देशद्रोहियों की हत्या करने वाले सिपाही या अपराधी?

सरकार और सर्वोच्च न्यायालय को साफ करना चाहिए कि क्या कोई आम आदमी अगर देशद्रोहियों पर हमला कर उन्हें मौत के घाट उतार देता है, तो उसे देश का सिपाही माना जायेगा या अपराधी. क्योंकि अब सवाल देश की अखंडता का है. सरकार मौन है. न्यायपालिका के घर देर है. ऐसे में सवाल उठता है कि सेना में अपने बच्चे भेजने वाला किसान, मजदूर, फौजी और मध्यमवर्गीय नागरिक देश के बारे में अपमानजनक बातें क्यों बर्दाश्त करे? सरकार और न्यायपालिका की चुप्पी क्या देश के साथ विश्वासघात नहीं है? देश की अखंडता पर चोट क्यों बर्दाश्त किया जा रहा है? क्या व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर फिर से देश के विभाजन पर चर्चा होगी? ऐसे देशद्रोहियों को सीधे फांसी या गोली क्यों नहीं मारी जानी चाहिए? सवाल का जवाब चाहिए… सरकार.

कश्मीर में हताशा की हालात में अलगाववादी अब आजादी की मांग खुलकर कर रहे हैं. वो भी धर्म के आधार पर. कश्मीर के डिप्टी मुफ्ती आजम नसीर अल इस्लाम में अपनी मांग में भारत को धमकी दी है कि जब 1947 में 17 करोड़ मुस्लिम अलग देश बना सकते हैं तो आज बीस करोड़ से ज्यादा मुस्लिमों के लिए अलग देश क्यों नहीं. सवाल केवल एक डिप्टी मुफ्ती का नहीं है, बल्कि ऐसी सोच को कुचलने का है. ये ऐसी सोच है जो गांधी-नेहरू की सोच वाले लोगों के मुंह पर तमाचा है. जो हिंदुस्तान को केवल हिंदुओं का स्थान नहीं मानते थे. संविधान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधान किये गये थे. हालांकि तब भी सवाल खड़ा हुआ कि जब इस्लाम धर्म के आधार पर देश बाटा गया, तो हिंदुस्तान में मुस्लिमों और इस्लाम को जगह क्यों? इसका जवाब अब केवल और केवल मुस्लिमों को खोजना है.

देश की अखंडता संविधान का हिस्सा है. मन/वचन/कर्म से भारत के टुकड़े करने की कोशिश करने वाले देशद्रोही की श्रेणी में आते हैं. देशद्रोह के कानून में फांसी की सजा है. इसके लिए विशेष प्रावधान हैं. लेकिन कार्रवाई के नाम पर सरकारी एजेंसियां लाचार और बेबस दिखती हैं. सत्ताधारियों की इच्छाशक्ति की कमी भी एक कारण है. जो कड़ाई से कानून लागू करने में हिचकते हैं. इसके पीछे कई ऐसे विपक्षी दलों की दोगली नीतियां भी हैं, जो तुष्टीकरण की नीति के चलते कई बार देश को भी दांव लगाने से बाज नहीं आते. लोकतंत्र की आड़ में देश को बांटने वाली सोच अब आर या पार वाली स्थिति में आ गई है.

आज के दिन स्वाभिमानी नागिरकों के सामने कई सवाल खड़े हैं. जिसका जवाब सरकार से लेकर देश की सर्वोच्च न्यायालय को देना चाहिए. पहला, क्या खुलेआम देश के टुकड़े की बात करने वाले देशद्रोही हैं? क्या ये संविधान के साथ देशद्रोह है? अगर है, तो खुलेआम माखौल उड़ाने वालों को सजा तुरंत क्यों नहीं? मौजूदा प्रावधानों का पालन में संकोच क्यों?
दूसरा सवाल, लोकतंत्र की आड़ में देश की आबरू से खिलवाड़ करने वाले कथित नेताओं पर कार्रवाई से संकोच क्यों? देशद्रोहियों की तर्ज पर इन पर सजा के साथ इनके रिश्तेदारों तक की संपत्तियां भी जब्त होनी चाहिए. इसमें देरी क्यों?

तीसरा सवाल, राष्ट्र की मौलिक संरचना के हिस्सा बने राष्ट्रगान, राष्ट्रीय गीत का तिरस्कार करने वालों पर देशद्रोह का मुकदमा क्यों नहीं? तुरंत सजा क्यों नहीं? खुलेआम टीवी, मीडिया में अपनी देशद्रोही मानसिकता का परिचय कुछ लोग दे रहे हैं. जिसके कारण हर एक नागरिक ठगा महसूस करता है. ऐसे लोगों पर कार्रवाई में क्या सबूत चाहिए? अगर कोई लाचारी है तो सरकार देश की जनता को बताये.

लेखक प्रसून शुक्ला वरिष्ठ पत्रकार हैं और कई न्यूज चैनलों के एडिटर इन चीफ रह चुके हैं. उनसे संपर्क prasoon001shukla@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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बहनजी हार का कारण खुद को बतातीं तो समर्थक टूट जाते, इसलिए EVM को दुश्मन बनाया!

मायावती के निशाने पर ईवीएम के मायने… राजनीति में अक्सर ईवीएम को मोहरा बना दिया जाता है…  बीएसपी की हार से नाखुश दिख रहे दलित हितों को प्रमुखता से उठाने वाले एक संपादक ने मुझसे निजी बातचीत में बहन मायावती जी रवैये पर खासी नाराजगी जाहिर की. कहा, हार के कारणों की सही से समीक्षा नहीं होगी, तो ईवीएम को गलत ठहराने से बहुजन समाज पार्टी का कुछ भी भला नहीं होगा. बहन जी से मिलकर सबको सही बात बतानी चाहिए, भले ही उसमें अपना घाटा ही क्यों ना हो जाये. मैंने अपने संपादक मित्र से इस मामले पर एक घटना का जिक्र किया. जिसे आपके लिए भी लिख रहा हूं.

