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सियासत

बंगाल का नया ‘डीमोक्रेसी’

50 सालों से चुनावी हिंसा के राजनीतिक संस्कार में पगे लोगों से दो महीनों में सुधरने की उम्मीद बेमानी…

Close-up of a middle-aged man's face with a mustache, looking at the camera against an orange wall.

बिमल राय-

बंगाल में पहली बार सत्ता में आई भाजपा सरकार ने लगभग 2 महीनों में ही भले ही जन हित और देशहित में कई बड़े कदम उठाये हैं, पर एक खास ट्रेंड ने सबका ध्यान खींचा है। वह ट्रेंड है पिछली सरकार के दौरान हुए अपराधों व घोटालों के आरोपियों को देखते ही ‘चोर चोर’ के नारे लगना और उन पर अंडे से अटैक का सिलसिला। बांग्ला में अंडे को ‘डीम’ कहते हैं, इसलिए हम लोकतंत्र यानी डेमोक्रेसी को क्यों न इस संदर्भ में ‘डीमोक्रेसी’ कहें?

सबसे पहले ‘डीमोक्रेसी’ का शिकार तृणमूल के युवराज अभिषेक बनर्जी हुए, जो चुनाव बाद हिंसा से पीड़ित अपने कार्यकर्ता के घर ढांढ़स बंधाने जा रहे थे। जिस बुआ के शासन में विपक्षी कार्यकर्ताओं पर उत्पीड़न के बाद सांत्वना देने या मदद करने का हक भी विपक्षी दलों से छीन लिया गया था, वहां इनको हम ऐसे ही क्यों जाने दें? 4 मई के बाद ‘रवींद्र संगीत के साथ ‘डीजे’ (चुनावी हिंसा) भी बजेगा’ कहने वाला और देश के गृहमंत्री की हिम्मत को ललकार कर 4 मई के बाद भी कोलकाता में मौजूद रहने की चुनौती (सत्ता में लौटने का आत्मविश्वास भी देखिए) देने वाला खुली सड़क पर बिना भारी भरकम सुरक्षा के निकला, तो लोगों को सब कुछ याद आ गया। ‘चोर- चोर’ के नारे के साथ अंडों से प्रहार, पिटाई से युवराज पस्त हो गये। दो-दो अस्पतालों ने युवराज को भर्ती करने की जरूरत नहीं बतायी और इस तरह सहानुभूति बटोरने व आधा दर्जन मामलों में पेशी से कुछ राहत का एक मौका फिसल गया।

इस बार करारी हार के बाद तृणमूल को सांस लेने के लिए कुछ समय चाहिए था, पर क्षुब्ध लोग थोड़ी सी खुली हवा भी नसीब नहीं होने दे रहे हैं। शायद तभी, 8 जुलाई को एक प्रदर्शन के दौरान घेरा बनाकर अपनी दीदी की सुरक्षा में लगे 3 तृणमूल कार्यकताओं को ही उनकी थप्पड़ खानी पड़ी। हालांकि अपने घर के सामने चोर-चोर का नारा और अंडे फेंकने की आवाज सुनकर ममता ने जैसे आपा खो दिया। हाल में असली तृणमूल विवाद को लेकर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मिलने अभिषेक बनर्जी चार्टर्ड विमान से दिल्ली गये तो लोगों ने माना कि क्या लाखों रुपयों की बर्बादी सिर्फ अंडों और ‘चोर चोर’ के खौफ के कारण हुई? यह भय 10 जुलाई को तब स्पष्ट हो गया, जब अभिषेक हाईकोर्ट के कड़े आदेश के बाद अपनी आवाज का नमूना (4 मई के बाद डीजे बजाने उर्फ हिंसा भड़काने के मामले के सबूत के तौर पर) देने पर तैयार हो गये, पर अर्जी लगायी कि पुलिस को हर हालत में अंडा प्रहार रोकने का आदेश दिया जाये। कुछ दिन पहले पूर्व विधायक निर्मल मांझी के बेटे पर पेशी के दौरान अंडा फेका गया। इन बाप-बेटे पर पानीहाटी इलाके के एक हाकर की जीती गयी 1 करोड़ की लाटरी का टिकट जबरन हड़पने का आरोप है।

