भीमा कोरेगांव, दलित-ब्राह्मण संघर्ष, यलगार परिषद और नक्सली कनेक्शन की कहानी

महाराष्ट्र के पुणे जिले में भीमा कोरेगांव नाम का एक गांव है। दो सौ साल पहले, एक जनवरी 1818 के दिन इस गांव में ईस्ट इंडिया कंपनी और पेशवाओं के नेतृत्व वाली मराठा सेना के बीच एक लड़ाई हुई थी। इस लड़ाई में ईस्ट इंडिया कंपनी की तरफ से लड़ते हुए दलित महार जाति के सैनिकों ने मराठों को हराया था. महार महाराष्ट्र में अछूत माने जाते हैं। चूंकि पेशवा ब्राह्मण थे लिहाजा इस लड़ाई को ब्राह्मणों पर महारों की जीत के तौर पर भी देखा जाता है। Continue reading

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शहरी नक्सली नहीं, ये हुकूमत ख़तरनाक है!

प्राइवेट कंपनियों के मालिकों को धनकुबेर बनाने के लिए सरकारी कंपनियों को बर्बाद कर दिया गया। देश की 157 सरकारी कंपनियां एक लाख करोड़ से भी ज्यादा का नुकसान झेल रहीं हैं। कभी देश को गौरवान्वित करने वाली कंपनी स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया (सेल) अब बर्बाद हो चुका है। अकेले 2016-17 में कंपनी को 3187 करोड़ का घाटा हुआ है। Continue reading

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नक्सली बताकर गौतम नवलखा समेत कई पत्रकार, वकील और लेखक किए गए गिरफ्तार

Urmilesh Urmil : देश के कई वरिष्ठ बुद्धिजीवियों, जिनमें प्रख्यात पत्रकार, एडवोकेट और लेखक शामिल हैं; की गिरफ्तारी भारतीय राज्यसत्ता की निरंकुशता के खतरनाक स्तर तक पहुंचने का भयावह संकेत है! इनमें ‘इकोनामिक एंड पोलिटिकल वीकली’ जैसी देश की श्रेष्ठतम पत्रिका से लंबे समय तक सम्बद्ध रहे जाने-माने पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा और आदिवासी हक के लिए आवाज उठाने वाली मशहूर एडवोकेट सुधा भारद्वाज सहित कई बुद्धिजीवी शामिल हैं। Continue reading

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चुनावी साल से पहले संघ-भाजपा का नया प्रपंच- Urban Naxals

Abhishek Srivastava : आज की गिरफ्तारियों के बहाने ”Urban Naxals” पर कुछ बातें… पिछले चार साल में एक ट्रेंड पर ध्‍यान दें। अगले एक साल की तस्‍वीर साफ़ होती दिखेगी। केंद्र की सत्‍ता में आने के बाद भाजपा सरकार ने पहले एक साल में छिटपुट मूर्खतापूर्ण बयानों और दुष्‍प्रचार की राजनीति जम कर की। याद करें, 2014-15 में गिरिजाघरों पर हमले की कई खबरें आईं जो ज्‍यादातर भ्रामक साबित हुईं। Continue reading

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जंगल से आदिवासियों को बेदखल कर कारपोरेट को बसाने का अभियान मोदी सरकार ‘नक्सल सफाया’ के नाम पर चला रही है : वरवर राव

1940 में आंध्र-प्रदेश के वारंगल में जन्मे वरवर राव ने कोई 40 सालों तक कॉलेजों में तेलुगू साहित्य पढ़ाया है और लगभग इतने ही सालों से वे भारत के सशस्त्र माओवादी आंदोलन से भी जुड़े हुए हैं। वैसे वरवर राव को भारतीय माओवादियों के संघर्ष का प्रवक्ता माना जाता है, सरकारी दावे के अनुसार वे सशस्त्र माओवादियों के नीतिकार भी हैं, परंतु वरवर राव अपने को क्रांतिकारी कवि कहलाना ज्यादा पसंद करते हैं। सत्ता के खिलाफ लिखने-पढ़ने, संगठन बनाने और पत्र-पत्रिकायें प्रकाशित करने वाले वरवर राव टाडा समेत देशद्रोह के आरोप में लगभग 10 वर्षों तक जेल में रहे हैं और अभी लगभग 50 मामलों पर विभिन्न कोर्टों में सुनवाई चल रही है तो कुछ मामलों पर जमानत पर हैं।

2001-02 में तेलुगू देशम और 2004 में कांग्रेस पार्टी ने जब माओवादियों से शांति वार्ता की पेशकश की तो वरवर राव को मध्यस्थ बनाया गया था। नक्सलबाड़ी आंदोलन की 50वीं वर्षगांठ पर झारखंड के गिरिडीह में आयोजित समारोह में शिरकत करने आए क्रान्तिकारी कवि, लेखक, पूर्व शिक्षक, क्रान्तिकारी लेखक संघ के संस्थापक एवं आरडीएफ के अध्यक्ष 76 वर्षीय कामरेड वरवर राव का विशद कुमार से एक बातचीत :—

विशद कुमार:— नक्सलबाड़ी आंदोलन के 50 वर्ष पूरे हो रहे हैं, आप इसे कैसे देखते हैं?

वरवर राव:— दुनिया के आंदोलनों के इतिहास में नक्सलबाड़ी आंदोलन का इतिहास सबसे लंबा रहा है। भारत में तेलंगाना का आंदोलन भी 1946 से 1951 तक मात्र पांच साल ही टिक पाया था। जिसका कारण यह था कि वह मात्र दो जिलों तक ही सिमट कर रह गया था। जबकि नक्सलबाड़ी आंदोलन आज लगभग पूरे देश में अपनी उपस्थिति दर्ज कर चुका है, आपने देखा होगा पूरे देश में विभिन्न संगठनों द्वारा इसका 50वां वर्षगाठ मनाया जा रहा है।

विशद कुमार:— आपको लगता है कि नक्सलबाड़ी आंदोलन का रास्ता सही है?