कांग्रेस ने 13वीं लोकसभा चुनाव (1999) में मिली हार की समीक्षा के लिए बैठक बुलाई. सोनिया गांधी जी चर्चा में तमाम दिग्गज कांग्रेसियों की राय ले रही थी. बात आगे बढ़े, उससे पहले बता दिया देना उचित होगा कि पहली बार लोकसभा चुनाव में ईवीएम को आंशिक तौर पर 1999 में इस्तेमाल शुरू किया गया था. उस समय विदेशी मूल का मुद्दा 12वीं लोकसभा में एक मत से गिरी अटल सरकार के वरदान साबित हुआ. जिसके कारण ही अटल सरकार या कहें पहली गैर-कांग्रेसी सरकार अपने 5 साल पूरा करने में कामयाब रही.

मंच में कांग्रेस के तमाम ऊंची जाति के नेता कांग्रेस की हार समीक्षा में अपनी ऊर्जा इस तरह खपा रहे थे कि कहीं भी हार का ठीकरा सोनिया गांधी पर नहीं फूटे. किसी ने हार का कारण चुनाव में गलत टिकट बटवारे को बताया, किसी में संगठन में अनुशासनहीनता को जिम्मेदार ठहराया, तो किसी चुनाव में युवाओं की भागीदारी की कमी को लेकर भी सवाल खड़ा किया. इसी बीच सोनिया जी ने पूर्वांचल के दिग्गज कांग्रेसी दलित नेता महावीर प्रसाद जी से पूछा कि आपकी राय में कांग्रेस की हार के लिए कौन जिम्मेदार है.

महावीर प्रसाद जी ने कहा कि हार का एकमात्र कारण ईवीएम है. जिसमें वोट डालने पर बीजेपी को एक की जगह दो वोट मिलते थे. दलित नेता की बेतुकी बात सुनकर तमाम दिग्गज और ऊंची जाति के कांग्रेसी नेता व्यंग्य से हंसे और हार के कारणों को जानने के लिए लिए दूसरे नेता की बारी आ गई. ऊंची जाति के नेताओं की व्यंग्यात्मक हंसी महावीर प्रसाद जी के एक समर्थक को काफी खली. चर्चा खत्म होने के बाद जैसे ही महावीर प्रसाद जी बाहर निकले, करीबी समर्थक ने बिलखकर बोला, बाबूजी आप भी गजब करते हैं, आपकी राय को तमाम दिग्गज नेता उपहास में उड़ा दिये. ऐसी राय आपको नहीं जतानी चाहिए थी.

इतना सुनते ही टोपी वाले नेता और बाबूजी के नाम से प्रसिद्ध महावीर प्रसाद जी गुस्से में बोले, मुझे राजनीति मत सिखाओ. हार का कारण क्या है, किसको नहीं मालूम है… सबको मालूम है कि हार का कारण सोनिया जी ही हैं. उनके विदेशी मूल का मुद्दा ही बड़ा कारण है. लेकिन बिल्ली के गले में घंटी बांधे कौन. मैं फिर कहता हूं कि ईवीएम ही हार की जिम्मेदार है.

अब समर्थक सन्न. उसने महावीर प्रसाद जी के सामने श्रद्धा से हाथ जोड़ लिये.

दिवंगत महावीर प्रसाद जी की तरह बहन मायावती जी को भी अच्छी तरह मालूम है कि 2017 यूपी विधानसभा चुनाव में किस कारण से बहुजन समाज पार्टी चुनाव हारी. लेकिन हार की जिम्मेदारी बहन जी के खुद लेने से क्या करोड़ों बीएसपी के वोटरों का मनोबल नहीं गिरेगा? इस सवाल जवाब के बाद मेरे साथी संपादक के चेहरे शांति भाव से खिल गया. जय भीम के नारे संग वो अगली रणनीति को सफल बनाने के लिए बढ़ चले.

नोट : इस लेख का मकसद ईवीएम मशीन को क्लीनचिट देना बिल्कुल नहीं है.

लेखक प्रसून शुक्ला वरिष्ठ पत्रकार हैं और कई न्यूज चैनलों के एडिटर इन चीफ रह चुके हैं. उनसे संपर्क prasoon001shukla@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.


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टीवी संपादक प्रसून शुक्ला ने कश्मीर मामले पर पीएम को लिखे संतोष भारतीय के पत्र का यूं दिया जवाब

प्रधानमंत्री जी,

जम्मू-कश्मीर की सैर पर गये चंद संपादक और बुद्धिजीवी यह साबित करने पर तुले हैं कि मसला पाकिस्तान नहीं बल्कि कश्मीर है. इतिहास और भूगोल की सलाह देने वाले कथित स्टोरी राइटर्स से आपको इससे ज्यादा उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए. भारत का इतिहास साक्षी है कि यह धरती केवल चंद्रगुप्त मौर्य, साम्राट अशोक, पृथ्वीराज चौहान जैसे वीरों की ही जननी नहीं रही बल्कि जयचंद जैसे कंलक भी इसी की कोख से जन्म लेते रहे हैं. मोदी जी, जनता को शुरू से मालूम है कि आप नेहरू नहीं हैं, गांधी भी नहीं हैं. इसीलिए ही जनता ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री चुना है. आपको करोड़ों-करोड़ लोगों ने जाति-धर्म बंधन को तोड़कर जन आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए चुना है. इसीलिए आपकी एक भी गलती की माफी नहीं होगी. आप आकांक्षाओं के पहाड़ के नीचे हैं. लेकिन इससे आप मुकर नहीं सकते.

