के खिलाफ नोएडा से निकला पत्रकारों का विरोध मार्च आईटीओ के पास प्रगति मैदान-मंडी हाउस से पहले तिलक ब्रिज चौराहे के पास दिल्ली पुलिस ने रोक लिया। विरोध में पत्रकार बीच चौराहे सड़क पर बैठ गए। लंबी हुज्जत नारेबाजी भाषणबाजी के बाद गिरफ्तार कर जंतर मंतर ले जाकर छोड़ दिए गए। तब जंतर मंतर से पहले सड़क जाम कर फिर धरने पर बैठ गए। दिल्ली पुलिस को इन जुझारू दिलेर पत्रकारों ने नाकों चने चबवा दिए। 

बुधवार को नोएडा से दिल्ली तक पैदल मार्च का नेतृत्व करते भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह और वरिष्ठ पत्रकार राजीव शर्मा

बुधवार को नोएडा से दिल्ली तक पैदल मार्च को रोकती दिल्ली पुलिस

पत्रकारों की हत्या और उत्पीड़न के विरोध में बुधवार को नोएडा से दिल्ली तक निकला पैदल मार्च

आखिर में लंबी भाषणबाजी के बाद दिल्ली पुलिस के अधिकारी को ज्ञापन देकर आंदोलन को अगले चरण में ले जाने का फैसला किया गया। कुल मिलाकर यह स्वतःस्फूर्त पद यात्रा विरोध प्रदर्शन का कार्यक्रम बेहद सफल रहा। शर्मनाक यह रहा कि न्यूज़ चैनल वाले और अखबार वाले इसे कवर करने नहीं आए। भाई रजत, अमरनाथ, राजीव शर्मा, जनार्दन यादव समेत ढेर सारे साथी इस जोरदार ‘विरोध प्रदर्शन के लिए पद यात्रा’ कार्यक्रम में आए। इन सबको और बाकी सभी क्रांतिकारी पत्रकारों को दिली बधाई सड़क पर उतरने के लिए। 

फेसबुक पर ज्ञान देने से लेकर क्रांति लाने के लिए ललकारने तक का काम ढेर सारे साथी करते रहते हैं पर कुछ ही साथी ऐसे होते हैं जो एक पुकार आह्वान मात्र पर मुट्ठी बांध सड़क पर दबंगई के साथ विरोध प्रकट करने के लिए हाजिर हो जाते हैं। खैर, जो आए उनको प्रणाम। जो दूर से आशीर्वचन दिए उनको भी सलाम। विरोध प्रदर्शन का ये कार्यक्रम प्लान करने वाले नोएडा के पत्रकार साथियों राकेश पाण्डेय और अन्य को उनके जुझारू तेवरों के लिए खासतौर पर नमन। ये ज़ज़्बा ज़िंदा रहे, ये चिनगारी भड़कती रहे, ये आग धधकती रहे। तभी लोकतंत्र बचेगा। तभी हम आप निर्भय जी पाएंगे।

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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पत्रकारों पर पुलिस लाठी चार्ज, क्षुब्ध पत्रकारों और शिक्षकों ने धरना दिया

भबूआ, कैमूर : पिछले दिनो यहां जच्चा-बच्चा की मौत के बाद परिजनों ने शव सदर अस्पताल के सामने रखकर सड़क जाम कर दिया। पुलिस ने जमकर लाठियां चलाईं । फोटो लेने के दौरान कई मीडिया कर्मियों पर भी लाठियां बरसीं। कई पत्रकार घायल हो गए। 

घटना से क्षुब्ध पत्रकारों का एक शिष्ट मण्डल एसपी सुनील कुमार नायक से मिला। एसपी ने दोषी पुलिस कर्मियों पर कारवाई करने का आश्वासन दिया है। घटना के अगले दिन शनिवार को युवा जोश के सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने पत्रकारों पर लाठी चार्ज को लेकर जिला मुख्यालय पर एक दिवसीय धरना दिया। पत्रकारों ने कहा कि लोकतन्त्र के चौथे स्तम्भ पर हमला हुआ है। ऐसे पुलिस कर्मियों को निलम्बित नहीं, बर्खास्त किया जाना चाहिए। बिहार शिक्षक संघ ने भी पत्रकारों के पक्ष में धरना देते हुए कहा कि ये सुशासन का राज नहीं,  कुशासन है। पत्रकार पीटे जा रहे हैं। पूरा शिक्षक संघ 09 जुलाई को पटना में धरना देगा। सभा की अध्यक्षता युवा जोश के अध्यक्ष विकास उर्फ़ लल्लू पटेल ने की। सभा को प्रसून गुड्डू, दीपक बच्चन सहित कई लोगों ने सम्बोधित किया।

