शहरी नक्सली नहीं, ये हुकूमत ख़तरनाक है!

प्राइवेट कंपनियों के मालिकों को धनकुबेर बनाने के लिए सरकारी कंपनियों को बर्बाद कर दिया गया। देश की 157 सरकारी कंपनियां एक लाख करोड़ से भी ज्यादा का नुकसान झेल रहीं हैं। कभी देश को गौरवान्वित करने वाली कंपनी स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया (सेल) अब बर्बाद हो चुका है। अकेले 2016-17 में कंपनी को 3187 करोड़ का घाटा हुआ है।

इसी साल महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड को 2941 करोड़, हिंदुस्तान फोटोफिल्म्स कंपनी लिमिटेड को 2917, यूनाइडेट इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को 1914, ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को 1691 और राष्ट्रीय इस्पात निगम लिमिटेड को 1263 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ. खास बात रही कि 173 सरकारी नियंत्रण कटेगरी की कंपनियों में से 41 को 2016-17 में ही 4308 करोड़ का नुकसान हो गया.

महज तीन सालों में मोदीयोनॉमिक्स ने देश की तमाम बड़ी सरकारी कंपनियों को दिवालिया कर दिया।

यही हाल बैकों का हुआ। पिछले वित्त वर्ष की चौथी तिमाही में बैंको का कुल नुकसान 2.42 लाख करोड़ रुपये रहा। नतीजतन NPA का 1.2 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर10.4 लाख करोड़ हो गया था अब यह और भी अधिक बढ़ने वाला है। आलम ये है कि देश का सबसे बड़ा बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया भरभराने लगा है। धनकुबेरों पर सरकारी मेहरबानी ने बैंकों का बेड़ा गर्क कर दिया है।

दुनिया भर में जब पेट्रोलियम प्रोडक्ट सस्ते हो रहे हैं भारत में उनकी कीमत बढ़ती जा रही है। कच्चे तेल की कीमतों में कमी के बावजूद भारत में पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें बढ़ाई गईं। मुंबई में पेट्रोल की कीमत 86 रुपये लीटर हो गई है और डीज़ल 74 रुपये लीटर मिल रहा है। 38 रुपये 26 पैसे के पेट्रोल पर 19रु.48 पैसे तो एक्साइज ड्यूटी लिया जा रहा है। वैट और डीलर कमीशन मिलाकर पेट्रोल को 86 रुपये तक पहुंचा दिया गया। ये सीधी लूट है। सरकार लूट रही है।

सबसे ज्यादा तबाही अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में आई है। रुपया इतना डूब गया है कि अब भारतीय अर्थव्यवस्था की तुलना नेपाल के अर्थव्यवस्था से होने लगी है। रुपया गिरकर डॉलर के मुकाबले 70.32 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा गया है।

तो फिर इन मुद्दों पर चर्चा क्यों नहीं हो रही है ? ये मसले तो कहीं दिख ही नहीं रहे हैं। न तो चौक-चौराहों पर, ना ही संसद में और ना ही मीडिया में।

तो क्या बाबर को गालियां देकर पेट्रोल-डीज़ल में हम अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई लुटाती रहें ? मोहम्मद गजनी को गालियां देकर बर्बाद हो चुके सरकारी उपक्रमों को बचा लेंगे हम ? तैमूर लंग को कोस कर डूब रहे बैंकों को बचा लेंगे क्या हमलोग ? और रेलवे स्टेशनों का नाम बदल कर डूब रहे रुपये को गर्त से निकाल लेंगे क्या हमलोग ? नहीं न !

तो फिर जो भीड़ मूर्खता के अंधकूप में धेकली जा चुकी है पहले उस भीड़ को बाहर निकालने की कोशिश कीजिए। लौट आइए अपनी नागरिक वाली हैसियत में और अपनी जिंदगी और आने वाली पीढ़ी के लिए असली मुद्दों पर बहस छेड़िए। जब सबकुछ लुट जाएगा तो फिर होश में आकर कपार पीटने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं होगा। अभी भी वक्त है लौट आइए।

छोड़िए ये गजनी, बाबर, गोबर और शहरी नक्सली का राग। ये सारे राग हमको-आपको मूर्खता के अंधकूप में धकेलने के लिए अलापे जा रहे हैं। और डरिए भी मत। वैसे भी देश को बिना दीवारों वाली जेल में तब्दील किया जा रहा है तो फिर देश के लिए दीवारों वाली जेल में जाने से डर कैसा।

लेखक असित नाथ तिवारी प्रतिभाशाली टीवी एंकर हैं. उनसे संपर्क asitnath@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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