प्रधानमंत्री जी, कुछ कथाकार कश्मीर के विलय को दो देशों की संधि बताते हैं. वो जानना ही नहीं चाहते कि कश्मीर भी आजादी के समय भारत के 662 रियासतों में से एक थी. जो गंगा जामुनी तहजीब का एक अहम हिस्सा रही है. भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की पहचान है. जिसे भारत या पाकिस्तान में मिलना ही था. राजा हरिसिंह ने सैद्धांतिक रूप से इसे अपनी मंजूरी पाकिस्तान के आक्रमण के समय दे दी थी. असल में कटी-फटी आजादी देने की मंशा के चलते अंग्रेजों ने आजादी के समय प्रावधान रखा था कि रियासतें भारत या पाकिस्तान में विलय कर लें या अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रखें. आजादी के समय गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने अपने सहयोगियों की मदद से एक एक करके भारतीय परिसंघ में शामिल करा लिया था. सबसे बाद में भोपाल रियासत को शामिल किया गया.

प्रधानमंत्री जी, खास बात यह रही कि भारत राष्ट्र के एकीकरण में धर्म की जगह सभ्यता और संस्कृति को तरजीह दी गई. लेकिन सेक्युलरवादियों को यह बात भी नहीं पचती है. सेक्युलरिज्म की पश्चिमी धारणा कभी भी धर्म के सार्वजनिक पहचान को मान्यता नहीं देती है, धर्म को घर के अंदर की चीज मानी जाती है. लेकिन इन्हीं छद्म धर्मनिरपेक्षतावादियों की बदौलत सेक्युलरिज्म की धारणा भारत में आते-आते अपना दम तोड़ देती है. बिगड़ी परिभाषा में बहुसंख्यक की धार्मिक आस्था को तोड़ा-मरोड़ा जाता है जबकि हिंसक प्रवृत्ति वाले अल्पसंख्यकों को उनकी धार्मिक पहचान को सार्वजनिक तौर पर बनाये रखने के लिए प्रोत्साहित करते हैं. हिंसक प्रवृत्तियों से निपटने के लिए वैचारिक और जमीनी धरातल पर वास्तविक संघर्ष ही करना पड़ेगा, जिसमें सरकार से ज्यादा जनता की भूमिका अहम होगी. ऐसे हालात भारत में ही नहीं हैं, बल्कि ऐसी ही समस्याओं से दो-चार हो रहे चीन और कई पश्चिमी देश इसी दिशा में कड़े कदम उठा रहे हैं. धर्म के सार्वजनिक पहचान को कड़ाई से दबाकर राष्ट्र प्रथम का नारा दिया जा रहा है.

प्रधानमंत्री जी, देश आज अपने तक्षशिला की सलामती मांग रहा है. कश्मीरी पंडित अपनी जड़ों में जाना चाहते हैं. उस कश्मीर में, जो कभी तक्षशिला बनकर पूरे विश्व में महका करती थी. जहां पूरे भारतवर्ष से विद्वान आते थे. आज भी लाखों-लाख भारतवासी कश्मीर में बसना चाहते हैं. बर्फ के पहाड़ों पर तपस्या करना चाहते हैं. लेकिन नेहरू काल की भूलों ने कश्मीर को बेगाना सा बना दिया. संकट की घड़ी में सारा देश, जिसका असली प्रतिनिधित्व देश की एक अरब से ज्यादा मध्यमवर्गीय और गरीब जनता करती है, आपके साथ है. देश ने अपने लिए नए युग की कल्पना की, उसका आपको शिल्पकार चुना, सर्वमान्य नेता बनाया. आपका प्रधानमंत्री बनना ही साबित करता है कि लोग कांग्रेसी युग के लिजलिजेपन को त्याग देना चाहते थे.

प्रधानमंत्री जी, पाकिस्तान की करतूतों के चलते जम्मू-कश्मीर में कभी अल्पसंख्यक रहे और अब बहुसंख्यक बन उभरे लोग धार्मिक आधार पर एक और पाकिस्तान बनाने की मांग कर रहे हैं. चंद लोग अपनी सिंधु-हिंदु वाली आदिम पहचान से भी मुंह मोड़ रहे हैं. देश में बिना रीढ़ वाली सरकारों के चलते घाटी से लाखों कश्मीरी पंडितों का पलायन होता रहा. धर्मांतरण होता रहा. इसी विसंगति के चलते आज कश्‍मीर का सच अलग नजर आ रहा है. इस प्रक्रिया को उटलने का वक्त आ गया है क्योंकि अभी तक चारित्रिक दोषों से युक्त सरकार के मुखिय़ाओं में इतना दम नहीं रहा कि वो घाटी को कलंकित होने से बचा पाते. राष्ट्र गवाह है कि देशसेवा के लिए आपने पारिवारिक खुशियों को तिलांजलि दे दी. देश ने भी सही मौके पर अपना सही नेता चुना है. जो तमाम विसंगतियों को दूर कर राष्ट्र को एक सूत्र में पिरो सकता है.

प्रधानमंत्री जी, कश्मीर की समस्या की जड़ धार्मिक अलगाववाद में है. जिसे पाकिस्तान प्रयोजित आतंकवाद की शह मिल रही है. जो सर्वविदित है. धार्मिक अलगाववाद को अपने ही जयचंदों ने हवा दी. नब्बे दशक से ही कश्मीरी नेताओं के रिश्तेदारों के बदले आतंकी छोड़ने की परंपरा ने समस्या को खाद और पानी देने का काम किया. जिसके चलते केंद्र में तत्कालीन गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सैयद की बेटी रूबिया को छोड़ने के 13 आतंकी तो सैफुदीन सौज की बेटी नाहिदा सौज के लिए 7 आतंकी और गुलाम नबी आजाद के साले के बदले 21 आतंकी छोड़े गए. नपुंसक सरकारों ने देश को भी अपाहिज बना दिया. मिलीजुली सरकारों की हैसियत और इच्छाशक्ति की कमी ने कोढ़ में खाज का काम किया. रही सही कसर मलाईखोर बुद्धिजीवियों ने मानवता के लबादे को ओढ़ कर अपने लेखों से पूरी कर दी. बिकाऊ कथाकारों की चले तो देश के हर शहर को मानवता और रेफरेंडम के नाम पर देश को साम्प्रदायिक आग में झोंक देंगे.