वरवर राव:— एकदम सही है, जनता का शासन स्थापित करने बस यही एक रास्ता है और यह आंदोलन तब तक जारी रहेगा जब तक जनता का शासन पूरे देश पर कायम नहीं हो जाता। हम सरकार बनाने का सपना नहीं देख रहे हैं बल्कि आदिवासी, दलित, शोषित, पीड़ित एवं छोटे मझोले किसानों के हक अधिकार के लिए आंदोलित हैं।

विशद कुमार:— इस आंदोलन की अब तक की सफलता क्या है?

वरवर राव :— ग्राम राज्य की सरकार का हमने सारंडा, जंगल महल, नार्थ तेलंगाना और ओडीसा के नारायण पटना में गठन कर दिया है। दण्डकारण्य में जनताना सरकार पिछले 12 वर्षों से काम कर रही है। जहां एक करोड़ लोग रह रहे हैं। जिनके समर्थन से पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी बना है। जनताना सरकार आदिवासियों, दलितों, छोटे व मझोले किसानों का मोर्चा है और इस सरकार ने वहां बसने वाले सभी परिवारों को बराबर-बराबर जमीन बांट दी है। जिसका नतीजा यह है कि जो आदिवासी पहले केवल प्रकृति पर निर्भर था, कभी खेती के बारे जानता तक नहीं था, वह अब तरह-तरह की सब्जियां व अनाज की उपज कर रहा है। इन किसानों द्वारा मोबाइल स्कूल, मोबाइल हॉस्पिटल चलाया जा रहा है। जनताना सरकार की क्रांतिकारी महिला संगठन में एक लाख से अधिक सदस्य हैं, सांस्कृतिक टीम चेतना नाट्य मंच में 10 हजार सदस्य हैं, जो एक मिसाल है, क्योंकि किसी भी बाहरी महिला संगठन एवं सांस्कृतिक टीम में इतनी बड़ी संख्या में सदस्य नहीं हैं। वहां अंग्रेजों से लड़ने वाले क्रांतिकारी गुण्डादर के नाम पर पीपुल्स मिलिशिया (जन सेना) है। जनताना सरकार माओत्से तुंग के तीन मैजिक वीपन्स — पार्टी, यूनाइटेड फ्रंट और सेना की तर्ज पर चल रही है। अत: माओवादी आंदोलन ही क्रांति ला सकता है।

विशद कुमार:— इस आन्दोलन ​में आपका वाम जनवादी भागीदारी पर भी कोई स्टैड है?

वरवर राव :— माओवादी आंदोलन के साथ वाम जनवादी भागीदारी में वे लोग आ सकते हैं जो सत्ता से दूर हैं, उनके साथ हम फ्रंट बना सकते हैं। जैसे हमने आंध्रा व तेलंगाना में तेलंगाना डेमोक्रेटिक फोरम में सीपीआई, सीपीएम, एमएल के अलग अलग ग्रुप सहित आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यक, छात्र आदि के 10 संगठन शामिल किया है।

विशद कुमार:— चीन की कम्युनिस्ट सरकार पर आपका नजरिया?

वरवर राव :— दुनिया में कहीं भी समाजवाद नहीं है। रूस व चीन साम्राज्यवादी देश बन गए हैं, नेपाल से आशा थी वह भी समाप्त हो गया है, वह भी भारत का उपनिवेश बन गया है। भारत का अमेरिका के साथ गठबंधन यहां के आदिवासियों व दलितों के लिए काफी खतरनाक है। अमेरिका की नजर हमारे जंगल, पहाड़ व जमीन पर है, जहां काफी प्राकृतिक संपदाएं हैं। जिसे लूटने की तैयारी में अमेरिका मोदी सरकार को हथियार और जहाज दे रहा है जिससे आसमान से जंगलों को निशाना बनाकर वहां से आदिवासियों को भगाया जा सके और उस पर कब्जा करके मल्टीनेशनल और कारपोरेट कंपनियों को दिया जा सके। जंगल से आदिवासियों को बेदखल करने का अभियान मोदी सरकार नक्सल सफाया के नाम पर चला रही है। मेरा मानना है कि देश को नवजनवाद की जरूरत है, ऐसी स्थिति में नवजनवाद केवल नक्सल आंदोलन से ही आ सकता है, जो सशस्त्र संघर्ष से ही संभव है।

विशद कुमार:— हाल में यूपी में आक्सीजन के अभाव में 72 बच्चे मर गए, आपकी प्रतिक्रिया?

वरवर राव :— आजादी के 71 वर्षों बाद भी जिस देश में बच्चों के लिये आक्सीजन नहीं हो जो प्राकृतिक है। मॉ के पेट में बच्चों का पूर्ण विकास होता है और उनके विकास के लिये सारी मौलिक चीजें मॉ के पेट में मिलती हैं। जबकि बाहर आने पर आक्सीजन के बिना वे मरे जा रहे हैं, यह कितना शर्मनाक है अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है। अजीब कॉम्बिनेशन है कि आजादी के 71 साल 72 बच्चों की मौत और झारखण्ड में 70 इंडस्ट्रीज को जमीन आवंटन और आनलाईन उद्घाटन करने की योजना।

विशद कुमार:— देश में उद्योग लगेगा तभी न लोगों को रोजगार मिलेगा, फिर इन कंपनियों से परहेज क्यों?

