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उत्तराखंड

उत्तराखंड में मीडिया के लिए अघोषित आपात काल है!

Chetan Gurung : उत्तराखंड में अघोषित काला कानून है नया फरमान… मंत्रियों को उनके सचिव-एचओडी कुछ बताने के लिए राजी नहीं. विदेशाटन तक पर निकल जाते हैं. मंत्री मीडिया में बयान भर दे के रह जाते हैं. सो उनसे क्या पूछा जाए जब उनको ही कुछ पता नहीं रहता. नौकरशाह पत्रकारों से मिलने के लिए राजी नहीं. सेक्शन में पत्रकारों के प्रवेश मात्र पर सेक्शन अफसर की जबर्दस्त लकड़ी की चेतावनी. खबरें ऐसे में निकाल लाना बहुत बड़ी चुनौती है पत्रकारों के लिए.

इतना ही नहीं, सचिवालय में प्रवेश को कम से कम करने के लिए नाना प्रकार के रास्ते लगातार तलाशे जा रहे सरकार के स्तर पर. सचिवालय जो कभी आबाद दिखता था, आज वीरान रहता है. दलाल तो दूर सही, लोग भी नहीं दिखते अब तो. मीडिया वाले भी गायब हैं. इसलिए ही खबरें पैदा नहीं होती अब इस शासन में. इतनी सारी पाबंदियां देखकर न घुसना ही सहज रहा पत्रकारों के लिए भी. ये सब अघोषित काला कानून है मीडिया को थामने के लिए.

ऐसे दौर में जब RTI सरीखा शानदार कानून है, मीडिया के हाथ-पाँव-आँख-कान जकड़ने-बंद करने के लिए आए दिन सख्त-आलोकप्रिय-अव्यवहारिक फैसले सरकार उठा रही. इसका असर अगले विधानसभा चुनाव में जरूर दिखेगा. ये नहीं सोचा कि आखिर सचिवालय फालतू में आना ही कौन चाहता है, सिवाय परेशान और मजबूर लोगों के. या फिर बैठक के लिए तलब अफसरों के. उम्मीद है हुजूरे आला-जिल्ले ईलाही इस पर मंथन के लिए कुछ वक्त जरूर निकालेंगे. सलाहकारों की राय न ले लीजिएगा. इंजन को उल्टी दिशा में और तेज दौड़ा देंगे वे तो.

उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार चेतन गुरुंग की एफबी वॉल से.

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