सफेद पर्दे में सरकार के काले कारनामे और मजबूत इरादे वाले सोनम वांगचुक
अखबारों ने यह सवाल नहीं उठाया है कि जबरदस्ती की यह कार्रवाई 20 जुलाई के संसद मार्च की अपील को नाकाम करने के लिए तो नहीं की गई है। गिरफ्तारी से मार्च पर क्या असर होगा इस पर अटकल भी नहीं है। खबर का यह वाला हिस्सा सिर्फ दैनिक भास्कर में कायदे से है। खबरों से पता नहीं चल रहा है कि सोनम वांगचुक गिरफ्तार कर लिए गए हैं या उनका ‘इलाज’ किया जा रहा है।
संजय कुमार सिंह
आज मेरे 10 के 10 अखबारों में सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी की खबर पहले पन्ने पर है। जाहिर है लोकतंत्र अस्पताल में है और इसकी चिन्ता अखबारों को भी है। हालांकि, सोशल मीडिया एक्स पर जबलपुर के संतोष मिश्रा का वीडियो बताता है कि मीडिया ने हमारे समाज कहां पहुंचा दिया है। एक स्वयंसेवी संगठन के छद्म देशभक्तों ने बच्चों के लिए भी रिपोर्टिंग कितनी मुश्किल बना दी है। वीडियो के अनुसार, एक बच्ची कुछ बुजुर्गों से बात कर रही थी, संतोष जी बीच में घुसे, सर्टिफिकेट बांटने लगे। लोकतंत्र में खुलकर, जोखिम उठाकर और कीमत चुका कर सरकार का विरोध कर रहे सोनम वांगचुक के मरने की कामना कर डाली। मुझे होर्मुज विवाद में एक नाविक की मौत पर उसके पिता का यह कहना याद आया कि मरने वाला उनका बेटा था। सोशल मीडिया उनकी पुरानी पोस्ट याद कर रहा था। वीडियो में बच्ची ने बुजुर्ग दिखने वाले सज्जन को आइना दिखाने की पूरी कोशिश की और उन्हें न दिखा हो, बहुतों को दिखेगा। पता नहीं मेरा यह अनुमान कितना सही है पर वह अलग मुद्दा है। आज अंग्रेजी अखबारों में द टेलीग्राफ, इंडियन एक्सप्रेस और द हिन्दू में सोनम वांगचुक को हटाया जाना लीड है तो हिन्दी अखबारों में देशबन्धु, दैनिक भास्कर और नवोदय टाइम्स में भी यह खबर लीड है। इसके अलावा टाइम्स ऑफ इंडिया, दि एशियन एज, हिन्दुस्तान टाइम्स के साथ अमर उजाला में भी यह खबर पहले पन्ने पर है। यहां यह गौर करने की बात है कि सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी तड़के या अखबार छपने के बाद हुई थी। अमूमन पुलिस कार्रवाई इसी समय होती है। इससे खबर पहले पन्ने पर तो नहीं ही छपती है अगले दिन के लिए बासी हो गई रहती है। असल में सुबह की ऐसी खबर डाक संस्करणों से शुरू होकर अगले दिन के नगर संस्करण के साथ पहले पन्ने लायक नहीं रह जाती है। ऐसे कितने ही उदाहरण हैं जब कोई कार्रवाई या घटना अखबार छपने के बाद हुई और अगले दिन पिट गई जबकि दो घंटे पहले हुई होती तो पहले पन्ने पर प्रमुखता से रहती। क्रिकेट, फुटबॉल मैच की ऐसी खबरें जो विदेश में होती हैं और इस कारण देर रात या तड़के होने वाली होती हैं उन्हें खास तौर से उसी दिन छापा जाता है क्योंकि अगले दिन खबरें पुरानी हो जाती हैं।
सुबह-सुबह हुई सोनम वांगचुकी की गिरफ्तारी की खबर अगले दिन भी लीड बनी या पहले पन्ने पर प्रमुखता से है तो मामला गोदी पत्रकारिता का भी है। आप जानते हैं कि राहुल गांधी की देहरादून की रैली छात्रों के मुद्दे पर ही थी और उसकी खबर पहले पन्ने पर नहीं के बराबर थी। ऐसे में सोनम वांगचुक का जो अनशन छात्रों (असल में कॉक्रोच) के लिए है और गिरफ्तारी के अगले दिन भी पहले पन्ने पर है तो जाहिर है कि मामला सीधा-सरल नहीं हो सकता है। कारण चाहे जो हो मामला रेखांकित करने लायक है और शीर्षक में ही सरकार का बचाव हो तो भी खबर पहले पन्ने पर है जबकि सामान्य कार्रवाई है तो बड़ी खबर क्यों और बड़ी खबर नहीं है तो पहले पन्ने पर क्यों। कहा भी जाता है, कुत्ता आदमी को काटे तो खबर नहीं है लेकिन आदमी कुत्ते को काटे तो खबर है। हालांकि, जो छिपाया जाए वही खबर होती है जो बताकर किया जाए वह खबर नहीं होती है। यह अलग बात है कि 2014 के बाद की पत्रकारिता बदल गई है और सरकारी घोषणाएं भी खबर होती हैं और कल ही मैंने लिखा था कि