वरवर राव :— मल्टीनेशनल कम्पनियां या कॉरपोरेट कम्पनियां पूरी तरह हाई टेक्नोलॉजी पर आधारित हैं। एक प्रतिशत श्रम पर काम करवाएंगी यानी कम से कम श्रम और अधिक से अधिक मुनाफे का इनकी थ्योरी है, ऐसे में रोजगार की संभावना कहां है। अत: साफ है कि इनके आने से श्रम बेकार पड़ जायेगा और जो आदिवासी, दलित छोटे किसान अपने श्रम को कृषि में लगाकर अपना और अपने परिवार का भरण पोषण करते रहे हैं वे बेकार हो जाएंगे, भूखे मरने की नौबत आ जएगी। मतलब कि श्रमिक वर्ग की रोटी का जुगाड़ समाप्त हो जायेगा। यह कौन सा विकास है।

विशद कुमार:— मोदी सरकार को आप कैसे देखते हैं?

वरवर राव :— सब तो साफ दिख रहा है, किस तरह गौ हत्या, बीफ, देशभक्ति का नाटक करके संघ के इशारे पर लोगों को आपस में लड़वाने का काम हो रहा है। देश के टुकड़े करने की योजना पर मोदी के लोग काम कर रहे हैं और यही लोग आरोप लगा रहे हैं दूसरों पर।

विशद कुमार:— इस संसदीय व्यवस्था पर आपकी टिप्पणी?

वरवर राव :— मैं ऐसे लोकतंत्र के संसदीय रास्ते पर कतई भरोसा नहीं कर सकता जिस लोकतंत्र के संसदीय रास्ते के ही कारण 4000 लोगों की हत्या करवाने वाला मोदी आज देश का प्रधानमंत्री बना हुआ है। वहीं इतिहास गवाह है कि इन्दिरा की हत्या के बाद 3 से 4 हजार सिखों की हत्या का ईनाम राजीव गांधी को प्रधानमंत्री रूप में मिला। यह इसी लोकतंत्र की संसदीय प्रणाली की देन है। फिर हम ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था की संसदीय प्रणाली पर कैसे भरोसा करें?

विशद कुमार:— आप माओवाद के समर्थक हैं और माओवाद जनता के शासन की बात करता है, दूसरी तरफ बड़ी बड़ी कंपनियों से लेवी वसुलने का माओवादियों पर आरोप है, अप क्या कहेंगे?

वरवर राव :— लेवी के पैसे से संगठन चलता है। उससे हथियार खरीदे जाते हैं। आंदोलन के लिए पैसों की जरूरत होती है जो सारे संगठन करते हैं। सत्ता में बैठे लोग इसे चंदा कहते हैं। हमारे और उनमें मौलिक फर्क यह है कि वे लोग कारपोरेट की दलाली के लिये, उनकी ही सुरक्षा के लिए उनसे पैसा लेते हैं और माओवादी उनसे लेवी लेकर उनके ही खिलाफ जनता की हक की लड़ाई लड़ते हैं। हमें भगत सिंह की विरासत के रास्ते पर चलना होगा, तभी देश में जनता का शासन सम्भव है।

विशद कुमार: – मोदी सरकार कह रही है माओवादी कमजोर हुए है। आप क्या कहना चाहेंगे?

वरवर राव : – अगर ऐसा यह मान रहे हैं तो फिर वे आन्दोलनकारी जनता के बीच पारा मिलिट्री फोर्स क्यों भेज रहे हैं ? यह इस तरह के बयान देकर ऐसे क्रांतिकारी विचारों को भयभीत करके जिनसे अप्रत्यक्ष हमें समर्थन मिलता है उसे समाप्त करना चाह रहे हैं।

विशद कुमार

स्वतंत्र पत्रकार

9234941942

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बस्तर पुलिस ने देशबंधु अखबार के ब्यूरो चीफ देवशरण तिवारी को फर्जी मामलों में फंसाया

रायपुर । बस्तर में ईमानदार और निरपेक्ष पत्रकारों पर हमले जारी हैं। इस बार पुलिस ने षड्यंत्र कर तीन माह पुराने मामले में देशबंधु बस्तर के ब्यूरोचीफ व छत्तीसगढ़ सरकार के अधिमान्यता प्राप्त पत्रकार देवशरण तिवारी का नाम चालान पेश करते समय न केवल आरोपियों की लिस्ट में जोड़ा बल्कि उन्हें फरार भी बताया है। ज्ञात हो कि तीन माह पूर्व बस्तर परिवहन संघ के दो गैंग के बीच खूनी संघर्ष हुआ था। इस पूरे मामले को लेकर देवशरण ने खुद लगातार समाचार कवरेज किया था। देशबंधु कार्यालय के ठीक बगल में स्थित बस्तर परिवहन संघ के कार्यालय को सील करते समय पुलिस ने पंचनामा में देवशरण का भी हस्ताक्षर कराया था।

यही नहीं, इन तीन माह में देवशरण को पुलिस विभाग के कई पत्रकार वार्ता में भी बुलाया गया पर पुलिस ने कोर्ट में झूठा चालान पेशकर उन्हें फरार बताया है। देवशरण तिवारी को पिछले वर्ष पीयूसीएल की ओर से मानवाधिकार की पत्रकारिता के लिए निर्भीक पत्रकारिता सम्मान दिया गया था। दक्षिण बस्तर के पत्रकार प्रभात सिंह का मानना है कि देवशरण खुद सरकारी अधिमान्यता प्राप्त पत्रकार हैं पर उनसे कोई पूछताछ किये बिना गंभीर आपराधिक प्रकरणों में उन्हें सह आरोपी बनाए जाने के पीछे बस्तर में बनाये गए डरावने माहौल के बीच भी बिना डरे उनके द्वारा की जा रही निर्भीक पत्रकारिता ही है। प्रभात सिंह खुद भी पिछले वर्ष तीन माह जेल होकर आए हैं और अभी जमानत पर हैं। इनके अलावा तीन और पत्रकार पिछले वर्ष नक्सली सहयोगी बता का जेल भेजे गए थे, जिसमे अनवर खान और सोमारू नाग बाईज्जत बरी हो गए जबकि संतोष यादव अभी जमानत में हैं।

