अखबार न बंटने से कुछ लोग तो बहुत खुश हैं!

लखनऊ में पांच दिनों से अखबार नहीं आ रहे हैं। लोग परेशान हैं। कार्यक्रम हो रहे हैं, पत्रकार वार्ताएं हो रही हैं लेकिन जब खबरें नगर में पहुंच नहीं रही हैं तो लोगों को लगता है कि उनका उद्देश्य पूरा नहीं हो सका है। कार्यक्रमों की सूचनाएं भी नहीं पहुंच रही हैं। मैं तो ज्यादातर साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों में जाता हूं। इस बीच कई कलाकार बाहर से नगर में आए लेकिन वे अपने साथ अखबार नहीं ले जा सके। फोन आते हैं। क्या हमारे कार्यक्रम की कवरेज हुई, फोटो भी थी? अगर वे आसपास हैं तो हम उन्हें कार्यालय आकर अखबार लेने की सलाह देते हैं, दूर हैं तो इंटरनेट संस्करण के बारे में बताते हैं। पत्रकार साथी भी परेशान हैं। उनकी खबरें लोगों तक पहुंच नहीं रही हैं, बाइलाइन बेकार जा रही हैं..।

हॉकरों की हड़ताल से लखनऊ के रिपोर्टर हो गए हैं परेशान!

Pravesh Yadav : यूपी में इस समय हड़ताल का सीजन चल रहा है। आए लखनऊ पूरा जाम हो जा रहा है और हमारी मांगे पूरी करो …. के नारे जम कर लग रहे हैं। इसी का फायदा लखनऊ के समाचार पत्र वितरक भी उठा रहे हैं। राजधानी में पिछले चार दिनों से अखबार का वितरण नहीं हुआ है। 20 पैसे कमीशन बढ़ाने की मांग को लेकर राजधानी वासियों को सुबह सुबह ताजा खबरों को पढ़ने के लिए तरसा दिया है। मीटिंगों का दौर जारी है लेकिन बात नहीं बन रही है। जिला अध्यक्ष इनका पूरी तरीके से टाइट है। इस समय इन्हें 1 रुपए 20 पैसे कमीशन मिल रहा है 20 पैसे और मांग रहे है।

लखनऊ में कई दिन से हड़ताल पर हैं न्यूज पेपर हॉकर… काश ऐसी हिम्मत पत्रकारों में होती…

लखनऊ में न्यूज पेपर हॉकरों की हड़ताल का पांचवां दिन है। नम्बर 1, सबसे आगे और देश के सबसे बड़ा अखबार होने का दंभ भरने वाले समाचार पत्रों के बंडल रद्दी हो रहे हें। राजधानी लखनऊ ही नहीं बल्कि देशभर में पत्रकार कई गुटों में बंटे हैं। लखनऊ में कई गुट व धाराएं हैं। मान्यता प्राप्त व गैर प्राप्त का भेद अलग से है। चार दिन से राजधानीवासियों को अखबार का दीदार नहीं हुआ है। लखनऊ समाचार वितरक विकास मंच ने सरकार और पाठकों से अपील की है कि आजादी से पहले मिल रहा कमीशन आज भी बरकरार है। बीते 67 वर्षो में मंहगाई कई गुना बढ़ गई है। लेकिन उनका कमीशन नहीं बढ़ा है, उलटे घटा दिया है।