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म.प्र. सरकार पत्रकारों की सुरक्षा के लिए प्रोटेक्शन एक्ट लाएगी : शिवराज

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विदिशा में कहा है कि पत्रकारों की अधिमान्यता अवधि एक वर्ष से बढ़ाकर दो वर्ष की जायेगी । प्रदेश में पत्रकारों की सुरक्षा के लिए प्रोटेक्शन एक्ट लाया जाएगा। 

मुख्यमंत्री चौहान देश के ऐसे पहले मुख्यमंत्री होंगे, जो पत्रकारों के हक में  आगे आएंगे और पत्रकारों की मांग को पूरा करेंगे। इस घोषणा से मध्य प्रदेश के समस्त पत्रकार संगठनों में खुशी की लहर है। अब उनको प्रतीक्षा है प्रोटेक्शन एक्ट मध्य प्रदेश में शीघ्र लागू होने और अधिमान्यता अवधि दो वर्ष होने की।

मध्य प्रदेश में पत्रकार अधिमान्यता नियमावली जानने के लिए यहां क्लिक कर सकते हैं- http://mpinfo.org/MPinfoStatic/Hindi/dpr/rule_accredition.pdf

अधिमान्यता नवीनीकरण के लिए यहां क्लिक कर जाना जा सकता है – http://mpinfo.org/MPinfoStatic/Hindi/Accreditation/News_Chennel_Website.pdf

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दिल्ली की पत्रकार निरुपमा पाठक की मौत मामले में प्रियभांशु रंजन बरी

रांची : पत्रकार निरुपमा पाठक मौत मामले में कोडरमा की निचली अदालत ने उसके कथित प्रेमी प्रियभांशु रंजन को बरी कर दिया है।

कोडरमा की निचली अदालत में निरुपमा पाठक मौत मामले की सुनवाई पूरी हो गयी और अदालत ने निरुपमा के कथित प्रेमी प्रियभांशु रंजन को बरी कर दिया। अदालत में प्रियभांशु पर निरुपमा को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप सिद्ध नहीं हो सका।

अदालत का फैसला आने के बाद प्रियभांशु रंजन ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि इस मामले में चार लोगों को आरोपी बनाया गया था, अदालत ने उन्हें बरी कर दिया है, लेकिन मामले के तीन अन्य आरोपी निरुपमा की मां सुधा पाठक, पिता धर्मेन्द्र पाठक और समरेंद्र पाठक के खिलाफ पुलिस अभी पूरी तरह से आरोप पत्र भी दाखिल नहीं कर चुकी है, जबकि इन तीनों की याचिका उच्चतम न्यायालय में भी खारिज हो चुकी है।

गौरतलब है कि 29 अप्रैल 2010 को दिल्ली की दैनिक अखबार की पत्रकार निरुपमा पाठक की कोडरमा स्थित अपने पैतृक आवास पर संदेहास्पद सिथति में मौत हो गयी थी और इस मामले में निरुपमा के परिजनों ने उसके कथित प्रेमी प्रियभांशु को आरोपी बनाया था। प्रियभांशु भी दिल्ली में एक प्रतिष्ठित संस्थान में पत्र्ाकार के रुप में कार्यरत था।

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गुलाब कोठारी को पीड़ित पत्रकारों ने घेरा, नारेबाजी-पर्चा वितरण के बीच हाथापाई की नौबत

राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी को उदयपुर के राजस्थान विद्यापीठ सभागार में आयोजित कार्यक्रम के दौरान कर्मचारियों के विरोध का सामना करना पड़ा। कार्यक्रम के दौरान बंटे पर्चों ने कोठारी की हवा हवाई बातों की कलई खोल कर रख दी। गौरतलब है कि कोठारी पर पत्रकारों के लिए बने मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों को अपने अख़बार में लागू नहीं करने पर सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का केस चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट का शिकंजा कसने से बौखलाकर उन्होंने करीब चार दर्जन कर्मचारियों को गैर कानूनी रूप से ट्रान्सफर और टर्मिनेट कर दिया है।

विद्यापीठ सभागार में आयोजित कार्यक्रम के दौरान ही लोग कोठारी की कथनी और करनी में फर्क की बात करते हुए वहाँ मौजूद स्थानीय संपादक एवं शाखा प्रबंधक से सवाल करने लगे। अख़बार मालिक के सामने अपनी इज्जत ख़राब होते देख अधिकारियों ने क्राइम रिपोर्टर को तत्काल पुलिस फ़ोर्स लेकर मौके पर आने को कहा। बाद में विश्वविद्यालय परिसर के बाहर पर्चे बाँट रहे कर्मचारियों को पुलिस ने धमकाया और केस करने की चेतावनी दी। इस बीच सर्क्युलशन और मार्केटिंग की टीम को लेकर पहुचे मैनेजर मनोज नायर और अरुण शाह भी पुलिस की भाषा बोलते हुए धमकाने लगे। 