पत्रकार देवशरण ने बताया कि सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया, पत्रकार मालिनी सुब्रमण्यम, सीपीआई नेता मनीष कुंजाम और सोनी सोरी पर हमले की रिपोर्टिंग के दौरान पुलिस द्वारा बनाये गए संगठनों के कई पदाधिकारियों ने उन्हें कई बार फंसाये जाने की धमकी दी थी। देवशरण के अनुसार पुलिस ने जिस गैंगवार के मामले में उसे आरोपी बनाया है उसमें एक पक्ष का प्रमुख मनीष पारेख है जो बदनाम और भंग हो चुके सामाजिक एकता मंच का प्रमुख और स्थानीय विधायक का भाई है। अग्नि और सामाजिक एकता मंच के द्वारा पूर्व आईजी के सरंक्षण में जब सामाजिक कार्यकर्ताओं, नेताओं और पत्रकारों पर हमले किये जा रहे थे और आतंक का माहौल बनाया गया था, तब देवशरण ही उन इक्के दुक्के पत्रकारों में शामिल थे जो सच को देश के सामने ला रहे थे।

ज्ञात हो कि बस्तर और पूरे प्रदेश में पत्रकारों को फर्जी मामलों में फंसाकर डराए जाने के खिलाफ पिछले वर्ष प्रदेश भर के पत्रकारों ने पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग को लेकर आंदोलन किया था, तब प्रदेश के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने प्रतिनिधि मंडल से बात करते हुए पत्रकारों की सुरक्षा के लिए एक उच्चस्तरीय समिति की घोषणा की थी। इस समिति की पिछले एक साल में अभी तक किसी बैठक होने की खबर नहीं है। तय हुआ था कि इस समिति द्वारा जांच के बाद ही किसी पत्रकार के खिलाफ प्रकरण दर्ज किया जा सकेगा।

इस सम्बंध में बस्तर पुलिस अधीक्षक शेख आरिफ ने बताया कि गैंगवार प्रकरण का चालान शुक्रवार को न्यायालय में पेश किया गया है। इस प्रकरण में कोई आरोपी पत्रकार भी है, यह उनकी जानकारी में नहीं है। उन्होंने बताया कि अभी वे जगदलपुर से बाहर हैं। अतः आकर ही बता पाएंगे कि पत्रकार के खिलाफ प्रकरण निर्धारित प्रक्रिया से हुई है या नहीं। उन्होंने सरकार द्वारा पत्रकारों की गिरफ्तारी को लेकर कोई उच्चस्तरीय समिति बनाये जाने की जानकारी होने से इनकार किया।

आप नेता सोनी सोरी ने बस्तर पुलिस पर पत्रकारों डराने के लिए षड्यंत्र करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि खुलेआम षड्यंत्र कर फर्जी तरीके से तीन माह पुराने मामले में पत्रकार देवशरण को फंसाकर बस्तर पुलिस ने जता दिया है कि उन्हें रमन सरकार द्वारा बनाये किसी समिति की परवाह नहीं है। प्रदेश में पिछले दो वर्ष से संघर्ष कर रहे पत्रकार सुरक्षा संयुक्त संघर्ष समिति जुड़े तामेश्वर सिन्हा ने इस मामले में दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक षडयंत्र का मामला दर्ज करने और पत्रकार देवशरण के खिलाफ मामला तत्काल वापस लेने अन्यथा प्रदेशव्यापी आंदोलन की चेतावनी दी है। बस्तर आईजी का मोबाइल नंबर 9425595544, पुलिस अधीक्षक का मोबाइल नंबर 9479194003 और पत्रकार देवशरण तिवारी का मोबाइल नंबर 9009988019 है।

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एक आदिवासी की हत्या का प्रशासनिक जश्न बनाम विरोध की खबरों का दम घोंटा जाना

रूपेश कुमार सिंह


झारखंड के गिरिडीह जिला के पीरटांड़ प्रखंड के मधुबन थाना अंतर्गत जैन तीर्थावलम्बियों के विश्व प्रसिद्ध तीर्थस्थल पारसनाथ पर्वत की तलहटी में स्थित आदिवासी गांव ढोलकट्टा के समीप 9 जून 2017 को माओवादियों व सीआरपीएफ कोबरा के बीच मुठभेड़ होती है और उसी दिन शाम में पुलिस दावा करती है कि मुठभेड़ में एक दुर्दांत माओवादी को मार गिराया गया है, साथ ही उसके पास से एक एसएलआर व गोली समेत कई चीजें दिखाई जाती है।

10 जून को झारखंड के डीजीपी डी के पांडेय हवाई मार्ग से मधुबन पहुंचते हैं और ‘भारत माता की जय’ ‘सीआरपीएफ की जय’ के नारे के उद्घोष के बीच गिरिडीह एसपी बी वारियार को एक लाख रूपये मुठभेड़ में शामिल जवानों को बड़ी पार्टी देने के लिए देते हैं और अलग से 15 लाख रूपये इनाम देने की घोषणा भी करते हैं। इस खबर को झारखंड के तमाम अखबारों के तमाम एडिसन में प्रमुखता से प्रकाशित किया जाता है। मुठभेड़ में मारे गए क्या सच में दुर्दांत माओवादी थे?

