सुलगता देश, दहकते लोग : इस्लामिक कट्टरता ही समस्या

इस्लामिक कट्टरता के टाइमबम पर खड़े देश. सरकार, अदालतों और मानवता के पक्षधरों के पास सीमित समय. इसे डिफ्यूज नहीं किया तो वो लोग फूट पड़ेंगे, जो कभी अहिंसा के पुजारी होने का दम भरते रहे है. हालात नहीं संभले तो फ्रांस समेत तमाम देश गृहयुद्ध के अंदेशे को नकार नहीं सकते. ये बात भारत सहित दुनिया के तमाम देशों के लिए कभी भी सच्चाई बनकर सामने आ सकती है. जो विश्वयुद्ध का आकार ले सकती है. जबकि सिस्टम कथित बुद्धिजीवियों की संतुष्ट करने में लगा है, नाकि समस्या को सुलझाने में. वहीं सेना के जवान, मजदूर, किसान के साथ मध्यमवर्गीय लोग भी सहनशीलता की उपदेश में खुद को ठगा पा रहे हैं.

इस बात के समर्थन में तीन घटनाएं हैं. पहली घटना में फ्रांस फिर हुई आतंकी कार्रवाई, वहीं फ्रांस जो अपने को इतना बुद्धिजीवी समझता था मानो सभी समस्याओं का अंत दार्शनिक अंदाज में करना कोई उससे सीखे. दूसरी घटना से लगा कि सुप्रीम कोर्ट ने अरुणांचल में लोकतंत्र को बचा लिया, पर पूरे देश बचाने के लिए लोगों को सुप्रीम कोर्ट की पहल का इंतजार अब भी है. तीसरी घटना कश्मीर को लेकर कथित बुद्धिजीवियों का विधवा-विलाप (जो नहीं उसका शोक) है. तीनों घटनाओं को एक सूत्र में देखे तो नतीजे मन में कोलाहल पैदा करते हैं.

पहला, नागरिक स्वतंत्रता का पक्षधर फ्रांस को बदरंग करने के लिए इस्लामिक कट्टरपंथी जिम्मेदार हैं, जो यह साबित करने पर तुले हैं कि वो दूसरे धर्म के लोगों के साथ शांति से नहीं रह सकते. फ्रांसीसी सरकार जिसके राष्ट्रपति फ्रांसवा ओलांद मानते हैं कि पूरा फ्रांस ‘इस्लामी आतंकवाद के खतरे’ का सामना कर रहा है. लेकिन इस्लामिक कट्टरवादियों को पूरी तरह से कुचलने के लिए वैश्विक गठबंधन के लिए आगे आने में ओलांद के पांव अगर कांप रहे हैं तो इसका कारण मात्र इतना ही है कि वो खुद समझ नहीं पा रहे हैं कि कथित बुद्धिजीवियों से वैचारिक धरातल पर कैसे निबटेंगे. ओलांद के लिए सलाह केवल इतनी है कि समस्या से निपटो, कथित बुद्धिजीवियों से जनता निपट  लेगी. हिम्मत करो ओलांद. सिर्फ समस्या से निपटो. समस्या है इस्लामिक कट्टरवाद.

खुद को बुद्धिजीवी मानने वाले किसी समस्या सीधे तौर पर नहीं देखते. उसमें कई और समस्याओं को जोड़ देते हैं जैसे कश्मीर में आतंकवाद. जो सीधे सीधे इस्लामिक कट्टरवाद का दंश झेल रहा है. लेकिन कथित बुद्धिजीवी इस समस्या को रोजगार, उदारता, स्वायत्ता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता के हनन और इतिहास की घटनाओं को अपनी व्याख्या से जोड़ देते हैं. लेकिन ऐसी बातें करते वक्त कथित दार्शनिकों के दिमाग से बाकी देश को लोप हो जाता है.

उत्तराखंड के बाद अरुणांचल में सुप्रीम कोर्ट ने लोकतंत्र को बचा लिया. अब देश बचा लीजिए साहब. कई मुद्दे हैं जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने राजनीति की देन कहकर परामर्श देने से मना कर दिया, जैसे राम मंदिर पर. देश ने इस फैसले का स्वागत किया. लेकिन कुछ मामलों की अनदेखी देश पर भारी पड़ती है जैसे जेएनयू छात्रों के देशद्रोही नारे. देश ठगा देखता रह गया. कोर्ट से जमानत पर रिहा एक कथित छात्र उमर फिर आतंकवादियों के पक्ष में फेसबुक और ट्विटर पर संदेश देने लगा. पूरा देश सन्न है. कहां है कानून. देश की सरहदों को वीर जवान देने वाली माताएं दंग है. ये संकट तब और गहरा हो जाता है जब यह प्रवृति देश के न्यायालयों में दिखने लगे. देशद्रोह तक के मामलों को सामान्य तौर पर लिये जाने की प्रवृत्ति दिखने लगी है. आतंकवादियों को फांसी की जगह उम्रकैद दिया जाने लगा है. सब हो रहा है देश की कीमत पर. देश की सर्वोच्च अदालत, आपसे देश की गरीब जनता इनता आस तो लगाये हुए ही है कि दो वक्त की रोटी भले ही नहीं दिला पाइये लेकिन देश के टुकड़े-टुकड़े करने वालों के टुकड़े तो कर ही दीजिए.

देश-दुनिया के तमाम कथित बुद्धिजीवी कश्मीर की समस्या को बनाये रखने पर तुले है. स्वायत्ता की बात करते करते स्वतंत्रता तक पहुंच जाते हैं. अंदर ही अंदर सरकार की विवशता पर कहकहे लगाते हैं. दार्शनिक अंदाज में साबित करते हैं कि सवा सौ करोड़ जनता को कैसे छला जाता है. कैसे राष्ट्रवाद का संजीदगी से मजाक उड़ाया जा सकता है, उस राष्ट्र पर जिसपर देशभक्त अपनी जान लुटाने के लिए तैयार रहते हैं. सरकार भी छवि के चक्कर में कड़े फैसले में सहम जा रही है. लेकिन सरकार, अब आपको सीधे स्वीकार पड़ेगा कि इस्लामिक कट्टरवाद ही समस्या है. इसकी पकड़ को ढीला करने के लिए मुस्लिम महिला शिक्षा को आधुनिक और अनिवार्य बनाना होगा. इस्लामिक कट्टरता के हर स्मारक को चूर-चूर करना होगा. हर उस सामाजिक परिवर्तन को लाना होगा, जो कट्टरता के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दे. भले ही आप पर इस्लाम विरोधी होने का आरोप लगे. लेकिन इससे शांति-अमन पसंद मुस्लिमों का भला तो होगा ही साथ ही उन गैर-मुस्लिम युवाओं के दहकते विचारों पर पानी पड़ेगा, जिन्हें अभी तक यहीं लग रहा है कि जो कौम लड़ती नहीं, वो मिट जाती है.

लेखक प्रसून शुक्ला वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. उनसे संपर्क prasoon001shukla@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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