दैनिक भास्कर के पहले पन्ने की तीनों खबरें सरकारी प्रचार थी और विपक्ष के नेता राहुल गांधी की रैली की खबर अंतिम पन्ने से पहले के पन्ने पर साढ़े 13 लाइनों में निपटा दी गई थी। ऐसे में आज सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी की खबर पहले पन्ने पर है तो सामान्य नहीं है। आइए देखें खबर क्या है और समझने की कोशिश कीजिए कि इसके पहले पन्ने पर होने के क्या मतलब लगाए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए, टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर सेकेंड लीड है और शीर्षक है – ‘हाईकोर्ट के ऑर्डर का पालन करते हुए’: पुलिस ने वांगचुक को अस्पताल पहुंचाया। खबर का इंट्रो है – प्रदर्शनकारियों को रोके जाने या उनपर लाठी चलाने से इनकार। जाहिर है, अखबार सरकार का पक्ष रख रहे हैं। लेकिन अमर उजाला ने ‘खबर’ दी है, सफेद चादर की दीवार बना वांगचुक को जबरन उठाकर अस्पताल ले गई पुलिस। जाहिर है कि यह सरकार का विरोध भी हो तो जो हुआ उसकी रिपोर्ट है और इस सोच या विचारधारा के तहत खबर है कि सरकार को गिरफ्तार ही करना था तो वह खुलेआम, नियमानुसार और पारदर्शी व सम्मानजनक तरीके से कर सकती थी। संभव है इसका विरोध होता और पुलिस को कामयाबी नहीं मिलती। मेरे ख्याल से जबरदस्ती उसके बाद भी की जा सकती थी या उसके बाद ही की जानी चाहिए थी। अभी भी खबरों से सब समझ में आता है लेकिन भक्ति के नशे में चूर लोगों को सच बताना भी जरूरी है।

द टेलीग्राफ की लीड का शीर्षक है, पुलिस डॉक्टर के भेस में सोनम को उठा ले गई। दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है, वांगचुक को अस्पताल में दाखिल कराया गया विपक्ष ने कार्रवाई की निन्दा की। इसके साथ के चार बुलेट प्वाइंट हैं – 1) पुलिस ने हाईकोर्ट के आदेश का जिक्र किया 2) सोनम ने उपचार से इनकार किया 3) सीजेपी ने विरोध बढ़ाया और 4) भाजपा ने पुलिस कार्रवाई का समर्थन किया। jagran.com की खबर के अनुसार, जैमर लगा, चादर तानी और वांगचुक अस्पताल में… दिल्ली पुलिस के नए कप्तान आते ही 30 सेकेंड में उठाए गए सोनम वांगचुक। खबरों के अनुसार, सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को दिल्ली के जंतर-मंतर से हटाए जाने से ठीक पहले इलाके में फोन जैमर लगाए गए थे। दिल्ली पुलिस द्वारा अपनाई गई इस विशेष रणनीति का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि कोई भी व्यक्ति घटना की लाइव स्ट्रीमिंग या वीडियो रिकॉर्डिंग न कर सके। पुलिसकर्मी सादे कपड़ों में आए। इसके बाद मंच के सामने सफेद पर्दा/चादर लगा दी गई और वांगचुक को बिना किसी टकराव का मौका दिए सिर्फ 30 सेकंड के भीतर वहां से हटा दिया गया। मुझे लगता है कि यह तरीका किसी लोकतांत्रिक सरकार के काम का नहीं है और इसका विरोध होना ही चाहिए। इसीलिए देशबन्धु की खबर का शीर्षक है, वांगचुक को जबरन उठाया। कांग्रेस ने इसका विरोध किया है पर यह खबर किसी और अखबार में प्रमुखता से नहीं दिखी। देशबन्धु की खबर का शीर्षक है, शांतिपूर्ण विरोध को कुचलना लोकतंत्र पर हमला। इंडियन एक्सप्रेस की खबर का शीर्षक है, “भूख हड़ताल 21वां दिन : पुलिस ने वांगचुक को अस्पताल में स्थानांतरित किया”। इंट्रो है, दिल्ली पुलिस ने कहा : उनके बिगड़ते स्वास्थ्य के कारण हाईकोर्ट के ऑर्डर, विशेषज्ञों की सलाह पर कार्रवाई की। इस खबर के साथ एक अलग खबर का शीर्षक है, विपक्ष ने सरकार की आलोचना की, सोनम मामले को सदन में उठाने का संकेत दिया; भाजपा ने हाईकोर्ट के निर्देश का उल्लेख किया। लगे हाथ हाईकोर्ट के निर्देश की खबर इंडियन एक्सप्रेस में इस प्रकार छपी थी, हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि सरकारी डॉक्टर वांगचुक के स्वास्थ्य की निगरानी अवश्य करें। इस खबर का इंट्रो था – कोर्ट ने कहा, किसी भी नागरिक का जीवन बहुमूल्य है; सॉलिसीटर जनरल ने कहा आदेश पर कोई एतराज नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है कि कोर्ट के आदेश का उपयोग सरकार (या पुलिस) ने अपनी मर्जी से किया है क्योंकि खबर कुछ और थी। आज तो खबर यह भी है कि दिल्ली पुलिस के प्रमुख को इसीलिए बदला गया। जो भी हो, खबर उसपर भी होनी चाहिए थी लेकिन अच्छे दिन चल रहे हैं।
हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर दो कॉलम की है, “पुलिस ने वांगचुक को अस्पताल पहुंचाया; विपक्ष ने हल्ला बोला”। इसमें हाईलाइट किया हुआ हिस्सा है, अस्पताल ने कहा कि वांगचुक ने आईवी फ्लुइड, खाने-पीने वाली दवाई आदि से मना कर दिया है। द हिन्दू की खबर के अनुसार, उनकी पत्नी का कहना है कि उनके निजी डॉक्टर और वकील को वांगचुक से मिलने नहीं दिया गया। मुख्य शीर्षक है, भूख हड़ताल के 21वें दिन पुलिस वांगचुक को अस्पताल ले गई। केंद्रीय (शिक्षा) मंत्री के इस्तीफे की मांग कर रहे एक्टिविस्ट ने अस्पताल में मेडिकल इलाज लेने से इनकार किया; पुलिस ने इस कदम के लिए हाई कोर्ट के आदेश का हवाला दिया। कई अखबारों में सोनम वांगचुक की फोटो छपी है। द हिन्दू में पीटीआई की इस फोटो का कैप्शन है, मजबूत इरादा: शनिवार को नई दिल्ली के जंतर-मंतर से हटाए जाते समय एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक भीड़ की ओर इशारा करते हुए। द हिन्दू की खबर के अनुसार उन्हें ज़बरदस्ती अस्पताल में भर्ती कराने की कार्रवाई सीजेपी की संसद तक प्रस्तावित मार्च से दो दिन पहले हुई है। एक्टिविस्ट (सोनम वांगचुक ने एक वीडियो में) ने ज़ोर देकर कहा था कि वह इस मार्च में शामिल होंगे। श्री वांगचुक की पत्नी गीतांजलि जे आंग्मो ने बताया कि वह उनसे मिलने के लिए स्मार्टफोन साथ नहीं जा पा रही थीं। सफ़दरजंग अस्पताल के एंट्री गेट पर केंद्रीय सुरक्षा बल के जवानों को तैनात किया गया था। अमर उजाला की खबर, सफदरजंग (अस्पताल) की रिपोर्ट के अनुसार, सोनम वांगचुक के शरीर में पोटैशियम की कमी, निजी डॉक्टर ने जताया संदेह। दैनिक भास्कर ने बताया है कि पुलिस अचानक वांगचुक को अस्पताल ले गई, वहां भी वे अनशन पर हैं, ड्रिप नहीं ली। कल संसद मार्च है…सीजेपी ने कहा – हर हाल में होगा; पुलिस ने कहा – अनुमति नहीं। यहां पुलिस प्रमुख बदलने के कारण और मकसद पर भी बात हो सकती थी।
नवोदय टाइम्स में यह तीन कॉलम की लीड है। शीर्षक है – वांगचुक अस्पताल में। पुलिस ने सोनम को हटाया, प्रदर्शन स्थल को चादर से ढंका। अखबार ने इस संबंध में एक्स पर राहुल गांधी की पोस्ट को भी उद्धृत किया है। अंग्रेजी में एक्स पर उनकी पोस्ट इस प्रकार है, मोदी सरकार के मुख्य सिद्धांत असत्य और हिंसा हैं। सोनम वांगचुक जी को जंतर-मंतर से हटाना, जबकि वे अहिंसक भूख हड़ताल पर थे, गलत है। पेपर लीक, शिक्षा की बढ़ती लागत और छात्रों की आत्महत्या भारत के भविष्य के लिए गंभीर मुद्दे हैं। कोई भी ताकत भारत के छात्रों और हममें से उन लोगों को, जो उनसे प्यार करते हैं और उनमें विश्वास रखते हैं, इन मुद्दों को उठाने से नहीं रोक सकती। मुझे लगता है कि खबर लिखने वालों का मकसद कई बार सरकार का बचाव या उसका विरोध करना होता है जबकि खबर का उद्देश्य सूचना देना और पारदर्शिता रखना होना चाहिए। खबर ऐसी जरूर लिखी जा सकती है कि पढ़ी जाए पर ऐसी नहीं होनी चाहिए कि किसी का बचाव करती लगे या किसी पर आरोप लगाती। पर अब यह बहुत आम है। जबलपुर की घटना का जिक्र इसीलिए किया है। इस सरकार ने पत्रकारों को पक्षकार बना दिया है और भारी दबाव रहता है कि आलोचना करते हैं तो प्रशंसा भी कीजिए। पर पत्रकार या मीडिया संस्थान का यह काम नहीं है। फिर भी बहुत सारे मीडिया संस्थान और मीडिया के लोग खुलकर सरकार के पक्ष में काम कर रहे हैं जबकि जरूरत खुल कर विरोध करने की है।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।