इस सवाल का जवाब 11 जून को मिल गया, जब मारे गये आदिवासी की पहचान उजागर हुई तो पता चला कि जिसे मारकर प्रशासन अपना पीठ खुद ही थपथपा रही है और जिसकी हत्या का जश्न भी अब तक प्रशासन मना चुकी है, दरअसल वह एक डोली मजदूर था, जो कि तीर्थयात्रियों को डोली पर बिठाकर अपने कंधे पर उठाकर तीर्थस्थल का भ्रमण कराता था और साथ ही पारसनाथ पर्वत पर स्थित चंद्र मंदिर के नीचे एक छोटा सा होटल भी चलाता था, जिसमें डोली मजदूर चावल-दाल व सत्तू खाया करते थे। उस डोली मजदूर का नाम मोतीलाल बास्के था। वह धनबाद जिला के तोपचांची प्रखंड अंतर्गत चिरूवाबेड़ा का रहनेवाला था, लेकिन कुछ दिन से अपने ससुराल गिरिडीह जिला के पीरटांड़ प्रखंड अंतर्गत ढोलकट्टा में ही रहकर प्रखंड से पास किया गया प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अपने आवास को बनवा रहा था।

9 जून को वह ढोलकट्टा से पारसनाथ पर्वत स्थित अपने दूकान ही जा रहा था, लेकिन हमारे देश के ‘बहादूर’ अर्द्धसैनिक बल सीआरपीएफ कोबरा ने उसकी हत्या करके उसे दुर्दांत माओवादी घोषित कर दिया और उसकी हत्या का जश्न भी सरकारी खजाने से मनाया। अब जबकि यह बात पूरी तरह से साफ हो चुकी है कि मृतक मोतीलाल बास्के एक डोली मजदूर था और डोली मजदूरों के एकमात्र संगठन मजदूर संगठन समिति का सदस्य भी था, उसकी सदस्यता संख्या 2065 है।

एक आदिवासी होने के नाते वह आदिवासी संगठन सांवता सुसार बैसी का भी सदस्य था और 26-27 फरवरी 2017 को मधुबन में आयोजित मारांड. बुरु बाहा पोरोब में विधि व्यवस्था का दायित्व भी संभाला था, जिसमें झारखंड की राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू मुख्य अतिथि के बतौर शामिल हुई थीं। मृतक मोतीलाल बास्के को प्रधानमंत्री आवास योजाना के तहत मकान बनाने के पैसे भी मिले हैं, जिससे वे मकान बना रहे थे।

माओवादी बताकर मोतीलाल बास्के की हत्या पुलिस द्वारा कर दिए जाने का सच पारसनाथ पर्वत के अगल-बगल के गांवों में पहुंचते ही आम लोगों में गुस्सा बढ़ने लगा और 11 जून को मधुबन के हटिया मैदान में मजदूर संगठन समिति ने एक बैठक कर मोतीलाल बास्के का सच सबके सामने लाया। इस बैठक में आदिवासी संगठन सांवता सुसार बैसी के अलावा स्थानीय जनप्रतिनिधि भी शामिल हुए और 14 जून को वहीं पर महापंचायत करने का निर्णय लिया गया। धीरे-धीरे फर्जी मुठभेड़ का सच बाहर आने लगा।

12 जून को भाकपा (माले) लिबरेशन की एक टीम ने अपने गिरिडीह जिला सचिव के नेतृत्व में मृतक के परिजनों से मुलाकात करते हुए इस फर्जी मुठभेड़ की न्यायिक जांच व दोषी पुलिसकर्मियों को सजा देने की मांग के साथ 15 जून को पूरे जिला में प्रतिवाद दिवस मनाने की घोषणा की, साथ ही मृतक की पत्नी को 5 हजार रूपये की आर्थिक मदद भी की।

13 जून को झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेतागण ढोलकट्टा जाकर मृतक के परिजनों से मुलाकात की व मृतक की पत्नी की बात झारखंड के विपक्ष के नेता व पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से करायी, जिसमें उन्होंने उनको न्याय दिलाने का वादा किया। 14 जून को मधुबन में आयोजित मजदूर संगठन समिति के महापंचायत में सैकड़ों गांवों के हजारों ग्रामीणों के साथ-साथ झामुमो, झाविमो, भाकपा (माले) लिबरेशन, आदिवासी संगठन सांवता सुसार बैसी व स्थानीय तमाम जनप्रतिनिधि- जिला परिषद सदस्य, प्रखंड प्रमुख व कई पंचायत के मुखिया शामिल हुए। महापंचायत ने इस फर्जी मुठभेड़ के खिलाफ 17 जून को मधुबन बंद, 21 जून को गिरिडीह में उपायुक्त के समक्ष धरना, 2 जुलाई को पूरे गिरिडीह जिला में मशाल जुलूस व 3 जुलाई को गिरिडीह बंद की घोषणा की। 15 जून के अखबारों में भाकपा (माओवादी) का बयान भी आया कि मोतीलाल बास्के उनके पार्टी या पीएलजीए का सदस्य नहीं है।

उलगुलान के सृजनकार महान छापामार योद्धा बिरसा मुंडा के शहादत दिवस 9 जून को ही फर्जी मुठभेड़ में एक आदिवासी मजदूर की हत्या को माओवादी हत्या के रूप में पूरे झारखंड के तमाम अखबारों ने अपने तमाम एडीसन में मुख्य पृष्ठ पर जगह दी, लेकिन अब जबकि यह साबित हो चुका है कि मृतक मोतीलाल बास्के माओवादी नहीं था, तो सभी अखबारों ने इन तमाम समाचारों को गिरिडीह के पन्नों में ही कैद कर रखा है।

