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सुख-दुख

मीडिया में एडिटिंग के काम को राह का रोड़ा घोषित किया जा चुका है!

रंगनाथ सिंह-

समरेंद्र भाई की नीचे दिख रही पोस्ट ने सुबह-सुबह दुखती रग पर हाथ धर दिया। रिपोर्टिंगवाद पत्रकारिता का नस्लवाद है। यह कुछ वैसा ही है जैसे हर कोई प्रधानमंत्री बनना चाहे लेकिन कोई संतरी न बनना चाहे। कोई भी सिस्टम हो, पेशा हो, उसमें बहुत सारे रोल होते हैं।

अब तो रिपोर्टर को भी दोयम दर्जे पर ढकेला जा चुका है। रिपोर्टर के साथ अब वही होता है जो पहले कॉपी एडिटर के साथ होता था। अब एंकर रिपोर्टर से ज्यादा गोरा मान लिया गया है लेकिन रिपोर्टरों का नस्लवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। पिछले कुछ दशकों में यह नस्लवाद और तेजी से बढ़ा है क्योंकि अमेरिकी सेठ की कृपा से एंकर-रिपोर्टर का कॉकटेल यूट्यूबर बाजार में तेजी से बिक रहा है।

नतीजा यह हुआ कि मीडिया से एडिटिंग का काम लगभग समाप्त हो गया है। समाप्त ही नहीं हो गया है बल्कि उसे राह का रोड़ा घोषित किया जा चुका है। कई नए मूढ़ फख्र से बताते हैं कि उनकी कॉपी एडिट करने लायक एडिटर जनमया ही नहीं! अच्छी बात है लेकिन किसी भी न्यूज रूम में सारे लोग सड़क पर उतर जाएँ, यह सम्भव नहीं है। प्रचुर संसाधन दे दिए जाएँ तो भी दुनिया के सबसे क्रान्तिकारी अखबार में भी आधा काम डेस्क पर होता होगा। वो आधा काम कौन करेगा? जो करेगा वो बेवकूफ या कमतर है? जमीनी हकीकत यह है कि रिपोर्टिंग इतना महँगा सौदा साबित हो रहा है कि ज्यादातर संस्थानों में रिपोर्टर उतने ही प्रतिशत बचे हैं जितने प्रतिशत अंग्रेज आजादी से पहले भारत में रहते थे।

मीडिया में कदम रखने वाले नौजवानों को यह समझना चाहिए कि एंकर-रिपोर्टर (पढ़ें छोटा सेलेब्रिटी) बनने का रूमान पालकर इस फील्ड में आने से पहले चार बार सोच लें। याद रखें कि अमिताभ बच्चन को भी अमिताभ बनाने में कई सौ लोग लगते हैं। और अकेले अमिताभ के दम पर कोई फिल्म नहीं बन सकती।

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