अनिल अत्रि-
शुक्रवार देर रात विजय संघवी (Sanghvi Vijay) जी के न रहने की सूचना मिली. उनकी स्थिति को देखते हुए, पिछले कुछ समय से मन कहीं न कहीं इस खबर के लिए तैयार था, फिर भी यह समाचार भीतर तक तोड़ गया.
मेरे लिए वे केवल एक मार्गदर्शक, मित्र या गुरु नहीं थे. वे मेरे लिए पिता समान थे. वैसा ही स्नेह, वैसा ही अपनापन और वैसा ही अधिकार. मुझे याद नहीं पड़ता कि मैंने उनसे कभी कोई काम कहा हो और उन्होंने मना किया हो. आज उनके जाने का दुख वैसा ही है, जैसा अपने पिता को खो देने का होता है.
बीते दो से अधिक वर्षों से विजय जी असहनीय पीड़ा में थे. पिछली बार जब दिल्ली गया तो पता चला कि उनकी हालत बहुत खराब है. लेकिन उनसे मिलने की हिम्मत नहीं जुटा पाया. उस इंसान को इस तरह असहाय देखना आसान नहीं था, जिससे मिलने के लिए कभी बड़े-बड़े नेता, उद्योगपति, नौकरशाह और पत्रकार समय मांगते थे. लंबे समय से वे बिस्तर पर थे और बेहद कठिन जीवन जी रहे थे. स्मृतिलोप के कारण वे लोगों को पहचान भी नहीं पाते थे. सोचा यह भी था कि वह स्वस्थ्य हो जाएंगे तब एक दिन उनके साथ बताऊँगा. लेकिन वह दिन न आना था न आया. इधर 2 साल से मैं स्वयं स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहा हूँ. बेंगलुरु का मौसम लगता है रास नहीं आ रहा है.
विजय जी गज़ब के जीवट इंसान थे. जब तक शरीर ने साथ दिया, उन्होंने पढ़ना-लिखना नहीं छोड़ा. आख़िरी समय तक किताबों, विचारों और पत्रकारिता से उनका रिश्ता बना रहा. उनके सुनाए अनेक राजनीतिक किस्से आज ताज़ा हो रहे हैं.
एक दौर था जब आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विजय संघवी के घर नाश्ते पर जाते थे और उनसे मुलाक़ात के लिए इंतज़ार करते थे. अहमद पटेल को उनके बेटे कुलिन प्यार से चाचा कहकर बुलाते थे. उनकी बेटी स्नेहा की शादी नजमा हेपतुल्ला के घर में हुई थी. कहने का मतलब यह है कि वह संबंधों को जीने वाले इंसान थे. विजय जी ने करीब आधा दर्जन पुस्तकें लिखीं और उतनी ही अप्रकाशित रह गईं. उन्होंने जवाहरलाल नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक 16 प्रधानमंत्रियों के कामकाज पर अपनी बेबाक कलम चलाई. 1960 के आसपास पत्रकारिता की शुरुआत की और कुछ समय बाद ही 1967 के आसपास संसदीय कार्यवाही की रिपोर्टिंग शुरू कर दी. राजनीति, अर्थव्यवस्था और सामाजिक सरोकार उनके लेखन के प्रमुख विषय रहे. सत्ता के गलियारों तक उनकी सहज पहुँच थी.
उनकी हर पुस्तक प्रकाशित होने से पहले मेरे पास आती थी. भले ही अंग्रेज़ी पर मेरी पकड़ उतनी मज़बूत नहीं थी, लेकिन वे मुझे उसका ड्राफ्ट भेजते और उस पर मेरी राय भी अवश्य पूछते थे. यह उनका बड़प्पन था कि वे अपने से बहुत छोटे साथी की राय को भी उतना ही महत्व देते थे. उनकी कई पुस्तकों की पांडुलिपियां मेरे पास सुरक्षित हैं.
विजय जी मेरी पहली मुलाकात 1995 में हुई थी. मिलवाने वाले यूएनआई के एक वरिष्ठ पत्रकार थे, जिनका नाम अब याद नहीं आ रहा. वे कई वर्षों तक विदेश में भी यूएनआई की सेवाओं से जुड़े रहे थे और कुछ समय के लिए हमारे साथ काम कर रहे थे. वह उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के आसपास के थे. उन दिनों मैं सत्ता चक्र नामक पत्रिका में कार्यरत था. वही मुझे वरिष्ठ पत्रकार शरद द्विवेदी से मिलवाने ले गए, जो उस समय दैनिक भास्कर से जुड़े थे और आईएनएस बिल्डिंग में बैठते थे. उन्होंने ही मेरी मुलाकात यूएनआई के विमल कुमार और रामकृष्ण पाण्डेय सहित कई लोगों से कराई थी. मैं बीबीसी का कार्यालय भी पहली बार उन्हीं के माध्यम से देखा था जहाँ उन्होंने मुझे कुरबान अली और मधुकर उपाध्याय से मिलवाया था.
उन्हीं दिनों मैंने सत्ता चक्र के लिए शरद द्विवेदी और विजय संघवी से नियमित कॉलम लिखवाने शुरू किए. शरद जी हिंदी में लिखते थे, जबकि विजय जी अंग्रेज़ी में. हम उनके लेखों का हिंदी अनुवाद प्रकाशित करते थे. यह सिलसिला भले बहुत लंबा न चला हो, लेकिन उससे बने रिश्ते जीवन भर साथ रहे.