तमाम अखबारों ने डीजीपी द्वारा एसपी को एक लाख रूपये हत्यारों को पार्टी देने की खबरों को प्रमुखता से छापा था, लेकिन आज कोई अखबार यह सवाल नहीं कर रहा है कि आखिर एक ग्रामीण आदिवासी की हत्या का जश्न क्यों और कब तक? फर्जी मुठभेड़ की घटना को अब एक सप्ताह होने को हैं, लेकिन देश के मानवाधिकार संगठनों, बुद्धिजीवियों व न्यायपसन्द नागरिकों के कानों पर अब तक जूं भी क्यों नहीं रेंग रही? उनके लिए एक आदिवासी की हत्या और हत्यारे पुलिस अधिकारियों के द्वारा हत्या का जश्न मनाना कोई बेचैनी का सवाल क्यों नहीं बनता?

लेखक रूपेश कुमार सिंह स्वतंत्र पत्रकार हैं. इनसे संपर्क singh0085.rupesh@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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नक्सलबाड़ी अर्द्धशताब्दी समारोह की रपट

तेभागा और तेलंगाना के बाद नक्सलबाड़ी किसान आंदोलन ने समाज, राजनीति और संस्कृति पर काफी असर पैदा किया। इसे ‘वसन्त का बज्रनाद’ के नाम से भी जाना जाता है। बीते 25 मई को इस आंदोलन ने पचास साल पूरे किए। इतना लम्बा समय बीत जाने के बाद भी उस आंदोलन की राजनीतिक व वैचारिक उष्मा संघर्षशील जन समुदाय और प्रगतिशील व जनवादी बौद्धिकों द्वारा आज भी महसूस की जाती है। वर्तमान चुनौतियों के संदर्भ में नक्सलबाड़ी को याद करने, उसकी दशा-दिशा और उसके सांस्कृतिक प्रभाव पर विचार करने के लिए जन संस्कृति मंच की ओर से ‘नक्सलबाड़ी अर्द्धशताब्दी समारोह’ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम स्थानीय जयशंकर प्रसाद सभागार, कैसरबाग, लखनऊ  में हुआ। इसके मुख्य अतिथि थे जाने माने वामपंथी चिन्तक कामरेड जयप्रकाश नारायण तथा कार्यक्रम की अध्यक्षता जन संस्कृति मंच के प्रदेश अध्यक्ष कौशल किशोर ने की। समारोह का आरम्भ शहीद वेदी पर पुष्पांजलि से हुआ। दो सत्रों में बंटे इस कार्यक्रम में कविता पाठ के साथ परिसंवाद का आयोजन था।

‘क्रान्तिकारी संघर्ष और जन संस्कृति’ विषय पर आयोजित परिसंवाद कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि जयप्रकाश नारायण ने कहा कि आज जब हम नक्सलबाड़ी की 50 वीं वर्षगांठ मना रहे हैं तब हमें उसकी उपलब्धियों को आज की वास्तविकता के संदर्भ में देखने की जरूरत है। यह एक ऐसा किसान विद्रोह था जिसने वर्ग संघर्ष के नए प्रतिमानों को गढ़ा। इसने उत्पीडि़त भूमिहीन गरीबों की पीड़ा और उनके आक्रोश को बड़े जन प्रतिरोध में बदल दिया। आज के कृषि संकट के दौर में नक्सलबाड़ी का संदेश बिल्कुल स्पष्ट है। लाखों किसानों को खुद अपनी जान लेने पर मजबूर होना पड़ रहा है। देश कॉरपोरेट लूट और साम्प्रदायिक घ्रवीकरण की पाटों के बीच पिस रहा है। ऐसी हालत में जन प्रतिरोध की लपटों को तेज करने के लिए नक्सलबाड़ी की क्रान्तिकारी ऊर्जा की बड़ी जरूरत है।

समारोह की अध्यक्षता करते हुए कौशल किशोर ने कहा कि नक्सलबाड़ी इतिहास ही नहीं वर्तमान भी है। इसमें भारतीय जनता की वही स्वप्न आकांक्षा है जिसे शहीद भगत सिंह ने देखा था। यह आकांक्षा है शोषण मुक्त समाज की रचना। इस आकांक्षा को सत्ता के दमन-उत्पीड़न से नहीं मारा जा सकता है। जहां अधिकांश आंदोलन समझौते या समर्पण में सिमट गए वहीं नक्सलबाड़ी ने अलग राह बनाई। वह संघर्ष और शहादत की राह में आगे बढ़ा। इसे खत्म करने के लिए तमाम दमन ढाये गये पर वह राख की ढेर से फिनिक्स पछी की तरह जी उठा है। उसका सांस्कृतिक प्रभाव तो ऐसा रहा कि भक्ति आंदोलन व प्रगतिशील आंदोलन के बाद तीसरा सांस्कृतिक आंदोलन है जो राष्ट्रीय स्तर पर संगठित हुआ।