हंगामा इतना बढ़ गया के गाली-गलौज व हाथापाई की नौबत आ गयी। यहाँ विद्यापीठ के कुछ कर्मचारियों के बीच बचाव से मामला शांत हुआ। इधर, बदहवास हुए मैनेजमेंट ने कार्यक्रम में मौजूद मजीठिया का केस करने की वजह से टर्मिनेट किये गए एक पत्रकार के आगे पुलिस अधिकारी को खड़ा कर दिया। आगे-पीछे की सभी सीटो पे मैनेजमेंट के गुर्गे बिठा दिए। इन्हें डर था कि कोई अनहोनी न हो जाए।

फोटोग्राफर ने उस कर्मचारी के 100 से ज्यादा फ़ोटो लिए। यही नहीं कार्यक्रम में पर्चे आते ही मुख्य द्वार बंद कर दिया गया। जयपुर में भी बिरला सभागार में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज और वकीलो के सामने पर्चे बाँटे थे। तब जज और वकीलो ने इस मुद्दे पर गुलाब कोठारी की काफी फजीहत की थी।

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जगेंद्र सिंह : पत्रकारों के लिए सबक, पत्रकारिता के लिए आदर्श

लगभग दो-ढाई वर्ष पुरानी बात होगी. फेसबुक पर किसी ने एक समाचार का लिंक शेयर किया कि काकोरी कांड के अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह की पौत्रवधू की झोपड़ी गाँव के दबंगों ने जला दी है. कड़कड़ाती सर्दी में खुले आसमान के नीचे शहीद के वंशज रात गुजारने को मजबूर हैं . समाचार पढ़कर धक्का लगा . समाचार का स्रोत थे शाहजहांपुर समाचार के नाम से फेसबुक पर सक्रिय जगेन्द्र सिंह . मैं उन दिनों किसी महत्वपूर्ण कार्यक्रम के संयोजन में व्यस्त था पर मैंने सोशल मीडिया पर मुहिम चलायी और मेरी उस मुहिम में जगेन्द्रसिंह, सिराज फैसल खान, अमित त्यागी,  भारतीय वायुसेना में वरिष्ठ अधिकारी श्रीकांत मिश्र कान्त आदि जुड़े. 

फिर मैंने स्वयं शाहजहाँपुर जाकर स्थितियों का आंकलन करने का फैसला किया . यह पहला मौका था, जब मेरी जगेन्द्र सिंह से प्रत्यक्ष मुलाकात हुई . पांच फीट तीन इंच की इकहरी काया वाले जगेन्द्र रोशनसिंह के वंशजों को न्याय दिलाने के अभियान से निजी रूप से तब तक इतने जुड़ चुके थे मानो यह उनकी निजी लड़ाई हो . और २-३ दिन के भीतर ही जगेन्द्र सिंह पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के अपने अभियान में सफल हो गये . 

आधुनिक पत्रकारिता के दौर में जब पत्रकार ब्रेकिंग न्यूज के चक्कर में अपनी आँखों के सामने किसी को भी फांसी पर लटकते और धू धू कर जलते देख भी निर्लिप्त होकर रिपोर्टिंग करते हैं, जगेन्द्र सिंह जैसे पत्रकार, जो अन्यायी को सजा दिलाना अपना लक्ष्य मानकर समाचार को परे रख खुद पार्टी बन जाते हैं, समकालीन पत्रकारिता के लिए आश्चर्य जैसे थे . जगेन्द्र सिंह की यही खासियत उन्हें भीड़ में सबसे अलग करती थी तो यही खासियत उनके बलिदान की वजह बनी . जगेन्द्र की जगह कोई भी पत्रकार होता तो उसके लिए आंगनबाड़ी कार्यकत्री से बलात्कार एक सामान्य समाचार भर था पर जगेन्द्र जिस मिट्टी के बने थे, उसमें समाचार गौड़ हो गया और अपराधियों को सजा दिलवाना मुख्य मकसद बन गया . जिसकी परिणति अंतत: उनकी निर्मम हत्या में हुई।

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हमलों से सीतापुर के पत्रकारों में रोष, महेंद्र अग्रवाल ने कहा- बनाया जा रहा भय का माहौल