कॉलम के बहाने ही शरद जी और विजय जी से इतनी आत्मीयता हो गई कि दोनों के घर मेरा नियमित आना-जाना शुरू हो गया. शरद जी उन दिनों पंडारा रोड पर रहते थे, जबकि विजय जी सुजान सिंह पार्क, एंबेसडर होटल के पास रहते थे. कई बार उनके घर गुजराती नाश्ते और भोजन का आनंद लेने का अवसर मिला. उनसे मैंने पत्रकारिता ही नहीं, जीवन के भी अनेक सबक सीखे. जब-जब मुझे उनकी जरूरत पड़ी, वे दोनों ही हमेशा मेरे साथ खड़े मिले.
विजय जी की बहन और कई रिश्तेदार मुंबई रहते हैं. बहन कुमुद चावरे जो पत्रकार हैं, मुंबई के ओशीवारा इलाके में रहती हैं. वह लंबे समय तक नवभारत टाइम्स से जुड़ी रहीं और उसकी राजनीतिक संपादक भी रहीं. इस कारण से विजय जी से 2013 की शुरुआत में मेरे मुंबई शिफ्ट होने के बाद भी मुलाक़ातों का सिलसिला जारी रहा. वह लगभग हर साल मुंबई आते थे. ब्याह-शादी आदि अवसर पर भी उनका मुंबई आना होता था. जब भी आते समय निकालकर मिलने घर पर ज़रूर आते. उन्हीं की वज़ह से मेरी मुलाक़ात योगेश शर्मा और नेहल से हुई. हम लोगों से बिना मिले वह शायद ही कभी दिल्ली लौटे होंगे.
मुझे याद है, विजय जी और मीता (Meeta Sanghvi) आंटी ने 2017 में अपनी शादी की 50वीं वर्षगाँठ भी मुंबई के ट्राइडेंट होटल में ही मनाई थी. समारोह पूरी तरह पारिवारिक था. परिवार के सदस्यों के अलावा वहाँ मेरे परिवार, योगेश जी, नेहल के अलावा वरिष्ठ पत्रकार, राज्यसभा सांसद और दो-दो प्रधानमंत्रियों अटल बिहारी वाजपेयी और देवेगौड़ा के सलाहकार रहे एच. के. दुआ मौजूद थे जिनका बीते मार्च में निधन हुआ.
यदि मेरी पहुँच चंद्रशेखर जी तक हुई और मैं यंग इंडियन का हिस्सा बन सका, तो उसके पीछे भी विजय संघवी और शरद द्विवेदी का ही योगदान था. उन्हीं दोनों ने मुझे वहाँ तक पहुँचाया. पत्रकारिता में कई लोग रास्ता बताते हैं, लेकिन मंज़िल तक पहुँचाने वाले बहुत कम होते हैं. मेरे लिए विजय जी उन्हीं विरले लोगों में थे.
सच तो यह है कि यंग इंडियन को दोबारा खड़ा करने का सबसे बड़ा श्रेय भी विजय संघवी को ही जाता है. पत्रिका की पूरी रूपरेखा तैयार करने से लेकर टीम बनाने तक उन्होंने हर जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठाई. आईएसआईडी के निदेशक डॉ. एस. के. गोयल ने यंग इंडियन की अंग्रेजी की टाइपिंग कराने और प्रिंटिंग की जिम्मेदारी संभाली.
वही यंग इंडियन के प्रकाशक भी बने. पत्रिका के शुरुआती कुछ कवर डॉ जेएस यादव, जो उस समय भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) के निदेशक थे की पत्नी उमा यादव, वहाँ से बनवाकर लाती थीं. लेकिन इस पूरी कोशिश के पीछे विजय जी की दृष्टि, उनकी ऊर्जा और उनकी संगठन क्षमता साफ दिखाई देती थी. यंग इंडियन की सामग्री चयन का जिम्मा भी उन्होंने ही उठाया और तमाम पत्रकारों को पत्रिका से जोड़ने का भी. जब तक उन्होंने पत्रिका का जिम्मा सम्भाला यंग इंडियन संसद भवन के गलियारे में निरंतर चर्चा का विषय बनती रही.
एक और बात वह निरंतर अपनी गाड़ी से यंग इंडियन के कार्यालय आते रहे. अपना समय देते रहे. और भी कई तरह के खर्च करते रहे लेकिन कभी काम करने के पैसे नहीं लिए.
विजय जी केवल बड़े पत्रकार नहीं थे. वे प्रतिभाओं को पहचानने और उन्हें आगे बढ़ाने का दुर्लभ गुण भी रखते थे. उन्होंने न जाने कितने पत्रकारों और लेखकों का हाथ थामा, उन्हें अवसर दिए और सही लोगों से मिलवाया. मेरे जीवन में भी उन्होंने यही भूमिका निभाई. आज महसूस होता है कि यदि उस समय उनका स्नेह, उनका विश्वास और उनका मार्गदर्शन न मिला होता, तो शायद मेरी जीवन-यात्रा कुछ और ही होती.

आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो यादों का एक पूरा संसार आँखों के सामने तैर जाता है. कुछ रिश्ते खून से नहीं, विश्वास, स्नेह और मार्गदर्शन से बनते हैं. विजय संघवी जी मेरे जीवन में ऐसा ही एक रिश्ता थे.
आज भारतीय पत्रकारिता ने भले एक निर्भीक, अध्ययनशील और सजग पत्रकार खोया है, लेकिन मेरे लिए उनके जाने का दुख वैसा ही है, जैसा अपने पिता को खो देने का होता है. आँखें उतनी ही नम हैं जितनी तब थीं. उनका होना मेरे जीवन में बहुत मायने रखता था. उनकी स्मृतियों को सादर नमन. विनम्र श्रद्धांजलि…