हिन्दी कविता पर नक्सलबाड़ी के प्रभाव पर बोलते हुए कवि व आलोचक चन्द्रेश्वर ने कहा कि इसने न सिर्फ हिंदी कविता, बल्कि अन्य भारतीय भाषाओं में लिखी जा रही कविता को भी एक नयी दिशा-दृष्टि प्रदान करने का कार्य किया। नक्सलबाड़ी आंदोलन के प्रभाव का ही प्रतिफल था कि पुराने प्रगतिशील कवियों में नागार्जुन, केदार, शमशेर, मुक्तिबोध और त्रिलोचन के साथ-साथ इनके कुछ बाद के कवियों में रघुवीर सहाय और सर्वेश्वर आदि को भी नयी पीढ़ी के कवियों ने अपना नायक कवि माना। यह आंदोलन से पैदा हुयी समझ ही थी कि एक कलमकार एक हलवाहे से अपने को अभिन्न मानता है। आज हिंदी कविता में जिस प्रतिरोध की चेतना की बात की जाती है, वह नक्सलबाड़ी से उत्पन्न परिवर्तन कामी चेतना का ही प्रभाव है। आज का दौर रचना और संस्कृति कर्म के लिये एक चुनौती भरा दौर है। आज जो भी बुद्धिजीवी है, ज्ञान और विवेक की तर्कसम्मत परम्परा से जुड़ा हुआ है, सरकार की निगाह में नक्सली है। आज जिस तरह से वर्तमान सत्ता के दलाल अरुंधति राय को नक्सली घोषित कर रहे हैं, कल कोई भी सच के पक्ष में खड़ा लेखक नक्सली करार दिया जा सकता है।

नाटकों, रंगमंच व सिनेमा पर इस आंदोलन के प्रभाव की चर्चा करते हुए नाटककार राजेश कुमार ने कहा कि पहली बार नक्सलबाड़ी आंदोलन ने रंगमंच को वैचारिकता प्रदान की। सामाजिक नाटक अब राजनीतिक नाटक में बदलने लगे जो जनता के बीच नुक्कड़ नाटक के नाम से प्रचलित हुआ। इसके और भी कई नाम हैं जैसे बंगाल में ‘पोस्टर प्ले’, महाराष्ट्र में ‘प्लेटफार्म प्ले’ आदि। इसने संास्कृतिक आंदोलन का रूप अख्तियार कर लिया है। जल, जंगल और जमीन की लड़ाई से जुड़ गया है। भले ही सत्ता इसे एक खास राजनीति से जोड़ देती है, इसकी धार को भोथरा करने में लगी है और दमन ढा रही है लेकिन प्रतिरोध की यह धारा मांदल की गूंज की तरह फेले, यह आज की जरूरत है।

संगोष्ठी को सोशल एक्टिविस्ट सुभाष गताडे ने कहा कि क्रान्ति हमारी जिनदगी का सवाल है इसी आन्दोलन के चलते जन और संस्कृति के सामने कई सवाल खड़े होते है. उनहोने कहा कि संस्कृति सिर्फ रचना नहीं है वह हमारे अतीत के आन्दोलनों की एक मुक्कमल तस्वीर भी है, जीवन शैली भी है। यह ऐसा समय है जब हमें जन को परिभाषित करने की जरूरत है.  एक्टिविस्ट व अनुवादक अवधेश कुमार सिंह और कवि भगवान स्वरूप कटियार ने भी संबोधित किया.

कार्यक्रम में अजय सिंह, एस आर दारापुरी, राम किशोर, शकील सिद्दीकी, विनय दास, किरण सिंह, प्रज्ञा पांडेय, ओ पी सिन्हा, रविकांत, बंधू कुशावर्ती, आर के सिन्हा, रमेश सेंगर, राम कृष्ण, नासिर अहमद, मेहदी हसन रिज़वी, अशोक श्रीवास्तव, प्रवाल सिंह, नितिन राज, सुरेंद्र प्रसाद, मीणा सिंह, मंजू प्रसाद, इंदू पांडेय, मोहित पांडेय, विमल किशोर, रामायण प्रकाश, बी एम प्रसाद, रामराज डेविड, सी एम् शुकला, वीरेंदर त्रिपाठी आदि मौजूद थे. सञ्चालन जसम लखनऊ के संयोजक श्याम अंकुरम ने किया।

कविता पाठ – लोकपथ पर मुक्ति का अग्निरथ

‘लोकपथ पर मुक्ति का अग्निरथ’ बांगला के प्रसद्ध कवि सरोज दत्त के काव्य की पंक्ति है जो आंदोलन के दौरान शहीद हुए। आज के कविता पाठ कार्यक्रम का यही शीर्षक था। इसके अन्तर्गत डॉ उषा राय ने नागार्जुन की कविता ‘भोजपुर’ सुनाई। जनता ही किसी कवि के लिए ऊर्जा का अजस्र श्रोत है और उसका जीवन और संघर्ष प्राणवायु का काम करता है। नागार्जुन कहते हैं – ‘यहाँ अहिंसा की समाधि है/यहाँ कब्र है पार्लमेंट की/भगतसिंह ने नया-नया अवतार लिया है/अरे यहीं पर/जन्म ले रहे/आजाद चन्द्रशेखर भैया भी……एक-एक सिर सूँघ चुका हूँ/एक-एक दिल छूकर देखा/इन सबमें तो वही आग है, ऊर्जा वो ही…/चमत्कार है इस माटी में/इस माटी का तिलक लगाओ/बुद्धू इसकी करो वंदना/यही अमृत है, यही चंदना।’ उषा राय ने पाश की कविता ‘हम लड़ेंगे साथी’ का भी पाठ किया जिसमें संघर्ष की संस्कृति की अभिव्यक्ति है। वे कहते हैं – ‘ हम लड़ेंगे जब तक/दुनिया में लड़ने की जरुरत बाकी है/जब तक बंदूक न हुई, तब तक तलवार होगी/जब तलवार न हुई, लड़ने की लगन होगी/लड़ने का ढंग न हुआ, लड़ने की जरूरत होगी।’ इस मौके पर गोरख पाण्डेय की मशहूर कविता ‘कैथरकलां की औरतें’ भी सुनाई जो औरतों के अन्दर के संघर्ष की जीजिविषा को सामने लाती है। डा संदीप कुमार सिंह ने बांगला के क्रान्तिकारी कवि नवारुण भट्टाचार्य की चर्चित कविता ‘यह मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश’ का पाठ किया – ‘यह मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश/यह जल्लादों का उल्लास-मंच नहीं है मेरा देश/यह विस्तीर्ण शमशान नहीं है मेरा देश/यह रक्त रंजित कसाईघर नहीं है मेरा देश’।

