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पंकज चतुर्वेदी ने ‘वीरेन डंगवाल स्मरण’ 111 कड़ियों के साथ पूरा किया, पढ़ें आखिरी कुछ कड़ियां

भरोसा पैदा करो प्यारे! उसका न होना अच्छी बात नहीं है…

 

Pankaj Chaturvedi : प्यार की आशा करते समय इंसान को देखना चाहिए कि वह ख़ुद प्यार करता है या नहीं। तुम्हारे बारे में कहा गया है कि तुम्हें जितनी मुहब्बत मिली, बहुत कम कवियों को मिली होगी। मैंने यह बात ज्ञानरंजन जी से कही, तो वह बोले : ”मिली तो इसलिए कि मुहब्बत वह करता भी था।”

कभी फ़ोन पर तुम मुझसे पूछते : ”तुम्हारी पत्नी तो ठीक है न?” और जब मैं कहता कि हाँ, तो तुम सुझाव देते : ”कभी-कभी उसे स्कूटर पर बैठाकर मोतीझील घुमा लाया करो!” और फिर यह जताने के लिए तुम्हारा इसरार कि यह कोई अतिरिक्त नहीं, बल्कि ज़रूरी गतिविधि है : ”यह सब भी तो करना चाहिए न!”

यह सिर्फ़ तुम्हारा अंदाज़ नहीं था, यही तुम थे!

एक बार मुझे तुमको डाक से कुछ भेजना था और विलम्ब हो रहा था। तुमने वजह जाननी चाही, तो मैंने कहा : ”मुझे समय मिल नहीं पा रहा और किसी और पर भरोसा नहीं है।” तत्काल तुम्हारा स्वर सुनायी पड़ा : ”भरोसा पैदा करो प्यारे! उसका न होना अच्छी बात नहीं है।”

मैं टी.वी. पर क्रिकेट के खिलाड़ियों को शैम्पेन से जीत का जश्न मनाते देखता था। कोई सत्रह बरस पहले मैंने तुमसे पूछा : ”शैम्पेन कैसी होती है?”

इसके दो जवाब हो सकते थे। पहला कि ‘यह तुम मुझसे क्यों पूछ रहे हो?’ और दूसरा, ‘ख़रीदकर आज़मा लो !’ प्रश्न तो कर दिया था, मगर मैं डर भी रहा था। यह भूलकर कि तुम ठंडे, औपचारिक, अविनम्र और क्रूर नहीं थे।

थोड़ी देर चुप रहकर तुम मुस्कराये और बोले : ”किसी दिन चखा देंगे!”

वह दिन तो नहीं आया, पर मैंने जाना कि जीवन जानने के लिए है, वर्जना के लिए नहीं।

(वीरेन डंगवाल स्मरण : 107)

इसके पहले वाली कड़ी पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें>

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