सीतापुर : प्रदेश में प्रशासन की निष्क्रियता के चलते अराजक तत्वों द्वारा पत्रकारों पर लगातार हमले कर भय का माहौल बनाया जा रहा है। निष्पक्ष पत्रकारिता को डरा-धमका कर प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। यह बात उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट एसोसिएशन के जिलाध्यक्ष महेन्द्र अग्रवाल ने मुख्यमंत्री को सम्बोधित एक ज्ञापन एडीएम सर्वेश दीक्षित को सौंपते हुए कही। 

पत्रकारों पर हमलों के विरोध में ज्ञापन देते सीतापुर के पत्रकार 

जगेंद्र हत्याकांड के विरोध में धरना देते हुए पत्रकारों ने कहा कि पूर्व में जारी शासनादेश के मुताबिक जिला स्तर पर प्रशासन पत्रकारों से मासिक सद्भावना बैठकें भी नही कर रहा है। पत्रकारों की समुचित सुरक्षा हेतु जिला स्तर पर पत्रकार सुरक्षा फोरम का गठन किये जाने की मांग की गयी। कहा गया कि शाहजहांपुर में पत्रकार जोगेन्द्र सिंह की जलाकर हत्या कर दी गयी। कानपुर में पत्रकार को गोली मारी गयी, बस्ती में पत्रकार को गाड़ी से कुचला गया। पीलीभीत में पत्रकार को बाइक से बांधकर घसीटा गया, सीतापुर में विगत एक वर्ष में कई पत्रकारों को धमकी एवं हमला किया गया। 

उपरोक्त घटनाओं को संज्ञान में लेकर त्वरित कार्यवाही किये जाने की मांग की गयी ताकि निष्पक्ष पत्रकारिता के प्रति विश्वास एवं सुरक्षा का माहौल बना रह सके। इस दौरान राहुल मिश्र, आनन्द तिवारी, राजेश मिश्रा, राहुल अरोरा, हरिओम अवस्थी, विनोद यादव, सुनील शर्मा, सुरेश सिंह, सूरज तिवारी, आशुतोष बाजपेयी, अमित सक्सेना, अनिल विश्वकर्मा, रिजवान, अम्बरीश पाण्डेय, वैभव दीक्षित, आशीष स्वरूप जायसवाल, कृष्ण कुमार, समीर, अवनीश मिश्रा, शिवकुमार जायसवाल, हरेन्द्र यादव सहित अन्य पत्रकार मौजूद थे। 

पत्रकारों की ओर से अपर जिलाधिकारी को सौंपे गये ज्ञापन में सकरन काण्ड के खुलासे में पुलिस प्रशासन द्वारा मीडिया कर्मियों के प्रति व्यक्त की गयी प्रतिक्रिया की निन्दा की गयी है। साथ ही कहा गया है कि किसी जिम्मेदार पुलिस अधिकारी के स्तर से प्रेस के लोगों के प्रति ऐसी निम्न स्तरीय प्रतिक्रिया जताना न केवल मीडिया कर्मियों का अपमान है बल्कि उनके अधिकारों का हनन भी है। उक्त मामले में पीडि़ता द्वारा न्यायालय में 164 के तहत दिये गये बयानों के पश्चात उन्हीं बयानों के आधार पर यदि मीडिया कर्मियों ने अपना दायित्व निभाया तो इसमें वह साजिशकर्ता कहां से हो गये। इलेक्ट्रिानिक चैनलों के विभिन्न संवाददाताओं व प्रिन्ट मीडिया के लोगों ने यदि पीडि़ता द्वारा कही गयी आपबीती प्रसारित प्रकाशित की तो इसमें प्रेस के प्रतिनिधि कहां से कसूरवार हो गये। कहा गया है कि अपने बयान पर कायम रहना अथवा बयान बदल देना यह पीडि़ता का निजी प्रकरण है। ऐसी स्थिति में मीडिया कर्मियों की भूमिका संदिग्ध बताते हुए उनके खिलाफ कार्यवाही की प्रतिक्रिया व्यक्त करना न केवल समूचे पत्रकारिता जगत का अपमान है अपितु लोकत्रांतिक व्यवस्था में मीडिया के अधिकारों का हनन है। ज्ञापन में माध्यम से चेतावनी दी गयी है कि पुलिस प्रशासन एक सप्ताह के अन्दर अपनी यह प्रतिक्रिया वापस ले अन्यथा मीडिया कर्मी आन्दोलित होने को विवश होंगे। 

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मध्य प्रदेश में गुपचुप तैयार हो गई पत्रकारों की यूनियन, सभी बड़े अखबारों से सदस्यता