संदीप कुमार सिंह, सह संयोजक जसम लखनऊ की ओर से जारी. मो – 8765231081, 8400208031

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बस्तर के आईजी कल्लूरी ने जिस पत्रकार सोमारू नाग को नक्सली बताकर जेल में ठूंसा उसे कोर्ट ने बाइज्जत बरी करने का आदेश दिया

Kamal Shukla : ब्रेकिंग न्यूज़ जगदलपुर… पत्रकार सोमारू नाग को न्यायालय ने किया बाइज्जत बरी। पत्रकार सोमारू नाग को फर्जी मामला बनाकर बस्तर आईजी शिव राम प्रसाद कल्लूरी ने था फँसाया। एक साल पहले किया था कल्लूरी ने फर्जी मामले में गिरफ्तार। केंद्रीय जेल जगदलपुर में थे एक साल से सोमारू नाग। कर रहे थे न्याय का इन्तजार।

सोमारू नाग के वकील अरविन्द चौधरी ने कोर्ट में विस्तार से प्रमाण व दस्तावेजों के साथ पूरी कहानी बताई जिससे अदालत ने सोमारू नाग को रिहा करने का आदेश दिया। बस्तर के दुर्दांत पुलिस अधिकारियों के बनाये गए झूठे प्रकरण से बेदाग़ बाहर आने वाले ग्रामीण पत्रकार सोमारू नाग की रिहाई तथा भारतीय न्यायपालिका का उसे नक्सल मामले से निर्दोष रिहा करने का फैसला लोकतन्त्र की जीत है। साथ ही पत्रकार सुरक्षा कानून को लेकर लड़ी जा रही हमारी लड़ाई के लिए भी राहत पहुंचाने वाली खबर है।

पत्रकार कमल शुक्ला की एफबी वॉल से.

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IAS Amit Kataria ने Journalist Kamal Shukla को धमकाया- ‘दो कौड़ी का आदमी, साले, कीड़े, चूजे, मच्छर, मक्खी… तुझे तो ऐसे ही मसल दूंगा’ (सुनें टेप)

अमित कटारिया, कलक्टर, बस्तर (फोटो सौजन्य : फेसबुक)

छत्तीसगढ़ में तैनात आईएएस और आईपीएस विवादों में रहते हैं. दमन करने से लेकर धमकाने तक के लिए. बस्तर जिले के कलक्टर अमित कटारिया काला चश्मा पहनकर पीएम नरेंद्र मोदी से मिलने के मामले में कुख्यात रहे तो अब यही आईएएस एक पत्रकार बुरी तरह और गंदी भाषा में धमकाने के लिए चर्चा में है. दरअसल जेएनयू से कई प्रोफेसर बस्तर के एक गांव में गरीबों से मिलने और सामाजिक अध्ययन करने गए थे. उन्होंने बातचीत में ग्रामीणों को नक्सलियों और राज्य की पुलिस दोनों से दूर रहकर खुद का जीवन बेहतर करने की सलाह दी थी. मौके की ताक में बैठे रहने वाली रमन सरकार के कारिंदों ने गांव वालों को चढ़ाया, भड़काया और उनसे इन प्रोफेसरों के खिलाफ शिकायत ले ली कि ये लोग ग्रामीणों को भड़का रहे थे.

इस शिकायत को डीएम अमित कटारिया ने अपने फेसबुक वॉल पर डाल दिया और मीडिया को इस तरह ब्रीफ किया गया मानों प्रोफेसर लोगों ने गांव वालों को नक्सलियों के साथ मिलजुल कर लड़ने का गुर दिया हो. ऐसा ही कुछ हर जगह छपा और ऐसा ही राज्य मशीनरी ने प्रचारित किया. इसी मसले को लेकर पत्रकार कमल शुक्ला ने डीएम अमित कटारिया को फोन किया और गंदी मानसिकता के तहत प्रोफेसरों को बदनाम किए जाने की शिकायत की. इतना सुनकर आईएएस अमित कटारिया आपा खो बैठा और लगा पत्रकार को धमकाने. पूरी बातचीत सुनिए और सोचिए कि जिन्हें जनता का सेवक कहा जाता है, वो खुद को किसी सद्दाम हुसैन से कम नहीं समझते.

लोकतंत्र में आईएएस – आईपीएस नामक प्रजाति किस कदर रक्षक से भक्षक कैटगरी में शिफ्ट हो रही है, इसकी मिसाल यह टेप है. कायदे से तो कलक्टर को विनम्रता पूर्वक पत्रकार द्वारा कहे गए शब्द पर आपत्ति प्रकट कर फोन काट देना चाहिए था. आखिर पद की गरिमा भी होती है. लेकिन आईएएस अमित कटारिया ने सड़क छाप मवालियों वाली भाषा का इस्तेमाल कर अपना ओरीजनल चेहरा दिखा दिया. आप इस आईएएस से कैसे जनप्रिय और निष्पक्ष अधिकारी होने की उम्मीद कर सकते हैं जो थोड़ा सा आरोप लगने पर इस कदर बिलबिला जाता कि अपने पद गरिमा दायित्व सब कुछ को भूल कर धमकाने लग जाता है.

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https://www.youtube.com/watch?v=VxJH8p7Tmr0

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