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साहित्य

पंकज चतुर्वेदी ने ‘वीरेन डंगवाल स्मरण’ 111 कड़ियों के साथ पूरा किया, पढ़ें आखिरी कुछ कड़ियां

नागार्जुन, शमशेर और त्रिलोचन जैसे हमारे कवि आधुनिक ऋषि हैं…

 

Pankaj Chaturvedi : शब्द सगुण है, मगर अर्थ निर्गुण। इसलिए भीतर की आँख खुली हुई न हो, तो अर्थ नहीं दिखेगा। बक़ौल फ़िराक़ गोरखपुरी, ”जब तक ऊँची न हो ज़मीर की लौ / आँख को रौशनी नहीं मिलती।”

‘ईशावास्योपनिषद्’ के पहले ही मन्त्र में कहा गया है कि ‘संसार का त्यागपूर्वक उपभोग करो, इसमें आसक्त मत होओ, क्योंकि यह किसी का नहीं है, (यानी अस्थिर है और इसीलिए असत्य है।)’

कोई पूछ सकता है कि ‘त्यागपूर्वक उपभोग’ कैसे किया जाय ? शायद इसलिए भी ‘श्वेताश्वतरोपनिषद्’ के चौथे अध्याय के छठवें मन्त्र में एक रूपक की मार्फ़त यह रहस्य समझाया गया है : ‘जीव और आत्मा दरअसल दो पक्षी हैं, जो आपस में मित्र-भाव से हमेशा साथ-साथ एक ही वृक्ष, यानी शरीर का आश्रय लेकर रहते हैं। उन दोनों में-से एक (जीव) तो उस वृक्ष के फलों को स्वाद लेकर खाता है ; लेकिन दूसरा (आत्मा) उनका उपभोग न करता हुआ केवल देखता रहता है।’

तुम कहते थे कि नागार्जुन, शमशेर और त्रिलोचन जैसे हमारे कवि अपनी त्याग-तपस्या, मनीषा और विपुल सृजनात्मक अवदान के मद्देनज़र आधुनिक ऋषि हैं। ऋषि वह है, जो मन्त्रद्रष्टा है, यानी मन्त्र या कविता का आंतरिक अर्थ देखने में सक्षम।

एक बार त्रिलोचन तुम्हारे घर आये, तो तुमने उनसे कहा : ”आपके आने से यह कुटिया पवित्र हो गयी।” हम तीन—-त्रिलोचन, तुम और मैं—- तीन दिन तक साथ रहे। उम्र का जितना अन्तर मेरे और तुम्हारे बीच था, उससे अधिक तुम्हारे और त्रिलोचन के बीच। मगर दरअसल कोई फ़ासिला न था। वह कविता की दुनिया थी।

एक रात हम बैठे शराब पी रहे थे। सहसा त्रिलोचन ने मुझसे जो कहा, वह मेरे लिए किसी मन्त्र से कम न था : ”पी तो रहे हो, पर एक बात ध्यान रखना कि साहित्य से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है।”

बाद में कभी मुझे ग़ालिब का एक शे’र मिला, जो मैंने तुमको सुनाया, तो तुम बहुत आत्म-विभोर हो गये : ‘शराब से किस गुनाहगार को ख़ुशी की चाह है, मुझको तो उससे निरन्तर एक ज़रा-सी आत्म-विस्मृति दरकार है’ : ”मै से ग़रज़ नशात है किस रूसियाह को / इक गूना बेख़ुदी मुझे दिन रात चाहिये।”

इसी ‘गूना बेख़ुदी’ के तलबगार तुम भी थे, मगर ख़ूबी यह कि उसके ख़तरे से नावाक़िफ़ नहीं। तभी तुमने आगाह किया : ”बग़ल दबी हो बोतल मुँह में जनता का अफ़साना / ऐसे घाघ नहीं हो जाना !”

(वीरेन डंगवाल स्मरण : 108)

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