पंकज चतुर्वेदी ने ‘वीरेन डंगवाल स्मरण’ 111 कड़ियों के साथ पूरा किया, पढ़ें आखिरी कुछ कड़ियां

 

 

 

 

विवाह से बचा तो नहीं जा सकता, पर जितना टाला जा सके, उतना अच्छा…

 

Pankaj Chaturvedi : शादी थी, तो प्यार भी एक चकल्लस ही था : ”चाँद की चकल्लस से / कुछ सुन्दर हुई रात / थोड़ी-सी हवा चली / और मज़ा आ गया।”

विवाह के बारे में तुम्हारी राय उत्साहजनक नहीं थी। गोया उससे बचा तो नहीं जा सकता, पर जितना टाला जा सके, उतना अच्छा।

यह रुख़ रहीम की याद दिलाता है : ‘शादी एक झंझट है, संभव हो तो बचा जाओ ! उत्सव की ओट में बंदी बना लिया जाता है।’—-”रहिमन ब्याह बिआधि है, सकहु तो जाहु बचाय। पायन बेड़ी पड़त है, ढोल बजाय बजाय।।”

मुझे तुम जब भी विवाह के लिए उत्सुक देखते, कहते : ”चकल्लस में पड़ जाओगे, प्यारे !”

ख़ुद अपने बारे में तुमने मुझे बताया था कि पहाड़ों पर कैंची एक शान्त और ख़ूबसूरत-सी जगह है, जहाँ—-तुम्हारी जब शादी तय की गयी, तो उससे बचने के लिए भागकर—-तुम एक रिश्तेदार के घर चले गये थे। बाद में तुम्हारे मामा तुम्हें खोजकर लाये और विवाह तुमको करना पड़ा।

अगरचे तुम्हारी कविता गवाह है कि शादी के ज़रिए भी प्यार तक पहुँचा जा सकता है। वह प्रिया, जिसकी बाबत तुमने लिखा है कि ”हाई स्कूल में होमसाइंस थी / महीने में जो कहीं देख लीं तीन फ़िल्में तो धन्य”—-तुम्हारी जीवन-संगिनी ही तो है।

कोई ग़ौर करेगा, तो यही माँ है, जिसके माध्यम से तुम उन स्त्रियों को पहचानते हो, जो ”सब्ज़ी काटते हुए भी / पार्क में अपने बच्चों पर निगाह रखती हुई प्रेतात्माएँ” हैं।

काल और स्थान के परे तुम इस स्त्री के अथाह दुख की भी कल्पना कर सके, जिसे मानो वह अपने उजास में छिपाये रखती है : ”शोक की लौ जैसी एकाग्र / यों कई शताब्दियों से पृथ्वी की सारी थकान से भरी / मेरी प्यारी !”

आख़िरी वर्षों में रोग के जानलेवा हमले से यही स्त्री तुम्हें बचाती थी। सम्बन्ध के पर्दे में असहजता की जो क्षीण-सी रेखा काँपती थी, उसका अन्त इस संकोच-भरी, सजल कृतज्ञता में हुआ : ”इस बीमारी में / अब तक दवाओं और डॉक्टरों ने बचाये रखा मुझे / या किसी उम्मीद ने / या तुम्हारे प्यार ने / मैं नहीं बताऊँगा।”

फिर भी यहाँ सही विकल्प को चिह्नित कर पाने में असमर्थ किसी पाठक ने जब तुमसे कहा कि ‘आपने यह कविता अपने पोते-पोतियों को संबोधित की है’, तुम बोले : ”नहीं, उनकी दादी को।”

(वीरेन डंगवाल स्मरण : 101)

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