इंदौर : मजीठिया की लड़ाई में अब तक सबसे ठन्डे माने जा रहे मध्यप्रदेश में इसे लेकर गुपचुप तरीके से बड़ी लड़ाई की तैयारी चल रही है। यहाँ के कुछ पत्रकारों ने इस लड़ाई में पंजीकृत ट्रेड यूनियन का महत्व समझते हुए चुपचाप इसका गठन कर लिया है। 

न्यूज़ पेपर मालिकों और उनके चमचों को इसकी भनक तक नहीं लगी। इतना ही नहीं इस यूनियन के पदाधिकारियों ने व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर भास्कर, नई दुनिया और पत्रिका के कई पत्रकारों और दूसरे कर्मचारियों को इसका सदस्य भी बना लिया। बताया जाता है कि यूनियन के पदाधिकारियों ने अन्य साथियों को समझाया कि लड़ाई में पंजीकृत ट्रेड यूनियन का बहुत महत्व है। यूनियन न केवल उनकी मजीठिया की लड़ाई उन्हें बिना सामने लाए लड़ सकती है बल्कि आए दिन होने वाली प्रताड़ना और ट्रान्सफर के मामलों में भी उनकी मदद कर सकती है। 

सोमवार 15 जून को इंदौर में यूनियन की बैठक हुई। इसमें भाग लेकर लौटे एक पत्रकार ने मैनेजमेंट के जासूसों को इस बारे में बताया है। मध्यप्रदेश पत्रकार गैर पत्रकार संगठन नाम की ये यूनियन देश के सबसे बड़े मज़दूर संगठन भारतीय मज़दूर संघ से जुड़ी हुई है। भारतीय मज़दूर संघ आरएसएस का संगठन है। इसके चलते यूनियन को केंद्रीय और प्रादेशिक श्रम विभाग से सहयोग भी मिल रहा है। प्रदेश सरकार पहले किसी अन्य अधिकारी को मजीठिया के मामले में रिपोर्ट देने के लिए नियुक्त करने वाली थी लेकिन इस यूनियन के नेताओं ने अपने संपर्कों से प्रभात दुबे की नियुक्ति कराई है।

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जगेंद्र हत्याकांड के विरोध में बदायूं के पत्रकारों ने किया धरना-प्रदर्शन

बदायूं : मालवीय आवास गृह पर एक दिवसीय धरना प्रदर्शन कर पत्रकारों ने पहले शाहजहांपुर निवासी पत्रकार जगेंद्र सिंह की हत्या पर गुस्से का इजहार किया, फिर प्रदेश के राज्यपाल को ज्ञापन भेजकर आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और पीड़ित परिवार को 25 लाख रुपये मुआवजा देने की मांग की। 

पत्रकारों को संबोधित करते हुए हामिद अली राजपूत ने कहा कि यह पत्रकार की हत्या नहीं, बल्कि सीधे तौर पर प्रेस की आजादी पर हमला है। इस मामले में सरकार को निष्पक्ष जांच कराकर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। जिला उपाध्यक्ष मुकेश बाशिष्ठ ने कहा कि इस मामले में कोई अधिकारी दोषी है तो उसको बर्खास्त किया जाए और जनप्रतिनिधि है तो उसको पद से हटाकर चुनाव लड़ने से डिबार किया जाए। साथ ही पीड़ित परिवार को गुजारा करने और मुकदमे की पैरवी के लिए कम से कम 25 लाख रुपये मुआवजा दिया जाए। 

इसके बाद पत्रकारों ने राज्यपाल को सम्बोधित ज्ञापन डीएम को सौंपा। इस अवसर पर आशू बंसल , मुकेश मिश्रा, इतिहारुद्दीन, शाहिद अली, शेषमणि, नन्द किशोर, छबीले चौहान, शकील भारती, राजीव पाल, संजय सिंह गौर, अरविंद सिंह, कुलदीप शर्मा, सुमित कुमार, आनंद प्रकाश, मो. शाकिल, अतीक अहमद, उमेश राठौर, सुनील मिश्रा, अवनेश मिश्रा, रोहित महाजन, अनुपम मिश्रा, प्रदीप कुमार गौरव आदि पत्रकार मौजूद रहे।

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पत्रकारों पर हमले के विरोध में उरई कलेक्ट्रेट में धरना, मंगलवार को कैंडल मार्च