पैलेट गन पर बवाल मचाने वाले कश्मीरी पंडितों की हत्याओं पर खामोश रहें. यह हत्यायें एक दिन की घटना नहीं थी, ना ही घाटी में सौ दिनों तक चली सामूहिक कत्ल की कहानी. कश्मीरी पंडितों का कत्ल और उनकी औरतों से बलात्कार सालों साल चला. नपुंसक सत्ता हाथ पर हाथ धरे बैठी रही. पलायन होता रहा. चारित्रिक कमियों से लबरेज सत्ता और कथाकार घाटी की रोमानी स्टोरी छापते और छापवाते रहे. सत्ता से पैसे और भविष्य में सम्मान को आतुर लंपट कथाकर विक्षिप्त कर देने वाली ऐसी विचारधारा के पोषक बन गए, जिसके चलते कभी पाकिस्तान बना था. क्या ये लंपट कथाकार संपूर्ण राष्ट्र की वेदना को सुन रहे हैं? इस समस्या से जल्द से जल्द छुटकारा पाना होगा. जिसे दूर करने के लिए बड़ी सर्जरी की जरूरत है. इसके लिए मोदी जी देशवासी बड़े से बड़े बलिदान के लिए तैयार है. मोदी जी, अब राष्ट्र आपकी ओर देख रहा है…

वरिष्ठ पत्रकार संतोष भारतीय ने पीएम को संबोधित पत्र लिखा था तो उसके जवाब में संपादक प्रसून शुक्ला ने भी पीएम को संबोधित पत्र लिखकर संतोष भारतीय के सारे तर्कों-अवधारणाओं का अपने हिसाब से जवाब दिया. ज्ञात हो कि प्रसून शुक्ला कई चैनलों में संपादक पद पर कार्य कर चुके हैं. प्रसून से संपर्क prasoon001shukla@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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सुलगता देश, दहकते लोग : इस्लामिक कट्टरता ही समस्या

इस्लामिक कट्टरता के टाइमबम पर खड़े देश. सरकार, अदालतों और मानवता के पक्षधरों के पास सीमित समय. इसे डिफ्यूज नहीं किया तो वो लोग फूट पड़ेंगे, जो कभी अहिंसा के पुजारी होने का दम भरते रहे है. हालात नहीं संभले तो फ्रांस समेत तमाम देश गृहयुद्ध के अंदेशे को नकार नहीं सकते. ये बात भारत सहित दुनिया के तमाम देशों के लिए कभी भी सच्चाई बनकर सामने आ सकती है. जो विश्वयुद्ध का आकार ले सकती है. जबकि सिस्टम कथित बुद्धिजीवियों की संतुष्ट करने में लगा है, नाकि समस्या को सुलझाने में. वहीं सेना के जवान, मजदूर, किसान के साथ मध्यमवर्गीय लोग भी सहनशीलता की उपदेश में खुद को ठगा पा रहे हैं.

इस बात के समर्थन में तीन घटनाएं हैं. पहली घटना में फ्रांस फिर हुई आतंकी कार्रवाई, वहीं फ्रांस जो अपने को इतना बुद्धिजीवी समझता था मानो सभी समस्याओं का अंत दार्शनिक अंदाज में करना कोई उससे सीखे. दूसरी घटना से लगा कि सुप्रीम कोर्ट ने अरुणांचल में लोकतंत्र को बचा लिया, पर पूरे देश बचाने के लिए लोगों को सुप्रीम कोर्ट की पहल का इंतजार अब भी है. तीसरी घटना कश्मीर को लेकर कथित बुद्धिजीवियों का विधवा-विलाप (जो नहीं उसका शोक) है. तीनों घटनाओं को एक सूत्र में देखे तो नतीजे मन में कोलाहल पैदा करते हैं.

पहला, नागरिक स्वतंत्रता का पक्षधर फ्रांस को बदरंग करने के लिए इस्लामिक कट्टरपंथी जिम्मेदार हैं, जो यह साबित करने पर तुले हैं कि वो दूसरे धर्म के लोगों के साथ शांति से नहीं रह सकते. फ्रांसीसी सरकार जिसके राष्ट्रपति फ्रांसवा ओलांद मानते हैं कि पूरा फ्रांस ‘इस्लामी आतंकवाद के खतरे’ का सामना कर रहा है. लेकिन इस्लामिक कट्टरवादियों को पूरी तरह से कुचलने के लिए वैश्विक गठबंधन के लिए आगे आने में ओलांद के पांव अगर कांप रहे हैं तो इसका कारण मात्र इतना ही है कि वो खुद समझ नहीं पा रहे हैं कि कथित बुद्धिजीवियों से वैचारिक धरातल पर कैसे निबटेंगे. ओलांद के लिए सलाह केवल इतनी है कि समस्या से निपटो, कथित बुद्धिजीवियों से जनता निपट  लेगी. हिम्मत करो ओलांद. सिर्फ समस्या से निपटो. समस्या है इस्लामिक कट्टरवाद.

खुद को बुद्धिजीवी मानने वाले किसी समस्या सीधे तौर पर नहीं देखते. उसमें कई और समस्याओं को जोड़ देते हैं जैसे कश्मीर में आतंकवाद. जो सीधे सीधे इस्लामिक कट्टरवाद का दंश झेल रहा है. लेकिन कथित बुद्धिजीवी इस समस्या को रोजगार, उदारता, स्वायत्ता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता के हनन और इतिहास की घटनाओं को अपनी व्याख्या से जोड़ देते हैं. लेकिन ऐसी बातें करते वक्त कथित दार्शनिकों के दिमाग से बाकी देश को लोप हो जाता है.

