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पंकज चतुर्वेदी ने ‘वीरेन डंगवाल स्मरण’ 111 कड़ियों के साथ पूरा किया, पढ़ें आखिरी कुछ कड़ियां

जब मैं भाषा में थोड़ा उत्पात मचाता हूँ, तो लगता है जैसे अशोक-वाटिका में हनुमान् की तरह हूँ…

 

Pankaj Chaturvedi : विप्लव करेंगे तो ग़रीब और वंचित जन ही। मिथक पुरातनपंथियों को सौंप देने के लिए नहीं हैं, बल्कि उनसे हम अपने संकट का विश्लेषण और उससे मुक्ति का कुछ उपाय कर सकते हैं। निराला की कविता में बादल ‘विप्लव के वीर’ हैं और वर्षा ऋतु में जब वे आसमान में गरजते हैं ; धनी भयभीत होते हैं, मगर ग़रीब किसान और छोटे-छोटे पौधे उनकी ओर उम्मीद से देखते हैं। क्रान्ति से सामन्तों और पूँजीपतियों का तो नुक़सान ही होगा, पर ये उससे प्रसन्न होंगे और उसके सहभागी भी : ”हँसते हैं छोटे पौधे लघुभार—/ शस्य अपार / हिल-हिल / खिल-खिल / हाथ हिलाते / तुझे बुलाते / विप्लव-रव से छोटे ही हैं शोभा पाते।”

इसी तरह क्रान्तिधर्मी कविता से जनसाधारण को जितनी आत्मीयता होती है, अभिजात वर्ग को उतनी ही अड़चन ! निराला ने इसरार किया कि ऐसी कविता की रचना में मुक्त-स्वभाव कवि ही समर्थ होगा, क्योंकि ”मनुष्यों की मुक्ति की तरह कविता की भी मुक्ति होती है।”

एक बार मेरे यह पूछने पर कि ‘कविता में आपकी क्या कोशिश रही?’, तुमने एक मिथकीय रूपक के सहारे जवाब दिया : ”जब मैं भाषा में थोड़ा उत्पात मचाता हूँ, तो लगता है जैसे अशोक-वाटिका में हनुमान् की तरह हूँ। मेरा मक़सद शालीन लोगों को धक्का पहुँचाना है, जिन्होंने कविता को नीले जार में रखी हुई मुक्तिबोध की आँत बना दिया है।”

वानरों का यह मिथक अज्ञेय की भी कविता में आया है, पर उनके पराक्रम को उन्होंने इतने शांत, सुन्दर, सम्भ्रान्त और निर्लेप लहजे में बयान किया है कि कवि का पक्ष राम का ही जान पड़ता है। उसकी सारी सदिच्छा के बावजूद बन्दर—-इतिहास-निर्माण के बाद भी—-बन्दर ही रह जाते हैं : ”जो पुल बनायेंगे / वे अनिवार्यतः / पीछे रह जायेंगे। सेनाएँ हो जायेंगी पार / मारे जायेंगे रावण / जयी होंगे राम / जो निर्माता रहे / इतिहास में / बन्दर कहलायेंगे।”

लेकिन रावण मारा जाकर भी कहाँ मारा गया ? वह कितने ही रूपों में हमारे बीच जीवित और सक्रिय रहा आता है। तभी मुक्तिबोध ने लिखा कि आज के नवयुवकों के दिल में आग है, पर वह उनके काव्य में नहीं झलकती, क्योंकि वे ”रावण के यहाँ पानी भरते हैं और हाँ में हाँ मिलाते हैं।” यहाँ तक कि कुछ ”बड़े प्रगतिशील महानुभाव भी।”

तुम्हारी कविता साम्राज्यवादी शत्रु के रूप में इस रावण के असीम लालच की अप्रतिम निशानदेही करती है : ”जहाँ कहीं जो कुछ भी मतलब का मिले / सब गप्प हप्प / अन्तरिक्ष सागर वन प्रान्तर या मरुथल सब / हाँ-हाँ-हाँ मेरे हैं / मेरे हैं—-मेरे हैं गप्प हप्प।”

आज हम देख सकते हैं कि जब मध्यवर्ग का बेशतर हिस्सा बेशर्म और अचूक अवसरवादी ढंग से अन्यायी सत्ता-तंत्र के साथ है, उसके रथ को रोकने का सामर्थ्य सर्वहारा में है। प्राक्-इतिहास को हम ठीक से समझ सकें, तो इसकी एक कुंजी वहाँ भी मिलती है : ”किन्तु हाय / यह कँगला वानर समुदाय / ताक-झाँक खिड़की-कंगूरों से / घुस आया लिये सिर्फ़ / जलती लुआठियाँ / हाय-हाय-हाय-हाय-हाय।”

(वीरेन डंगवाल स्मरण : 100)

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