सत्यजित राय जैसी मेधा हो तभी ऐतिहासिक फिल्म बनाएं

पद्मावत फिल्म जब चर्चा में थी और इस पर बहुत लिखा-पढ़ा जा रहा था, तभी मैंने सोचा था इस पर बाद में लिखूंगा। क्योंकि तब जो लोग भी उसको पढेंगे, वो शायद फिल्म देख भी चुके होंगे और तब वो बेहतर तरीके से मेरे लिखे को समझेंगे। ऐतिहासिक हिंदी फिल्में अपने देश में तमाम बनी हैं और ज्यादातर बेकार ही बनी हैं, जिसमें मुख्य वजह प्रसिद्ध चरित्रों का बम्बइया तरीके से प्रस्तुतीकरण कर माल बटोरना रहा है, ना कि एक उत्कृष्ट ऐतिहासिक फिल्म बनाना। अपवाद भी रहे हैं जैसे शतरंज के खिलाड़ी या उत्सव। इस सिलसिले में मुझे उन तीन हिंदी फिल्मों का खयाल आ रहा है जो मैंने देखीं। मनोज कुमार की क्रांति, के आसिफ की मुगल-ए-आज़म और सत्यजित राय की शतरंज के खिलाड़ी।

क्रांति शायद 1981-82 मे आई थी और ऐसा प्रचारित था कि सन 1857 मे हुई क्रांति के ऊपर यह फिल्म बनी है। तब तक हालांकि मुझे भी इस क्रांति के बारे में बहुत जानकारी नही थी, फिर भी बेसिक जानकारियाँ तो थी हीं। फिल्म देखने के बाद मैं समझ गया कि मनोज कुमार को अपने देश के लोगों की मूर्खता और अज्ञान पर पूरा भरोसा था, इसलिये उन्होंने उस ऐतिहासिक और गौरवशाली अध्याय को भुनाने के लिये खालिस बम्बइया स्टाइल में निहायत कूड़ा और भद्दी फिल्म बना कर पेश की। मनोज कुमार का भरोसा सच निकला, फिल्म काफी चली और उन्हें मोटा मुनाफा मिला होगा। यूरोप या अमेरिका में किसी ऐतिहासिक घटना पर ऐसी घटिया फिल्म बनी होती तो मुकदमों और जनरोष की बाढ़ आ जाती। खैर अपने देश की बात ही निराली है।

मुगल-ए-आज़म को ऐतिहासिक फिल्म माना जाता है लेकिन यह है नहीं, हां, इसके चरित्र जरूर ऐतिहासिक हैं। इन ऐतिहासिक और विश्वप्रसिद्ध चरित्रों को एक प्रेम कथा के माध्यम से इतने भव्य तरीके से प्रस्तुत किया गया कि इस फिल्म पर ऐतिहासिक होने का ठप्पा लग गया, किसी ने भी अकबर, जोधाबाई या सलीम को नही देखा, लेकिन उनकी जो छवि जनमानस मे बनी है, उसके अनुरूप जीवंत अभिनय कर कलाकारों ने फिल्म को ऐतिहासिक बना दिय। कुल मिलाकर ये फिल्म कालजई बन गई जो आज भी पसंद की जाती है‌।

अब आते हैं फिल्म शतरंज के खिलाड़ी पर। यह फिल्म सत्यजित राय ने प्रसिद्ध हिंदी कथाकार प्रेमचंद्र की कहानी पर बनाई। कहानी में नये चरित्रों को शामिल कर उन्होंने फिल्म को ऐतिहासिक बना दिय। हिंदी मे बनी इस फिल्म को अगर तार्किक लिहाज़ से बनी एकमात्र ऐतिहासिक फिल्म माना जाये तो शायद ये अतिशयोक्ति नहीं होगी। अगर इस फिल्म के बनाने के समय को ध्यान में रखें यानी 1977 को, तो तब तक आमजनता के मुताबिक अवध के आखिरी नवाब वाज़िद अली शाह एक ऐयाश और अयोग्य नवाब थे जिन्हें अपदस्थ कर अंग्रेज़ों ने अवध पर कब्जा कर लिया।

