पंकज चतुर्वेदी ने ‘वीरेन डंगवाल स्मरण’ 111 कड़ियों के साथ पूरा किया, पढ़ें आखिरी कुछ कड़ियां

भैंस से बैरागीपन और बन्दर से फुर्ती की माँग… कुत्ते की पतली गुलाबी जीभ की सराहना…

 

Pankaj Chaturvedi : जिसे हम सौन्दर्य समझते हैं, वह दरअसल सत्य है या उसका प्रकटीकरण और जिसे अलंकार, वह प्यार है। सुन्दर और सशक्त सादृश्य-विधान संभव है, अगर वस्तु-जगत् को समग्रता में देखा जा सके ; क्योंकि मनुष्य, मनुष्येतर सजीव सृष्टि और चराचर प्रकृति अलग-अलग नहीं, बल्कि परस्पर संश्लिष्ट सच हैं।

यह कहना आसान है कि सब कुछ में एक ही चेतन सत्ता है ; मगर वस्तुओं में अभेद, यानी एकता का सत्यापन अनुभूति की गहनता से होता है। शेक्सपियर के एक कथन को ज़रा बदलकर कहें, तो यह ‘प्यार में होने’ से प्यार करने और प्यार करने का फ़र्क़ है।

इसी निष्कपट, अन्तरंग, प्रत्यक्ष प्यार की बदौलत तुमने प्रकृति में प्राणियों की-सी सक्रियता महसूस की : ”सूर्य का पत्ते की तरह काँपना / हवा में आसमान का फड़फड़ाना / गायों का नदियों की तरह रँभाते हुए भागना”, यहाँ तक कि पहाड़ की अटल आकृति में जीवित देह की भावना कर सके : ”……….ऐन इस पहाड़ की पसली पर / अटका है तुम्हारा गाँव।”

जिस तरह गौरैया के प्रति संवेदना से भरकर तुम किसी वस्तु में उसके हृदय की कल्पना कर सकते थे : ”मेरे बच्चे की किलकारियों से मत डरो / वे तुम्हारे प्रति उसके उल्लास की / उत्तेजना से निकली हैं / तुम्हारा धनिये के बीज जितना हृदय / पटपटाता होगा / और नन्हीं-सी जीभ ख़ुश्क होती होगी”; वैसे ही स्कूल के दिनों में स्वाधीनता दिवस पर अपने उत्साह की समता किसी पक्षी में पाते थे : ”जन-गण-मन भर सीना तना रहता कबूतर की मानिंद।”

तुम्हारे यहाँ ”हरे खीरे जैसी बढ़ती बेटी” रुकुमिनी है, तो उसके जीवन की त्रासदी से आहत माँ का दिल ”उपले की तरह सुलगता रहता है” और वह बरसों पहले मरे अपने आदमी नरेसा को याद करती है, ”जिसकी बाँहें जैसे लोहे की थीं।” आँखों में जो जल उमड़ आता है, उसका कारण हृदय का सूर्य है : ”जिनकी आँखों में अब भी उमड़ते हैं नम बादल / हृदयस्थ सूर्य के ताप से प्रेरित।”

तुम जब ‘भैंस से बैरागीपन और बन्दर से फुर्ती’ माँग सकते थे और कुत्ते की ‘पतली गुलाबी जीभ’ की सराहना में कह सकते थे : ”कैसी रसीली और चिकनी टपकदार, सृष्टि के हर / स्वाद की मर्मज्ञ” ; तो क़ुदरत का अपना नायाब सृजन-कारख़ाना बन्द करके बैठे ईश्वर से यह भी पूछ सकते थे : ”किस घोंसले में जा छिपे हो भगवान ?”

तुम्हारी यह अदा महज़ कविता तक महदूद नहीं, बल्कि उसके आर-पार विस्तृत थी। एक बार कॉलेज में तुम्हारे सहकर्मी रहे एक प्राध्यापक दोस्त मिलने आये, तो उनसे मेरा परिचय कराते हुए अन्त में तुमने कहा : ”क्लास में जब ये ख़ूबसूरत छात्राओं को देख लेते थे, तो इनकी आँखों में साँप की-सी चमक आ जाती थी।”

(वीरेन डंगवाल स्मरण : 104)

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