उत्तराखंड के बाद अरुणांचल में सुप्रीम कोर्ट ने लोकतंत्र को बचा लिया. अब देश बचा लीजिए साहब. कई मुद्दे हैं जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने राजनीति की देन कहकर परामर्श देने से मना कर दिया, जैसे राम मंदिर पर. देश ने इस फैसले का स्वागत किया. लेकिन कुछ मामलों की अनदेखी देश पर भारी पड़ती है जैसे जेएनयू छात्रों के देशद्रोही नारे. देश ठगा देखता रह गया. कोर्ट से जमानत पर रिहा एक कथित छात्र उमर फिर आतंकवादियों के पक्ष में फेसबुक और ट्विटर पर संदेश देने लगा. पूरा देश सन्न है. कहां है कानून. देश की सरहदों को वीर जवान देने वाली माताएं दंग है. ये संकट तब और गहरा हो जाता है जब यह प्रवृति देश के न्यायालयों में दिखने लगे. देशद्रोह तक के मामलों को सामान्य तौर पर लिये जाने की प्रवृत्ति दिखने लगी है. आतंकवादियों को फांसी की जगह उम्रकैद दिया जाने लगा है. सब हो रहा है देश की कीमत पर. देश की सर्वोच्च अदालत, आपसे देश की गरीब जनता इनता आस तो लगाये हुए ही है कि दो वक्त की रोटी भले ही नहीं दिला पाइये लेकिन देश के टुकड़े-टुकड़े करने वालों के टुकड़े तो कर ही दीजिए.

देश-दुनिया के तमाम कथित बुद्धिजीवी कश्मीर की समस्या को बनाये रखने पर तुले है. स्वायत्ता की बात करते करते स्वतंत्रता तक पहुंच जाते हैं. अंदर ही अंदर सरकार की विवशता पर कहकहे लगाते हैं. दार्शनिक अंदाज में साबित करते हैं कि सवा सौ करोड़ जनता को कैसे छला जाता है. कैसे राष्ट्रवाद का संजीदगी से मजाक उड़ाया जा सकता है, उस राष्ट्र पर जिसपर देशभक्त अपनी जान लुटाने के लिए तैयार रहते हैं. सरकार भी छवि के चक्कर में कड़े फैसले में सहम जा रही है. लेकिन सरकार, अब आपको सीधे स्वीकार पड़ेगा कि इस्लामिक कट्टरवाद ही समस्या है. इसकी पकड़ को ढीला करने के लिए मुस्लिम महिला शिक्षा को आधुनिक और अनिवार्य बनाना होगा. इस्लामिक कट्टरता के हर स्मारक को चूर-चूर करना होगा. हर उस सामाजिक परिवर्तन को लाना होगा, जो कट्टरता के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दे. भले ही आप पर इस्लाम विरोधी होने का आरोप लगे. लेकिन इससे शांति-अमन पसंद मुस्लिमों का भला तो होगा ही साथ ही उन गैर-मुस्लिम युवाओं के दहकते विचारों पर पानी पड़ेगा, जिन्हें अभी तक यहीं लग रहा है कि जो कौम लड़ती नहीं, वो मिट जाती है.

लेखक प्रसून शुक्ला वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. उनसे संपर्क prasoon001shukla@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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सुप्रीम कोर्ट स्वत: संज्ञान लेकर अमिताभ ठाकुर को राज्य की प्रताड़ना से बचाए

सर्वोच्च न्यायालय से गुहार. यूपी के आईजी अमिताभ ठाकुर के मामले में दखल दीजिए. सरकार की प्रताड़ना से बचायें, वरना सभी जनवादी और लोकतंत्र के नायक कालकोठरी में होंगे. अब जरा भी देरी न्यायिक प्रक्रिया का मजाक बना देगी. यूपी सरकार से भरोसा उठ रहा है. सुप्रीम कोर्ट से आस है. पूरा मामला देश के लोकतंत्र और कानूनी प्रक्रिया का माखौल उड़ाते साफ दिख रहा है. अब तो हर पत्रकार और अफसर को डर लगने लगा है कि जो यूपी सरकार के खिलाफ आवाज उठायेगा, वो फर्जी मुकदमे झेलेगा, जेल जायेगा. ये देश की सबसे बड़ी अदालत, अब जनता इंसाफ के लिए आप की तरफ टकटकी लगाये बैठी है. दखल दीजिए. 

यूपी के बेहद संवेदनशील आईपीएस के अफसर हैं अमिताभ ठाकुर. कसूर मात्र इतना कि नौकरी के अलावा भी समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी मानते हैं. गलत बातों को रोकने के लिए आम नागरिक की तरह आवाज उठाते हैं. इस काम में पत्नी, बेटा और बेटी भी शामिल है. लेकिन सरकार तो सरकार होती है. अपनी तौहीन कैसे बर्दाश्त करे. 

अपने काम से काम रखो, दुनिया जले तो जले. कुछ ऐसी ही छुपी नसीहत यूपी सरकार के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने फोन के जरिए सीधे आईजी अमिताभ ठाकुर को दे डाली. जिसकी शिकायत जब आईजी ठाकुर पुलिस थाने में करने गये तो यूपी सरकार का भड़कना तय था. लाद दिया रेप का केस. आनन-फानन में पुराने मामले में एफआईआर दर्ज की. दिखा दिया एक आईजी को उसकी औकात.