ऐसे विवादास्पद चरित्र की सचाई को सामने लाना, जैसे कि वाज़िद अली शाह थे, सत्यजित राय के बस की ही बात थी, जिसमें वे पूरी तरह सफल रहे। गहन शोध के बाद उन्होंने शाह के तख्त और मुकुट समेत तमाम बारीक चीज़ों पर ध्यान दिया और शाह के चरित्र को निभाने के लिये अमजद खान को चुना। अमजद खान ने भी सत्यजित राय के चयन को अपनी भूमिका से साबित किया और वाज़िद अली शाह के चरित्र को जीवंत कर दिया। जनरल आउट्रम की भूमिका के लिये सत्य जित राय सर रिचर्ड एटेनबरो को लाये। वाज़िद अली शाह जैसे लोकप्रिय शासक को गद्दी से हटाने की नैतिक दुविधा का बेहतरीन अभिनय सर रिचर्ड ने किया।

अब इन तीन फिल्मों के लिहाज़ से पद्मावत को देखें। फिल्म विवादास्पद ज़रूर है, लेकिन क्रांति की तरह फूहड़ और भद्दी तो नहीं ही है। अगर मैं अपने ज्ञान को सच मानू तो खिलजी और पद्मिनी के काल्प्निक प्रसंग को मुगल-ए-आज़म सरीखी सौंदर्यप्रियता के साथ फिल्माया गया है, तो ऐसा भी नहीं है। अब रही बात शतरंज के खिलाड़ी की कसौटी पर कसने की तो यह तो सम्भव ही नहीं है, क्योंकि संजय लीला भंसाली, सत्यजित राय नहीं हैं। यानी बचती है सिर्फ एक बात कि खिलजी और पद्मिनी के काल्प्निक लेकिन प्रसिद्ध आख्यान को फिल्माकर मोटा मुनाफा कमाया जा सके।

बुरा यह भी नहीं, लेकिन इसके लिये के आसिफ जैसी काबिलियत और नज़रिया चाहिये, वर्ना फिर यही होगा कि बाजीराव-मस्तानी फिल्म में मध्यकाल मे हुई मस्तानी आधुनिक काल का वाद्य मैंडोलिन बजाती नज़र आईं। हाँ एक बात और ऐतिहासिकता का मतलब चमक-दमक कतई नहीं होता। बाजीराव फिल्म में जो मुगलिया चमक-दमक दिखाई गई है इतिहास उसकी पुष्टि नहीं करता। पुणे मे शनिवार वाड़ा के खंड हर और मस्तानी का लकड़ी का घर यह बताने के लिये काफी हैं कि पेशवा का राज्य मुगलों सरीखा सम्पन्न नहीं था। यह कोई बुरी बात भी नहीं है, क्योंकि पेशवा वैसे भी अपने युद्ध कौशल और कूटनीति के लिये ज्यादा प्रसिद्ध थे ना कि सम्पन्न्ता के लिये।

बहरहाल पद्मावत बनाकर संजय लीला भंसाली ने एक काम ज़रूर किया कि ऐतिहासिक फिल्मों को एक बार फिर चर्चा में ला दिया। ऐसे में एक सीधा रास्ता बचता है जो के. आसिफ साहब दिखा भी गये हैं कि ऐतिहासिक चरित्रों को लेकर एक कहानी के तहत बेहतर फिल्म भी बनाई जा सकती है। ऐतिहासिक फिल्म बनाने मे थोड़ा संकट तो है कि कितने भी शोध के साथ फिल्में बनाई जायें, विवाद की वजह पैदा की जा सकती है क्योंकि हर प्रसिद्ध ऐतिहासिक चरित्र में कुछ ना कुछ विवादास्पद पहलू रहते ही हैं, और शतरंज के खिलाड़ी जैसी मुकम्मल फिल्म बनाना कम से कम हिदी मे फिलहाल सम्भव नहीं क्योंकि सत्यजित राय अब नहीं रहे।

लेखक अनेहस शाश्वत सुल्तानपुर के निवासी हैं और उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. मेरठ, बनारस, लखनऊ, सतना समेत कई शहरों में विभिन्न अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं.

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