ख़ुशदीप सहगल-
एक बड़े टेलीविजन चैनल पर बिहार को लेकर हो रही डिबेट के दौरान वरिष्ठ पत्रकार शशि शेखर और RJD की तेजतर्रार प्रवक्ता कंचना यादव के बीच बहस हो गई…
कंचना यादव एंकर से कह रही थीं कि “आप आरजेडी प्रवक्ताओं से बस जंगलराज, चारा घोटाले जैसे चंद सवाल ही हमेशा करती रहती हैं, कभी अजय आलोक जैसे सत्ता पक्ष के प्रवक्ताओं से भी ज्वलंत मुद्दों पर सवाल किया कीजिए”…
इस पर एंकर महोदया ने प्रतिवाद किया- “हम उनसे भी सवाल करते हैं”.
कंचन यादव ने अपनी पहले वाली बात को दोहराना जारी रखा…
इस पर गेस्ट राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर हिस्सा ले रहे शशि शेखर ने एंकर के समर्थन में मोर्चा लेते हुए कहा कि “जिस तरह प्रवक्ताओं ने नया तमाशा शुरू कर दिया है और इसमें सब आते हैं, कि वो सीधे सीधे आक्षेप की भाषा में बात करते हैं, लॉजिक उनके पास कोई नहीं होता. और लॉजिक जो नहीं होता तो चीखा चिल्ली जो मचती है, भारतीय जनता इतनी बेवकूफ़ नहीं है जो हर समय एक तमाशे को ही पसंद करें. मुझे ऐसा लगता है हम सारे लोगों को थोड़ा श्लील होने की ज़रूरत है. और दिमाग़ी तौर पर सेहतमंद होने की ज़रूरत है”.
इस पर कंचना यादव ने कहा- “20 साल से जो नैरेटिव फैला रहे थे वो आपको बुरा लग गया क्या”…
शशि शेखर- “मैं आपसे बात नहीं कर रहा हूं.”
कंचना यादव – “नहीं आप से बात नहीं कर रही हूं, 20 साल से जो डंडा चला रहे थे, उस पर पूछा तो आपको बुरा लग गया.”
शशि शेखर- “बीच में मत बोलिए, मैं आपके बीच बोला?”
कंचना यादव- “हम से आप जंगलराज पर पूछते हैं.”
शशि शेखर- “आप बोलें चली जा रही हैं, मैंने अजय आलोक से पूछा”…
कंचना यादव- “आप कमेंट कर रहे हैं इसलिए मैंने कहा सर”…
शशि शेखर- “प्लीज़ कीप क्वाइट”.
कंचना यादव- अच्छा…आप आर्डर देंगे?
एंकर- “कंचना जी ऑर्डर देने की बात नहीं है, हो गया, अब आगे बढ़ते हैं”…
शशि शेखर- “हां मैं कह रहा हूं कीप क्वाइट, जब आप से बोलने को कहा जाए, तब आप बोलिएगा, मैंने अजय आलोक से पूछा क्या बिहार गुजरात बन जाएगा, वो ऑफेंड नहीं हुए.”
एंकर- “मैंने पूछा क्या शराब आजकल फोन पर मिलती है बिहार में?”
शशि शेखर- “एस ए जर्नलिस्ट वो ऑफेंड हो नहीं हो रहे हैं, सिर्फ़ कुछ लोगों को ऑफेन्ड होकर न जाने कौन सा टीआरपी का नया तमाशा क्रिएट हो गया है. ना कोई बड़े छोटे का लिहाज़, न किसी तरीके की कोई चीज़”.
कंचना यादव- “नहीं पैर छू लेते हैं आपका. आकर…पैर छू लेते हैं, लिहाज़ कर लेते हैं आपका, हमारा क्या सवाल था, हमारा सवाल था कि 20 साल तक”…
एंकर- “चलिए ठीक है आगे बढ़ते हैं”…
आपने तकरार पढ़ ली. बड़े छोटे के लिहाज़ की बात कही गई…कंचना यादव ग़लत थीं तो क्या वरिष्ठ पत्रकार का आदेश के लहज़े में ये कहना सही था कि हां मैं कह रहा हूं , कीप क्वाइट. कुछ कुछ वैसे ही अंदाज़ में जैसे ऑफिस में अपने मातहतों को कहा जाता है…
अब मेरे कुछ सवाल-
टीवी डिबेट्स पर चीखा चिल्ली कंचना या प्रियंका यादव जैसी प्रवक्ताओं के आने के बाद ही शुरू हुई है क्या? क्या इससे पहले टीवी डिबेट्स बड़े शांतिपूर्ण और सौहार्द वाले माहौल में होती थी…तब मुर्गे नहीं भिड़ाए जाते थे क्या?…
टीवी डिबेट्स में आम तौर पर कथित राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर हिस्सा लेने वाले पत्रकारों और अन्य गेस्ट्स को प्रति डिबेट मेहनताने का लिफ़ाफ़ा मिलता है. बस राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं को ये नहीं मिलता है…
जिन्हें लिफ़ाफ़े मिलते हैं उनकी कोशिश रहती है कि उन्हें आगे भी बुलाया जाता रहे…ऐसे में कई लिफ़ाफ़ा-धारी बढ़ चढ़ कर एंकर्स और उनकी लाइन को डिफेंड करते नज़र आते हैं…दिखाने को ये बेशक अपने को कितना भी न्यूट्रल दिखाएं लेकिन सच्चाई छुपी नहीं रह सकती…
बाबू ये जो पब्लिक है, ये सब जानती है…