उत्तर प्रदेश में पिछले तीन सप्ताह में शाहजहाँपुर में पत्रकार जगेंद्र सिंह को जिन्दा जलाने, जालौन में दो पत्रकारों, कानपुर के पत्रकार दीपक मिश्रा तथा लखनऊ के पत्रकार अमित सिंह पर हमलों के विरोध में जिला पत्रकार संघर्ष समिति उरई कलेक्ट्रेट परिसर में धरना दिया। पत्रकारों ने आरोपी राज्य मंत्री राममूर्ति सिंह वर्मा तथा पुलिस कर्मियों को गिरफ्तार करने और घटना की निष्पक्ष जांच सीबीआई से कराने की मांग की। 

जिला पत्रकार संघर्ष समिति के संयोजक अनिल शर्मा ने बताया कि जालौन जिले के वरिष्ठ पत्रकार दीपक अग्निहोत्री के पुत्र सौरभ को 27 मई 2015  की शाम आधा दर्जन अराजक तत्वों ने लोहे की रॉड , तमंचे,  डंडों से लैस होकर पीटा था। अपने पिता को सौरभ ने मोबाइल पर जैसे ही सूचना दी, दीपक अग्निहोत्री, अचल शर्मा, आज के ब्यूरोचीफ अरविन्द द्विवेदी घटना स्थल पर पहुंच गए। हमलावरों ने उनको भीघेर कर लोहे की रॉड, क्रिकेट के बैट से लहूलुहान दिया। बार-बार फोन करने के बावजूद पुलिस घटना स्थल पर नहीं पहुंची। घटना की जानकारी मिलते ही जिलाधिकारी रामगणेश जिला अस्पताल पहुंचे। अराजक तत्वों से मिलीभगत के चलते कोतवाली पुलिस ने हमलावरों के खिलाफ रिपोर्ट को हलकी धाराओं में तरमीम कर दिया। इतना ही नहीं, घटना के 18 दिन बाद भी कोतवाल दयाशंकर, जो इस मामले के विवेचक हैं, ने घायल पत्रकारों के बयान नहीं लिए। दो नामजद, चार अज्ञात अभियुक्तों में से पुलिस ने घटना के 8 दिन बाद एक अभियुक्त योगेश राजपूत और 16 दिन बाद पंकज चौहान को गिरफ्तार  जेल भेजा। इस से प्रेस को अवगत नहीं कराया गया।

अनिल शर्मा ने बताया कि इसी तरह कानपुर के पत्रकार दीपक मिश्रा को तीन दिन पूर्व अराजक तत्वों ने गोली मारकर हत्या का प्रयास किया। दो दिन पूर्व लखनऊ के कैनविज टाइम्स के पत्रकार अमित सिंह को सपा के छुटभैये नेताओं ने वाहन चढ़ाकर मारने का प्रयास किया। इन सभी घटनाओं में अभी तक अभियुक्त गिरफ्तार नहीं हुए हैं। इसके विरोध में जालौन के पत्रकारों ने धरना देकर पुलिस के विरोध में जमकर नारेबाजी की। सभी पत्रकार मंगलवार को एकजुट होकर प्रदेश  में पत्रकारों की हो रही हत्या और कातिलाना हमले के विरोध में नगर में माहिल तालाब से लेकर गांधी चबूतरे तक कैंडल मार्च निकालेंगे। 

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रायबरेली और मिर्जापुर के दो और पत्रकारों की जान को खतरा

उत्तर प्रदेश के शाहजंहापुर में पत्रकार जगेन्द्र सिंह को राज्यमंत्री राम मूर्ति सिंह वर्मा द्वारा जिंदा जलवा देने की घटना, बहराइच में आरटीआई कार्यकर्ता गुरू प्रसाद शुक्ला की हत्या, कानपुर में पत्रकार को गोली मारने और बस्ती में पत्रकार पर हमले के बाद मिर्जापुर के थाना जिगना ग्राम मनकथा निवासी पत्रकार अनुज शुक्ला की पैत्रिक जमीन पर समाजवादी पार्टी के दबंग राधेश्याम यादव पुत्र अनन्त यादव, स्थानीय विधायक भाई लाल कोल के प्रतिनिधि विनोद यादव के संरक्षण में पुलिस की मदद से अदालती स्टे के बावजूद जबरन कब्जा किया जा रहा है।

रिहाई मंच के शाहनवाज आलम और राजीव यादव ने बताया है कि पत्रकार अनुज शुक्ला का परिवार डरा हुआ है और उसकी जान का भी खतरा है। उधर, रायबरेली के रहने वाले दिल्ली में रह रहे वरिष्ठ पत्रकार प्रशान्त टंडन के चन्द्रापुर हाउस में कल रात साढ़े ग्यारह बजे मकान मालिक के पुत्र अजय त्रिवेदी और उनके गुंडों ने मकान में तोड़-फोड़ की। आपत्ति करने पर प्रशान्त टंडन की मां मीरा टंडन के साथ मारपीट के बाद फायरिंग की घटना होने के बाद भी जिला प्रशासन द्वारा कोई कार्रवाई न होने से साफ है कि पुलिस प्रशासन द्वारा अपराधियों को खुला संरक्षण दिया जा रहा है।