वो केस, जिसमें तथाकथित पीड़ित महिला की बेटी ने एक न्यूज चैनल पर साफ-साफ बोली कि मेरा परिवार समाजवादी पार्टी से जुड़ा है. लेकिन इस पीड़ित महिला की बेटी को ना तो इतनी बड़ी घटना के बारे में मालूम था ना ही अमिताभ ठाकुर के बारे में. असल में ये मामला खनन मंत्री गायत्री प्रजापति के कथित संरक्षण में अवैध खनन से जुड़ा है. जिसके बारे में आईजी ठाकुर ने आम आदमी की तरह से आवाज उठाई. मामला सुर्खियां में आया तो करीब 3-4 महीने पहले षड़यंत्र के तहत एक तथाकथित पीड़ित महिला ने बलात्कार का आरोप लगाया जिसके वर्तमान पता-ठिकाने के बारे में केवल समाजवादी पार्टी के लोग ही जानते हैं. क्योंकि मामला सामने आते ही महिला गायब हो गई. लेकिन मीडिया में फर्जी मामले को तूल पकड़ते देख यूपी पुलिस ने भी महिला की शिकायत को एक किनारे कर दिया. 

लेकिन सत्ता के तेवर देखिए, सारे के सारे पुलिस अफसर पस्त हो गये. आईजी ठाकुर की शिकायत पर तो एफआईआर नहीं हुई, लेकिन आईजी ठाकुर पर एफआईआर जरूर हो गई. यूपी का पुलिस महकमा भी अंदर से शर्मिंदा हुआ होगा. यूपी में कैसा जंगलराज चल रहा है. किस कारण लोकतांत्रिक प्रक्रिया के कट्टर समर्थक मुलायम सिंह यादव एक आईजी को धमकाने लगे. एक बार भी लोक-लाज के चलते मुलायम सिंह यादव ने इस बात का भी खंडन नहीं किया कि उन्होंने अमिताभ ठाकुर को धमकी नहीं दी. और तो और धमकी-चेतावनी नहीं मानने आईजी पर जड़ दिया गया रेप का मुकदमा. 

अब आईजी अमिताभ ठाकुर किससे इंसाफ मांगे? क्या करें जब मेड़ ही खेत को खाने लगे. ठगे गये अमिताभ ठाकुर. कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी ढोने वाले ठाकुर अब उसी व्यवस्था की खामी के शिकार हो गये. इंसाफ की दरकार है कि सुप्रीम कोर्ट सारे मामले को स्वत: संज्ञान में लेते हुए राज्य की प्रताड़ना से एक संवेदनशील और समाज के प्रति जागरूक अफसर को बचाये. अन्यथा किसी भी बड़ी अनहोनी से इंकार नहीं किया जा सकता है.

वरिष्ठ पत्रकार प्रसून शुक्ला के फेसबुक वॉल से

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जो इस्तीफा दे चुका है उसे श्रम विभाग नोएडा ने पार्टी बनाकर नोटिस जारी कर दिया! (पढ़ें प्रसून शुक्ला का पत्र)

द्वारा, प्रसून शुक्ला, पूर्व एडिटर इन चीफ  एवं सीईओ, न्यूज़ एक्सप्रेस चैनल

08.06.2015

श्री शमीम अख्तर

सहायक श्रम आयुक्त

गौतमबुद्ध नगर, उत्तर प्रदेश

संदर्भ :  प्रसून शुक्ला, (पूर्व सीईओ एवं एडिटर इन चीफ) को भेजे गये 06.06.15 की नोटिस का जवाब

शमीम जी,

 

5 जून 2015 को कर्मचारियों से प्राप्त शिकायत के मद्देनजर 06 जून 15 को जारी आपके ऑफिस से पत्रांक में मेरी उपस्थित आपके दफ्तर में जरूरी बताई गई. आप कर्मचारियों का हक दिलाने की मंशा रखने का दम भरते हैं, ये अच्छी बात है. लेकिन व्यवहार में आप का बर्ताव कहीं से भी सरकारी मुलाजिम जैसा नहीं है. आप साजिश का हिस्सा बनते रहे. 17अप्रैल2015 से लेबर कोर्ट में जारी विवाद में अभी तक मुझे कोई भी नोटिस नहीं भेजी गई थी. हालांकि इसके लिए भी आपने कुछ कर्मचारियों लगातार प्रेरित किया. आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि वेतन की दृष्टि से 29-05-2015 को मेरा न्यूज़ एक्सप्रेस के दफ्तर में आखिरी दिन था. जिसकी सूचना प्रबंधन ने सभी कर्मचारियों को मेल के जरिए 16-05-15 को दे दी गई थी. जिसमें साफ था कि मैंने 29अप्रैल2015 को इस्तीफा दे दिया था. संबंधित पत्राचार संलग्न है. (पत्राचार क्रमांक-1)

कर्मचारियों को पैसा मिलना चाहिए, लेकिन सैलरी दिलाने में मेरी भूमिका शुरू से ही शून्य और खुद वेतनभोगी की है. इसके बावजूद विवाद होने की नैतिक जिम्मेवारी लेते हुए 29 अप्रैल को ही इस्तीफा दे दिया. क्या आप भी ऐसी नैतिकता का परिचय देने में सक्षम हैं? सैलरी विवाद पर प्रबंधन से अपना विरोध दिखाने के लिए दो बार मेल भी किया. क्या आप बता सकते हैं कि इस्तीफे से ज्यादा मैं और क्या कर सकता था? इससे संबंधित पत्राचार संलग्न कर रहा हूं. {(पत्राचार क्रम-1)}

कर्मचारियों के साथ आपने भी शुरू से ही विवाद में मेरा नाम नहीं डाला क्योंकि सैलरी सीधे पुणे हेड ऑफिस से आती थी. इसके बारे में सभी कर्मचारियों को पता था. कर्मचारियों द्वारा किसी भी न्यायिक या प्रशासनिक प्रक्रिया में मुझे नहीं शामिल करने के पीछे भी यही वजह रही. प्रबंधन ने सारे मामले को देखने और अपना पक्ष रखने के लिए सीओओ संदीप शुक्ला को भेजा, जिन्होंने विवाद के मद्देनजर कंपनी के तरफ से हस्ताक्षर भी किये. ऐसे में मेरे इस्तीफा देने के बाद मुझे नोटिस भेजना आपकी एक कुटिल चाल रही.

