लखनऊ में कई दिन से हड़ताल पर हैं न्यूज पेपर हॉकर… काश ऐसी हिम्मत पत्रकारों में होती…

लखनऊ में न्यूज पेपर हॉकरों की हड़ताल का पांचवां दिन है। नम्बर 1, सबसे आगे और देश के सबसे बड़ा अखबार होने का दंभ भरने वाले समाचार पत्रों के बंडल रद्दी हो रहे हें। राजधानी लखनऊ ही नहीं बल्कि देशभर में पत्रकार कई गुटों में बंटे हैं। लखनऊ में कई गुट व धाराएं हैं। मान्यता प्राप्त व गैर प्राप्त का भेद अलग से है। चार दिन से राजधानीवासियों को अखबार का दीदार नहीं हुआ है। लखनऊ समाचार वितरक विकास मंच ने सरकार और पाठकों से अपील की है कि आजादी से पहले मिल रहा कमीशन आज भी बरकरार है। बीते 67 वर्षो में मंहगाई कई गुना बढ़ गई है। लेकिन उनका कमीशन नहीं बढ़ा है, उलटे घटा दिया है।

लखनऊ व देश के पत्रकार साथी हॉकर भाईयों से कुछ और नहीं तो कम से कम एकता का पाठ सीख लें तो, पत्रकार व पत्रकारिता दोनों का भला होगा। पिछले दिनों मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव के समक्ष भी पत्रकार एकता खण्ड—खण्ड हुई, जिस पर मुख्यमंत्री ने टिप्पणी भी की। उप्र राज्य मान्यताप्राप्त संवाददाता समिति के चुनाव में पत्रकार दो गुटों में बंटे। दो समितियों का चयन हुआ। पत्रकार एकता ​बंटी। नतीजा, सूचना विभाग की डायरी से मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के पदाधिकारियों का नाम छापना सरकार ने बदं कर दिया। नाम छपना कोई बड़ा मुद्दा नहीं है, लेकिन एकता टूटते ही सरकारी अमले ने पत्रकारों को उनकी औकात बताने में देरी नहीं की।

तमाम मौकों पर मतभेद और मनभेद सार्वजनिक होते रहते हैं। मीडिया घरानों और अखबार मालिकों द्वारा पत्रकारों का शोषण पत्रकार संगठनों के नेताओं से छिपा नहीं है, लेकिन एकता खंड—खंड होने का लाभ अखबार मालिक वर्षों से उठा रहे हैं। लखनऊ में रिर्पोटिंग व डेस्क के सा​थियों का जमकर शोषण हो रहा है। अल्प वेतन, 10 से 12 घण्टे की डयूटी और नियमित वेतन, सामाजिक सुरक्षा की कोई सुविधा न होना लखनऊ की पत्रकारों की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है।

हॉकर भाईयों की भांति राजधानी लखनऊ में अगर रिपोर्टिंग और डेस्क के साथी चार दिन की हड़ताल पर चले जाएं तो पत्रकारों और पत्रकारिता दोनों का कल्याण हो जाएगा। लेकिन टुकड़ों में बंटी एकता, मतभेद और मनभेद शायद ऐसा होने में बड़ी बाधा है। देश—दुनिया की खबरों की कवरेज करने वाले, दूसरों की आवाज बुलंद करने वाले, सत्ता और शासन को कंपाने और हड़काने वाले, बड़े—बड़े दिग्गज पत्रकारों में अखबार की दुनिया में सबसे निचले पायदान पर खड़े हॉकरों जैसी हिम्मत भी नहीं है। एकता तो बरसों पहले ही स्वाहा हो चुकी है।

खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मानने व बताने वाले पत्रकार अंदर से कितने कमजोर और बुजदिल हैं। जो अपने ही शोषण का विरोध करने की हिम्मत बरसों से नहीं जुटा पाये हैं। हम पत्रकारों से बेहतर तो हॉकर ही हैं, कम से कम उनमें एकता और अपने हक को मांगने की हिम्मत तो है। हॉकर भाईयों की एकता और हक की लड़ाई को सलाम।

लेखक डॉ0 आशीष वशिष्ठ लखनऊ के पत्रकार और पत्रकारिता शिक्षक हैं.

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