शाहनवाज आलम और राजीव यादव ने कहा है कि पत्रकारों प्रशांत टंडन और अनुज शुक्ला, उनके परिजनों के साथ कोई भी अप्रिय घटना होने की स्थिति में प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव व डीजीपी ए.के. जैन को जिम्मेदार ठहराना गलत न होगा। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और डीजीपी को इन प्रकरणों में तत्काल हस्तक्षेप करते हुए उचित कार्रवाई की जानी चाहिए।

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DUJ DEMANDS ACTION AGAINST ATTACKS ON JOURNALISTS

Sujata Madhok / S.K. Pande : The Delhi Union of Journalists is shocked at the murder of Shahjahanpur journalist Jagendra Singh and demands an immediate impartial inquiry into the horrific episode and arrest and due punishment for all those who are guilty.

DUJ also condemns the attack on Kanpur journalist Deepak Mishra who was allegedly shot at because of his complaint against local gambling mafia. It calls for immediate arrest of the attackers.

 DUJ regrets the slow pace of government action in both these crimes. It notes with alarm the increasing climate of lawlessness and impunity that is encouraging such attacks on journalists and social media activists in the country.

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क्रिकेट प्रतियोगिता के फाइनल मैच में 72 रन से जीती पत्रकारों की टीम

जौनपुर : नगर के राज कालेज के मैदान पर चल रही जेकेपी त्रिकोणीय क्रिकेट प्रतियोगिता के फाइनल मैच में पत्रकार क्रिकेट क्लब ने बेहतरीन प्रदर्शन करते हुये जेसीआई को 72 रन के भारी अंतर से हराकर चैम्पियन का खिताब हासिल कर लिया। विजेता टीम के कुमार कमलेश को लगातार तीसरे मैच में मैन आफ द मैच दिया गया। पूरी प्रतियोगिता में बेहतरीन प्रदर्शन करते हुये 135 रन बनाने के साथ 12 विकेट लेने वाले जेसीआई के कप्तान आलोक सेठ को मैन आफ द सीरिज दिया गया। मुख्य अतिथि नगर पालिकाध्यक्ष दिनेश टण्डन ने विजेता व उपविजेता टीमों को ट्राफियां प्रदान कीं। 

जौनपुर के राज कालेज मैदान पर दिनेश टण्डन से विजेता ट्राफी लेते पत्रकार। छाया-कुमार कमलेश

इससे पहले पत्रकार क्रिकेट क्लब के कप्तान रामजी जायसवाल ने टास जीतकर पहले बल्लेबाजी करने का निर्णय लिया। निर्धारित 12 ओवर के मैच में सलामी बल्लेबाज महर्षि सेठ ने पहली ही गेंद पर बाउण्ड्री लगाकर अपनी आक्रामकता का परिचय देते हुये 2 छक्के व 3 चौके लगाते हुये सर्वाधिक 40 रन बनाये। दूसरे छोर पर खड़े विनोद यादव महज 3 रन पर ही बनाकर अपना विकेट गवां बैठे लेकिन उनका स्थान लेने पहुंचे लगातार दो मैचों में सर्वाधिक स्कोर बनाकर मैन आफ द मैच रहने वाले कुमार कमलेश ने भी पहली ही गेंद पर छक्का लगाकर न सिर्फ अपनी आक्रामकता का परिचय दिया, बल्कि विरोधी टीम को एक बार फिर चेतावनी दे दी कि उनकी लय तोड़ना आसान नहीं है। उन्होंने 3 छक्के व 1 चौकों की मदद से ताबड़तोड़ 30 रन जड़ दिया। उनका विकेट गिरने पर पहुंचे विनीत मात्र 3 रन ही बना सके। एक समय ऐसा लगा कि जेसीआई की टीम वापसी कर रही है, क्योंकि विनीत के बाद गये वकील 0 व बंटी 1 रन पर आसान विकेट देकर पवेलियन लौट गये। उनका स्थान लेने पहुंचे हसन ने 1 चौके व 1 छक्का लगाते हुये 14 रन की मदद से टीम को स्कोर 100 के पार पहुंचा दिया। 