शमीम जी, आपकी नीयत शुरू से ही इस मामले को सांप्रदायिक रंग देने की रही. जिसका खुलासा 18 अप्रैल 2015 को मेरे द्वारा कराई गई जांच रिपोर्ट आने से हुआ. ये रिपोर्ट न्यूज़ एक्सप्रेस के उन लोगों ने तैयार की, जो अपने हक की लड़ाई के लिए आपके ऑफिस गये थे. जांचकर्ताओं में ऑउटपुट हेड राकेश त्रिपाठी, डिप्टी एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर अभय उपाध्याय और प्रिंसिपल कॉरसपोंडेंट प्रख्या शामिल रहीं. जिनकी रिपोर्ट में आपका रोल सीधे तौर पर संदिग्ध पाया गया. जांच संबंधी पत्राचार भी संलग्न कर रहा हूं. {जांच रिपोर्ट (पत्राचार क्रम-2)}

जांच नतीजों में यह भी सामने आया कि प्रबंधन के खिलाफ आपने लोगों को शुरू से भड़काया और मेरे खिलाफ मामले को सांप्रदायिक रंग देने की भरपूर कोशिश की. आप दो महीने से कार्रवाई कर रहे हैं, पुणे में प्रबंधन से सीधे संवाद कर रहे थे, तब सीईओ को क्यों नहीं पार्टी बनाया? इस्तीफे के बाद नोटिस क्यूं भेजा? 5जून2015 को लिखे शिकायती पत्र में मेरा नाम डालकर मेरी प्रतिष्ठा धूमिल करने का प्रयास किया. ये प्रशासनिक दायित्व निभाने का सबसे घटिया प्रमाण है.

जहां तक सुश्री रूबी अरूण (पूर्व इनपुट एडिटर) की शिकायत का सवाल है, तो सुश्री रूबी श्रमिक की श्रेणी में आती ही नहीं हैं, जिसका ज्ञान आपको अच्छी तरह से है. सुश्री रूबी ने 5 मई को अपना इस्तीफा उस समय जांच के दौरान सौंपा, जब उनपर एक महिला रिपोर्टर ने गाली-गलौज करने का आरोप लगाया. जिसके साक्ष्य में तमाम गवाह और सबूत भी मौजूद हैं, जिसके चलते सुश्री रूबी ने इस्तीफा देना ही बेहतर समझा. इस्तीफे के कारण सुश्री रूबी का पूरा पैसा कंपनी ने एक महीने की नोटिस के हिसाब से 5 जून 2015 को दे दिया है. सुश्री रूबी के इस्तीफे, और उन पर लगे आरोपों से संबंधित जांच की कॉपी भी संलग्न कर रहा हूं. {जांच रिपोर्ट (पत्राचार क्रम-3)}

शमीम जी, ऐसा मुझे ज्ञात हुआ है कि सुश्री रूबी कंपनी की ओर से मिली गाड़ी वापस नहीं देना चाहती हैं, जिसके कारण वो आपके साथ मिलकर मामले को न्यायिक प्रक्रिया में उलझाने की साजिश रच रही हैं. जिसका उदाहरण यह नोटिस है.अगर प्रार्थी सुश्री रूबी अरूण इस्तीफे से इंकार करती हैं तो हैंडराइटिंग एक्सपर्ट से आपराधिक श्रेणी में मामला दर्ज करके पत्राचार की जांच कराई जा सकती है. आपको सचेत कर रहा हूं कि आप किसी भी गैरकानूनी गतिविधि का हिस्सा ना बने.(पत्राचार क्रम-3)

इन तथ्यों को आपको कई कर्मचारियों ने बताया, पर तथ्यों को अनदेखा करके आप ना केवल अपनी बल्कि सरकार और विभाग की भी छवि धूमिल कर रहे हैं. ये गंभीर विषय है.  मेरी साख को दांव पर लगाने की कोशिश के लिए केवल आप जिम्मेदार हैं. आपराधिक साजिश की आशंका के चलते इस पत्र और संलग्न पत्राचार की कॉपी प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश, प्रमुख सचिव, श्रम विभाग के साथ एसएसपी गौतमबुद्ध नगर और एसएसपी गाजियाबाद के पास भी भेज रहा हूं. ताकि किसी भी आपराधिक साजिश को नाकाम बनाया जा सके और आपको भी सचेत करता हूं कि नोटिस वापस लेकर भविष्य में इस बाबत कोई पत्राचार नहीं करें.

हस्ताक्षर

प्रसून शुक्ला
पूर्व संपादक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी
न्यूज़ एक्सप्रेस

कॉपी :
1. श्री नरेंद्र मोदी जी, प्रधानमंत्री
2. श्री राजनाथ सिंह जी, गृहमंत्री
3. श्री अखिलेश यादव जी, मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश
4. प्रमुख सचिव, श्रम विभाग, उत्तर प्रदेश
5. एसएसपी, गौतमबुद्ध नगर
6. एसएसपी, गाजियाबाद      

संलग्न पत्राचार के कुल पृष्ठ : 
पत्राचार क्रमांक 1 =  इस्तीफे से संबंधित पत्राचार
पत्राचार क्रमांक 2  = 18.04.15जांच रिपोर्ट के कागजात       
पत्राचार क्रमांक 3 = सुश्री रूबी के इस्तीफे और गाड़ी संबंधी कागजात

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न्यूज एक्सप्रेस में अपने साथियो की दुर्गति देख एडिटर इन चीफ प्रसून शुक्ला ने इस्तीफा दिया

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न्यूज एक्सप्रेस चैनल के एडिटर इन चीफ प्रसून शुक्ला और मैनेजिंग डायरेक्टर शशांक भापकर : आछे दिन पाछे गए… ! (फाइल फोटो)


