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पंकज चतुर्वेदी ने ‘वीरेन डंगवाल स्मरण’ 111 कड़ियों के साथ पूरा किया, पढ़ें आखिरी कुछ कड़ियां

शायद तुम अपना कोई दुख नहीं कह रहे थे, मुझसे विदा माँग रहे थे…

 

Pankaj Chaturvedi : देश में भी अपना घर ही स्वदेश लगता है। कैसा अजीब इत्तिफ़ाक़ है कि तुमसे मिलने के शुरूआती तीन वर्ष सबसे अधिक हमारा सान्निध्य रहा और अंतिम तीन वर्ष सबसे कम। इसका मुख्य कारण तो दूरियाँ थीं, पर आनुषंगिक वजह यह भी थी कि मैं तुम्हारे सुन्दरतम समय का साक्षी रहा था और इधर तुम रोग की जिस यातना का सामना कर रहे थे, वह भीषण थी। मुझसे वह देखी नहीं जाती थी।

यहाँ तक कि इस दौरान मैं तुम्हें फ़ोन करने से भी बचता रहा—-यह सोचकर कि पता नहीं तुम किस हाल में होगे और जो तकलीफ़ कम नहीं कर सकते, उन्हें उसे बढ़ाने का हक़ तो बिलकुल नहीं है।

बीते दो वर्षों में दो बार ही तुमसे मिल पाया, मगर तब मैंने बीमारी की बाबत कोई हमदर्दी तुमसे नहीं जतायी ; क्योंकि वैसा करके तुम्हारे आत्मसम्मान को मैं आहत ही करता। यह भी नहीं कहा कि तुम्हारे बारे में मैं सोचता रहता हूँ।

शायद प्यार जहाँ सहज और गहनतम होता है, भाषा का मुहताज नहीं होता। मातृभूमि को सम्बोधित तुम्हारी कविता से इस आशय की पुष्टि होती है, गोकि उसमें विदा का भाव भी छिपा है : ”हमलावर चढ़े चले आ रहे हैं हर कोने से / पंजर दबता जाता है उनके बोझे से / मन आशंकित होता है तुम्हारे भविष्य के लिए / ओ मेरी मातृभूमि ओ मेरी प्रिया / कभी बतला भी न पाया कि कितना प्यार करता हूँ तुमसे मैं।”

आख़िरी बार जब तुमसे मिला, मुझे देखकर तुम सुखद अचरज में पड़ गये। हालाँकि तुमने कुछ कहा नहीं, बस मुझे गले लगा लिया। लगभग एक मिनट तक मैं तुम्हारा निःशब्द रोना सुनता रहा। शायद तुम अपना कोई दुख नहीं कह रहे थे, मुझसे विदा माँग रहे थे।

मुझे तुमसे तुम्हारे घर पर मिलने की आदत थी। सो मैंने पूछा : ”आप बरेली कब जायेंगे ?” तुम्हारे स्वर में बहुत अफ़सोस था : ”इलाज कराते बहुत दिन हो गये। अब घर जाने का जी होने लगा है। मगर शरीर इजाज़त तो दे!”

दिल्ली तुम्हें वैसे भी पसंद नहीं थी। यह उसकी सराहना के तुम्हारे अंदाज़ से ज़ाहिर है : ”कुछ बात तो है इस नासपिटी दिल्ली / और इसके भटूरों में / कि हमारी भाषा के सबसे उम्दा कवि / जो यहाँ आते हैं यहीं के होकर रह जाते हैं / जब कि भाषा भी क्या यहाँ की : / अबे ओये तू हान्जी हाँ।”

इसलिए मेरे मिलने के तक़रीबन छह महीने बाद—-शरीर तो इस लायक़ नहीं हो सका, पर तुम्हारा मन तुम्हें बरेली ले गया। अगले ही दिन दुनिया से तुम्हें रुख़्सत होना था। गोया इसी काम से तुम अपने घर गये थे !

तुम ख़ुशक़िस्मत थे कि अपनी कर्मभूमि में आख़िरी साँस ले सके ! आततायियों ने बहादुरशाह ज़फ़र से लेकर एम. एफ़. हुसेन तक को यह रिआयत नहीं बख़्शी। वे नहीं चाहते कि सत्ता से असहमत कोई व्यक्ति इस मुल्क में रहे। बक़ौल फ़ैज़ : ”निसार मैं तिरी गलियों के ऐ वतन, कि जहाँ / चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले / जो कोई चाहनेवाला तवाफ़ को निकले / नज़र चुरा के चले जिस्मो-जाँ बचा के चले।”

ऐसे ही समय में बरेली वह आख़िरी स्टेशन था, जहाँ तुम अपनी ‘रात-गाड़ी’ से उतर गये, जिसके बारे में कभी तुमने यह मार्मिक शिकायत की थी : ”रात चूँ-चर्र-मर्र जाती है / ऐसी गाड़ी में भला नींद कहीं आती है?”

अब तुम हमारी आवाज़ें नहीं सुन रहे होगे ! यह वैसे ही है, जैसे तुमने एक कविता में लिखा है कि अपने मक़ाम पर पहुँच जानेवाले यात्री ‘स्टेशन पर फेरीवालों की आवाज़ें’ नहीं सुनते। आज यह उलाहना तुम्हारे लिए सही : ”उन्हें सुनते हैं सिर्फ़ यात्री / सोते में भी /…….उतरने वाले उन्हें नहीं सुनते /…….हद है / न सुनायी पड़ना भी / साबित करे / पहुँच जाना।”

(वीरेन डंगवाल स्मरण : 110)

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