राजेश ने 1 छक्के की मदद से 7 रन बनाकर रन आउट हो गये लेकिन तब तक स्कोर 104 रन हो चुका था। उनका स्थान लेने गये ओपी जायसवाल ने ताबड़तोड़ बल्लेबाजी करते हुये 3 छक्का लगाकर 24 रन के व्यक्तिगत योगदान के साथ टीम का स्कोर 128 पहुंचाया। जेसीआई की ओर से संजय गुप्ता, मनोज अग्रहरि ने 1-1 विकेट, नितेष ने 3 व आलोक ने 2 विकेट लिया। 

129 रन के विशाल स्कोर का पीछा करने हेतु उतरी जेसीआई की टीम शुरू से ही लड़खड़ाने लगी और 12 ओवर में मात्र 58 रन ही बना पायी। पत्रकारों की कसी गेंदबाजी के आगे जेसीआई की पूरी टीम समर्पण करती हुई दिखाई पड़ी। पत्रकारों की ओर से आलराउण्डर कुमार कमलेश ने 3 ओवर में 14 रन देकर 1 विकेट, विनोद यादव ने 2 विकेट, वकील ने 2 विकेट और हसन ने दो ओवर में मात्र 2 रन देकर 1 विकेट लिया जबकि मसूद को कोई सफलता नहीं मिली लेकिन अपने ओवर में उन्होंने मात्र 1 रन ही खर्च किया। प्रतियोगिता की अम्पायरिंग पंकज सिन्हा व धीरज सिन्हा, कमेंट्री सलमान शेख और स्कोरिंग महेश सेठ ने किया।

इस अवसर पर समाजसेवी सोमेश्वर केसरवानी, जेसीआई के मण्डलाध्यक्ष राधेरमण जायसवाल, अध्यक्ष राकेश जायसवाल, पूर्व अध्यक्ष शशांक सिंह रानू, चन्द्रशेखर जायसवाल, अजय गुप्ता, आशीष चैरसिया, संतोष अग्रहरि, देहदानकर्ता दीपक चिटकारिया, दिलीप जायसवाल, मो. अब्बास, राजकुमार सिंह, मेराज अहमद, अजयनाथ जायसवाल, अनिल जायसवाल, पत्रकारों की टीम के प्रशिक्षक सुहेल असगर खान, संजय शुक्ला, अंकित जायसवाल, जितेन्द्र सेठ, शुभांशु जायसवाल, संतोष सेठ, सूरज जायसवाल, संजय गुप्ता, वैभव जायसवाल, मुन्नू भाई, मुन्नू मौर्या सहित सैकड़ों लोग उपस्थित रहे। अन्त में कार्यक्रम आयोजक कृष्ण कुमार जायसवाल ने समस्त आगंतुकों के प्रति आभार व्यक्त किया।

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खामोशी से बाज आओ पत्रकारों वरना ये सिलसिला अब थमने वाला नहीं

इस देश में क्या हो रहा है, कहीं कोर्ट परिसर में मर्डर तो कहीं जर्नलिस्ट का मर्डर तो कहीं ४२० के केस में पुलिस एनकाउंटर करती है, तो कहीं पुलिस मर्डर के अभियुक्त को समोसे खिलाती है, आखिर कितने जगेंद्र सिंह जैसे बेगुनाह और कलम के सिपाहियों की बलि लेगा ये देश।

जब नेता को बचाना होगा तो जांच कर या कह दिया जायेगा कि पत्रकार की एक्टिविटी अच्छी नहीं थी। आखिर कब तक सत्ता और नेताओं के दलाल अपने घर में ही अपनों की हत्या होते देख मजे लेंगे। आज जगेंद्र सिंह तो कल कभी प्रदीप भाटिया, राजेश वर्मा, मूलचंद यादव, दिनेश पाठक ऐसे करीब 36 से ज्यादा कलम के सिपाहियों की हत्या देश के नेताओं ने करवाईं और पुलिस ने फाइनल रिपोर्ट में यही कहा कि इन पत्रकारों की एक्टिविटी अलग थी।

आखिर क्यों ऐसी नौबत आई कि उनकी हत्या करनी पड़ी, आखिर कितने, कब तक और कौन-कौन? अगला अटैक आपके घर पर भी हो सकता है। भगत सिंह के पड़ोसी के घर पैदा होने का इंतज़ार न करें। आप अपने घर का खुद भगत सिंह होने जज्बा पैदा करें अपने अंदर। वरना कहीं आप भी अगला निशाना इन नामों में शामिल न हो जायं। कलम के सिपाही अब तो चेत जाएं ? 

लेखक एवं अधिवक्ता, प्रबंध संपादक लीगल बाउंड्री सत्य प्रकाश से संपर्क satyaprakash64@gmail.com

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