एक बड़ी खबर साईं प्रसाद मीडिया के न्यूज चैनल ‘न्यूज एक्सप्रेस’ से आ रही है. चैनल के सीईओ और एडिटर इन चीफ प्रसून शुक्ला ने दुबारा व फाइनली इस्तीफा दे दिया. उन्होंने अपने अधीनस्थ मीडियाकर्मियों को सेलरी न दिए जाने पर पहले भी इस्तीफा दे दिया था लेकिन प्रबंधन ने सेलरी संकट दूर करने और सब कुछ स्मूथ करने का पूरी गंभीरता से वादा किया था जिस पर भरोसा करने के बाद प्रबंधन के अनुरोध पर प्रसून काम पर लौट आए. लेकिन प्रबंधन लगातार वादाखिलाफी करता रहा. चैनल संचालन के लिए जरूरी प्रत्येक मद में पैसे देने का काम बंद कर दिया गया. इसके कारण देखते ही देखते चैनल ब्लैकआउट हो गया.

प्रसून शुक्ला प्रबंधन से बातचीत कर स्थितियों को नामर्ल करने की कोशिश करते रहे लेकिन प्रबंधन किसी दूसरी ही धुन में है. इस बीच न्यूज एक्सप्रेस कर्मियों ने लेबर कोर्ट में मुकदमा कर दिया. साथ ही एक पत्र भी दिया जिसमें कहा गया है कि प्रबंधन अपने पूरे धंधे को बाइंडअप कर और पैसे विदेश ट्रांसफर कर भारत छोड़ने की फिराक में है. इसको लेकर तरह-तरह की चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया. प्रबंधन ने मीडियाकर्मियों की एकता में फूट डालने के लिए महाराष्ट्र के ब्यूरो चीफ संदीप शुक्ला को सीओओ बनाकर दिल्ली भेज दिया. पर संदीप शुक्ला भी तमाम कोशिशों के बावजूद पैसे की तंगी के कारण बंद पड़े चैनल को दुबारा शुरू नहीं करा पाए. इस बीच प्रसून शुक्ला ने चैनल की दिन प्रतिदिन बेहद खराब होती जा रही स्थिति और अपने मीडियाकर्मियों की पैसे की तंगी के कारण हो रही दुर्गति देख चैनल को अलविदा कहने का फैसला ले लिया. ऐसा लगता है कि न्यूज एक्सप्रेस चैनल भी भास्कर न्यूज और पी7 न्यूज आदि न्यूज चैनलों की राह पर चल पड़ा है जहां मालिकों दवारा पैसे न दिए जाने के कारण मीडियाकर्मियों ने सेलरी के लिए लंबे आंदोलन किए और हिसाब होने के बाद चैनल पूरी तरह बंद कर दिया गया.

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‘न्यूज एक्सप्रेस’ के सीईओ और एडिटर इन चीफ पद से प्रसून शुक्ला के इस्तीफे की चर्चा

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प्रसून शुक्ला का इस्तीफा नामंजूर, बने रहेंगे सीईओ और एडिटर इन चीफ

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‘न्यूज एक्सप्रेस’ के सीईओ और एडिटर इन चीफ पद से प्रसून शुक्ला के इस्तीफे की चर्चा

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एक बड़ी खबर ‘न्यूज एक्सप्रेस’ चैनल से आ रही है. पता चला है कि सीईओ और एडिटर इन चीफ पद से प्रसून शुक्ला ने इस्तीफा दे दिया है. पिछले कुछ महीने से चैनल में चले आ रहे सेलरी संकट के निपटते ही प्रसून ने चैनल को टाटा बाय बाय बोल दिया है. हालांकि इस बारे में प्रसून शुक्ला ने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया. उधर, उनके करीबियों का कहना है कि प्रसून जी ने इस्तीफा नहीं दिया है बल्कि वे लंबी छुट्टी पर चले गए हैं.

वहीं कुछ अन्य का कहना है कि प्रसून शुक्ला ने कल सभी स्टाफ की सेलरी आ जाने के बाद इस्तीफा दे दिया. यहां तक कहा जा रहा है कि वे पहले ही इस्तीफा देने वाले थे लेकिन पद पर अब तक इसलिए बने हुए थे ताकि अपने साथ काम करने वालों को सेलरी दिला सकें. सेलरी आते ही प्रसून ने अपना इस्तीफा प्रबंधन को भेज दिया है. फिलहाल प्रसून शुक्ला को लेकर जितने मुंह उतनी बातें हो रही हैं.

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प्रसून शुक्ला के व्यक्तित्व के बारे में क्या कहा वैदिक, यशवंत, रुबी, विकास आदि ने, आप भी सुनिए…

पिछले दिनों न्यूज एक्सप्रेस चैनल के सीईओ और एडिटर इन चीफ प्रसून शुक्ला का सम्मान उनके गृह जनपद बस्ती में एक संगठन ‘बस्ती विकास मंच’ द्वारा किया गया. इस मौके पर दिल्ली से गए कई पत्रकारों ने प्रसून शुक्ला के जीवन, करियर और सोच को लेकर अपने अपने विचार व्यक्त किए. डा. वेद प्रताप वैदिक, योगेश मिश्र, यशवंत सिंह, रुबी अरुण, सुधीर सुधाकर, विकास झा, बृजमोहन सिंह आदि ने प्रसून की पर्सनाल्टी के विविध पक्षों को उकेरा.

इस पूरे आयोजन और सबके भाषण को आप इस वीडियो लिंक पर क्लिक करके देख सुन सकते हैं…

https://www.youtube.com/watch?v=IK7_UhVVRME

इस आयोजन के बारे में बस्ती के स्थानीय अखबारों में जो कुछ छपा है, उसकी कतरन उपर नीचे प्रकाशित है जिसे पढ़कर पूरे आयोजन के बारे में विस्तार से जाना जा सकता है….

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