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सुख-दुख

राजा भैया का वैवाहिक जीवन कभी सुखी नहीं रहा!

सत्येंद्र पीएस-

रघुराज प्रताप सिंह मेरे कई मित्रों के मित्र हैं। कुछ उनसे जातीय भैयावाद भी गांठे हुए हैं। हालांकि यह इत्तेफाक ही है कि मैं कभी राजा भैया से आमने सामने नहीं मिला।

राजा भैया को मैंने एक सामंती ठाकुर के रूप में ही देखा, जो सबको दबाकर रखता है। जो तालाब में मगरमच्छ पालता है, पुलिस दिखाती है कि तालाब से नरकंकाल मिलते हैं.. आदि आदि।

हालांकि अगर आप यू ट्यूब पर पड़े उनके साक्षात्कार देखें तो उनके प्रति आपकी धारणा बदल जाएगी। वह कभी आपको गुस्से में नजर नहीं आएंगे। आपने कभी उन्हें किसी के खिलाफ अपशब्द बोलते कोई वीडियो नहीँ देखा होगा। किसी नेता को तुम कहकर भी संबोधित किया हो, यह भी नहीं पाएंगे। वह निहायत पढ़े लिखे, स्मार्ट, डिसेंट नेता नजर आते हैं।

शादी के 25 साल बाद उनका ब्रेकप होने जा रहा है। मित्रों से बात हुई तो पता चला कि उनका वैवाहिक जीवन कभी सुखी नहीं रहा। जबकि यह भी सत्य है कि न तो कभी राजा भैया का, न उनकी पत्नी का एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर सुनने को आया। इतने बवाल में भी दोनों ने एक दूसरे पर झूठे चारित्रिक आरोप भी नहीं लगाए हैं।
यही सब जीवन के आश्चर्य हैं।

आपको कोई बन्दा हर तरफ से सुखी दिखता है। इलाके के लोग न्याय पाने आते हैं, उनकी पंचायत को निष्पक्ष मानते हैं, सैकड़ों युवा रोजी रोजगार पाते हैं। ऐसे व्यक्ति को निजी जीवन मे ही प्यार के लिए तरसना पड़ रहा है।

मुझे नहीं लगता कि रघुराज प्रताप की इच्छा नहीं होगी कि वह प्यार से रहें। पत्नी की बाहों में बाहें डालकर घूमें। उसकी गोदी में सिर रखकर लेटें। बात करें। लेकिन सब कुछ होने के बावजूद यह नहीं हो पा रहा है। यह कितनी सहज सरल चीज है, इसे हासिल करने के लिए किसी मेहनत, किसी अतिरिक्त श्रम की जरूरत नहीं है, लेकिन नहीं मिल पा रही है। शायद ज़िंदगी को सहज सरल बनाने से यह प्यार सम्भव हो पाता। यह प्यार पाने के लिए पॉजिटिव वाइब्स जरूरी हैं। आपके मस्तिष्क में जितनी सरलता सहजता रहेगी, क्रोध कम रहेगा, जिंदगी उतनी ही आसान होती है।

ऐसा नहीं है कि यह एकतरफा हो सकता है। एक सचान जी ने पूछा कि ऐसा कैसे होता है कि अगर हम किसी से प्यार करते हैं, उसे याद करते हैं तो वह खुद या उस व्यक्ति का फोन हमारे पास आ जाता है?

मेरे साथ अक्सर ऐसा होता है। किसी को फोन करता हूँ तो वह व्यक्ति बोलता है कि अभी अभी आपको याद कर रहा था। जब फोन नहीं था तो दर्जनों बार तो ऐसा हुआ है कि मेरे बारे में चर्चा हो रही है और मैं उसी समय वहां पहुँच गया। पता नहीं किस सेंस में इसके लिए कहावत भी प्रचलित है, “शैतान का नाम लिया, शैतान हाजिर।”

दरअसल जब आप किसी के बारे में पॉजिटिव सोचते हैं तो आप सामने वाले को पॉजिटिव सिग्नल भेज रहे होते हैं। नेगेटिव सोच रहे हैं तो नेगेटिव सिग्नल भेज रहे होते हैं। जिसमे मुंह से आमने सामने बोल देना जरूरी नहीं है। कहीं न कहीं मस्तिष्क ही सिग्नल भेजता है और दूसरे का मस्तिष्क उसे कैच करता है। अगर आपका थॉट प्रोसेस नेगेटिव है तो फिर आप नेगेटिविटी का सिग्नल भेज रहे होते हैं।

यह बहुत कम समय में जाना जा सकता है। आप अपने किसी शत्रु के ऊपर इसे आजमाएं। सोचना शुरू करें कि उसमें क्या क्या अच्छाइयां हैं। उससे हृदय से मिलें। ऐसा नहीं कि अंदर से उसे मार डालने की इच्छा हो रही है और उसे देखकर मुस्कुराए जा रहे हैं। इससे पॉजिटिव वाइब्स नहीं जाएंगी उसके पास। धीरे धीरे करके उसके बारे में अच्छा सोचना शुरू कर दें, आपके प्रति उसका व्यवहार भी बदला हुआ मिलेगा।

अब निश्चित रूप से रघुराज प्रताप सिंह से मेरी मिलने की इच्छा हो रही है। खासकर ऐसी मुलाकात जिसमें घण्टों साथ रहकर सरलता से बात हो सके।

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