अभी एक सप्ताह पहले इन ‘छोटी मिसाइलों’ का प्रहार झेला महंगे उपहारों के बदले संसद का पासवर्ड ‘बेचने’ वाली ममतापंथी महुआ मोइत्रा ने। अपने संसदीय क्षेत्र कृष्णनगर में पार्टी की एक बैठक में शामिल महुआ पर खिड़की के रास्ते अंडे बरसाये जाते रहे और वे वहीं से फेसबुक लाइव होकर बंगाल की मौजूदा दयनीय हालत के लिए नयी भाजपा सरकार को कोसने लगीं। सुरक्षा बल विपरीत दिशा में झांक रहे थे और इन्हें रोकने का कोई प्रयास नहीं हुआ। अंडे से पीला पड़ा महुआ ने जी भरकर सुनाया, पर फ्लैशबैक में गये लोगों का प्रहार और तेज हो गया।

यह हकीकत है कि बंगाल सत्ता बदलने के बाद पिछली सरकार के बहुत सारे कथित भ्रष्टाचारी भूमिगत हो गये थे। बाद में एक-एक कर पकड़े जाने के बाद नेताओं, कोलकाता नगर निगम व दूसरी नगरपालिकाओं/पंचायतों के पार्षदों/प्रधानों को पेशी के दौरान चोर-चोर संबोधन व अंडों का प्रहार झेलना पड़ा। कहने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि ऋतव्रत की अगुवाई में तृणमूल के 60 विधायकों के बागी होने के पीछे के कारणों में चोर चोर का स्लोगन व इन नन्ही मिसाइलों का आतंक भी था। शायद, संभावित कार्रवाई से बचने के लिए ममता से दूरी दिखानी जरूरी थी।

सवाल है कि ऐसा क्यों हो रहा है? हाईकोर्ट के बार-बार मना करने के बाद भी यह सिलसिला रुक नहीं रहा है। क्या सरकार अदालत की अवमामना कर रही है चाहती है कि ऐसी मिसाइलों से लोगों को गुस्सा अगर कम होता है तो होने दिया जाये? लोगों के क्षोभ की वजह साफ है, पर तृणमूल शासन के दौरान अत्याचार, हिंसा और भ्रष्टाचार को जिस तरह संस्थागत रूप दे दिया गया था, उसकी देश में तो कोई मिसाल नहीं मिलती। तृणमूल सरकार के रहते ही आधा दर्जन से ज्यादा मंत्री, एक दर्जन से ज्यादा सरकारी अफसर व कुछ अन्य अपराधों में शामिल लोग जेल गये। आज भी कुछ अंदर ही हैं, तो कुछ जमानत पर हैं। यह भी बताने की जरूरत नहीं कि बंगाल की बदहाली की बड़ी झांकियों में से एक था संदेशखाली कांड, जहां कबीलाई अंदाज में शासन चला रहा सरदारशेख शाहजहां हिंदू महिलाओं से आधी रात को ‘पीठे’ (बंगाल का एक मीठा व्यंजन) बनाने के लिए बुलाता था और इज्ज्त लूटता था। फिर युवराज के डायमंड हार्बर में इसी शैली में सरदार शेख जहांगीर का शासन चलता था। महिला उत्पीड़न के मामले पर तत्कालीन सीएम ममता ने एक आसान उपाय बता ही दिया था कि 8 बजे के बाद महिलाएं न निकलें। शिक्षा घोटाले ने बंगाल के युवा समाज को गुस्से से भर दिया, जिसमें तृणमूल नेताओं को घूस देकर नौकरी पाने वाले 8-10 हजार शिक्षकों के चलते अपनी प्रतिभा से शिक्षक बने 15-16 लाख शिक्षक भी बेरोजगार हो गये। सुप्रीम कोर्ट को सारे 26 हजार शिक्षकों को हटाने का आदेश देना पड़ा।

विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं को ‘अनोखी सज़ाएं (बालुरघाट में 3 आदिवासी महिलाओं को तृणमूल कार्यालय तक दंडवत परिक्रमा यानी- जमीन पर लेट-लेटकर जाने, माफी मांगने और फिर तृणमूल में शामिल होने) देने से लेकर सैकड़ों राजनीतिक हत्याओं, भाजपा के कार्यकताओं को महीनों तक पड़ोसी राज्यों-असम, बिहार, झारखंड में शरण लेने पर मजबूर करने वाला ‘आतंक राज’ लोग भूल नहीं पा रहे हैं।

आज जब तृणमूल के दर्जनों कार्यालयों व पंचायत भवनों से बेचने के लिए जमा आइला और आमफान जैसे चक्रवातों की राहत सामग्री के साथ सफेद साड़ियां मिल रही हैं, तब भी लोगों में सिहरन हो रही है। जान लें कि विपक्षी दलों के नेताओं व कार्यकर्ताओं को ‘चुप कराने’ या अपने खेमे में खीचने के लिए उनके घरों व दालानों में सफेद साड़ियां रख दी जाती थीं और एक भयानक संदेश होता था कि तुम्हारा पति अगर नहीं माना तो यही साड़ी (विधवा) तुम्हें पहननी होगी। ये डरावने दृश्य बार-बार फ्लैशबैक हो रहे हैं और लोग अंडे लेकर घंटों अदालतों व थानों के बाहर इंतजार करते दिख रहे हैं। वैसे भाजपा नेता बार-बार इन घटनाओं की निंदा कर रहे हैं और कह रहे हैं कि यह भाजपा की संस्कृति नहीं है। राज्यसभा सदस्य और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने कुछ दिन पहले कहा था कि अभी कोई ऐसा डिटेक्टर नहीं बना है, जो जेब में प्रहार के लिए रखे अंडे को डिटेक्ट कर सके। पुलिस और यहां तक कि केंद्रीय सुरक्षा बल भी ‘डीमोक्रेसी’ जमात के प्रति नरमी बरतती दिख रही हैं। हालांकि कानून व अदालतों पर विश्वास न कर विरोध के इस तरीके का कोई भी समर्थन नहीं कर सकता। इन्हीं घटनाओं के कारण नयी सरकार बनने के बाद भी फुटेज व बाइट का बड़ा हिस्सा हारी हुई टीम ने अपने खाते में कर लिया है। निष्कर्ष यही है कि, लोगों की प्रतिशोध की भूख तृणमूल को सत्ता से बाहर करने भर से शांत नहीं हो रही है। बंगाल में ‘डीमोक्रेसी’ के इस चलन से पुलिस वालों की वर्दी भी गंदी हो रही है, डिटर्जेंट का खर्च भी बढ़ रहा है। अंडों का प्रहार किसी गोली से ज्यादा असर कर रहा है और विभाजन के भंवर या कगार पर खड़ी तृणमूल को संभलने तक का मौका नहीं मिल रहा है।

मगर ‘संडे हो या मंडे, रोज खाओ अंडे’ से प्रेरित बहुत सारे लोग खुश नहीं हैं। वे पूछ रहे हैं कि सस्ते प्रोटीन व अमीनो एसिड से भरे अंडों को इस तरह क्यों बर्बाद किया जा रहा है? स्कूलों में इस्कान की ओर मिड डे मिल देने के मामले में बवाल हो रहा है और बच्चों को अंडा खिलाना जारी रखने की मांग हो रही है। हालांकि यह भी समझना चाहिए कि पिछले 50 सालों से हिंसा को अपना राजनीतिक संस्कार बना लेने वाले बंगाल में डेढ़-दो महीने पुराने परिवर्तन के बाद लोग अचानक बुद्ध और गांधी के रास्ते पर चलने लगेंगे, ऐसा संभव नहीं दिखता। पिछले विधानसभा चुनाव दौरान एक भी लाश नहीं गिरने की मिसाल ने उम्मीद बंधाई है। इसलिए, सब्र करें, अंडा प्रहार करने वाले ‘डीमोक्रेट’ भी धीरे-धीरे डेमोक्रेट बन जायेंगे।

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।
ई-मेल : [email protected]
फोन : 9830520445

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